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भारत में बहुपक्षवाद का प्रभाव

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) अशोक कुमार मुखर्जी
    Venue: दिल्ली विश्वविद्यालय
    Date: मार्च 29, 2019

माननीय कुलपति योगेश त्यागी जी,
पराराष्ट्रीय अध्ययन विद्यालय के संकाय सदस्यगण,
मित्रों,


बहुपक्षवाद भारत के लिए एक विश्व शक्ति के रूप में रूपांतरण करने की प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालता है। यह शांति सुरक्षा और संपोषणीय विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांतों को संपुष्ट बनाए रखता है। आज भारत की 40 प्रतिशत से भी अधिक जीडीपी में उसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार द्वारा योगदान दिया जाता है, जो हमारे विशाल संख्या में लोगों के नियोजन और समृद्धि को प्रत्यक्षत: प्रभावित करता है। भारत की नियति प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को जारी रखने के साथ जुड़ी है। अत: भारत को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांत को संपोषित करने में एक नेतृत्वकारी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए जिसे आज प्रमुख शक्तियों द्वारा संचालित किए जा रहे एकपक्षीय उपायों से गंभीर चुनौती प्राप्त हो रही है।

मैं इन संदर्शों से इस विषय का वर्णन करूंगा। पहले किस प्रकार बहुपक्षवाद भारत के रूपांतरण के लिए प्रासंगिक है, दूसरे क्या भारत बहुपक्षवाद मुद्दों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान आधार पर प्रतिभागिता करने में समर्थ है जिसका भारत के केन्द्रीय राष्ट्रीय हितों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है? तीसरे, भारत किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांत के प्रति अपने योगदान में वृद्धि करेगा जो बहुपक्षवाद को संपोषित करता है?

भारत के रूपांतरण के लिए प्रासंगिकता

एक स्तर पर, जब यह प्रश्न पूछा जाता है कि किस प्रकार बहुपक्षवाद भारत में प्रभाव डालता है, इसका तत्काल ही उत्तर हमारे दैनिक जीवन के पहलुओं में पाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, खाद्य, स्वास्थ्य, शिक्षा और उत्कृष्ट कार्य को हमारे मानवीय अस्तित्व के लिए अनिवार्य संघटक माना जाता है।

उन प्रत्येक क्षेत्रों में, भारत ने हमारी आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के अंतर्गत बहुपक्षीय संरचनाओं के साथ भागीदारी की है। भारत की हरित क्रांति की सफलता खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) को सहायता प्रदान करने पर पर्याप्त रूप से निर्भर रही है। पोलियो के उत्सादन की सफलता विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सहायता पर बड़ी मात्रा पर निर्भर रही है। सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने तथा हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करने पर दिए गए ध्यान को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा पर्याप्त सहयोग प्रदान किया गया है। श्वेत क्रांति द्वारा संपोषित पोषण के क्षेत्र में भारत की सफलता को संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन निधि (यूनीसेफ) द्वारा सहयोग प्रदान किया गया है। उत्कृष्ट कार्य पर भारत के ध्यान केन्द्रण को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) द्वारा सहयोग प्रदान किया गया है।

एजेंडा 2030 में, इसके 17 सतत् विकास लक्ष्यों के साथ बहुपक्षीय संपोषणीय विकास उद्देश्यों के क्रियान्वयन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण है। सतत् विकास लक्ष्यों पर चर्चा और बातचीत में एक सक्रिय भागीदार के रूप में भारत ने अपने स्वयं के राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के साथ इन लक्ष्यों को संरेखित किया है। इस संरेखण का सर्वाधिक दृश्यमान प्रभाव नीति आयोग द्वारा अभिनव बनाए गए एसजीडी भारत डैशबोर्ड में देखा जा सकता है जो एजेंडा 2030 के लिए सरकार का नोडल बिंदु है। इस सूचकांक के लिए एसजीडी के क्रियान्वयन में भारत के अग्रणी राज्यों में अभी तक शामिल हैं - हिमाचल प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, चंडीगढ़ और पुडुच्चेरी।

एजेंडा 2030 के क्रियान्वयन में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए दो क्षेत्रों को प्राथमिकता प्रदान की गई है। ये हैं - वित्तीय प्रवाह तथा संधारणीय विकास के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकियों का अंतरण। इन दोनों ही प्राथमिकताओं पर भारत तथा जुलाई, 2015 में अदिस अबाबा में विकास के लिए वित्त-पोषण सम्मेलन में भाग लेने आए अनेक अन्य विकासशील देशों द्वारा एजेंडा 2030 को अपनाए जाने से पूर्व बातचीत की गई थी। वे एजेंडा 2030 के क्रियान्वयन का एक अभिन्न भाग का निर्माण करते हैं।

एजेंडा 2030 के बहुपक्षीय उद्देश्यों तथा भारत की राष्ट्रीय स्तर पर तैयार की गई स्कीमों के बीच अभिसारिता 2014 में भारत में हुए आम चुनावों द्वारा अभिप्रेरित हुई थी जिसने देश में राष्ट्रीय विकास नीति के लिए एक राजनीतिक ढांचा उपलब्ध कराया।

'सबका साथ - सबका विकास' जो 2014 के आम चुनावों में अंतर्वेशी विकास के लिए अभियान का प्रधान विषय था, को एसडीजी-1 के रूप में एकीकृत किया गया है जो गरीबी उपशमन के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन खाद्य सुरक्षा के लिए एडीजी-2 के साथ संरेखित है; स्वास्थ्य बीमा योजनाएं बेहतर स्वास्थ्य और कुशलता के लिए एसडीजी-3 के साथ; राष्ट्रीय शिक्षा मिशन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए एसडीजी-4 के साथ; बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ' लिंग समानता पर एसडीजी-5 के साथ; स्वच्छ भारत स्वच्छता और शुद्ध जल के लिए एसडीजी-6 के साथ; स्वच्छ ऊर्जा के लिए 2022 तक 175 जीडब्ल्यू नवीकरणीय ऊर्जा का लक्ष्य एसडीजी-7 के साथ; मनरेगा योजना और कुशल भारत सभी के लिए बेहतर काम पर एसडीजी 8 के साथ; मेक इन इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया और डिजिटल इंडिया उद्योग, नवोन्मेषण और अवसंरचना पर एसडीजी-9 के साथ; जलधन योजना, असमानता कम करने के लिए एसडीजी-10 के साथ; स्मार्ट सिटी मिशन एंपोषणीय शहरों और समुदायों के लिए एसडीजी-11 के साथ; अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस वैश्विक स्वास्थ्य पर एसडीजी-3 के साथ; उत्तरदायी उपभोग और उत्पादन के लिए एसडीजी-12; अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन जलवायु परिवर्तन पर एसडीजी-13 के साथ, भारत की सामुद्रिक नीति का नीली अर्थव्यवस्था (सागर) समुद्रों के लिए एसडीजी-14 के साथ तथा कृषि विकास और फसल बीमा योजना भूमि पर कृषि और जीवन के लिए एसडीजी-15 के साथ एकीकृत किया गया है।

भारत पर बहुपक्षवाद का यह सकारात्मक प्रभाव इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार बहुपक्षीय प्रणाली के सामाजिक-आर्थिक स्तंभ ने देश को लाभान्वित किया है। भारत की राष्ट्रीयता को उसके द्वारा क्रियान्वयन का प्राथमिक उद्देश्य संधारणीय विकास के लिए लक्ष्य निर्धारित करता है तथा यह एजेंडा 2030 का प्रयोग करने से संबंधित है ताकि दिसम्बर, 2030 तक लगभग 270 मिलियन भारतीयों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाया जा सके।

बहुपक्षीय निर्णय लेने की भारत की प्रतिभागिता

अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को एजेंडा 2030 के बहुपक्षीय ढांचे के साथ संरेखित करने की भारत की योग्यता निर्णय करने संबंधी संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रक्रियाओं और पद्धतियों द्वारा संभव हो सकी है। निर्णय लेने संबंधी प्रक्रिया के महासभा के नियम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 18 में अंतर्विष्ट एक देश - एक मत के सिद्धांत पर आधारित हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के सभी आनुषंगिक निकाय जैसे आर्थिक और सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) और मानव अधिकार परिषद (एचआरसी) इन्हीं प्रक्रिया नियमों का पालन करते हैं। यदि किसी मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए सर्वसम्मति नहीं बनती है, तो ये नियम विशिष्ट रूप से बहुमत के आधार पर मतदान का उपबंध करते हैं।

निर्णय लिए जाने पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र चार्टर के 1945 में अंगीकृत किए जाने के पश्चात राजनीतिक विकास द्वारा गहनता के साथ प्रभावित है। अगस्त, 1947 में, भारत उपनिवेशी शासन से आजाद हुआ और उसने उपनिवेशीकरण के वैश्विक आंदोलन में अपनी गति निर्धारित की। 1947 और 1960 के बीच, संयुक्त राष्ट्र में इन नए स्वतंत्र हुए राष्ट्रों के प्रवेश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में महाशक्तियों द्वारा रोका जाता रहा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर ने सदस्यता के लिए देशों के आवेदनों को अनुशंसित करने की भूमिका प्रदान की गई है।

इस स्थिति में सामना करने के लिए, महासभा ने 14 दिसम्बर, 1960 को इस ऐतिहासिक उपनिवेशवादी-विरोधी संकल्प को सर्वसम्मति से अंगीकृत किया था। उपनिवेश विरोधी संकल्प का प्रभाव भारत जैसे विकासशील देशों से प्रासंगिक दो मुद्दों को संयुक्त राष्ट्र महासभा के एजेंडे में शामिल करना था। पहला संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधानों में सुधार करना और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता में विस्तार करना था, जिसे "अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के अनुरक्षण के लिए प्राथमिक उत्तरदायित्व" के साथ बहुपक्षीय संरचना के रूप में अभिहित किया गया था। दूसरा, नए स्वतंत्र हुए देशों की सहायता करने के लिए बहुपक्षीय संरचनाओं के कार्य पर ध्यान केन्द्रित करना था ताकि उनके सामाजिक-आर्थिक विकास में तेजी लाई जा सके तथा साथ ही गरीबी उपशमन पर प्राथमिकता प्रदान की जा सके।

हम इस चर्चा में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में निर्णय लेने के मुद्दे पर कुछ देर बाद लौटेंगे। भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा के एजेंडा में प्राथमिकता के आधार पर विकास के मुद्दों को रखने की मांग का एक सक्रिय समर्थक बन गया है। नए प्रवेश दिए गए विकासशील देशों के सदस्यों की संख्या में वृद्धि होने के साथ ही संयुक्त राष्ट्र में 1964 में विकासशील देशों का 'ग्रुप ऑफ 77 (जी-77) गठित किया गया। भारत 1970 में जी-77 का प्रथम चेयर बना। संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य राष्ट्रों ने सदस्य राज्यों को उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए एक समर्पित बहुपक्षीय मंच का सृजन करने के लिए प्राधिकृत किया। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की स्थापना 22 नवम्बर, 1965 को की गई थी। यूएनडीपी भारत सहित सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्यों द्वारा एजेंडा 2030 क्रियान्वित करने के लिए एक प्रमुख भागीदार है। आज संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्य-राज्यों में से 132 सदस्य जी-77 समूह से संबंध रखते हैं। इसका महत्व एजेंडा 2030 पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा निर्णय के सर्वसम्मति से अंगीकरण द्वारा प्रदर्शित होता है जिसे जी-77 द्वारा समर्थित किया गया था।

तथापि, जब हम अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का अनुरक्षण करने पर बहुपक्षीय निर्णयों में भारत की प्रतिभागिता की ओर नज़र दौड़ाते हैं, तो हमें तस्वीर बहुत सकारात्मक नहीं दिखाई देती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा प्रमुख मुद्दों पर लिए गए निर्णय सभी पांच स्व: घोषित स्थायी सदस्यों की सहमति पर निर्भर करते हैं अर्थात् चीन, फ्रांस, रूस, यूके और अमेरिका। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य - राज्यों ने सुरक्षा परिषद के निर्णयों को स्वीकार और क्रियान्वित करने की सहमति व्यक्त की है जो ऐसे निर्णय बनाती है जो बहुपक्षीय प्रणाली पर बाध्यकारी होते हैं। अत: भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान भूमिका का निर्वहन करने के लिए यह आवश्यक है कि वह समान अधिकार के साथ सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व पाए और उसे विद्यमान पांच स्थायी सदस्यों के समान ही विशेषाधिकार प्राप्त होने चाहिए।

संधारणीय विकास के मुद्दों पर सुरक्षा परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों का महत्व विश्व के नेताओं द्वारा स्वयं ही प्रदर्शित किया गया है। एजेंडा 2030 की उद्देशिका में विश्व के नेताओं ने इस बात पर बल दिया कि "शांति के बिना कोई संधारणीय विकास के बिना नहीं हो सकता है तथा कोई भी शांति बिना संधारणीय विकास के संभव नहीं हो सकती है।" विश्व के नेताओं ने भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के शीघ्र सुधार को अधिदेशित किया है।

जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1963 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता को 11 से बढ़ाकर 15 करने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर का संशोधन करने वाले अपने संकल्प को अंगीकृत करने के लिए मतदान किया था, तो इस निर्णय में परिषद में चार और गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल कर लिया गया था जो अधिकांशत: नए स्वतंत्र विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व करते थे। इस बात की अपेक्षाएं थी कि नए स्वतंत्र हुए विकासशील देशों का अधिक प्रतिनिधित्व परिषद द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों में प्रतिबिंबित होगा। परंतु ऐसा नहीं हुआ, तथा इसके बावजूद भी नहीं हुआ कि 119 सदस्य-राज्यों की बड़ी संख्या में विकासशील देशों की थी तथा जिनका निर्वाचन आज तक सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्यों के रूप में चक्रानुसार होता है।

भारत ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पुन: उठाया। 14 नवम्बर, 1979 को, भारत के स्थायी प्रतिनिधि ब्रजेश मिश्रा ने 10 विकासशील देशों के सफल प्रयास का नेतृत्व किया जिसका उद्देश्य इस मुद्दे को यूएनजीए के एजेंडा में शामिल करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक समानता और प्रतिनिधित्व हासिल करना था। तथापि, उनकी वीटो की शक्ति के महत्व ने यह, सुनिश्चित किया कि स्थायी पांच सदस्यों और महासभा के उनकी वीटो शक्ति के महत्व ने 2005 में दिए गए सुधार के अधिदेश को क्रियान्वित करने की राह को रोकने के लिए प्रक्रियात्मक साधन प्राप्त करना जारी रखा।

वर्ष 2007 में महासभा द्वारा अंतरसरकारी बातचीत प्रक्रिया के सृजन के बावजूद ऐसा हुआ, तथा 2008 में वीटो के प्रश्न सहित सुधार के पांच निर्दिष्ट क्षेत्रों की पहचान; और 2015 में 122 सदस्य-राज्यों को लिखित दस्तावेज के अंगीकरण जिससे संयुक्त राष्ट्र चार्टर को संशोधित करने के लिए आम सभा के पाठ को तैयार करना भारत की गंभीर चिंता का एक विषय है।

सुरक्षा परिषद के एजेंडा पर विद्यमान मुद्दों, जहां भारत के मुख्य राष्ट्रीय हित शामिल है और जिन पर भारत की समान प्रतिभागिता के बिना निर्णय लिए जाते हैं, में शामिल है - भारत के विरुद्ध निर्देशित आतंकवाद से लड़ना, अफ-पाक क्षेत्र में स्थिति, जहां से आतंकवाद के आतंकियों को भारत पर हमले करने के लिए प्रेरित किया जाता है; विभिन्न स्थानों जैसे गोलन हाइट्स, दक्षिण सूडान और कांगो जनवादी गणतंत्र में शांति सापित अभियानों के लिए हजारों भारतीय सैन्य टुकड़ियों की तैनाती; ईरान पर कार्रवाई की संयुक्त व्यापक योजना के क्रियान्वयन के बारे में अनिश्चितताएं तथा भारत की सुरक्षा और संयोजनता प्राथमिकताओं पर इसका प्रभाव; यमन में अस्थिर विवाद जो पश्चिमी भारत-प्रशांत को प्रत्यक्ष चुनौती प्रस्तुत करता है; और परिषद में वर्तमान प्रमुख वीटो प्रयोग करने वाली शक्तियों के बीच विवाद जो भारत के रूपांतर पर प्रत्यक्षत: प्रभाव डालता है।

क्या महासभा सुरक्षा परिषद के आवश्यक सुधारों को अधिक समय तक गतिरोध में रखना चाहेगी? एक भारतीय होने के नाते, मैं यह सुझाव दूंगा कि महासभा ऐसा नहीं करेगी। मेरी सकारात्मकता के पीछे जो कारण है, वह उस तरीके पर आधारित है, जिससे सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के अनेक निहित हितों पर महासभा में अधिकांश भावनाएं हावी रहती है जैसा कि नवम्बर, 2017 में भारत के न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी के इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के लिए नामनिर्देशन में प्रदर्शित हुआ था। यदि भारत संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा सुरक्षा परिषद के सुधारों पर मसौदा संकल्प को प्रस्तुत करने में अग्रणी भूमिका निभाता है, तो महासभा में ऐसे किसी संशोधन के पक्ष में अधिकांश भावनाएं अवश्य ही अभिभावी होंगी।

बहुपक्षवाद के भविष्य में भारत का योगदान

मैं अपनी बात की समाप्ति इस बात पर दृष्टि दौड़ाते हुए करूंगा कि भारत किस प्रकार इक्कीसवीं शताब्दी में बहुपक्षवाद की मुख्य धारा के रूप में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांत को सुदृढ़ बनाने में योगदान दे सकता है। सुरक्षा परिषद की प्रमुख शक्तियों के मध्य वर्तमान ध्रुवीकरण उनकी घरेलू प्राथमिकताओं को बहुपक्षीय संरचनाओं और नीतियों पर अभिभावी करने के उनके कार्यवाही संबंधी दृष्टिकोण द्वारा चालित है। इसका श्रेष्ठ प्रदर्शन अमेरिका द्वारा लिया गया निर्णय है जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में की गई इसकी प्रतिबद्धताओं को रद्द किया जाना था ताकि प्रमुख शक्तियों द्वारा ईरान के साथ समझौता की गई संयुक्त व्यापक कार्यवाही-योजना को पृष्ठांकित किया जा सके और उसके स्थान पर ईरान पर उनकी चिंताओं का निराकरण करने के लिए अमेरिका के घरेलू कानूनों के इतर-प्रादेशिक अनुप्रयोग पर आधारित एकपक्षीय उपायों का प्रयोग किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र के अनेक सदस्य-राज्यों ने, जिसमें भारत भी शामिल है, यह कहा कि वे अपने विदेश नीति में ईरान के विरुद्ध अमेरिका के घरेलू कानूनों को लागू नहीं करेंगे।

बहुपक्षवाद के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए ऐसी चुनौतियां नई नहीं हैं। लगभग एक शताब्दी पूर्व, लीग ऑफ नेशंस ने अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को कायम रखने तथा ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए बौद्धिक ढांचे का सृजन किया था। इसका उद्देश्य "वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, कलाकारों और बौद्धिक व्यवसायों के सदस्यों के बीच बौद्धिक कार्य और अंतर्राष्ट्रीय संबंध" को प्रोत्साहित करता था ताकि "शांति कायम रखने के एक साधन के रूप में राज्यों के मध्य अंतर्राष्ट्रीय समझ" हासिल की जा सके।

प्रति‍ष्ठित भारतीय जैसे प्रोफेसर डी.एन. बनर्जी, प्रो. जगदीश चन्द्र बोस और डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन लीग की अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग समिति में अनेक अन्य विद्वानों के साथ-साथ एलवबर्ट एंस्टाइन, मैरी क्यूरी, पॉल वलेरी, हेनरी बर्गसन, एल्डस हक्स्ले, थॉमस मान और गिल्बर्ट मरे के साथ प्रतिभागी थे। समिति की स्थापना 1922 में की गई थी जिसके फलस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक सहयोग संस्थान की स्थापना की गई जिसका वित्त-पोषण फ्रांस द्वारा किया गया था जो 1946 में यूनेस्को का अग्रणी संस्थान बन गया।

जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी, 'अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करने' का विचार संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 13 में शामिल किया गया था। 1960 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस मुद्दे पर ध्यान-केन्द्रित किया तथा 1945 में संकल्प अंगीकृत किया जिसने इस धारणा की पुन: पुष्टि की कि "संयुक्त राष्ट्र की शक्ति इकसे सदस्य राज्यों के सहयोग पर आधारित है जिसे पूर्ण उपायों के साथ सामने आना चाहिए ताकि संगठन शांति की सुरक्षा करने तथा सभी लोगों के आर्थिक और सामाजिक विकास के संवर्धन के लिए एक अधिक प्रभावी उपकरण बन सके।" 1963 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1965 को, जो संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की 20वीं वर्षगांठ का वर्ष था, 'अंतर्राष्ट्रीय सहयोग वर्ष' के रूप में घोषित किया। इसने सदस्य-राज्यों को पचास वर्ष से अधिक पहले ऐसे क्रियाकलाप संचालित करने का अवसर उपलब्ध कराया, जिनमें अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांत के महत्व पर ध्यान-केन्द्रित किया गया था।

बहुपक्षीय संबंधों में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सिद्धांतों का अनुरक्षण करने के महत्व तथा इस विषय में भारत के विनिर्दिष्ट राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए,भारत के लिए अब सही समय है कि वह संयुक्त राष्ट्र की आगामी 75वीं वर्षगांठ में इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में अन्य देशों की अगुआई करे जो सितम्बर 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र से प्रारंभ होगी। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत रखी गई ऐसी किसी पहल पर ध्यान केन्द्रण पर्याप्त चर्चा का केन्द्र बनता है जो अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के बौद्धिक चर्चाओं पर ध्यान आकर्षित करती है। भारत का योगदान भी हमारी सभ्यात्मक विरासत के गहन स्रोत और वेदांता के दर्शन पर आधारित होना चाहिए जो वसुधैव कुटुम्बकम अथवा 'समूचा विश्व एक परिवार है' की अवधारणा के विस्तार के रूप में राष्ट्रों के मध्य सहयोग के महत्व पर बल प्रदान करता है। यह इक्कीसवीं शताब्दी के लिए प्रमुख योगदान होगा।

जैसे भारत के 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने की पहल पर सकारात्मक कार्रवाई की गई, जिसे क्रियान्वित करने का मुझे श्रेय प्राप्त है, उसी तरह अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को एक जीवंत वास्तविकता बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में समारात्मक भावनाओं के पर्याप्त अवसर विद्यमान है। ऐसे अंतर्राष्ट्रीय सहयेाग के विचारों के मूल्य पर ध्यान-केनिद्रत करने की भारत की पहल के निश्चित ही सफलता प्राप्त करने की संभावना है जो बहुपक्षवाद को सृजित और संपोषित करती हो।

धन्यवाद।