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भारत की एक्ट ईस्ट नीति : लाभ और संभावनाएं

  • Distinguished Lectures Detail

    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) राजीव भाटिया
    Venue: विश्व भारती, शांति निकेतन
    Date: अप्रैल 05, 2019

ऋण का पुनर्भुगतान

मेरे लिए इस उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान में उपस्थित रहना अत्यंत विशेष सम्मान की बात रही है। इसकी स्थापना गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा की गई थी जो ऐसे प्रकांड विद्वान थे जिन्होंने पूर्व के साथ अपने युगों-पुराने संबंधों के प्रति आधुनिक भारत को सचेत बनाया था तथा ये संबंध बर्मा से चीन और जापान तक फैले हुए थे। इस अवबोधन को गहन बनाते हुए, उन्होंने प्रमुख एशियाई सभ्यताओं के मध्य संपोषणीय शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रारंभ करने के लिए असाधारण दृष्टि और साहस का प्रदर्शन किया जिसमें उनकी अनिवार्य एकता और सौहार्द को रेखांकित किया गया।

गुरुदेव ने अपने समय की युवा पीढ़ी को प्रभावित किया था, युवा नेता जैसे जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस भी इनमें शामिल थे जिनके शब्दों और कार्य ने भारत और विदेश में आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित किया। अत: निर्दिष्ट विषय पर बोलने के लिए विश्व भारती द्वारा मुझे दिया गया अवसर इस संस्था के भारी कर्ज का एक छोटा सा भाग चुकाने के लिए ही है, जो विश्व के विचारों का प्रतिनिधित्व भी करता है। आज इस विश्वविद्यालय में भारत की एक्ट-ईस्ट नीति (एईपी) का विषयपरक मूल्यांकन करने का प्रयास अत्यंत उपयुक्त और सामयिक प्रतीत होता है।

एक बात और बता दूं मैं एक बार पहले 2005 में भी यहां आ चुका हूं जब मैं म्यांमार में भारत का राजदूत था।

जकार्ता में भारतीय दूतावास में डीसीएम के रूप में कार्य करते हुए मैं विश्व-भारती का ऋणी बना जिसने मुझे गुरुदेव की कविताओं के माध्यम से भारत-इंडोनेशिया संबंधों को समझने का अवसर प्रदान किया। वर्ष 2012-15 के दौरान भारतीय विश्व मामला परिषद के महानिदेशक के रूप में, मैंने विभिन्न उपायों के माध्यम से आसियान के साथ भारत के संबंध में हमारे पूर्वोत्तर क्षेत्र के महत्व के बारे में जागरूकता का सृजन करने में सहायता प्रदान की, जिनमें एशियन कंफ्लूएंस, जो शिलांग स्थित एक चिंतन संस्था है, द्वारा किए गए लाभप्रद कार्य का प्रयोग करना भी शामिल है। पिछले तीन वर्षों में, गेटवे हाउस, जो मुंबई में स्थित एक अग्रणी चिंतन संस्था है, ने भारत प्रशांत क्षेत्र में विकास का निर्वचन करने के मेरे कार्य को पर्याप्त सहायता प्रदान की है। अत: भुवनेश्वर और दिल्ली में स्थित एक अन्य चिंतक संस्था कलिंगा अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान ने पिछले वर्ष और इस वर्ष मार्च में पांच आसियान राष्ट्रों - इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, लाओस और कम्बोडिया को शामिल करते हुए दो गंभीर नीतिगत यात्राएं आयोजित करने मुझे अवसर प्रदान किया जिसने मुझे नई सोच प्राप्त करने में समर्थ बनाया।

इस पृष्ठभूमि में, मुझे आपके सम्मुख अपना मूल्यांकन प्रस्तुत करने में अत्यंत प्रसन्नता हो रही है जो किसी भी भेदभाव से परे है, जिसमें मैंने व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को अपनाया है और उस मुकाम को प्रतिबिंबित किया है, जहां से हम आए हैं, जहां पर हम अभी खड़े हैं और जहां पर हम भविष्य में पहुंचेगे।

इतिहास के माध्यम से यात्रा

सर्वप्रथम, मैं व्याप्त दो भ्रांतियों को दूर करना चाहूंगा : यह कि भारत ने हमेशा ही पश्चिम की ओर देखा है, जो एक ऐसी प्रवृत्ति रही है जो ब्रिटिश काल के दौरान अत्यधिक सुदृढ़ बन गई थी; और यह कि भारत की लुक ईस्ट नीति नब्बे के दशक के प्रारंभ में आरंभ हुई थी जब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव दक्षिण पूर्व एशिया के साथ संबंधों में एक बिल्कुल नया मार्ग तलाशा था। इतिहास को सरसरी तौर पर से देखने से भी पता चल जाता है कि भारत के सांस्कृतिक, वाणिज्यिक और लोगों-के-लोगों के साथ संपर्कों के स्तर अनेक शताब्दियों प्राचीन हैं, तथा इन संबंधों का अधिकांश भाग मोटे तौर पर दो-मार्गीय था। दूसरे, श्री नरसिम्हा राव एक महान विद्वान थे जो अनेक भाषाएं बोलते थे और उन्होंने अपने समय के दौरान एक नीति विचारित और तैयार की जो भारत की स्वतंत्रता के साथ ही और वस्तुत: उससे भी पूर्व प्रारंभ हुई थी। अनेक वर्ष पूर्व आईएसएएस के लिए लिखे गए शोध पत्र में प्रोफेसर एस.डी. मुनि ने पूर्व के साथ संबंधी की 'चार लहरों' के बारे में बात की। सितम्बर, 2018 में जिंदल विश्वविद्यालय में दिए गए मेरे व्याख्यान में, मैंने पूर्व के साथ राष्ट्र की पहुंच के विकास में 'छह चरणों' का उल्लेख किया।

यहां पर, यह उल्लेखनीय है कि अपनी नवीनतम पुस्तक 'इंडियाज ईस्टवार्ड एंगेजमेंट : फ्रॉम एंटिक्विटी टु एक्ट ईस्ट पॉलिसी' में प्रोफेसर मुनि और डा. राहुल मिश्रा ने अपने 'सात विशिष्ट चरणों अथवा लहरों' के माध्यम से इस प्रक्रिया के विकास का निश्चित रूप से पता लगाया है। ये हैं :

प्राचीन बिन्दु-बौद्ध प्रभाव,

इस्लाम की लहर,

तीसरी लहर के रूप में ब्रिटिश युग जिसे स्वतंत्रता संग्राम के रूप में छोटी लहर द्वारा प्रभावी रूप से संभाला गया,

नेहरू युग,

नेहरू के बाद का समय (1962-1990),

लुक ईस्ट नीति (एलईपी), और

एक्ट ईस्ट नीति (2014 से आगे)

लुक ईस्ट नीति से एक्ट ईस्ट नीति : परिवर्तन क्यों?

इस परिवर्तन के पीछे के कारणों को पूर्णत: समझने तथा एक्ट ईस्ट नीति की प्रकृति और परिधि का जायजा लेने के लिए उस बात का स्मरण करने की आवश्यकता है कि लुक ईस्ट नीति को किसने प्रेरित किया, इसका निष्पादन कैसे किया गया था, और यह वर्तमान दशक के मध्य में किस अवस्था तक पहुंची जब अनेक लोगों ने यह महसूस किया कि इसमें और परिवर्तन करने, उन्नयन करने अथवा पुनःअभिमुखीकण करने के लिए समय आ गया है।

विद्वान सहमत हैं कि लुक ईस्ट नीति के तैयार और अंगीकृत करने के पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारकों का मिश्रण विद्यमान है। यह केवल एक दिन में ही तैयार नहीं की गई बल्कि इस नीति को धीरे-धीरे और एक व्यावहारिक रीति के साथ विकसित किया गया। यह सिक्के का बाहरी पहलू था जो आंतरिक रूप से आर्थिक उदारीकरण की नीति के चारों ओर घूमता था। भारत को विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी की आवश्यकता थी। आसियान को इसका एक उपयोगी और सुयोग्य स्रोत था।

इस क्षेत्रीय समूह ने हमारे राष्ट्र के रूप में भारत परिदृश्य पर एक विस्तृत स्थान अर्जित कर लिया, जिसने शीत युद्ध की समाप्ति तथा अमेरिका के एक ध्रुवीय आंदोलन की चुनौती का सामना किया, और दक्षिण-पूर्व एशिया में नई भागीदारियों का अन्वेषण किया। इसके अलावा, पूर्वोत्तर में उग्रवाद के प्रभाव का निवारण करने की तात्कालिक आवश्यकता, जिसने पश्चिमी म्यांमार में स्थिति के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए थे, के कारण नई दिलली को म्यांमार में एक लोकतंत्र समर्पित नीति से "एक दोहरा-मार्ग नीति" की ओर रूपांतरण करने की अनिवार्यता महसूस कराई (लोकतांत्रिक, ताकतों के लिए समर्थन को जारी रखते हुए सैन्य जनता के साथ भी दोस्ती कायम करना)।

अंतत: आसियान भी भारतीय बाजार के क्षमता से प्रभावित हुआ जो धीरे-धीरे खुल रहा था। इसके अलावा, यह भी भारत के साथ एक संवध्रित तरीके से संबंध स्थापित करते हुए चीन की बढ़ती हुई शक्ति के साथ क्षेत्र में संतुलन स्थापित करने के लिए अपनी स्वयं की रणनीतिक बाध्यताओं द्वारा चालित था।

एलईसी के क्रियान्वयन के दो दशकों में नई सांस्थानिक व्यवस्थाओं, करारों, संबंधों के नियमित स्वरूपों तथा भारत और आसियान के बीच सहयोग के रूप में अनेक लाभ हुए। आसियान के दायरे से बाहर हितधारकों के साथ संबंध गहन बनाने के प्रयास भी किए गए। 2012 के भारत-आसियान स्मारक स्तरीय भागीदारी का प्रथम दशक मनाया। तथापि, नीति के अंतिम कुछ माहों में, इस बात की धारणा बढ़ने लगी कि भारत को और अधिक तीव्र नीति अपनाने की तथा आसियान को भी भारत के साथ संबंध में अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। यही अनिवार्यता एलईपी से एईपी के रूपांतरण के पीछे प्रमुख कारण थी।

एलईपी और एईपी के बीच अंतर

दोनों ही विद्यालय अपने तर्क में सही प्रतीत नहीं होते हैं, जो यह तर्क देते हैं कि दोनों नीतियों के बीच कोई अंतर नहीं है, और जो यह कहते हैं कि एईपी पूर्णत: एक नई नीति है। मेरे दृष्टिकोण में, वस्तुपरक सत्यता यह है कि इनमें उल्लेखनीय अंतर है, एईपी पूर्व के प्रति एक नई विशिष्ट नीति थी, जो 2014 से पूर्व प्रारंभ की गई थी। अत: एईपी केवल एक शुरुआत थी अथवा उसने ऊंची छलांग लगाई थी, इस पर तब तक वाद-विवाद होता रहेगा जब तक कि हम उन परिवर्तनों की पहचान नहीं कर लेते जिन्हें एक सतर्क और सतत् तरीके से इनमें लाया गया है।

एलईसी और एईपी में कम-से-कम पांच अंतरों को निर्दिष्ट करना आवश्यक है, जो इस प्रकार है:

एईपी केवल आसियान ही नहीं, बल्कि अधिक व्यापक क्षेत्र शामिल करने पर ध्यान-केंद्रित करती है। अब यह पूर्व एशिया से भारत-प्रशांत के वर्णन में परिवर्तन को सार्थक करती है।

यह पूर्व की तुलना में पूर्वी राष्ट्रों के साथ सुरक्षा और संरक्षा पर अधिक बल प्रदान करती है, तथा 'वाणिज्य, संस्कृति और संयोजनता' के प्राचीन तीन क्षेत्रों पर अधिक निर्भर नहीं रहती, अर्थात् सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक सहयेाग।

इस नीति का आसियान, विशेष रूप से इसके सीएलएमवी अवयव में संबंधों का निर्माण करने में पूर्वोत्तर क्षेत्र की भूमिका पर दिए गए सुदृढ़ बल का व्यापक मान्यता प्रदान की गई है। इस संदर्भ में, इस प्रकार के प्रश्न जैसे एईपी में बांग्लादेश का स्थान, म्यांमार को एक निकटवर्ती पड़ोसी तथा एक दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्र, दोनों ही के रूप में देखने की समझी जा सकने वाली प्रवृत्ति तथा क्षेत्रीय एकता के लिए पसंद के मंच के रूप में बिमस्टेक में संवर्धित निवेश, ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें आज के यहां उपस्थित श्रोतागण की विशेष रुचि होगी।

'लुक' शब्द को 'एक्ट' शब्द से बदले जाने से उच्च स्तरीय क्रियात्मक और कार्रवाई-उन्मुख दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण संकेत भेजा गया है।

राजनीतिक संबंध, विशेषकर नेतृत्व के स्तर पर पूर्व की तुलना में अधिक प्राथमिकता प्राप्त कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय विदेश नीति के एक उप-सेट के रूप में एईपी अधिक विस्तृत प्रोफाइल अर्जित करती है, जो इसके पूर्ववर्ती वर्षों में नहीं था।

लाभ तथा भावी मार्ग

संक्षेप में, एईपी के तीन मुख्य स्तंभों में से राजनीतिक स्तंभ आज अत्यंत मजबूत है जिसमें रणनीतिक, राजनीतिक रक्षा और सुरक्षा सहयोग शामिल है। जनवरी, 2018 का भारत-आसियान स्मारक शिखर-सम्मेलन इसे उजागर करता है। संदर्शों की अभिसारिता तथा करारों, यात्राओं के आदान-प्रदान नौसेना अभ्यासों के आयोजन उपकरणों की आपूर्ति, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, आदि की संख्या और परिधि में हुई वृद्धि इस रूझान की पुष्टि करती है। भारत के भारत-प्रशांत दृष्टिकोण के बारे में पर्याप्त स्पष्टता विद्यमान है, हालांकि यह अन्य चतुर्भागीदारों - अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया से कुछ हद तक भिन्न है। भारत और कतिपय आसियान देशों, जैसे इंडोनेशिया, सिंगापुर और वियतनाम के बीच विचारों की समीपता भी विशष रूप से उल्लेखनीय है।

आर्थिक स्तंभ को भी पर्याप्त ध्यान और संपोषण प्राप्त हुआ है। व्यापार, निवेश, संयोजनता और पर्यटन में वृद्धि करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए गए हैं। विकास भागीदारी ने भी पर्याप्त ध्यान अर्जित किया है। तथापि, यह देखा गया है कि आर्थिक स्तंभ को और अधिक सहयोग और समय दिए जाने की आवश्यकता है जिससे यह अपनी पूर्ण क्षमता को हासिल कर ले।

सामाजिक-सांस्कृतिक सहयोग का तृतीय स्तंभ भी शक्ति अर्जित कर रहा है। इसका संवर्धन मुख्यत: सरकारों द्वारा चालित है। यह अनेक संस्थाओं और हितधारकों द्वारा और अधिक सक्रियता से कार्य कर सकता है जो 'तृतीय स्थान' के क्षेत्र में आते हैं। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि आज पूर्व एक रणनीतिक गतिरोध की स्थिति में है। अत: एईपी को अपने रणनीतिक अभिमुखीकरण में स्थिर होना चाहिए। यह आंशिक रूप से अंतर्वेशिता (पूर्व एशियाई शिखर-सम्मेलन के प्रतिनिधित्व में) से चतुर्देशों को और चतुर्देशों से अंतर्वेशिता (भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा उनकी शां-ग्रीला वार्ता द्वारा प्रारंभ) को नीतिगत प्रभावों का वर्णन करता है।

निष्कर्ष

हमारी एक्ट ईस्ट नीति के निरंतर अध्ययन से नीचे कुछ अनंतिम निष्कर्ष दिए गए हैं जो उस दिशा का संकेत करते हैं, जो हमारे एईपी 2.0 की ओर चलते समय अपनाई जा सकती है:

एसईपी-एईपी ने बहुत अच्छा कार्य किया है, परंतु इष्टतम परिणाम अभी भी अपेक्षित हैं।

आसियान का संदर्श : इसके सदस्य-राज्य भारत के साथ अत्यधिक संबंध चाहते हैं, कम नहीं, परंतु वे नई दिल्ली की पहलों के प्रति अधिक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। क्यों? पूर्वोत्तर : इसने नई दिल्ली के साथ अपने संबंध तेजी के साथ संवर्धित किए हैं। हालिया घटनाक्रम आशाजनक हैं। पूर्वी भारत इसे भी कुछ संस्थाओं द्वारा प्रवर्तित 'कलिंग दृष्टिकोण के अनुसार अधिक घनिष्टता के साथ सम्मिलित किए जाने की आवश्यकता है।

बांग्लादेश को शामिल करने अनिवार्य और अपेक्षित, दोनों है : 'बंगाल की खाड़ी के समुदाय' और बिमस्टेट का दृष्टिकोण।

व्यापार, युवाओं, विश्वविद्यालयों, चिंतकों, मीडिया और नागरिक समाज की संलिप्ता का विस्तार किया जाना अत्यंत अपेक्षित है।

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