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अपिया, समोया में लघु द्वीपीय विकासशील राज्‍यों पर तीसरे संयुक्‍त राष्‍ट्र सम्‍मेलन में फिजी में भारत के उच्‍चायुक्‍त तथा भारतीय प्रतिनिधि द्वारा वक्‍तव्‍य (3 सितंबर, 2014)

सितम्बर 03, 2014

अध्‍यक्ष महोदय,
महामहिम,
देवियो एवं सज्‍जनो,


सबसे पहले मैं इस सम्‍मेलन का आयोजन करने तथा समोया के लोगों के गर्मजोशीपूर्ण अतिथि सत्‍कार के लिए समोया सरकार को बधाई देना चाहता हूँ तथा प्रशंसा करना चाहता हूँ।

इस सुंदर द्वीप में अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय का स्‍वागत करने, अनोखी परिस्थितियों वाली दुनिया से सीधा परिचय करने तथा छोटे द्वीप के हमारे दोस्‍त जिस तरह का जीवन जीते हैं तथा जिन विशेष परिस्थितियों को वे सामना करते हैं उनसे परिचय कराने के लिए वास्‍तव में हम सभी एस आई डी एस के आभारी हैं।

साथी विकास देश के रूप में एस आई डी एस के साथ भारत के मैत्री एवं घनिष्‍टता के परंपरागत एवं मजबूत रिश्‍ते हैं तथा इस सम्‍मेलन के माध्‍यम से और आने वाले वर्षों में हम इन रिश्‍तों को सुदृढ़ करने की आशा करते हैं। चूंकि भारत की तटरेखा 7500 किमी से अधिक लंबी है तथा द्वीपों के अनेक समूह मुख्‍य भूभाग से काफी दूर स्थित हैं इसलिए एस आई डी एस द्वारा जिन विशेष परिस्थितियों का सामना किया जाता है उसके प्रति भारत गहन रूप से सजग है।

अध्‍यक्ष महोदय,

यह सम्‍मेलन एस आई डी एस पर है। परंतु यह केवल एस आई डी एस के बारे में सम्‍मेलन नहीं है। यह सम्‍मेलन इस बारे में है कि अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय एस आई डी एस की सहायता करने के लिए क्‍या कर सकता है।

भारत इस सम्‍मेलन से महत्‍वाकांक्षा एवं सफल परिचय की अपेक्षा करता है ताकि एस आई डी एस के लिए मजबूत अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग का एक चरण तैयार किया जा सके।

अध्‍यक्ष महोदय,

जिन अनोखी चुनौतियों का एस आई डी एस को सामना करना पड़ता है उनको कई वर्षों से अच्छी तरह से स्‍वीकार किया गया है।

रियो+20 सम्‍मेलन ने नोट किया था कि गरीबी उन्‍मूलन एवं ऋण संपोषणीयता के मामले में अधिकांश अन्‍य समूहों की तुलना में एस आई डी एस ने कम प्रगति की है। सहस्राब्‍दी विकास लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने में भी एस आई डी एस की समग्र प्रगति असमान है।

उनकी दूरी एवं संयोजकता का अभाव, सीमित भूमि संसाधन, छोटी आबादी, सीमित स्‍तर की अर्थव्‍यवस्‍था, विविधीकरण का अभाव, उत्‍पादन एवं परिवहन की ऊंची लागत तथा बाहरी आघातों के प्रति अरक्षिता आदि की वजह से एस आई डी एस को प्रभावित करने वाली संरचनात्‍मक कमियों ने एस आई डी एस को स्‍पष्‍ट रूप से नुकसान की स्थिति में रखा है। हाल के वर्षों में जो वित्‍तीय, ऊर्जा एवं खाद्य संकट उत्‍पन्‍न हुए हैं उनसे ये कमजोरियां और भी सुस्‍पष्‍ट हुई हैं।

एसआईडीएस को जलवायु परिवर्तन एवं समुद्री स्‍तर के ऊपर उठने के सख्‍त संकट का सामना करना पड़ रहा है तथा इस वैश्विक संकट के उत्‍पन्‍न होने में जितना है उसकी तुलना में वे सबसे अधिक पीडि़त हैं।

एसआईडीएस की अरक्षिता को कम करना तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी लोच को मजबूत करना अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय की सामूहिक जिम्‍मेदारी होनी चाहिए।

अध्‍यक्ष महोदय,

अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय ने काफी पहले से एस आई डी एस की विशेष परिस्थितियों को स्‍वीकार किया है तथा उनके साथ अपनी एकता व्‍यक्‍त की है। परंतु दुर्भाग्‍य से घोषित प्रतिबद्धता के अनुपात में वैश्विक स्‍तर पर प्रयास नहीं किए गए हैं।

हम उम्‍मीद करते हैं कि इस सम्‍मेलन में हम जिस समोया पथ को अपनाने जा रहे हैं वह इस गतिकी में परिवर्तन का प्रतीक बनेगा तथा संपोषणीय विकास प्राप्‍त करने के लिए एस आई डी एस के प्रयासों के लिए खरे अंतर्राष्‍ट्रीय समर्थन का मार्ग प्रशस्‍त करेगा।

अपनी संरचनात्‍मक कमजोरियों को दूर करने में एस आई डी एस में लोच का निर्माण करना समोया पथ मुख्‍य आधार बना रहना चाहिए। समोया पथ से एस आई डी एस को अधिक वित्‍तीय एवं प्रौद्योगिकी सहायता के प्रावधान का भी सुनिश्चय होना चाहिए ताकि उनके राष्‍ट्रीय प्रयासों में मदद की जा सके।

अध्‍यक्ष महोदय,

एसआईडीएस पर इस तीसरे सम्‍मेलन का आयोजन बहुत उपयुक्‍त समय पर हो रहा है क्‍योंकि आने वाले दिनों में अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय अगले दशक के लिए विकास के एक नए एजेंडा का खुलासा करने वाला है।

2015 पश्‍चात विकास एजेंडा में एस आई डी एस के हितों एवं सरोकारों को प्रमुख स्‍थान मिलना चाहिए।

विकासशील देशों में गरीबी उन्‍मूलन तथा त्‍वरित एवं स्‍थाई विकास एवं बदलाव की संरचनात्‍मक बाधाओं को दूर करने के लिए कार्य को सर्वोच्‍च प्राथमिकता देकर 2015 पश्‍चात विकास एजेंडा उन चुनौतियों में सार्थक ढंग से कभी लाया जा सकता है जिनका सामना एस आई डी एस को करना पड़ता है।

आपस में अधिक से अधिक जुड़े विश्‍व में, 2015 पश्‍चात विकास एजेंडा से विकास के लिए अनुकूल अंतर्राष्‍ट्रीय परिवेश की परिस्थितियों का सृजन होना चाहिए जिसमें विकासशील देशों को, विशेष रूप से एस आई डी एस को अधिक वित्‍तीय सहायता एवं प्रौद्योगिकी अंतरण का प्रावधान शामिल है। इसमें अंतर्राष्‍ट्रीय व्‍यवस्‍थागत मुद्दों पर भी ध्‍यान दिया जाना चाहिए जिसमें ऋण राहत तथा वैश्विक अभिशासन में विकासशील देशों की आवाज एवं भागीदारी में वृद्धि शामिल है।

अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय को चाहिए कि वे जलवायु परिवर्तन पर चल रही बहुपक्षीय वार्ता के अंग के रूप में एस आई डी एस की अनुकूलन संबंधी तात्‍कालिक आवश्‍यकताओं के प्रति एक ठोस प्रत्‍युत्‍तर प्राप्‍त करने के लिए आवश्‍यक राजनीतिक इच्‍छा शक्ति का भी आह्वान करें।

जलवायु परिवर्तन के प्रति केवल साम्‍यपूर्ण एवं उचित अंतर्राष्‍ट्रीय प्रत्‍युत्‍तर जो समता एवं समान हित के सिद्धांतों पर परंतु विभेदीकृत जिम्‍मेदारियों पर आधारित हो, अनुकूलन की उनकी तात्‍कालिक आवश्‍यकताओं पर ध्‍यान देकर तथा विकसित देशों द्वारा नई एवं अतिरिक्‍त वित्‍तीय एवं प्रौद्योगिकीय सहायता के प्रावधान के माध्‍यम से एस आई डी एस की अनोखी कमजोरियों को दूर कर सकता है।

अध्‍यक्ष महोदय,

संपोषणीय विकास के प्रयास में एस आई डी एस देशों द्वारा जिन विशेष चुनौतियों का सामना किया जाता है उनके प्रति भारत गहन रूप से संवदेनशील है तथा उनको दूर करने के लिए एस आई डी एस द्वारा जो प्रयास किए जा रहे हैं उसका आभारी है।

दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए हमारी प्रतिबद्धता के अंग के रूप में, भारत को इस बात पर गर्व है कि वह एस आई डी एस के साथ विकास संबंधी अपने अनुभव एवं विशेषज्ञता के साथ ही प्रौद्योगिकी संसाधनों को भी साझा करता है।

पिछले दशक में, हमने एस आई डी एस के साथ अपने परस्‍पर सहयोग को सुदृढ़ किया है तथा उनके साथ नए लिंक स्‍थापित किए हैं।

भारत ने मानव एवं संस्‍थानिक क्षमता निर्माण एवं अवसंरचना विकास पर एस आई डी एस के साथ अपने सहयोग को केंद्रित किया है। इसने विविध क्षेत्रों में परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन में मदद की है – जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, अवशिष्‍ट प्रबंधन प्रणालियां, रिमोट सेंसिंग, जल विज्ञानी सर्वेक्षण, टेलीफोन मेडिसीन, सार्वजनिक परिवहन, शिक्षा, सिंचाई प्रणाली, कृषि खाद्य सुरक्षा आदि।

भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (आई टी ई सी) में एस आई डी एस महत्‍वपूर्ण प्रतिभागी रहे हैं, जिसे भारत सरकार के पूर्णत: वित्‍त पोषित द्विपक्षीय सहायता कार्यक्रम के रूप में 1964 में आरंभ किया गया। पिछले वर्षों में एस आई डी एस के लिए प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण के स्‍लाट के उपयोग में निरंतर वृद्धि हुई है।

पिछले वर्षों में, एस आई डी एस के भारत के व्‍यापार में कई गुना वृद्धि हुई है। 2011-12 में एस आई डी एस के साथ कुल व्‍यापार 30 बिलियन अमरीकी डालर से अधिक था। भारत ने एस आई डी एस में आधारभूत सुविधाओं के विकास के लिए भारी मात्रा में ऋण भी प्रदान किए हैं।

इसके अलावा, आपदा राहत, आपातकालीन राहत, मानवीय सहायता तथा विकास की परियोजनाओं के लिए भी भारत एस आई डी एस को सहायता अनुदान प्रदान करता है। 2013-14 तक पिछले चार वर्षों में अकेले प्रशांत क्षेत्र में एस आई डी एस भारत से 6.5 बिलियन डालर से अधिक मूल्‍य के सहायता अनुदान का उपयोग करने में समर्थ हुए।

इसके अलावा, भारत चक्रवात, तूफान, बाढ़ एवं सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति एस आई डी एस देशों की अरक्षिता को ध्‍यान में रखते हुए भारत एस आई डी एस देशों को मानवीय सहायता भी प्रदान करता है।

इस सम्‍मेलन के आयोजन के लिए भारत द्वारा दिया गया 2,50,000 अमरीकी डालर का योगदान भी इसी तरह एस आई डी एस के साथ हमारी परंपरागत एकता का द्योतक है।

एसआईडीएस के विकास के लिए भारत की उच्‍च स्‍तरीय प्रतिबद्धता अडिग है। जैसा कि एस आई डी एस संपोषणीय विकास प्राप्‍त करने के लिए समोया पथ के तहत अपने प्रयासों को नवीकृत कर रहे हैं, वे अपने इस उद्देश्‍य में भारत को एक मजबूत समर्थक एवं तत्‍पर पार्टनर के रूप में गिन सकते हैं।

अध्‍यक्ष महोदय, आपका धन्‍यवाद।

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