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समुद्री सुरक्षा सहयोग पर 5वें ईएएस सम्मेलन में सचिव (पूर्व) का मुख्य सम्बोधन

नवम्बर 23, 2021

महामहिम गण,
ईएएस में भाग लेने वाले देशों के प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों, देवियो और सज्जनो,


समुद्री सुरक्षा सहयोग पर ईएएस सम्मेलन के 5वें संस्करण में आप सभी के साथ यहां मुझे बहुत खुशी हो रही है।

सबसे पहले मैं इस सम्मेलन के आयोजन में भारत के साथ भागीदारी करने के लिए ऑस्ट्रेलिया को धन्यवाद देना चाहता हूं। मैं इस सम्मेलन को आयोजित करने में विदेश मंत्रालय के साथ सहयोग करने के लिए आरआईएस, नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन (एनएमएफ), और सेंटर फॉर ईस्ट एंड नॉर्थ ईस्ट रीजनल स्टडीज, कोलकाता में आसियान-इंडिया सेंटर (एआईसी) को भी बधाई देना चाहता हूं।

यह समुद्री सुरक्षा सहयोग पर ईएएस सम्मेलन का पांचवां संस्करण है जिसके पहले सम्मेलन की शुरुआत वर्ष 2015 में नई दिल्ली में हुई थी। दूसरा सम्मेलन 2017 में गोवा में, तीसरा 2018 में भुवनेश्वर में और चौथा सम्मेलन पिछले साल चेन्नई में आयोजित किया गया था। मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि ईएएस के प्रतिभागी देशों ने समुद्री सुरक्षा सम्मेलन का जबर्दस्त स्वागत किया है, जिसमें वे हिंद-प्रशांत में समुद्री बहुपक्षवाद की संभावनाओं को आगे बढ़ाने के लिए समुद्री मुद्दों पर जीवंत चर्चा में सक्रिय रूप से शामिल हैं। सम्मेलन का 5वां दौर इन निरंतर चर्चाओं की समयबद्ध कड़ी है।

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (ईएएस) हिंद-प्रशान्त में रणनीतिक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए प्रमुख नेताओं के नेतृत्व वाला मंच है। वर्ष 2005 में अपनी स्थापना के बाद से, ईएएस हिंद-प्रशांत के समुद्री क्षेत्र सहित क्षेत्र में पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों प्रकार की सुरक्षा चुनौतियों को संबोधित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हाल ही में आयोजित 16वें ईएएस शिखर सम्मेलन ने उन मुद्दों को भी छुआ, जिसमें हिंद-प्रशांत में सुरक्षा स्थिति पर वर्तमान कोविड-19 महामारी का प्रभाव भी शामिल है।

मित्रों, भारत और आसियान 2000 से अधिक वर्षों के इतिहास से जुड़े हैं और यह संबंध हमारी विदेश नीति की आधारशिलाओं में से एक है। आसियान भारत की एक्ट ईस्ट नीति का केंद्रीय स्तंभ है। भारत ने हमेशा हिंद-प्रशांत में आसियान केंद्रीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की है। हम ईएएस, एआरएफ, एडीएमएम प्लस, ईएएमएफ सहित क्षेत्र में सभी आसियान-केंद्रित तंत्रों में एक सक्रिय भागीदार रहे हैं, इस क्षेत्र में शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। भारत, हिंद-प्रशांत के लिए आसियान आउटलुक या एओआईपी के रूप में हिंद-प्रशांत हेतु आसियान के अपने दृष्टिकोण का समर्थन करने वाले पहले देशों में से एक था।

जून 2018 में सिंगापुर में शांगरीला डायलॉग में अपने मुख्य भाषण में प्रधान मंत्री मोदी द्वारा व्यक्त किए गए हिंद-प्रशांत के लिए हमारा अपना दृष्टिकोण एओआईपी के साथ बहुत अधिक तालमेल रखता है। 2019 में 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (ईएएस) में, प्रधान मंत्री मोदी ने इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव (आईपीओआई) की घोषणा की, जो कि हिंद-प्रशांत के लिए इस साझा विजन के व्यावहारिक कार्यान्वयन के रूप में इस समुद्री क्षेत्र के बेहतर प्रबंधन, संरक्षण, अनुरक्षण और सुरक्षा के लिए सहयोगात्मक प्रयास पर ध्यान केंद्रित करता है। इसे आगे बढ़ाते हुए, इस वर्ष अक्टूबर में हाल ही में आयोजित 18वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन के दौरान, भारत और आसियान ने एओआईपी और आईपीओआई के तालमेल के व्यावहारिक कार्यान्वयन के लिए एओआईपी पर सहयोग के लिए एक संयुक्त वक्तव्य की घोषणा की है।

भारत इस क्षेत्र में सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान, बल के प्रयोग से बचने या बल के उपयोग की धमकी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों, नियम और विनियम के पालन के संबंध में एक स्वतंत्र, खुले, समावेशी और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत की परिकल्पना करता है। हिंद-प्रशांत की इस दृष्टि पर आधारित आईपीओआई एक खुली और गैर-संधि आधारित पहल है जिसमें किसी नए संस्थागत ढांचे के निर्माण की परिकल्पना नहीं की गई है। इसमें सहकारिता और सहयोग के सात स्तंभ अर्थात् समुद्री सुरक्षा, समुद्री पारिस्थितिकी, समुद्री संसाधन, क्षमता निर्माण और संसाधन साझा करना, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक सहयोग तथा व्यापार, कनेक्टिविटी और समुद्री परिवहन हैं जिसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत में व्यापक और अभिसरण हितों की पूर्ति करना है।

मित्रों, आसियान के नेतृत्व वाले संगठन के रूप में ईएएस को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध राष्ट्र के रूप में, भारत समुद्री सुरक्षा सहयोग सहित ईएएस लक्ष्यों में सकारात्मक योगदान देना जारी रखता है। आईपीओआई में परिकल्पित उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और साझा हितों के मुद्दों पर चर्चा करने तथा समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में साझा चुनौतियों का मिलकर समाधान करने के लिए हमें ईएएस का मूल्यवान मंच प्राप्त होने की खुशी है। सम्मेलन का उद्देश्य समुद्री सहयोग के नए विचारों की खोज के साथ-साथ मौजूदा संरचना और पहल के तहत ईएएस के प्रतिभागी देशों के बीच व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख सहयोग करना है। उदाहरण के रूप में, पिछले साल चेन्नई में आयोजित चौथे ईएएस समुद्री सुरक्षा सम्मेलन में, भारत ने एचएडीआर सहयोग पर एक मसौदा पुस्तिका तैयार करने और ईएएस भाग लेने वाले देशों तथा एएचए केंद्र के बीच उनके विचार और टिप्पणियों हेतु इसके वितरण के लिए एक एसओपी फॉर सर्च एंड रेस्क्यू (एसएआर) ऑपरेशन तैयार करने का प्रस्ताव रखा। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एचएडीआर सहयोग और एसओपी फॉर सर्च एंड रेस्क्यू (एसएआर) के लिए मसौदा दिशानिर्देश तैयारी के अंतिम चरण में हैं और जल्द ही टिप्पणियों के लिए ईएएस देशों में वितरित कर दिया जाएगा।

साथियों, जैसे-जैसे वैश्विक विकास का गुरुत्व केंद्र इस क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे समुद्री डकैती, तस्करी और ट्रैफिकिंग, आईयूयू फिशिंग, समुद्री संसाधनों का दुरुपयोग, समुद्री प्रदूषकों की वृद्धि, विशेष रूप से प्लास्टिक आदि जैसी समुद्री चुनौतियां बढ़ रही हैं। इन सबके कारण ईएएस के समस्त प्रतिभागी देशों के बीच शीघ्रातिशीघ्र सहकारी और सहयोगी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बढ़ी है। ये मुद्दे ईएएस प्रक्रिया के तहत चर्चा के केंद्र में रहे हैं जो कि ईएएस के विभिन्न नेताओं के बयानों और घोषणाओं में बहुत अच्छी तरह से परिलक्षित होता है जैसे कि सिंगापुर में नवंबर 2018 में अपनाए गए समुद्री प्लास्टिक मलबे का मुकाबला करने पर ईएएस नेताओं का वक्तव्य, अवैध दवाओं के प्रसार के विरुद्ध ईएएस नेताओं का बैंकॉक में 2019 में वक्तव्य, हनोई में 2020 में समुद्री स्थिरता पर ईएएस नेताओं का वक्तव्य। यह सम्मेलन ईएएस के सभी प्रतिभागी देशों को हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा स्थिति के बारे में अपने विचार रखने के लिए एक आदर्श मंच प्रदान करता है और ईएएस समुद्री सुरक्षा सहयोग एजेंडा को आगे बढ़ाने और हमारे नेताओं के कथन के व्यावहारिक कार्यान्वयन की तलाश करने के लिए एक खुला और मुक्त विचार-विमर्श करता है। हम इस क्षेत्र में समुद्री क्षेत्र में साझा हित के विशिष्ट क्षेत्रों पर चर्चा और विचार-विमर्श को बढ़ाने के लिए ईएएस देशों के साथ काम भी कर रहे हैं। भारत, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर संयुक्त रूप से "समुद्री प्रदूषण विशेष रूप से समुद्री प्लास्टिक मलबे" पर ईएएस कार्यशाला का आयोजन करेंगे और भारत तथा सिंगापुर संयुक्त रूप से 2022 की शुरुआत में "आईयूयू फिशिंग" पर ईएएस कार्यशाला का आयोजन करेंगे।

साथियों, सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही महासागरों ने भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हमारे सभ्यतागत लोकाचार के आधार पर, जो समुद्र को साझा शांति और समृद्धि के प्रवर्तक के रूप में देखता है, 2015 में प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 'सिक्योरिटी एण्ड ग्रोथ फॉर आल इन द रीजन' का संक्षिप्त रूप "सागर सिद्धांत" प्रस्तुत किया। यह दृष्टिकोण महासागरों के सतत उपयोग के लिए सहकारी उपायों पर केंद्रित है, और यह इस क्षेत्र में एक सुरक्षित, संरक्षित और स्थिर समुद्री क्षेत्र के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है। ये, यूएनसीएलओएस के प्रति भारत की प्रतिबद्धता और समुद्र के प्रथागत कानून के साथ, व्यापक हिंद-प्रशांत में सार्वजनिक कल्याण की वृद्धि हेतु प्रयासों की एक दिशा और एक रूपरेखा प्रदान करते हैं। अगस्त 2021 में, भारत ने, यूएनएससी की अध्यक्षता में, 'समुद्री सुरक्षा में वृद्धि - अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक मामला' पर एक उच्च-स्तरीय खुली बहस की मेजबानी की, जिसकी अध्यक्षता प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने की। पहली बार संयुक्त राष्ट्र में एक विशेष एजेंडा आइटम के रूप में समुद्री सुरक्षा पर समग्र रूप से चर्चा की गई। यह देखते हुए कि कोई भी देश अकेले समुद्री सुरक्षा के विविध पहलुओं को संबोधित नहीं कर सकता है, यूएनएससी में इस विषय पर समग्र रूप से विचार करना महत्वपूर्ण था। समुद्री सुरक्षा के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण को समुद्री क्षेत्र में पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों का मुकाबला करते हुए वैध समुद्री गतिविधियों की रक्षा और समर्थन करना चाहिए। हम इस सम्मेलन के माध्यम से उसी भावना को आत्मसात करते हैं। जैसा कि प्रधान मंत्री मोदी ने यूएनएससी उच्च स्तरीय खुली बहस के दौरान कहा है, सिद्धांत वही रहता है, अर्थात

(क) एक सुरक्षित, सुरक्षित और स्थिर समुद्री क्षेत्र रखना और वैध समुद्री व्यापार की बाधाओं को दूर करना तथा एक दूसरे के नाविकों के अधिकारों का सम्मान करना।

(ख) समुद्री विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से और केवल अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर निपटाना।

(ग) गैर-राजकीय अभिकर्ताओं द्वारा उत्पन्न की गई प्राकृतिक आपदाओं और समुद्री खतरों का सामना करना।

(घ) समुद्री पर्यावरण और समुद्री संसाधनों को संरक्षित करना क्योंकि महासागरों का जलवायु पर सीधा प्रभाव पड़ता है

(ङ) देशों की भौतिक स्थिरता और अवशोषण क्षमता के आधार पर जिम्मेदार समुद्री संपर्क स्थापित करनासंयुक्त राष्ट्र में प्रधान मंत्री मोदी द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत हमारे क्षेत्र के लिए भी बहुत प्रासंगिक हैं और ईएएस के सभी प्रतिभागी देशों के साझा और सहयोगात्मक प्रयासों के महत्व को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं।

साथियों, कोविड-19 महामारी अभी भी पूरी वैश्विक बातचीत में संदर्भ प्रदान करती है, वर्तमान सम्मेलन इसका अपवाद नहीं है क्योंकि इसने इस क्षेत्र में गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। मुझे खुशी है कि ईएएस के प्रतिभागी देश इन चुनौतियों को कम करने के लिए एक साथ आ रहे हैं और आज के सम्मेलन जैसे विभिन्न ईएएस प्लेटफार्मों के माध्यम से एक स्थायी भविष्य का स्वागत करने के लिए आवश्यक तैयारी कर रहे हैं।

मुझे विश्वास है कि इस 5वें ईएएस सम्मेलन के सत्र में समुद्री सुरक्षा सहयोग के विभिन्न मुद्दों पर सक्रिय रूप से विचार-विमर्श होगा, वर्तमान सम्मेलन की चर्चाओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया जायेगा और ईएएस देशों के बीच सक्रिय सहयोग के माध्यम से क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और सुरक्षा बढ़ाने के लिए एक रोडमैप तैयार किया जायेगा।

मैं समुद्री सुरक्षा सहयोग पर ईएएस सम्मेलन के 5वें संस्करण में सभी विशिष्ट प्रतिनिधियों का स्वागत करता हूं और इसकी अपार सफलता की कामना करता हूं।

धन्यवाद!

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