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अंतर्राष्ट्रीय संबंध और भारत की विदेश नीति

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त आर. विश्वनाथ)
    Venue: एनईएचयू, शिलांग
    Date: जनवरी 14, 2019

अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभिन्न कारकों द्वारा संचालित और निर्मित किए जाते हैं जैसे संस्कृति, धर्म, विचारधारा, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था। परंतु आधारभूत संचालक डार्विन का सिद्धांत है : सर्वाधिक उपयुक्त का जीवित रहना; सबसे ताकतवर की प्रधानता, सबसे चालक की सफलता और सबसे कमजोर का पीड़ित रहना।

अंतर्राष्ट्रीय संबंध (आईआर) इस बारे में होते हैं कि किस प्रकार देश एक-दूसरे के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंध स्थापित करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंध मजबूत और कमजोर, शक्तिशाली और निर्बल तथा विजेताओं और पराजित होने वाले के बीच समीकरण और संतुलन प्रतिबिंबित करते हैं। ताकतवर शक्तिशाली और विजेता अंतर्राष्ट्रीय कानून लिखते हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में अपनी प्रधानता को प्रतिपादित करते हैं जैसे यूएन, आईएमएफ और विश्व बैंक के मामले में देखा गया है।

किसी द्विध्रुवीय विश्व में, शक्तियां एक-दूसरे से प्रत्यक्षत: संघर्ष नहीं करती है जब वहां पारस्परिक दृष्टि से सुनिश्चित विध्वंस की संभावना मौजूद हो। वे छद्म देशों के माध्यम से संघर्ष करती हैं और सह-अस्तित्व बरकरार रखने तथा हितों का विभाजन करने का प्रयास करती हैं। पुर्तगाली और स्पेन के साम्रज्यों ने विश्व को 1494 में टोर्डा सिलास की संधि के अंतर्गत अपने बीच बांट दिया जिसकी मध्यस्थता पोप द्वारा की गई थी। ब्रिटिश और फ्रांसीसियों ने अफ्रीका को अपने हितों के क्षेत्रों में विभाजित कर दिया था। यूएस और सोवियत संघ ने यूरोप का नाटो-चालित लोकतांत्रिक पश्चिमी यूरोप तथा वारशा समझौता-चालित साम्यवादी पूर्वी यूरोप में विभाजित कर दिया था।

कमजोर देश एक साथ कुछ समूहों में मिल जाते हैं जैसे एनएएम और जी-77 जिसका आशय उनके हितों की रक्षा करना और उन्हें प्रवर्तित करना होता है। वे संकल्प पारित कराने तथा अपने मुद्दों को उठाने के लिए यूएन महासभा और अन्य ऐसे लोकतांत्रिक मंचों का प्रयोग करते हैं।

शक्तिशाली कभी-कभी बड़े-बड़े अपराधों से भी बच जाते हैं जैसे जमाल कशोगी मामले में अथवा यमन के युद्ध में देखा गया था। शक्तिशाली अन्य देशों के भू-भाग पर कब्जा कर लेते हैं। उदाहरण: फिलिस्तीन के क्षेत्रों पर इजराइली कब्जा; क्यूबा में यूएस का गुआन्टानोमो सैन्य ठिकाना और स्पेन में जिब्राल्टर पर ब्रिटिश नियंत्रण। शक्तिशाली देश सांस्थानिक ढांचों जैसे एनपीटी द्वारा कमजोर को शक्तिशाली बनने से रोकतें है। शक्तिशाली देश आईसीजे के निर्णयों का पालन नहीं करते हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को मान्यता नहीं देते हैं जिनका प्रयोग केवल कमजोर देशों के साथ व्यवहार करने के लिए किया जाता है। शक्तिशाली बहुपक्षीय प्रतिबंध लगा देते हैं (क्यूबा और ईरान पर यूएस के प्रतिबंध) तथा अन्य देशों को उन्हें मानने पर विवश करते हैं।

अत: इससे यह प्रतीत होता है कि इस कथा का सार यही है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध अनुचित और असंगत हैं। परंतु यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का निराशाजनक पहलू है। आशावाद को प्रेरित करने के लिए इसका एक चमकदार और सकारात्मक पक्ष भी है।

कभी-कभी छोटे देश बड़े देशों को पराजित कर देते हैं। वियतनाम ने फ्रांस, अमेरिका और चीन को सैन्य और राजनीतिक दृष्टि से पराजित किया है। अफगानिस्तान ने उस पर कब्जा करने वाली शक्तियों अर्थात् ब्रिटेन, यूएसएसआर और अब यूएस को बाहर खदेड़ दिया है। क्यूबा और निकारागुआ ने अमेरिका से उत्पन्न होने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्धों से पार पाया है। छोटे देश बड़ी शक्तियों को एक-दूसरे के विरुद्ध उकसाते हैं तथा उनसे बेहतर परिणाम हासिल करते हैं जैसा कि नेपाल, श्रीलंका और मालदीव्स में भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता के संवर्धन में दिखाई पड़ता है। कुछ छोटे देशों जैसे सिंगापुर और कतर ने अपनी क्षमता से अधिक प्रदर्शन किया है तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में गैर-अनुपातिक रूप से उच्च प्रभाव दिखाया है। एक छोटे से देश, कोस्टा रिका ने 1948 में अपनी सशस्त्र सेनाओं का उन्मूलन करते हुए अंतर्राष्ट्रीय संबंध में एक प्रेरणाप्रद उदाहरण स्थापित किया है जिसकी घोषत प्रतिज्ञा हथियारों और गोला-बारूद के स्थान पर दुर्लभ संस्थानों का प्रयोग शिक्षा और स्वास्थ्य पर करना था। यह मध्य अमेरिका में शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था के आदर्श के रूप में स्थापित हुआ जबकि इसके पड़ोसी देशों ने भयावह नागरिक युद्ध और सैन्य तानाशाही की विभीषिका झेली। कोस्टारिका उसके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में शांति की संस्कृति का प्रतिपादन करने के लिए शांति विश्वविद्यालय की स्थापना की है।

अपनी कमियों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र शक्तिशालियों और कमजोरों के लिए एक महत्वपूर्ण बैठक और वार्ता मंच बन गया है जिसने अनेक मामलों में युद्धों को सफलतापूर्वक रोका है और उनका निवारण किया है। संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना मिशनों ने लड़ाई में रत धड़ों और देशों को अलग किया है तथा उनके यहां विवादों का शांतिपूर्ण समाधान किया है। संयुक्त राष्ट्र संगठन जैसे यूएनडीसी, यूनिसेफ, यूएनएचसीआर और यूनेस्को ने अपने-अपने प्रचालन क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया है।

यूरोपीय संघ ने माल, सेवाओं, पूंजी तथा शेन्गेन वीजा सामान्य मुद्रा और पासपोर्ट के लिए सीमा संबंधी नियंत्रण समाप्त करते हुए विश्व के समक्ष एक उदाहरण स्थापित किया है। यदि यह कदम एक अत्यंत सटीक कदम नहीं भी है, तो यह एक सभ्यात्मक वृद्धि है और इसने अन्‍य क्षेत्रीय एकीकरण समूहों जैसे मर्कोसर और एशियन को प्रेरित किया है।

इन शक्तियों का स्व-जीवन है। वे समृद्ध हुईं और समाप्त हुईं जैसा कि ग्रीस, रोमन, मंगोलियन, स्पेन, पुर्तगालियों, हैप्सबर्ग, ब्रिटिश और फ्रांसीसी साम्राज्यों के मामले में देखा जा सकता है। कमजोरों को शक्तिशाली बनने का अवसर प्राप्त होता है। चीनी जो उन्नीसवीं शताब्दी में लातिन अमेरिका में कुलियों का कार्य करने के लिए जाते थे, आज विशालतम ऋणदाता के रूप में क्षेत्र में एक संरक्षक और भागीदार के रूप में उभरकर सामने आया है जिसके पास 150 बिलियन डॉलर का ऋण और 120 बिलियन डॉलर का निवेश है।

संस्कृति ने अंतर्राष्ट्रीय संबंध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उत्तर और दक्षिण अमेरिका की विभिन्न संस्कृतियां यह वर्णन करती है कि उत्तरी क्षेत्र क्यों समृद्ध और उन्नत बना जबकि लतीनों संस्कृति ने क्षेत्र को निर्धन बनाया तथा मोनरो सिद्धांत के दिन से ही उसे यूएस का बैक यार्ड बनाया। अतीत की भव्यता के साथ जूनून की संस्कृति ब्रेजिट की स्थापना तथा यूके की निर्बलता का कारण है। भारत और चीन अग्रदर्शी संस्कृतियां हैं जो अपनी समृद्धता और प्रगति के लिए निरंतर प्रयासशील हैं।

समस्त धर्म लोगों के मध्य शांति, सौहार्द और करुणा का उपदेश देते हैं परंतु उनमें विद्यमान कट्टरवाद और शक्तियों का दुरुपयोग धर्म को समाजों में विभाजित करने तथा विवाद और युद्ध उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। यूएस ने धार्मिक गुरुओं को नष्ट किया जैसे सद्दाम हुसैन और गद्दाफी तथा इन देशों को पंथवादी उग्रवादियों के मध्य विभाजित कर दिया। यूएस ने अस्साद सरकार के विरुद्ध सीरिया में धार्मिक उग्रवादियों का प्रयोग और समर्थन किया। ये उग्रवादी आज विशाल दानव बन गए हैं तथा विश्व को चुनौती दे रहे हैं।

साम्यवाद का पिछली शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर प्रमुख प्रभाव रहा है। इसने बुद्धिजवियों, युवाओं और श्रमिकों को मार्क्सवादी विचारों के माध्यम से एक उत्कृष्ट आदर्शलोक का स्वप्न दिखाया। इससे यूएस की ओर से एक साम्यवादी-विरोधी प्रतिक्रिया प्रदर्शित की गई जो शीत-युद्ध के रूप में थी। सोवियत संघ का विघटन उनके लिए एक बड़ा प्रहार था, जो साम्यवाद में विश्वास करते थे। परंतु चीन "चीनी विशेषताओं के साथ समाजवाद" के नए मॉडल को प्रबंधित करने में सफल रहा। क्यूबा और वियतनाम अपने-अपने तरीके से चीने मॉडल का अनुकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। उदावादी वामपंथी जैसे ब्राजील के लूला ने निर्धन-हितैषी और व्यवसाय, हितैषी नीतियों के संतुलित और व्यावहारिक मिश्रण के साथ लातिन अमेरिका में इस शताब्दी के प्रथम दशक में 'पिंक टाइड' का सृजन किया।

विभिन्न प्रौद्योगिकियों जैसे बारूद, सामुद्रिक नौवहन, भाप के इंजन, वायुयान और परमाणु हथियारों ने अतीत में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित किया है। सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, सोशल मीडिया और साइबर प्रौद्योगिकी के नवीनतम हथियार हैं जिनका प्रयोग अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में प्रधानता स्थापित करने तथा उसमें व्यवधान उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।

विकसित देशों ने अन्य देशों को उनके बाजारों को खोलने के लिए विवश करने के लिए वैश्वीकरण एजेंडा का प्रयोग किया है। परंतु अब वे संरक्षणवादी हो गए हैं तथा वे व्यापार और लोगों के संचलन के विरुद्ध एक भिन्न एजेंडा कार्यान्वित कर रहे हैं। बाल स्ट्रीट, वाशिंगटन डीसी और फंड/बैंक पूंजी के संचलन को नियंत्रित और निर्देशित कर रहे हैं जिसके फलस्वरूप कभी-कभी विश्व में दिवालियापन, मंदी और तेजी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रोल क्रांति के फलस्वरूप यूएस विश्व में तेल का विशालतम उत्पादक बन गया है। इस ऊर्जा सुरक्षा विश्वास ने यूएएस को मध्य-पूर्व को अस्थिर बनाने के लिए सक्षम बनाया है जिसने भारत जैसे विशाल तेल निर्यातकों के लिए अनिश्चितता और चुनौतियां उत्पन्न कर दी हैं।

पिछली शताब्दी में भारत की विदेश नीति स्वतंत्रता के उपरांत देशों द्वारा सामना की जाने वाली असुरक्षा और अनेक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अधिक संरक्षणकारी हो गई है। अपर्याप्त खाद्य उत्पादन, विदेशी मुद्रा, प्रौद्योगिकियों और उद्योगों की समस्याएं विद्यमान थी। भारत की सैन्‍य कमजोरी ने चीन और पाकिस्तान को शांतिप्रिय भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए प्रेरित किया।

परंतु इक्कीसवी शताब्दी में, प्रतिमान में परिवर्तन आया है। भारत राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य दृष्टि से एक सुदृढ़ देश बन गया है। तेजी से विकसित होते विशाल भारतीय बाजार अन्य देशों के लिए व्यापार और निवेश के प्रयोजनार्थ आकर्षक बन गए हैं। विश्व ने एक उभरती हुई शक्ति के रूप में भारत को मान्यता प्रदान करना और उसका सम्मान करना प्रारंभ कर दिया है। आत्मविश्वास से भरा और महत्वाकांक्षी भारत लातिन अमेरिका, अफ्रीका में अनेक देशों और विश्व के अन्य भागों तक पहुंच चुका है जिनके प्रति उसने पूर्व में कभी भी ध्यान नहीं दिया था।

भारत आज एक व्यावहारिक रीति से अनेक देशों और समूहों के साथ वैश्विक मुद्दों पर सामंजस्य स्थापित करते हुए एक स्वतंत्र पक्ष अपनाते हुए उत्कृष्ट राजनयिकता का प्रयोग कर रहा है। भारत चीन की प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वद्विता और चुनौती से उतर्क रहते हुए चीन के साथ संबंध स्थापित कर रहा है, सहयोग कर रहा है तथा उसके साथ कार्य कर रहा है।

जबकि जर्मनी और जापान निरंतर कम होती जनसंख्या और कुशल युवा जनशक्ति के अभाव का सामना कर रहे हैं, भारत बड़ी संख्या में युवाओं के जनसांख्यिकीय लाभ उठा रहा है जिनके पास सफलता हासिल करने की भूख है तथा विश्व के साथ जुड़ने, सहयोजित होने और प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रौद्योगिकीय अभिवृत्ति है। यह आगामी पीढ़ी भारत को वैश्विक शक्ति और एक वैश्विक अग्रेता के रूप में रूपांतरित करेगी।

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