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नई दिल्‍ली में आसियान देशों के राजदूतों के पारस्‍परिक गोलमेज मंच पर सचिव (पूर्व) द्वारा दिया गया मुख्‍य भाषण (18 सितम्‍बर, 20014)

सितम्बर 18, 2014

ईईपीसी इंडिया के अध्‍यक्ष श्री अनुपम शाह,
भारतीय उद्योग जगत के प्रतिनिधियो,
आसियान देशों के दिल्‍ली स्‍थित राजदूतो और राजनयिको,


देवियो और सज्‍जनो,


‘‘भारतीय इंजीनियरिंग एवं विनिर्माण क्षेत्र के साथ भागीदारी को बढ़ाना’’ विषय पर आसियान देशों के राजदूतों के साथ ईईपीसी द्वारा आयोजित गोलमेज सम्‍मेलन में भाग लेना मेरे लिए प्रसन्‍नता की बात है। जबकि भारत आसियान देशों के साथ अपनी भागीदारी के तीसरे दशक में प्रवेश कर रहा है, और नवम्‍बर में होने वाली आगामी आसियान-भारत शिखर बैठक के लिए तैयारी कर रहा है, यह एक सामयिक और महत्‍वपूर्ण चर्चा है।

हाल ही के समय में, भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में त्‍वरित परिवर्तन हुआ है और यह कृषि आधारित अर्थव्‍यवस्‍था से ऐसी अर्थव्‍यवस्‍था में बदल गई है जिसमें सेवा क्षेत्र हमारे सकल घेरलू उत्‍पाद में 57 प्रतिशत का अंशदान करता है। यद्यपि विनिर्माण क्षेत्र हमारे सकल घरेलू उत्‍पाद में केवल 16 प्रतिशत का अंशदान करता है, तथापि यह सतत रूप से बढ़ रहा है। मैकिन्‍सी एंड कम्‍पनी द्वारा किए गए हाल ही के अध्‍ययन के अनुसार, भारत का विनिर्माण क्षेत्र 2025 तक 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। अन्‍य विनिर्माण केंद्रों में बढ़ती कीमतों ने विदेशी कंपनियों और बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को भारत में मोबाइल फोनों से लेकर ऑटोमोबाइल्‍स, और लग्‍जरी ब्राण्‍डों तथा अन्‍य वस्‍तुओं तक के उत्‍पादन संयंत्र भारत में स्‍थापित करने के लिए उत्‍प्रेरित किया है। वर्ष 2013 में 38 राष्‍ट्रों के डेलोइटे वैश्‍विक सूचकांक में भारत को चौथा सबसे बड़ा प्रतिस्‍पर्धी विनिर्माण राष्‍ट्र बताया गया है।

सरकार ने विनिर्माण आउटपुट और गुणवत्‍ता में वृद्धि करने पर ध्‍यान दिया है और वर्ष 2011 में एक नई राष्‍ट्रीय विनिर्माण नीति घोषित की है, जिसका उद्देश्‍य आगामी दशक के भीतर सकल घरेलू उत्‍पाद के शेयर को वर्तमान 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत करना और 100 मिलियन नौकरियों का सृजन करना है।

हमारा इंजीनियरिंग क्षेत्र कुल भारतीय निर्यात बास्‍केट के दो सबसे बड़े योगदान कर्ताओं में है जिसका वर्ष 2012-13 में कुल शिपमेंट 56.7 बिलियन अमरीकी डॉलर का था। हमारे मुक्‍त व्‍यापार करार के भागीदारों, जिनमें आसियान शामिल है, को हमारे इंजीनियरिंग निर्यातों में बहुत वृद्धि हुई है।

भारत की तटरेखा 7500 किलोमीटर से अधिक होने के कारण, हम यूरोप और अफ्रीका दोनों महाद्वीपों में स्‍थित देशों को निर्यात के केंद्र के रूप में स्‍थित हैं। हम अपने मुख्‍य बंदरगाहों को क्षमता वृद्धि, मशीनीकरण, पूँजी ड्रेजिंग और कॉरपोरेटाइजेशन के माध्‍यम से अधिक क्षमतावान बना रहे हैं। हम अपने जहाजरानी उद्योग को स्‍तरोन्‍नत कर रहे और विस्‍तारित कर रहे हैं, जिसके लिए केवल वर्ष 2013-14 में ही 3.32 बिलियन अमरीकी डॉलर के निवेश की 30 परियोजनाओं का अधिनिर्णय किया गया है। भारत के पूर्वीतट पर निजी बंदरगाहों के विकास पर विशेष ध्‍यान दिया जा रहा है जो विशेषत: आसियान देशों के साथ भारत के विदेश व्‍यापार की वृद्धि में महत्‍वपूर्ण योगदान करेंगे।

इससे भारत आसियान देशों के लिए विनिर्माण संयंत्रों का सह-संस्‍थापन करने, और इसके एक निर्यात केंद्र बनने दोनों के लिए एक आदर्श विकल्‍प एवं स्‍थान उपलब्‍ध कराता है। यह हमारे प्रधान मंत्री द्वारा हाल ही में किए गए ‘भारत में निर्माण करो’ के आह्वान में सन्‍निहित था जिसके बारे में हमें आगे की जानकारी आने वाले सप्‍ताहों में प्राप्‍त होगी।

हमारी प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश नीति को उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं में से सबसे उदार नीति माना जाता है, जो विभिन्‍न क्षेत्रों और कार्यकलापों में स्‍वचालित मार्ग के तहत 100 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति देती है। भारत के पड़ौस और परिधि में स्‍थित आसियान देश अवसंरचना, विनिर्माण, फार्मा, ऑटोमोबाइल्‍स जैसे परंपरागत क्षेत्रों और दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्‍सा, पर्यटन आदि जैसे नए क्षेत्रों, दोनों में व्‍यापार, निवेश और भागीदारी के जरिये व्‍यावसायिक संभावनाएं तलाश कर सकते हैं जहां हमारी सम्‍पूरणीयताएं पारस्‍परिक हित में हों।

इस क्षेत्र के देशों के बढ़ते आर्थिक परिदृश्‍य और बदलते भौगोलिक-राजनैतिक परिदृश्‍य के चलते आसियान के साथ हमारे संबंध नींव के पत्‍थर बन गए हैं। हाल ही के वर्षों में आसियान के साथ हमारे संबंध बहु-आयामी हो गए हैं जो व्‍यापार और निवेश, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, संस्‍कृति एवं अन्‍य कई क्षेत्रों तक विस्‍तृत हैं। भारत-आसियान वाणिज्‍यिक संबंध महत्‍वपूर्ण हैं जिनमें लगभग 76 बिलियन अमरीकी डॉलर का द्विपक्षीय व्‍यापार तथा 1.8 बिलियन लोगों का संयुक्‍त बाजार है। वर्ष 2009 में हमने माल व्‍यापार के लिए एक मुक्‍त व्‍यापार करार पर हस्‍ताक्षर किए थे। वर्ष 2009 से 2013 के बीच आसियान देशों को भारत के निर्यातों में प्रतिवर्ष चक्रवृद्धि समाकलित दर 16 प्रतिशत रही। फिर भी, आसियान के साथ भारत का व्‍यापार आसियान के कुल व्‍यापार का केवल 3 प्रतिशत है- और इसमें अपार संभावनाएं हैं।

सेवाओं और निवेशों में आसियान-भारत व्‍यापार करारों पर फिलहाल परिचालित करके हस्‍ताक्षर किए जा रहे हैं। सेवाओं पर करार गैट्स पर आधारित है और अनुसूचीयन के लिए तौर-तरीकों की एक सकारात्‍मक सूची का अनुसरण करता है। यह व्‍यवसायिकों के आवागमन को भी सुसाध्‍य बनाएगा; और भारत एवं आसियान देशों के सेवा प्रदाताओं को व्‍यावसायिक निश्‍चितता प्रदान करता है।

निवेश संबंधी करार भागीदार देशों के बीच एक उदार, सुविधाजनक एवं प्रतिस्‍पर्धी निवेश वातावरण सृजित करता है। यह करार व्‍यापक है जिसमें निवेशों को बढ़ावा देना, सुविधा प्रदान करना, उदारीकरण और संरक्षण शामिल है। एक बार इन करारों के निष्‍पादित हो जाने के बाद, ईईपीसी और अन्‍य व्‍यावसायिक चैम्‍बर कार्यशालाएं कर सकते हैं जिनसे आसियान के साथ व्‍यवसाय में वृद्धि करने के लिए इन संरचनाओं का उपयोग करने के बार में हमारे उद्योग जगत को व्‍यावहारिक दिशा-निर्देश प्राप्‍त हो सकेगा।

भारत एक क्षेत्रीय व्‍यापक आर्थिक भागीदारी (आर सी ई पी) पर भी विचार कर रहा है जिसका लक्ष्‍य दुनिया का सबसे बड़ा मुक्‍त व्‍यापार ब्‍लॉक बनना है जिसमें सभी 10 आसियान राष्‍ट्र और वे 6 अन्‍य देश शामिल होंगे जिनके साथ भारत समेत इस समूह के मुक्‍त व्‍यापार करार हुए हों। क्षेत्रीय व्‍यापक आर्थिक भागीदारी (आर सी ई पी) ब्‍लॉक में विश्‍व की जनसंख्‍या की 49 प्रतिशत जनसंख्‍या है, विश्‍व व्‍यापार का 29 प्रतिशत व्‍यापार होता है और वैश्‍विक प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश के 26 प्रतिशत निवेश की आमद है। अपने उत्‍पादन और विनिर्माण नेटवर्कों को बढ़ाने, अपनी वित्‍तीय प्रणालियों, सतत विकास, खाद्य सुरक्षा आदि को सशक्‍त करने जैसे हमारे साझा लक्ष्‍य हैं। हमें एक ऐसे नेटवर्क को विकसित किए जाने की जरूरत है जिसमें क्षेत्रीय व्‍यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) के सिद्धांतों को देशों के बीच यात्रा को व्‍यवसायियों को सहज बनाते हुए उन्‍हें अधिक महत्‍व दिया जा सकता है।

हमें वर्ष 2015 तक आसियान-भारत व्‍यापार को 100 बिलियन डॉलर के लक्ष्‍य, जो हमारे अपने-अपने नेताओं द्वारा तय किए गए थे, तक पहुंचाने के लिए मिल कर काम करने की जरूरत है। तथापि, कुछ चुनौतियां हैं जिनका समाधान किए जाने की जरूरत है। फिलहाल आसियान के साथ भूमि और समुद्री मार्गों से कनेक्‍टिविटी कमजोर है और अंतत: इससे लाए-ले जाए जाने वाले सामान की लागत में वृद्धि होती है।

आसियान देशों के साथ बेहतर कनेक्‍टिविटी के महत्‍व को स्‍वीकार करते हुए, भारत सड़क अवसंरचना, विशेषत: भारत, म्‍यामां और थाईलैण्‍ड त्रिपक्षीय राजमार्ग, के लिए अंशदान कर रहा है। भारत ने 160 किलोमीटर राजमार्गों का निर्माण किया है, और अन्‍य 120 किलोमीटर हाईवे के निर्माण तथा ट्राइैलैटरल हाईवे पर स्‍थित 71 पुराने पुलों के स्‍तरोन्‍नयन के लिए वचनबद्धता की है। त्रिपक्षीय राजमार्ग के पूरा होने से भारत के लैण्‍डलॉक्‍ड पूर्वोत्‍तर क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने का मार्ग खुल जाएगा और फ्रेट और कंटेनर ट्रकों की भारत से म्‍यामां और थाईलैण्‍ड तक सीमा पार आवाजाही हो सकेगी। मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्‍नता हो रही है कि अक्‍टूबर की शुरूआत से ही भारतीय जहाजरानी निगम भारत के पूर्वोत्‍तर तट से यंगून तक पाक्षिक रूप से (पन्‍द्रह दिन में एक बार) सीधी जहाजरानी सेवाएं प्रायोगिक आधार पर शुरू करने जा रहा है जिससे जहाजरानी का समय घट कर एक तिहाई रह जाएगा।

म्‍यामां के दावेई गहन-सागर के साथ तटीय कनेक्‍टिविटी में भी सुधार होगा जिससे दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र के लिए मलाक्‍का के स्‍ट्रेट की तुलना में अधिक छोटा समुद्री मार्ग प्राप्‍त होगा। म्‍यामां में स्‍थित बंदरगाहों, दावेई सहित, के साथ भागीदारी से पूर्वी समुद्री बोर्ड में भारतीय बंदरगाह आसियान देशों के साथ कनेक्‍टिविटी का मुख्‍य प्रवेश द्वार बन जाएंगे। पूर्वी एशिया के साथ भारत के बढ़ते व्‍यापार की आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए, भारत के पूर्वी तट पर नए कंटेनर एवं मल्‍टी कारगो टर्मिनल निर्माणाधीन हैं।

कलाडन परियोजना, जिसके शीघ्र ही पूरी होने की उम्‍मीद है, कोलकाता और भारत के पूर्वी तट पर स्‍थित अन्‍य बंदरगाहों को म्‍यामां में सिटवी बंदरगाह के साथ जोड़ेगी और सिटवी को नदी और सड़क परिवहन के जरिये मिजोरम से जोड़ेगी। यह परियोजना कोलकाता से सिटवी की दूरी को लगभग 1300 किलोमीटर कम कर देगी।

आसियान के साथ वायुमार्ग संपर्क को बढ़ाने के लिए और लोगों की आवाजाही को सुसाध्‍य बनाने के लिए हमने आसियान देशों, भारत के टियर ।। और टियर ।।। शहरों के 18 गंतव्‍यों के लिए कुछ वर्ष पूर्व एयर कैरियर प्रदान करने का प्रस्‍ताव किया था। हमने इस प्रस्‍ताव का यथाशीघ्र उपयोग करने के लिए आसियान के एयर कैरियरों को निमंत्रित किया क्‍योंकि भारत के टियर ।। और टियर ।।। शहर किसी और देश के टियर शहरों की तुलना में कहीं अधिक बड़े हैं, और प्रगति पथ पर अग्रसर हैं। सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैण्‍ड इन मार्गों पर पहले से ही ऑपरेट कर रहे हैं। हमने आसियान देशों को कारगो के संबंध में एक मुक्‍त आकाश नीति का प्रतिदान आधार पर प्रस्‍ताव किया है।

जबकि हम इन भौतिक कनेक्‍टिविटी परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं, हमें अपने व्‍यवसायियों और व्‍यावसायिकों को लम्‍बी अवधि के और बहु-प्रवेश व्‍यवसाय वीजा प्रदान करते हुए उनकी आवाजाही को बढ़ाने की जरूरत है।

भारत-म्‍यामा-थाईलैण्‍ड के बीच भौगोलिक कनेक्‍टिविटी के साथ आसियान के साथ विशिष्‍ट संभावना, संचार और वित्‍तीय संपर्कों को भी सशक्‍त बनाया जाना चाहिए। आसियान देशों के साथ अपनी सभी सीमाओं पर, विशेषत: म्‍यामां के साथ, लैण्‍ड कस्‍टम स्‍टेशन, अप्रवासन, कस्‍टम और फिटो-सेनीटरी सुविधाओं का स्‍तरोन्‍नयन करके एक सुविधाजनक वातावरण सृजित करना महत्‍वपूर्ण होगा। अत:, हमने प्रस्‍ताव किया है कि ट्राईलैटरल हाइवे के लिए भारत-म्‍यामां-थाईलैण्‍ड एक ट्रांजिट परिवहन करार के संबंध में बतचीत शुरू करें।

भौगोलिक कॉरीडोरों को आर्थिक कॉरीडोरों के साथ जोड़ने के लिए, भारत के पूर्वोत्‍तर तथा पूर्वी तट पर अवसंरचना, सॉफ्ट अवसंरचना के सृजन तथा आर्थिक कार्यकलापों के समेकन का काम भी साथ ही शुरू किया जाना चाहिए, न कि क्रमिक रूप से। हमारे लिए विशेष आर्थिक जोनों, सतत उत्‍पादन नेटवर्कों, भारत के पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में बैकएंड संपर्कों के माध्‍यम से इस कॉरीडोर पर आर्थिक गतिविधि एवं क्‍लस्‍टर स्‍थापित किया जाना आवश्‍यक है ताकि दक्षिण पूर्व एशिया के साथ हमारे आर्थिक संबंध आर्थिक रूप से संधारणीय बन जाएं। हम भारत के कॉरपोरेट सेक्‍टर और आसियान देशों को अपने पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के राज्‍यों में युवाओं के कौशल एवं क्षमता निर्माण के लिए कार्यक्रम स्‍थापित करने के लिए आमंत्रित करते हैं ताकि इन आगामी आर्थिक अवसरों का लाभ प्राप्‍त किया जा सके। हमें एसएमई सेक्‍टर पर भी ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है जो भारतीय उद्योग जगत से आसियान क्षेत्र में किए जाने वाले निर्यातों के लिए आपूर्तिकर्ता बन सकता है। भारतीय उद्योग भागीदारी के माध्‍यम से अपनी सामूहिक ताकतों को भी जोड़ सकता है और आसियान क्षेत्र में अपनी मौजूदगी तथा गतिविधियों को भी बढ़ा सकता है।

निष्‍कर्ष रूप में मैं इस बात पर बल देना चाहूँगा कि आसियान के साथ बेहतर कनेक्‍टिविटी पूर्वोत्‍तर भारत के अल्‍प विकसित राज्‍यों तथा अल्‍प विकसित आसियान देशों को भी विकास के बेहतर अवसर प्रदान करेगी। आसियान क्षेत्र में आर्थिक विकास के अलग-अलग स्‍तर भी हैं, जिसके कारण कुछ देशों को कनेक्‍टिविटी के मुद्दे के समाधान हेतु वित्‍तीय सहायता की भी आवश्‍यकता होगी। सृजनात्‍मक कार्यतंत्र और वित्‍तपोषण के साधन तथा अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय संस्‍थाओं का पता लगाने के लिए हमें मिल कर काम करने की जरूरत है।

जैसा कि हम देख सकते हैं, आसियान के साथ भागीदारी को बढ़ाने के लिए एक समग्र एवं बहु-क्षेत्रीय दृष्‍टिकोण अपनाने की जरूरत है जिसके लिए बहुराष्‍ट्रीय एवं अंतरराष्‍ट्रीय संगठनों सहित विभिन्‍न पणधारियों एवं संस्‍थाओं के सक्रिय सहयोग आवश्‍यक है। मुझे यह देखकर प्रसन्‍नता है कि ईईपीसी जैसे संगठन आगे आ रहे हैं और आसियान-भारत संबंधों के अवसरों एवं संभावनाओं को उजागर कर रहे हैं। इन्‍हीं विचारों के साथ, मैं अपनी बात समाप्‍त करना चाहता हूँ और इस विचार मंथन कार्य में शामिल होने का हमें अवसर प्रदान करने के लिए ईईपीसी को धन्‍यवाद देता हूँ।

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