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पश्चिम एशिया में भारत की विदेश नीति

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    By: राजदूत अनिल त्रिगुनायत
    Venue: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी
    Date: मार्च 29, 2019

आईआईटी के माननीय निदेशक,
प्रतिष्ठित संकाय सदस्य, प्रिय छात्रों, देवियो और सज्जनो,


असम, विशेष रूप से इस अत्यंत प्रतिष्ठित संस्था में उपस्थित रहकर मुझे वस्तुत: हार्दिक प्रसन्नता हो रही है जिसकी उत्कृष्टता से विश्व स्तर पर पहचान छोड़ी है और प्रभाव बनाया है। इसके लिए आपको बधाई तथा आपके आतिथ्य-सत्कार और गर्मजोशी के लिए आपका धन्यवाद। मैं विदेश मंत्रालय और लोक राजनयिकता प्रभाग के प्रति भी आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने मध्य-पूर्व में विस्तारित और हमारे सर्वाधिक महत्वपूर्ण पड़ोस के संबंध में भारत की विदेश नीति पर अपने विचारों को प्रस्तुत करने के लिए मुझे अवसर प्रदान किया। जैसा कि शीर्षक संकेत करता है, जिस प्रकार इस व्यापक संबंधों के प्रति ध्यान देते हैं, उसमें एक प्रतिमान रूपांतरण की झलक देखने को मिलती है क्योंकि यह विश्व में सर्वाधिक अस्थिर और संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है जिसमें ऐतिहासिक अन्याय, अंतरा-क्षेत्रीय वैमनस्य तथा धार्मिक श्रेष्ठता और निष्ठाओं के लिए प्रतिस्पर्धा स्पष्टत: परिलक्षित होती है। भारत अपने पथ पर अत्यंत सतर्कता से और बिना किसी पूर्वग्रह के अग्रसर है। इससे भारत को क्षेत्र में लगभग सभी देशों का भरोसा प्राप्त हुआ है तथा वे भारत कोएक ईमानदार भागीदार और मित्र के रूप में देखते हैं। अंत में, मैं यह भी कहूंगा कि प्रमुख चुनौतियों के विद्यमान रहने के बावजूद संबंध को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार की जबर्दस्त सफलता के रूप में गिना जा सकता है।

2. 'नाम में क्या रखा है' या तो कुछ नहीं अथवा कुछ अस्पष्टत: अथवा वास्तविक और इंद्रिय गोचर। यह बात ज्ञात है कि पश्चिम एशिया स्पष्ट कारणों जैसे बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासियों, ऊर्जा आपूर्तियों, सुरक्षा और व्यापार मार्गों और निवेश के पर्याप्त स्रोतों के चलते हमारे विस्तारित पड़ोस में हमारे सबसे महत्वपूर्ण भागीदारों में से एक है। इस संबंध में रणनीतिक और ऐतिहासिक कहना पिष्टोक्ति होगी, परंतु यह बात निश्चित ही इस क्षेत्र पर लागू होती है, भले ही हम किसी भी प्रकार से उसे देखें। तथापि, इनमें अनेक संघटकों के साथ-साथ प्रोत्कर्ष और गर्त, सामान्य और असामान्य निर्भरता और अविश्वास की लंबी अवधियां भी शामिल रही हैं जो किसी भी संबंध में संदर्भ में सत्यता है। प्राय: पाकिस्तान कारक तथा अपने इस्लाम भाइयों का पक्ष लेने की क्षेत्र की प्रवृत्ति का भारत की वास्तविक इच्छा के संबंध में इसके अल्पकालिक दृष्टिकोण पर प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार, वांछित आतंकवादियों, भगोड़ों और अपराधियों की उपस्थिति, जो खाड़ी देशों में आश्रय ढूंढ रहे होते हैं, हमें यह मानने पर विवश कर देते हैं कि खाड़ी के कुछ देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय अथवा भारत की मुख्य और वैध चिंताओं का निराकरण नहीं किया जा रहा है। प्राय: भारत उसे चिंता में डालने वाली परिस्थितियों के पीछे पाकिस्तान द्वारा दिखाई गई प्राथमिकता अथवा उसका हाथ शामिल पाता है। दशकों से उच्च स्तरीय और क्षेत्र के अनेक महत्वपूर्ण देशों में नहीं किए जा सके हैं, जो भारत से मात्र 3 घंटे की दूरी पर हैं तथा अत्यंत महत्वपूर्ण देश हैं। संबंध निर्बाध रूप से जारी हैं परंतु उनमें उतनी गहनता और केन्द्रीयता दिखाई नहीं देती है। हालांकि मध्य पूर्व अथवा पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंध को प्राय: 'लुक और लिंक वेस्ट' के नाम से जाना जाता है, परंतु वास्तविकता में यह भारत के विस्तारित पड़ोस में प्रधानमंत्री मोदी की सबसे सफल विदेश नीति की उपलब्धि है जिसमें मोटे तौर पर जीआईसी देशों, ईरान और इजराइल तथा अन्य अरब देशों का अधिक महत्वपूर्ण तथा समृद्ध उप-क्षेत्र शामिल है।

3. सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षण इस माह के प्रारंभ में (1-2 मार्च, 2019) को आया जब भारत की विदेश मंत्री को इस्लाम सहयोग संगठन (ओआईसी) जिसे अब इस्लाम देशों के संगठन के नाम से जाना जाता है, के विदेश मंत्रियों की 46वीं परिषद में 'सम्मानित अतिथि' के रूप में आमंत्रित किया गया और उससे पूर्व सउदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान (एमबीएस) द्वारा भारत की प्रथम राजकीय यात्रा की गई। इसके साथ-साथ, यह असाधारण तथ्य भी सामने आया कि भारतीय विदेश मंत्री ने एक पखवाड़े में ही तीन बार सउदी विदेश मंत्री के साथ भेंट की और यह घटनाक्रम पुलवामा आतंकवादी हमलों की पृष्ठभूमि में हुआ।

4. आलोचकों के अन्यथा वर्णन करने के बावजूद, मैं कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को वर्णित करने का प्रयास करूंगा, विशेषत: वे, जो मई, 2014 में मोदी सरकार के कार्यभार संभालने के बाद से पश्चिम एशिया के साथ हमारे संबंधों में घटित हुए। सामान्यत: हमारी विदेश नीति की वैश्विक स्तर पर पहुंच और प्रभाव अत्यंत व्यापक हो गया है तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में राष्ट्रीय हितों को अपेक्षित स्वायत्तता प्राप्त हो गई है। इसके पीछे तथ्य यह है कि पाकिस्तान को छोड़कर, भारत के अपने पड़ोसी देशों तथा सभी प्रमुख वैश्विक राज्यों और राष्ट्रों के साथ संबंध सकारात्मक पथ पर अग्रसर हैं। 'भारत प्रथम' पर राष्ट्रीय हित एक प्रमुख विचारण तथा मुख्य सिद्धांत रहा है जो परिणामों में स्पष्ट दिखाई पड़ता है चाहे वे राजनीतिक अथवा सुरक्षा सहयोग से संबंधित हो अथवा अन्य मामले में आर्थिक संबंध, निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग से जुड़े हों। संबंधों पर नज़र दौड़ाते हुए हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यह मात्र एक संकेत मात्र ही है क्योंकि प्रत्येक संप्रभु देश के मध्य में अपना केन्द्रीय हित निहित होता है जिसकी किसी एकल द्विपक्षीय संबंध द्वारा अनन्य रूप से सेवा प्रदान करने की संभावना कम होती है।

ओआईसी:

5. इस्लाम सहयोग संगठन जिसे अब इस्लाम देशों का संगठन (ओआईसी) कहा जाता है, जहां तक भारत का संबंध है, पुन: समाचारों की सुर्खियों में था। भारत को आबू धाबी में 1-2 मार्च, 2019 को आयोजित उनके विदेश मंत्रियों की परिषद में 'सम्मानित अतिथि' के रूप में आमंत्रित किया गया था। श्रीमती सुषमा स्वराज, विदेश मंत्री ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। 46वीं ओआईसी बैठक के पूर्ण सत्र को संबोधित करने के यूएई के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जावेद अल नेहान का आमंत्रण स्वीकार करते हुए विदेश मंत्रालय के वक्तव्य में यूएई के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध को रेखांकित किया गया था, "हम इस निमंत्रण को यूएई के प्रबुद्ध नेतृत्व के तेजी से विकसित होते द्विपक्षीय संबंधों से परे जाने तथा बहुपक्षीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक बहुआयामी भागीदारी स्थापित करने की आकांक्षा के रूप में देखते हैं। हम इस निमंत्रण को यूएई के साथ हमारी व्यापक रणनीतिक भागीदारी में एक मील के पत्थर के रूप में देखते हैं। हम इस निमंत्रण को भारत में विद्यमान 185 मिलियन मुस्लिमों तथा इसके बहुलवादी लोकाचार के प्रति उनके योगदान तथा इस्लाम विश्व के प्रति भारत के योगदान को मान्यता प्रदान किए जाने के रूप में भी देखते हैं। भारत ने पहले ही चेतावनी दी है कि ओआईसी को जम्मू-कश्मीर तथा भारत में मुस्लिमों की स्थिति सहित भारत के आंतरिक मामलों में टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। नब्बे के दशक से पाकिस्तान के कहने पर ओआईसी वर्ष-दर-वर्ष भारत के विरुद्ध कट्टरवादी टिप्पणियां और संकल्प जारी कर रहा है जिन्हें भारत आधारहीन और फिजूल मानते हुए स्पष्टत: अस्वीकार कर रहा है।

6. यह बैठक पाकिस्तान आधारित और समर्थित जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के जम्मू और कश्मीर में पुलवामा में किए गए आतंकवादी हमले के उपरांत आयोजित की जा रही है जिसमें सीआरपीएफ के 40 कार्मिक मारे गए तथा जिसकी समूचे विश्व में निंदा की गई थी और भारत और पाकिस्तान के बीच भयावह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी। यह संभव है कि इस बार पाकिस्तान पर मेजबान और जीसीसी देशों का दबाव बढ़ गया है तथा उन्होंने भारत को 'सम्मानित अतिथि' के रूप में आमंत्रित करने के विचार का विरोध नहीं किया और संभवत: इसे किसी प्रकार के वार्तालाप अथवा बातचीत की शुऊआत के लिए एक उपाय के रूप में देखा। परंतु भारत द्वारा बालाकोट में स्थित प्रशिक्षण और भर्ती शिविरों पर किए गए हवाई हमलों के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरेशी ने विरोध व्यक्त किया तथा यूएई के विदेश मंत्री के निमंत्रण को वापस नहीं लिया जाता है, वह बैठक में भाग नहीं लेगा। परंतु यूएई और ओआईसी अपने निर्णय पर दृढ़ थे और उन्होंने निमंत्रण को बनाए रखा तथा उन्हें पूर्ण सम्मान प्रदान किया। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने इसका बहिष्कार किया। इसने भारत के साथ ओआईसी के सदस्य देशों के संबंधों में प्रतिमान परिवर्तन प्रदर्शित किया हालांकि नेमी तौर पर उन्होंने पुराने मुद्दों को ही निर्दिष्ट किया परंतु आबू धाबी घोषणा ने भारत की इच्छाओं के विरुद्ध किसी विवादास्पद मुद्दे का उल्लेख नहीं किया।

7. भारत और ओआईसी के बीच मोरक्को के रबात में 1969 में उसकी स्थापना किए जाने के बाद से संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। उसने प्रारंभ से ही अपने अस्तित्व के पांच दशकों के दौरान भारत की तुलना में पाकिस्तान को तरजीह दी है, जब शिष्टमंडल के भारतीय नेता फकरूद्दीन अली अहमद को, जो अपने आबंटित विला में मौजूद थे, सदस्य के रूप में भाग लेने की अनुमति प्रदान नहीं की गई। उन्हें रबात से उस समय लौटना पड़ा जब भारत ने 'प्रेक्षक दर्जे' को स्वीकार करने से इंकार कर दिया, हालांकि भारत के राजदूत ने पूर्ण सत्र में भाग लिया। मोरक्को, सउदी अरब और जॉर्डन के सम्राटों ने अपने पाकिस्तानी जनरल बंधु को अपमानित नहीं होने दिया जब तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल याहया खान ने यह दलील दी कि यदि भारत को ओआईसी में प्रवेश दे दिया गया तो वे अपने लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे। ओआईसी की बैठक 1965 के भारत-पाक युद्ध, अल अक्सा मस्जिद पर हमले तथा अरब-इजराइली टकराव की पृष्ठभूमि में हो रही थी। ओआईसी के नेताओं ने उसे इस्लाम जगत के निर्बाधित सामूहिक आवाज बनाने की इच्छा व्यक्त की थी। विवाह होने से पूर्व ही भारत और ओआईसी के बीच 'तलाक' हो गया था।

8. उसके बाद से, एक इस्लाम देश होने के नाते पाकिस्तान ने इस मंच पर विशेष रूप से कश्मीर के मुद्दे को लेकर भारत के विरुद्ध जहर उगलना सफलतापूर्वक जारी रखा है जिसमें 57 देश हैं तथा यह संयुक्त राष्ट्र के बाद दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी समूह बनकर उभरा है तथा यह मुस्लिम देशों का प्रतिनिधित्व करने और उनका पक्ष लेने का दावा करता है। ओआईसी की साख संदिग्ध रही है क्योंकि यह निरंतर अपने कुछ सदस्यों, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है, के अनौचित्यपूर्ण और प्रतिशोधी दृष्टिकोणों के आगे घुटने टेकता रहा है। प्रारंभ में, भारत इसके एकपक्षीय और प्रतिशोधी वक्तव्यों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता था परंतु एक समय ऐसा आया कि इन पर प्रतिक्रिया व्यक्त न करने और इसकी उपेक्षा करने का निर्णय लिया गया क्योंकि अपनी बात रखने के प्रयासों को व्यर्थ करने का कोई औचित्य नहीं बनता था। भारत के ओआईसी के अधिकांश देशों के साथ उत्कृष्ट द्विपक्षीय संबंध रहे हैं तथा द्विपक्षीय वार्ताओं में वे भारत को कहते रहे हैं कि वह उन मानक वक्तव्यों की ओर ध्यान न दे, भले ही उन्हें सर्वसम्मति से जारी किया गया हो। कुछ देश अनुपस्थित रहते हैं, यदि वे खुलकर उनका विरोध नहीं करते हैं, परंतु मेरा मानना है कि उसे इस्लाम-विरोधी माना जाता है। इस दौरान भारत को प्रसन्न करने के लिए वे उसे रूस और थाइलैंड की भांति 'प्रेक्षक का दर्जा' प्राप्त करने के लिए आवेदन करने का निमंत्रण देते हैं। वर्ष 2006 में भारत की अपनी यात्रा के दौरान सउदी अरब के सम्राट अबदुल्ला ने कहा था कि भारत को ओआईसी के प्रेक्षक बनना चाहिए तथा उन्होंने आदर्श रूप में आशा व्यक्त की कि पाकिस्तान, जो सदैव ही इसका विरोध करता रहा हैं, इसका प्रस्ताव करेगा। तब से 12 वर्ष बीत चुके हैं तथा पाकिस्तान की बेजुबानी को ओआईसी द्वारा वैधीकृत किया जा चुका है, यदि हम उसके नियमित वक्तव्यों पर नज़र दौड़ाएं जिनमें 'कश्मीर संपर्क ग्रुप' और 'जम्मू और कश्मीर के लिए एक विशेष राजदूत' नियुक्त करने के वक्तव्य भी शामिल हैं जिन्हें भारत द्वारा सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया है। 2018 में भी, ओआईसी द्वारा भारत के विरुद्ध जम्मू-कश्मीर पर और सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर वक्तव्य जारी किए गए हैं। यदि यूएई ने "अपनी विशाल वैश्विक राजनीतिक हैसियत को तथा अपनी समयानुकूल और गहरी सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत और इसके महत्वपूर्ण इस्लामी अवयव को ध्यान में रखते हुए सम्मानित अतिथि के रूप में भारत जैसे अपने मित्र राष्ट्र'' को आमंत्रित कर भी दिया तो हम रातों-रात हृदय-परिवर्तन अथवा रणनीति में किसी बदलाव की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं।

9. बांग्लादेश और कुछ अन्य देशों, जिनमें तुर्की भी शामिल है, ने ओआईसी चार्टर में परिवर्तन किए जाने की मांग की है ताकि भारत की प्रविष्टि को समर्थ बनाया जा सके जो विश्व में तेजी से विकास करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है तथा वैश्विक आकांक्षाओं, क्षमता और पहुंच के साथ उभरती हुई क्षेत्रीय शक्ति है जो संगठन और उसके सदस्यों को उल्लेखनीय लाभ प्रदान कर सकती है। इसे बाहर रखना तथा आलोचना का भाजक बनाना नुकसानदेह सिद्ध हो सकता है। अत: यूएई के विदेश मंत्री द्वारा भारत की विदेश मंत्री को निमंत्रण दिया जाना महत्वपूर्ण है तथा यूएई के विदेश मंत्री ने न केवल भारत के विरुद्ध आतंकवादी हमलों की निंदा की बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि शिखर-सम्मेलन के उपरांत आबू धाबी घोषणा में जम्मू-कश्मीर का कोई संदर्भ शामिल न किया जाए। वस्तुत: उन्होंने प्रेस कांफ्रेस में सम्मानित अतिथि के रूप में भारत को दिए गए निमंत्रण को 'ऐतिहासिक' बताया और कहा कि 'हम इसे उस स्थान तक आगे ले जाना चाहते हैं जहां तक हम एक दिन सदस्य के रूप में भारत का स्वागत कर सकें' जो संभवत: हमारी प्रतिभागिता की भावना निहित करता है।

सउदी अरब

10. सउदी अरब भारत के लिए एक घनिष्ठ और महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार रहा है तथा वह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की कल्याणकारी गतिशीलता में निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 2006 में तत्कालीन सम्राट अब्दुल्ला अजीज बिन अल सउद की यात्रा के बाद तथा 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा सउदी अरब की यात्रा के बाद से, ये संबंध अत्यंत उच्च तथा व्यापक हुए हैं। दिल्ली और रियाद घोषणाओं ने उस नई दिशा के भावी स्वरूप का वर्णन किया जिनकी ओर ये संबंध अग्रसर हैं। इस तथ्य को 2010 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सउदी अरब की यात्रा द्वारा और भी स्पष्ट कर दिया गया जब उन्हें सर्वोच्च सम्मान से सुशोभित किया गया। पश्चिम एशिया के संदर्भ में भारत द्वारा प्रदान किए गए बल के संदर्भ में की गई यात्रा में पारस्परिक हित के अनेक क्षेत्रों पर चर्चा का आयोजन समर्थ बना तथा इसने विद्यमान रणनीतिक भागीदारी को और बड़ा बनाया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को भारत की राजकीय यात्रा का निमंत्रण दिया। बहुपक्षीय बैठकों के दौरान भी सउदी और भारतीय नेताओं ने अपनी मुलाकातें जारी रखीं। उन्होंने जी-20 शिखर-सम्मेलन के दौरान भेंट की तथा एक-दूसरे की प्रमुख चिंताओं को समझा और उनका हल करने पर सहमति व्यक्त की। वस्तुत: अर्जेंटीना में हुई उनकी बैठक में, क्राउन प्रिंस ने स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री मोदी के अनुरोध के मद्देनजर सउदी अबर ने तेल के उत्पादन को कम न करने का निर्णय लिया है ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था, जो उनके बड़े ग्राहकों में एक है, को कोई परेशानी न होने पाए। यह एक महत्वपूर्ण निर्णय था जिससे सउदी की ओर से यह प्रस्ताव भी आया कि उस कमी को पूरा करने के लिए अधिक तेल का प्रावधान किया जाएगा जिसके ईरान के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध के उपरांत होने की संभावना है। हालांकि खाशोगी हत्याकांड तथा उसके उपरांत घटे घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए पंक्तिबद्ध एमबीएस को पश्चिम और तुर्की से पर्याप्त सहयोग प्राप्त हुआ है। भारत इसे एक आंतरिक मामला मानता है। नकारात्मक समीकरण के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने ब्यूनस आयर्स जी-20 शिखर-सम्मेलन के दौरान क्राउन प्रिंस के साथ विस्तृत विचार-विमर्श किया। अत: एमबीएस नेताओं के साथ अपने संपर्कों, विभिन्न देशों के दौरों तथा प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में प्रतिभागिता के साथ आलोचना का सामना करने और उसका बचाव करने का प्रयास कर रहा है तथा उसके साथ-साथ खाशोगी प्रकरण के दौरान ही प्रथम विवादास्पद 'रेगिस्तान में दावोस' सम्मेलन का आयोजन किया गया।

11. सउदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद-बिन सलमान (एमबीएम) अपनी पहली यात्रा पर 19-20 फरवरी को भारत का आए थे और उनके साथ-साथ एक उच्च-स्तरीय शिष्टमंडल भी आया था जिसमें मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी तथा अग्रणी सउदी व्यापारी भी थी। एमबीएस ने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति से भेंट की तथा हमारे पारस्परिक हित के व्यापार संभावित क्षेत्रों पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं कीं जिनमें पश्चिम एशिया क्षेत्र का विकास भी शामिल था। यह यात्रा पुलवामा और बालाकोट की घटनाओं तथा पोलैंड में आयोजित यूएस एंड इजराइल प्रायोजित मंत्रालयी बैठक की पृष्ठभूमि में आयोजित की गई थी जिसका उद्देश्य मध्य-पूर्व में शांति और सुरक्षा के भविष्य को प्रोत्साहित करना था जहां प्रधानमंत्री नेतनयाहू और जारेद खुशनेर ने अरब खाड़ी राज्यों को अपनी पहुंच से अवगत कराया और यह भी बताया कि ईरानी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका और प्रभाव को किस पर रोकना और उसका प्रतिरोध करना है, जो सउदियों का एक अपेक्षित लक्ष्य भी है। भारत इन क्षेत्रों में तथा इजराइल और फिलिस्तीन, सउदी अरब और ईरान सउदी अरब, यूएई, बहरीन बनाम कतर के बीच असंगत विवादों और बढ़ते हुए वैमनस्य अथवा यमन में युद्ध में तटस्थ रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच इन सभी मुद्दों और स्थितियों पर चर्चा की गई।

12. भारत ने अरब खाड़ी में अधिकांश देशों तथा इजराइल और ईरान के साथ उत्कृष्ट द्विपक्षीय रणनीतिक संबंध विकसित किए हैं। इस दृष्टिकोण की सराहना मध्य-पूर्वी देशों द्वारा की गई है तथा वे इस बात को साझा करते हैं कि उन्हें आशा नहीं है कि भारत की विदेश नीति के अवयवों को, उनके यथार्थवादी आकलन के संदर्भ में ध्यान में रखते हुए, भारत किसी देश-विशेष का पक्ष लें, जो अनिवार्यत: वार्तालाप के माध्यम से विवादों के परस्पर बातचीत से समाधान निकालने पर विश्वास रखता है। इसी प्रकार, हम एक द्विपक्षीय दृष्टिकोण के साथ कार्य नहीं कर सकते हैं जो एक ओर द्विपक्षवादी हो अथवा उस मायने में पाकिस्तान के साथ उनके घनिष्ठ संबंध पर आधारित हो जो भारत के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। वस्तुत: अधिकांश अरब नेता भारत-पाकिस्तान के संबंध का समाधान देखना चाहते हैं ताकि उन्हें किसी भी ओर पक्ष लेने की दुविधा का सामना न करना पड़े। वे भारत और पाकिस्तान का दौरा एक ही यात्रा में करते है। यह यात्रा हमारे लिए संवेदनशील होती है। परंतु इस समय भारतीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए, एमबीएस वापस लौटे और खाड़ी के रास्ते से आए।

13. एमबीएस की यात्रा के दौरान पारस्परिक हित के मुख्य क्षेत्रों जैसे ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश पर्यटन, अवसंरचना, आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष, रक्षा और सुरक्षा तथा निर्दिष्ट परियोजनाओं पर चर्चा की गई। एक व्यापारिक बैठक तथा सीईओ के बीच हुई चर्चाओं ने भावी बी2बी संपर्कों की गुंजाइश प्रदर्शित की तथा सउदी अरब ने उनके विजन 2030 के अनुसार भारतीय निवेश के लिए बड़े पैमाने पर अवसर उपलब्ध कराए। अपनी ओर से एमबीएस ने विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 100 बिलियन यूएस डॉलर के निवेश की घोषणा की। सउदी अरब 28 बिलियन यूएस डॉलर के साथ चौथा विशालतम व्यापार भागीदार है तथा वह कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, जो भारत की आवश्यकता का लगभग 20 प्रतिशत है। सउदी अरब का भारत में निवेश भी बढ़ रहा है तथा वह देश तथा क्षेत्र में अपनी संप्रभु संपत्ति निधि के कदमों का विस्तार कर रहा है। वस्तुत: सउदी अराम्को ने यूएई की एडीएनओसी के साथ भागीदारी करते हुए रत्नागिरी रिफाइनरी और पेट्रो रसायन परियोजना में 44 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित किया है। तथापि, आम के किसानों द्वारा किए गए विरोध से इसमें कुछ व्यवधान उत्पन्न हो गया। नई निवेश प्रतिबद्धताओं की घोषणा के साथ कुछ नई परियोजनाओं में शामिल है भारत की राष्ट्रीय निवेश और अवसंरचना निधि में सउदी निवेश जिसका उद्देश्य पत्तनों और राजमार्गों का निर्माण करना तथा कृषि क्षेत्र में निवेश करना है। पिछले अनेक वर्षों से जीसीसी देशों ने भारत के कृषि क्षेत्र में व्यापक रुचि दर्शाई है जो दोनों देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। अत: छोटी कृषि धारिता के कारण इस क्षेत्र में भारत की संतृप्तता को देखते हुए, त्रिराष्ट्रीय परियोजनाओं की पहचान करना उपयोगी होगा जहां सउदी पूंजी, कृषि क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता तथा भूमि की उपलब्धता, विशेष रूप से अफ्रीका में, एक लाभप्रद मॉडल का सृजन कर सकते हैं। भारत ने पर्यटन को प्रोत्साहित करने और सुकर बनाने के लिए सउदी अरब को ई-वीजा सुविधा प्रदान की है। बड़ी संख्या में भारतीय हज और उमरा के लिए समूचे वर्ष सउदी अरब की यात्रा करते हैं परंतु एमबीएस एक पर्यटन स्थल के रूप में किंगडम की क्षमता में और विस्तार करने पर विचार कर रहे हैं तथा उन्हें केवल कार्यबल उपलब्ध कराने के स्थान पर भारत और भारतीयों पर पर्यटन की एक बड़ी संभावना के रूप में विचार करना होगा। भारत भी रणनीतिक कच्चे तेल के रिजर्वों का सृजन करने के लिए सउदी प्रतिभागिता की प्रतीक्षा करेगा। एमबीएस ने न केवल 850 भारतीयों को क्षमा किया और उन्हें अपनी जेलों से रिहा भी कर दिया बल्कि भारतीय हज कोटे को 2,00,000 से बढ़ाकर 17,50,000 भी कर दिया। सउदी और अन्य खाड़ी देशों ने तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था तथा उसके अपने विकास मेट्रिक्स में उसकी भूमिका के महत्व को भी पहचान लिया है।

14. भारत में आगमन से पूर्व, एमबीएस ने इस्लामाबाद का दौरा किया जो क्षेत्र के उनके उच्च स्तरीय दौरे का पैटर्न रहा है। यह आशा की जा सकती है कि पाकिस्तान के एक प्रमुख समर्थक के रूप में एमबीएस ने इमरान खान के साथ पुलवामा हमलों को उठाया होगा तथा उन्हें आतंकवादी समूहों और सीमापार से होने वाले आतंकवाद को सहायता प्रदान करने से दूर रहने की हिदायत दी होगी। भारतीय पक्ष ने निश्चित ही इसे उठाया होगा तथा साथ ही अनेक अन्य घृणित हमलों तथा पाकिस्तान के सीमापार से किए जाने वाले आतंकवाद की जटिलता के विषय में भी बताया होगा। इसमें संवेदनशीलता है परंतु पाकिस्तान के साथ इस्लामी प्रत्यायकों के आधार पर घनिष्ठ संबंध को नज़रअंदाज करना कठिन है। वस्तुत: सउदी अरब ने प्रधानमंत्री इमरान खान के अनुरोध पर पाकिस्तान की रुग्ण अर्थव्यवस्था को मदद करने के लिए 6 बिलियन डॉलर के ऋण की घोषणा की थी जब वे अपने पद का कार्यभार संभालने के उपरांत अपनी प्रथम राजकीय तीर्थयात्रा पर नंगे पांव गए थे। यूएई और कतर ने भी पाकिस्तानी सरकार को पर्याप्त निधियां और संसाधन उपलब्ध कराएं हैं। यह घोषणा की गई थी कि सउदी अरब ग्वादर में एक पेट्रो-रसायन परिसर में 20 बिलियन डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहा है जहां चीन ने अपनी बेल्ट और रोड परियोजना पर पहले से ही तेजी से कार्यवाही की है। आतंकवादियों और आतंकवाद के साथ समर्थन और सहयोग की पाकिस्तान की नीति को ध्यान में रखते हुए भारत ने द्विपक्षीय और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के माध्यम से पाकिस्तान का पर्दाफाश करने और उसे अलग-थलग बनाने की नीति पर कार्य किया है। तथापि, यह भी सत्य है कि यह नीति वैश्विक ताकतों के अपने हितों के चलने के बावजूद काफी सफल रही है। विश्व पुलवामा और बालाकोट के हमलों के पश्चात् भारत के साथ खड़ा है, हालांकि उसने भविष्य में ऐसी किसी स्थिति के उत्पन्न न होने का आग्रह किया है।

15. पूर्व प्रधानमंत्री की वर्ष 2010 में रियाद यात्रा के दौरान पहली बार सउदी अरब ने खुले रूप से पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध आतंकवादी क्रियाकलापों को संचालित करने से दूर रहने के लिए कहा था। इसी प्रकार, प्रधानमंत्री मोदी की सउदी अरब की यात्रा भी ऐतिहासिक थी जब उन्हें भी उच्चतम सम्मान प्रदान किया गया। प्रधानमंत्री मोदी के संपर्कों ने रणनीतिक भागीदारी को एक नए स्तर पर ले जाने में सहायता दी। इसके बाद एमबीएस की यात्रा सांकेतिक और सारवान संदर्भ, दोनों ही में महत्वपूर्ण थी। सउदी अरब और भारत विशालतम हथियार आयातक हैं तथा वे संबंधित क्षेत्रों में श्रेष्ठ रहे हैं चाहे वह अर्थव्यवस्था हो या भूगोल अथवा उस मामले में मुस्लिमों को धार्मिक महत्व हासिल करने के लिए अनिवार्य है कि पारस्परिक महत्व के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान और रणनीतिक संप्रेषण को स्थापित किया जाए जिसें सीरियाई और इराकी पुनर्निर्माण भी शामिल है। विदेश मंत्री ने सदी विदेश मंत्री के साथ एक पखवाड़े में तीन बार भेंट की जो अभूतपूर्व है तथा सउदी अरब के हित को दर्शाता है जो न केवल भारत और पाकिस्तान के बीच किसी बड़े टकराव को बचाने के प्रयास कर रहा है बल्कि संबंधों की द्विपक्षीय संभावनाओं को भी देख रहा है। अत: एमबीएस के साथ एक रणनीतिक भागीदारी परिषद की स्थापना की गई है और प्रधानमंत्री मोदी परियोजनाओं पर प्रगति की निगरानी करने के लिए इसका नेतृत्व कर रहे हैं।

भारत के लिए खाड़ी और मध्य-पूर्व का महत्व

16. भारत ने पश्चिम एशिया के साथ अत्यंत घनिष्ठ, ऐतिहासिक और सभ्यतापूर्ण संबंध स्थापित किए हैं। प्रथम सहस्राब्दि ई.पू. की समाप्ति तक भारत और अरब के बीच व्यापार अरब प्राय:द्वीप का आर्थिक आधार बन गया। शताब्दियों पुराने द्विपक्षीय व्यापार ने दोनों ही पक्षों को पर्याप्त लाभान्वित किया है क्योंकि इसने एक-दूसरे देश के बारे में वहां के लोगो के ज्ञान और समझ में संवृद्धि की है तथा अरब ने भारत के ज्ञान को पश्चिम में ले जाते हुए माध्यम के रूप में कार्य किया है जैसे भारत से अरब क्षेत्र के लिए संख्यात्मक और व्यापारित मसाले, खाद्य-सामग्री, जवाहरात, वस्त्र, मलमल और अन्य सामग्रियां जबकि खाड़ी क्षेत्र से रत्नों और खजूर का निर्यात किया गया। आर्थिक संबंध भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान जारी रहे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सत्तर के दशक तक भारतीय रुपया अनेक देशों में एक वैध मुद्रा माना जाता था।

17. अधिकांश खाड़ी देश निकटवर्ती भू-भाग में स्थित है तथा वे भारत की रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। क्षेत्र में भारत और भारतीयों के प्रति पर्याप्त सद्भावना और आदर भाव व्याप्त है। वहां भारतीय 9 मिलियन से अधिक हैं तथा अधिकांश मामलों में वे विशालतम प्रवासी समुदाय हैं। वे अपनी मेजबान अर्थव्यवस्थाओं और देशों की खुशहाली और विकास के लिए महत्वपूर्ण योगदानकर्ताओं के रूप में में उभरे हैं। भारतीयों को उनके अनुशासन और निष्ठाभाव तथा मेहनती गुणों के कारण वरीयता प्राप्त कार्यबल के रूप में माना जाता है। विशेष रूप से जीसीसी देशों में भारतीय प्रतिवर्ष 35 बिलियन डॉलर से अधिक की धनराशि भारत प्रेषित करते हैं जो हमारे महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा रिजर्व में शामिल होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे वस्तुत: भारत के सद्भावना राजदूतों के रूप में कार्य करते हैं। समय के साथ-साथ एक परिवर्तन भी उभरकर सामने आया है क्योंकि भारतीय उद्यमियों ने भी मेजबान देशों में प्रमुख व्यापार और निवेश सहयोगकर्ताओं के रूप में पहचान बनाई है। वस्तुत: 2008 में, यूएई ने हमारा विशालतम व्यापार भागीदारी बनते हुए चीन को भी पीछे छोड़ दिया, जब हजारों भारतीय कंपनियों ने उनके विशेष आर्थिक जोन में अपनी उपस्थिति दर्ज की। उसके बाद से, मध्य-पूर्व के लगभग प्रत्येक देश के साथ संबंध प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के अंतर्गत गहन, वैविध्यपूर्ण और विस्तारित हुए हैं जिसमें उच्च स्तरीय आदान-प्रदान भी शामिल है जिन्हें अत्यंत संरचित और ध्यान-केन्द्रित तरीके से संचालित किया गया है। मैं इन यात्राओं और उनके परिणामों के बारे में उचित समय पर बताउंगा।

18. भारत तथा खाड़ी देशों की अनेक साझी राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं जो खाड़ी क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और स्थायित्व के लिए समन्वित प्रयासों में परिवर्तित हो सकती हैं तथा सामुद्रिक मार्गों की सुरक्षा भी क्षेत्र से होकर गुजरती है। खाड़ी राज्य उल्लेखनीय परिवर्तन और रूपांतरण से गुजर रहे हैं। उभरते हुए सामान्य चुनौतीपूर्ण संदर्श भविष्य में पश्चिम एशिया-भारत सहयोग के लिए और अधिक अवसर उपलब्ध करा रहे हैं। इसके माध्यम से उभरती हुई घरेलू और क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर तैयारी करने की परिकल्पना की गई है जिनमें अग्रणी साइनी चुनौतियां आतंकवाद और कट्टरवाद से उत्पन्न हो रही है। अत: खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया क्षेत्र तथा भारत दोनों ही को चुनौतियों का सामना करने के लिए ऐसी ताकतों के विरुद्ध संघर्ष के अपने प्रयासों में सहयोग और समन्वय लाने की आवश्यकता है। उच्च स्तरीय चर्चाओं में और उसके उपरांत जारी वक्तव्यों में इनकी स्पष्टत: पहचान तथा इन्हें प्रतिबिंबित किया गया था। (देखें www.mea.gov.in)। उदाहरण के लिए, भारत और यूएई ने 2017 में एक व्यापक सुरक्षा भागीदारी पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें अब तक शामिल न किए गए सहयोग के क्षेत्र शामिल थे। इस प्रयास में, अमेरिका और क्षेत्र में अन्य बाहरी शक्तियों की सक्रियता और उपस्थिति को भी ध्यान में रखा जाना होगा विशेष रूप से उन अनेक पश्चिमी देशों की उपस्थिति जिन्होंने क्षेत्र में अपने ठिकाने स्थापित किए है और उनके हित, यदि वे प्रतिकूल प्रयोजनों के लिए हैं, हमारी स्वयं की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। इसी प्रकार अंतरा-क्षेत्रीय विवादों का उत्पन्न होना भी हमारे विकल्पों पर प्रभाव डालता है तथा उसके फलस्वरूप हमारे राष्ट्रीय हित प्रभावित होते हैं।

19. अनेक शताब्दियों से हमारे संबंध विकसित, गहन और वैविध्यपूर्ण हुए हैं। तथापि, 2012 की स्थिति तक, हम पश्चिम एशिया तक हमारी पहुंच को परिभाषित करने के लिए किसी बेहतर शब्द की तलाश कर रहे थे तथा 'लुक वेस्ट अथवा लिंक वेस्ट' के लिए बेहतर वाक्यांश की खोज में थे और उसे 'लुक ईस्ट' के रूप में बताया गया। भारत की तथाकथित 'लुक वेस्ट' नीति 'लिंक एंड एक्ट वेस्ट' में परिवर्तित हो गई है हालांकि भारत की ओर से उच्च स्तरीय यात्राएं कम और यदाकदा आयोजित की गईं। इस असमंजस की स्थिति का निराकरण 2008 के बाद से किया गया जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ओमान, कतर और सउदी अरब की यात्रा की। प्रधानमंत्री श्री मोदी के क्षितिज पर आने के साथ ही उच्च स्तरीय आदान-प्रदान अब नियमित विशेषता बन गए हैं। पाकिस्तान के पक्ष में मुस्लिम देशों की तरफदारी होने के बावजूद भारत और भारतीय मध्य पूर्व के लोगों और उनकी सरकारों द्वारा पसंद किए जाते हैं और उन्हें सम्मान दिया जाता है क्योंकि उन्हें स्थायी और प्रतिबद्ध कार्यबल माना जाता है जो मेजबान देशों की कुशलता में योगदान देते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जीसीसी में ही हमारे पास भारत के मुख्यत: दक्षिणी भाग से बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी हैं तथा हजारों भारतीय कंपनियां क्षेत्र को भारत का प्रमुख व्यापारिक हब और भागीदार बनाने में योगदान दे रही हैं। यह क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अभी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी तेल और गैस की लगभग 65-70 प्रतिशत आवश्यकता की पूर्ति यहीं से होती है। इसके अलावा, भारतीय प्रवासियों द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा भारत के विदेशी मुद्रा रिजर्व में पर्याप्त योगदान देती है। हाल के समय में क्षेत्र के समृद्ध देशों ने भारत को एक व्यवहार्य निवेश गंतव्य और बेहतर अवसर के रूप में देखना प्रारंभ कर दिया है। भारत अपनी संप्रभु संपत्ति निधि को निकालने तथा उसे ट्रिलियन डॉलर अवसर विशेष रूप से अवसंरचना में निवेश करने का प्रयास कर रहा है। यूएई ने पहले ही 75 बिलियन यूएस डॉलर निवेश करने की प्रतिबद्धता दर्शाई है, और इसी प्रकार कतर और सउदी अरब की भारत की व्यापारिक क्षमता का आकलन कर रहे हैं। क्षेत्र के अन्य देश भी एक स्थिरकारी ताकत के रूप में भारत की ओर देख रहे हैं तथा क्षेत्र से वे अधिकाधिक भारतीय सुरक्षा की उपस्थिति चाहते हैं। फिर भी, हम कुछ अनिच्छुक हैं, पर यह स्थिति हाल के समय में कुछ परिवर्तित हुई है और हमने क्षेत्र में प्रमुख भागीदारों के साथ संस्थागत रक्षा और सुरक्षा तंत्र स्थापित किए हैं।

मध्य पूर्व में स्थिति

20. 2010 के अरब स्प्रिंग के बाद से, मध्य-पूर्व ढलान की ओर अग्रसर है तथा आज की प्रहेलिका में क्षेत्र को अस्थिर बनाने की क्षमता विद्यमान है जिसका भारत पर अत्यंत विनाशकारी प्रभाव होगा जो एक घनिष्ठ रणनीतिक पड़ोसी है। जबकि यह स्थिति बाहर से उत्प्रेरित है तथा इसमें इराक में अमेरिका द्वारा 2003 में संचालित किए गए अभियान से और भी प्रतिकूल माहौल बना है, अथवा इस दृष्टि से तथाकथित अरब स्प्रिंग, लीबिया में नाटो द्वारा बमबारी और सीरिया में विस्तारित विवाद की पृष्ठभूमि में, अरब देशों ने भी अपने गहन अंतरा अरब और शिया-सुन्नी विवादों को हवा दे दी है तथा धार्मिक नेतृत्व और एक व्यक्ति के शासन के लिए होड़ प्रारंभ हो गई है जिसमें विविधतापूर्ण प्रादेशिक परिदृश्य में शामिल हैं, जिनके फलस्वरूप और भी अस्थिरीकरण और अनिश्चितता की स्थिति बन गई है जिसके इस 'पारस्परिक आश्वस्त विनाश' संलक्षण में स्वयं शामिल देशों के लिए विनाशकारी प्रभाव हो सकते हैं। जबकि पिछले 8-9 वर्षों में अरब स्प्रिंग ने पर्याप्त परिवर्तन देखा है जो मुख्य रूप से खाड़ी के राजतत्रों के सुस्थापित शासनों में टकरावों और नैसर्गिक विरोधों के बावजूद उनके उखड़ जाने से सामने आया और फलस्वरूप खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) और पश्चिम एशिया की तीन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं सउदी अरब, कतर अथवा यूएई में संशयवादी नेतृत्व पदों में युवा नेताओं को स्थापित कर दिया गया जो वर्तमान में जून, 2016 से निरंतर अवरोधों और परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इस स्थिति को राष्ट्रपति ट्रम्प के अंतर्गत नए अमेरिकी प्रशासन द्वारा और भी विषम बना दिया है जिसे ईरान तक ओबामा की पहुंच को प्रतिलोमित करते हुए और पी 5+1 द्वारा किए गए प्रसिद्ध जेसीपीओए करार की व्यवहार्यता और सत्यनिष्ठा पर संदेह करते हुए प्रत्यक्षत: अथवा अप्रत्यक्षत: सउदी को स्वयं से दूर कर दिया है। शांति आज संकट में घिरी है। सउदी-ईरान-अमेरिका-इजराइल कटुता और गहन हो गई है तथा यमन और सीरिया में उनके प्रत्यक्ष और छद्म युद्ध और भी विषम हो सकते हैं। जीसीसी और ईरान भी प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं और ढुलमुल हितकर्ताओं के रूप में व्यापक शस्त्रों से लैस हैं, ठीक वैसे ही, जैसे अमेरिका ने पेट्रो-डॉलरों के उछाल के दौरान अपना हित साधा था। इस बात को पुन: दोहराया गया जब सउदी अरब के क्राउन प्रिंस सलमान ने अमेरिका के राष्ट्रप‍ति ट्रम्प के साथ मुलाकात की जिसने सउदी की संपत्ति में भागीदार होने और उसे एकत्र करने के लिए एक बार फिर खाड़ी राज्य को आधुनिकतम हथियारों की पेशकश की जो पहले से ही यमन के साथ चल रहे युद्ध की नाजुक स्थिति के संतुलन में व्यापक हथियारों से लैस है। एसआईपीआरआई के अनुसार, 33 प्रतिशत से भी अधिक वैश्विक हथियार निर्यातकों की नियति पश्चिम एशिया क्षेत्र से जुड़ी हुई थी।

21. प्रादेशिक संस्थाएं तनाव में हैं। कतर ओपेक से बहिर्गमन कर चुका है। जीसीसी भी स्वयं कतर तथा सउदी/यूएई के नेतृत्व वलो धड़े, जिसमें बहरीन और मिश्र भी शामिल है, के बीच लगभग एक वर्ष पुराने विवाद के कारण अप्रासंगिता और असमंजस की स्थिति‍ में है जिसने सभी संकल्पों की अवमानना की है। इस प्रक्रिया मे तुर्की और ईरान ने अपने प्रभाव में वृद्धि की है। मामले को सुलझाने के लिए कुवैत और ओमान के प्रयास निष्फल हुए हैं। सउदी अरब और यूएई ने एक अभूतपूर्व रणनीतिक भागीदारी करार किया है जिसका अपना ग्राफ हो सकता है जो यमन और सीरियाई युद्ध के चलते क्षेत्र के समग्र स्थायित्व को समाप्त कर सकता है जिसमें उनका मुख्य निशाना ईरान पर है। इन विवादों में ऐसे विविधतापूर्ण उग्रवादी और आतंकवादी समूहों की उपस्थिति में और अधिक विस्तार होने की गुंजाइश है जो निराशाजनक स्थिति है क्योंकि लगभग सभी राष्ट्र आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई के लिए अपनी साख का प्रयोग कर रहे हैं। तेल के मूल्यों में कमी होने तथा नवीकरणीय पदार्थों की बढ़ती मांग के कारण क्षोभकों के प्रमुखता अर्जित करने के अवसर उच्च हैं, जब तक कि क्षेत्र की व्यवस्थाएं सुधारोन्मुखी घरेलू नीतियों के प्रति अधिक सहिष्णु न बन जाएं और साथ ही उनके अंतरा क्षेत्रीय संबंधों में पारस्परिक सम्मान और समझ उत्पन्न न हो जाए। इससे भी कहीं ऊपर, अपने बलों और ठिकानों के माध्यम से अमेरिकी यूके, फ्रांस और रूस ने अपने भू-रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करना जारी रखा जैसे आईएसआईएस के विरुद्ध संघर्ष अथवा समुद्री डकैती को रोकने के अभियान अथवा उनके तेलापूर्ति और व्यापारिक मार्गों को विवादित रूप से क्षेत्र में कतिपय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए खोलना। ट्रम्प प्रशासन का ट्वीटों और बहुपक्षीय करारों को रद्द करने के माध्यम से विदेश नीति संचालित करने की तदर्थ और अपारंपरिक शैली अत्यंत कठिनता और दीर्घकालिक वार्तालापों के उपरांत निर्धारित की गई, जो विशेषत: ईरान से संबंधित थे, चाहे वे शिया-सुन्नी संदर्भ हो अथवा कतर का शिया के नेतृत्व वाला संघर्ष और गतिरोध हो अथवा उस संबंध में येरूशेलम को इजराइल की राजधानी घोषित करना हो अथवा इस सप्ताह गोलन हाइट्स को इजराइल का भाग बताना हो, जिसने वस्तुत: मध्य-पूर्व के देशों के मध्य गतिशील, अनिश्चितता, असहजता और अस्थिरता की भावना कर दी थी। अपनी सीमाओं के समीप पर्यटन स्थलों और परमाणु अपशिष्ट क्षेपण स्थलों का सृजन करते हुए कतर को एक द्वीप बनाने के सउदी अरब और यूएई नेतृतव के हालिया प्रस्तावों के गंभीर और अपूर्णीय परिणाम हो सकते हैं। कतर ने स्वयं को ओपेक से बाहर रखा है क्योंकि इसे सउदी प्रधानता वाले इस संगठन में कोई लाभ प्रतीत नहीं होता, जो पुन: खाड़ी क्षेत्र की संस्थाओं के अलग-थलग होने का एक अन्य संकेत है। क्षेत्र में व्याप्त महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता आग में घी डालने का काम कर रही है तथा सीरिया पर हाल में अमेरिका, यूके और फ्रांस द्वारा किए गए हवाई हमलों के मद्देनजर इसकी पर्याप्त आलोचना की गई है जब एंटोनियो गटेरेस ने यह कहा, "मध्य-पूर्व में स्थिति इतनी बदहवास है कि यह अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए एक खतरा बन गई है। नए समीकरण और गठबंधन उभर रहे हैं तथा तुर्की और ईरान खाड़ी विवाद और शिया-सुन्नी विभाजन में बड़े देशों के रूप में उभर रहे हैं। आज सीरिया उस खतरे के सर्वाधिक गंभीर आयाम का प्रतिनिधित्व करता है।" महाशक्तियों के बीच अविश्वास के अन्य क्षेत्रों के संयोजन के साथ द्वितीय शीतयुद्ध प्रारंभ होने का संकेत दे रहा है।

22. इसके साथ ही, इजराइल ने जीसीसी देशों, विशेष रूप से ओमान, सउदी अरब और यूएई के साथ अमेरिकी पहल के अनुसरण में अथवा मध्य-पूर्व शांति प्रक्रिया के संबंध में, जो लगभग सुसुप्त हो गई थी, अपने संबंधों को आगे बढ़ाया। वे ईरान के विरुद्ध अमेरिका के साथ एक अन्य गठबंधन भी स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं जैसा कि पौलेंड में हाल ही में आयोजित सम्मेलन के दौरान देखा गया। जबकि यूएनजीए में सभी मध्य-पूर्व देशों ने हो-हल्ला मचाया तथा अमेरिका द्वारा येरूसलेम को इजराइल की राजधानी घोषित करने के निर्णय के विरुद्ध मतदान किया, उन्होंने 'एक राज्य समाधान' की संभावना पर भी चिंतन-मनन प्रारंभ कर दिया जैसी कि यूएई के मंत्री अनवर गर्गाश द्वारा नई दिल्ली में घोषणा की गई थी तथा वे फिलिस्तीनियों को मनाने के लिए भी तैयार थे। यहां तक कि सउदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने निकासी के इजराइल के अधिकार को स्वीकार किया जो अब तक उनकी नीतियों के विरुद्ध था और यह प्रतीत हुआ कि कट्टरवादी सम्राट सलमान ने अपनी अब तक की सुस्थापित नीतियों के साथ छेड़छाड़ करने के प्रयास किया तथा इसे लोकप्रिय भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए रियाद में हालिया अरब सम्मेलन में पुन: दोहराया गया था। परंतु यह बदलती हुई जमीनी गतिशीलता का सत्य है तथा फिलिस्तीनी नेतृत्व के लिए प्रमुख अरब देशों और यहूदी राज्य के बीच वर्तमान संबंधों और विरोधों को ध्यान में रखते हुए बहुत अधिक समय तक इसे टालना संभव नहीं होगा। वस्तुत: फिलिस्तीनियों और इंटीफाडा के बीच पर्याप्त असहमति को प्रबंधित करना अत्यंत कठिन होगा। परंतु भारत जैसे देश के लिए, जो लगभग सभी देशों के साथ सौम्य संबंधों की परंपरा कायम करना चाहता है, संबंधों में संभावित चुनौतियां नैसर्गिक हैं, यदि परिस्थितियां हाथों से निकल जाती है। क्षेत्रीय और द्विपक्षीय संदर्भ में हमारे लिए समानता का सामना कठोर विकल्पों से होगा क्योंकि भारत का भी क्षेत्र कतिपय विवादास्पद पक्षकारों के साथ रक्षा करार विद्यमान है। इसमें अंतरा-क्षेत्रीय मामलों में एक ईमानदार अंतर्मध्यस्थ के रूप में एक बड़ी भूमिका निभाना भी शामिल है, जिसकी रुचिकर रूप से क्षेत्र के सभी देशों द्वारा अपेक्षा की गई है। इस दौरान, भारत उसकी विशाल आर्थिक क्षमता और सौम्य विदेश नीति पहुंच और निवेशों के कारण क्षेत्र से स्नेह प्राप्त करना जारी रखे हुए हैं।

पश्चिम एशिया तक भारत की हालिया पहुंच :

23. फिलीस्तीन का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है तथा इसे अरब विश्व के लिए भारत की निष्ठा का मानदण्ड समझा जाता है। भारत ने निरंतर फिलीस्तीन को समर्थन प्रदान किया है जो एमई देशों के भी बहुत निकट है। अरब-इजराइल संबंधों की भी अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू सार्वजनिक संदर्श और पहुंच में अपनी नकारात्मक गतिशीलता है। परंतु क्षेत्र में यह गतिशीलता भी परिवर्तित हुई है तथा इजराइल के प्रति बड़ी मात्रा में वैमनस्य समाप्त होता प्रतीत हो रहा है। इजराइल के साथ भारत के संबंधों ने आलोचनकों को कतिपय अवसर प्रदान किया है, जो भारत पर अरब विश्व के साथ अपने सहयोग और मदद को कम करने का आरोप लगाते रहे हैं परंतु भारत ने 1992 में राजनयिक संबंधों की स्थापना करते हुए फिलीस्तीनी नेता यासेर अराफात को समर्थन देना जारी रखा है। भारत ने अपने स्वयं के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने के लिए क्षेत्र के सभी देशों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करना जारी रखा है। हमारा पक्ष और सहयोग स्पष्ट है तथा यह प्रत्येक स्तर पर प्रतिबिंबित होता है जिसके तहत फिलीस्तीन को अनुदान और क्षमता निर्माण के लिए पर्याप्त सहायता प्रदान की गई है। अत: एक संतुलित समीकरण स्थापित किया गया है। पिछले यूएनजीए के दौरान विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने यह कहते हुए फिलीस्तीन के लिए भारत के ऐतिहासिक सहयोग को दोहराया था कि यह हमारी विदेश नीति का केन्द्रीय बिंदु होगा। उन्होंने उच्च-स्तरीय महासभा बैठक के दौरान गुट-निरपेक्ष की फिलीस्तीन संबंधी मंत्रालयी समिति को बताया, "स्वतंत्र भारत के लिए फिलीस्तीन के लिए सहयोग हमारी विदेश नीति का एक संदर्भ बिंदु है।" उन्होंने कहा, "मेरा दृढ़ विश्वास है कि क्षेत्र में सभी देशों के साथ भारत के विस्तारित होते संबंध फिलीस्तीन को ही सुदृढ़ करेंगे जिसे कभी भी कम नहीं आंका गया है।" इसने किसी भी संदेह को समाप्त कर दिया।

24. प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यभार संभालने के बाद, अरब सरकारें कुछ चिंता में थीं और उन्हें संदेह था कि भारत उनके साथ पारंपरिक संबंधों की कीमत पर नई सरकार के तहत एक अधिक इजराइल-समर्थक नीति अपना सकता है जिसे फिलीस्तीन को सहयोग भी प्रभावित होगा। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री नेतनयाडू के बीच दीर्घकालिक वैयक्तिक मित्रता और स्नेह ने भी उन्हें चिंताग्रस्त कर दिया। यह बात जल्द ही स्पष्ट हो गई। प्रधानमंत्री मोदी ने मध्य-पूर्व के साथ संबंधों के व्यापक महत्व को पहचाना जिसमें इजराइल भी शामिल था। अत: एक संयमपूर्ण और संतुलित संबंध स्थापित किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई की अपनी पहली ही यात्रा के दौरान 'लुक वेस्ट' नीति को 'लिंक एंड एक्ट वेस्ट' नीति में परिवर्तित कर दिया जिसके बाद कतर और सउदी अरब की यात्रा भी की गई थी तथा प्रथम दो वर्षों में ईरान (अगस्त, 2015 से जून, 2016) और 2017 में इजराइल की यात्रा की गई थी जिसका उद्देश्य राजनयिक संबंधों की 25वीं वर्षगांठ को मनाना था। क्षेत्र के अनेक नेताओं ने भारत की यात्रा की। एक असाधारण घटनाक्रम में यूएई के क्राउन प्रिंस हमारे गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि थे। आतंकवाद-विरोधी सहयोग पर असामान्य बल के साथ सुरक्षा और आसूचना मामलों में असाधारण सहयोग यात्रा के बाद की गई घोषणा की मुख्य विशेषता थी जिसमें स्पष्ट रूप से सीमापार से होने वाले आतंकवाद और आतंकवादियों के ठिकानों, विशेष रूप से पाकिस्तान में, को लक्षित किया गया था, जो उन्हें एक चेतावनी थी क्योंकि इस्लामी छत्रछाया के अंतर्गत पाकिस्तान सहायता प्रदान के रूप में अरब की सहायता प्राप्त करने में समर्थ हो गया था। यूएई के साथ संयुक्त वक्तव्य एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था क्योंकि इसमें पाकिस्तान भारत-विरोधी क्रियाकलापों के लिए यूएई के भू-भाग का प्रयोग करने से मना किया गया था जो अब तक का महत्वपूर्ण मामला था क्योंकि एक भगोड़ा अपराधी और उसकी डी-कंपनी तथा कई अन्य अपराधी यूएई में शरण ले रहे हैं तथा पाकिस्तान और यूएई के बीच आ-जा रहे हैं और भारत-विरोधी क्रियाकलाप संचालित कर रहे हैं। वस्तुत: अनेक अरोपी भारत मूल के आतंकवादी भारत को निर्वासित किए गए हैं। इनमें से ताजा उदाहरण दाउद के घनिष्ठ सहयोगी कुख्यात फारुक टकला का था, जो स्पष्टत: पारस्परिक चिंताओं का वस्तुत: निवारण करने के लिए प्रदर्शित सम्मान और संकल्प का संकेत है। इसके अलावा, इन देशों द्वारा भारत में लाखों डॉलरों के रणनीतिक निवेश की सहमति प्रदान की गई है। जबकि ईरान अपने रणनीतिक दृष्टि से स्थित चाबहार पत्तन के माध्यम से भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान का द्वार है, जीसीसी देश भारत की ऊर्जा, सुरक्षा, समग्र सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी प्रयासों और बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और कल्याण के लिए अभिन्न भाग हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिलीस्तीन के बाद इस वर्ष दूसरी बार यूएई की यात्रा की है क्योंकि भारत-यूएई संबंधों ने एक विशेष रणनीतिक प्रकृति अर्जित कर ली है। रेलवे, ऊर्जा क्षेत्र, वित्तीय सेवाओं और मानवशक्ति पर अनेक समझौता-ज्ञापनों पर यह हस्ताक्षर किए गए। परंतु प्रथम बार भारतीय कंर्सोटियम (ओवीएल, बीपीआरएल और आईओसीएल) तथा आबू धाबी राष्ट्रीय तेल कंपनी (एडीएनओसी) के बीच एक समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए जिसने 40 वर्ष के लिए आबू धाबी के अपतट लोअर जाकुम रिआयतों में 5000 मिलियन डॉलर की राशि के 10 प्रतिशत प्रतिभागिता ब्याज की अनुमति प्रदान की। यह एक अत्यंत उल्लेखनीय घटनाक्रम था जिसे अब तक देखा नहीं जा सका था क्योंकि अभी तक हम यूएई के साथ केवल क्रेता-विक्रेता का संबंध ही स्थापित करते थे। इसी प्रकार, तेल के रणनीतिक भण्डारण पर भी कार्यवाही की जा रही है।

25. हमारी गहन मैत्री और सतत् संबंधों के हमारे रणनीतिक हित के अनेक क्षेत्रों में एक अल्पावधि में अब परिणाम आने प्रारंभ हो गए हैं जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा, जो पच्चीस वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा है, के दौरान अगस्त, 2015 के संयुक्त वक्तव्य से परिलक्षित होता है - "इस बात को पहचानते हुए कि भारत निवेश अवसरों, विशेष रूप से व्यापार और निवेश को सुकर बनाने, भारत में यूएई के निवेश में वृद्धि करने के लिए यूएई की निवेश संस्थाओं को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें यूएई-भारत अवसंरचना निवेश निधि की स्थापना भी शामिल है जिसका उद्देश्य आगामी पीढ़ी की अवसंरचना, विशेष रूप से रेलवे, पत्तनों, सड़कों, हवाई-अड्डों और औद्योगिक गलियारों तथा पार्कों के क्षेत्र में अवसंरचना का तेजी के विस्तार करने की भारत की योजनाओं ने निवेश का सहयोग करने के लिए 75 बिलियन अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचना है।

हाल ही में, सउदी अरब ने पहली बार एयर इंडिया को इजराइल की उड़ान भरने के लिए अपने हवाई मार्ग का प्रयोग करने की अनुमति प्रदान की जिस पर पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है। उस दृष्टि से, यूएई आबू धाबी में एक मंदिर के निर्माण को सहयोग दे रहा है जो सांस्कृतिक विरासत तथा लोगों के परस्पर संबंधों को और भी मजबूत बनाएगा। यूएई ने ऑगस्टा हैलीकॉप्टर और अन्य घोटालों में भारत में वांछित आर्थिक भगोड़े अपराधियों जैसे माइकल और अन्य को प्रत्यावर्तित भी किया है। प्रथम बार संयुक्त सैन्य और नौसना कवायदें संचालित की जा रही हैं तथा रक्षा और आसूचना तथा आतंकवाद-विरोधी सहयोग अधिक महत्व लेता जा रहा है जो हमारे पश्चिमी पड़ोसियों को भी लक्षित करता है और उनकी राज्य प्रायोजित नीति को अवरुद्ध करता है, जो आतंकवादियों तथा भारत-विरोधी आतंकवाद का शरण-स्थल और निर्माण क्षेत्र बन गया है।

फिलीस्तीन, जार्डन और इजराइल

26. भारत-इजराइल संबंध प्रधानमंत्री की तेल अवीब की जुलाई, 2017 में की गई यात्रा के दौरान एक नई ऊंचाइयों तक पहुंचे, जो किसी भारतीय प्रधानमंत्री की प्रथम यात्रा थी जिसके बाद 14-19 जनवरी, 2018 तक राजनयिक संबंधों की स्थापना के 25 वर्ष के समारोह में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू द्वारा भारत की यात्रा की गई। इजराइल भारत के लिए एक प्रमुख तथा विश्वनीय सुरक्षा, आसूचना और आतंकवाद-विरोधी भागीदार के रूप में उभरा है। रक्षा के क्षेत्र में यह अमेरिका और रूस के बाद तीसरा विशालतम आपूर्तिकर्ता है जिसका टर्नओवर 1 बिलियन डॉलर से अधिक है तथा अनेक अन्य सौदों पर बातचीत चल रही है। अपनी शुष्क कृषि प्रौद्योगिकी के लिए प्रसिद्ध होने पर यह भारत की खाद्य सुरक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा साइबर स्पेस में और साथ ही आसूचना सहयोग और अभिनवता में एक घनिष्ठ भागीदार बन गया है तथा स्टार्ट-अप ने सहयोग के नए आयामों को खोल दिया है। आज इजराइल के पास प्राचीनतम लोकतंत्र (अमेरिका) और विशालतम लोकतंत्र (भारत) का सहयोग है। दोनों नेताओं के बीच घनिष्ठ मित्रता और पारस्परिक समझ है। प्रसन्न नेतनयाहू ने प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया, "हमने आपके लिए 70 वर्षों तक प्रतीक्षा की" जो अपने-आप में काफी कुछ कह जाता है। प्रधानमंत्री ने श्रीमती एवं श्रीमान नेतनयाहू की प्रथम भारत यात्रा की शानदार मेजबानी कर अपनी ओर से कृतज्ञता व्यक्त की। भारत-इजराइल संबंध सहजता और परिपक्वता के नए स्तर तक पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री नेतनयाहू अपनी घरेलू समस्याओं और दोनों देशों में लंबित चुनावों के बावजूद कुछ अन्य रक्षा करारों पर हस्ताक्षर करने के लिए पुन: भारत आने के इच्छुक थे। उन्होंने पुलवामा में हुए आतंकी हमले की प्रतिक्रिया में भारतीय वायु सेना द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविरों पर बालाकोट हवाई हमलों के दौरान सहायता और आसूचना मदद उपलब्ध कराई।

27. फिलीस्तीन के मुद्दे पर, भारत ने अपने मूल पक्ष को बनाए रखा है परंतु अनुक्रियाशील और सहयोगी प्रतिमान को पुन: संयोजित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने फिलीस्तीन का दौरा किए बिना इजराइल का दौरा किया है परंतु राष्ट्रपति महमूद अब्बास को भारत आमंत्रित किया है और उन्हें आश्वासन दिलाया है कि भारत उन्हें निरंतर राजनीतिक और आर्थिक सहायता प्रदान करेगा। फिलीस्तीनवासी भारत पर भरोसा करते हैं और भारतीय सहायता का महत्व समझते हैं। यह बात राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा येरूसलेम में इजराइल की राजधानी घोषित करने तथा उनके दूतावास को तेल अवीब से येरूसलेम स्थानांतरित करने से स्पष्टत: दृश्यमान हो गई है जिसके कारण इस कटु समस्या के समाधान को एक बड़ा धक्का पहुंचा है, जब भारत ने अपने पक्ष को कायम रखा और यूएनजीए में अमेरिका के प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया जिसकी अरब विश्व द्वारा पर्याप्त प्रशंसा की गई। इससे पूर्व भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मतदानों के दौरान दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए मुद्दे पर एक स्वतंत्र दृष्टिकोण लिया था।

28. हालांकि भारत द्वारा येरूसलेम पर यूएनजीए में दिए गए मतदान पर इजराइल और अमेरिका, दोनों ही खिन्न हुए प्रधानमंत्री नेतनयाहू ने इसे "एक मत द्विपक्षीय संबंधों पर निर्णय नहीं करता है" कहकर खारिज कर दिया जो एक ठोस और भरोसेमंद कदम है। वस्तुत: प्रधानमंत्री नेतनयाहू की यात्रा के दौरान दिए गए संयुक्त वक्तव्य ने भावी मार्ग को निर्धारित किया : "दोनों प्रधानमंत्रियों ने इजराइयली-फिलीस्तीनी शांति प्रक्रिया से संबंधित घटनाक्रमों पर चर्चा की। उन्होंने इजराइल और फिलीस्तीन के बीच शांति वार्ताओं को शीघ्र प्रारंभ करने के लिए अपने सहयोग की पुन:पुष्टि की ताकि क्षेत्र में औचित्यपूर्ण और स्थायी शांति की स्थापना करने के लिए पारस्परिक मान्यता और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्थाओं के आधार पर सभी लंबित मुद्दों का एक व्यापक, परस्पर बातचीत पर आधारित समाधान निकाला जा सके।" किसी गहरे संबंध के लिए विभेदों को मिलकर एक परिपक्व दृष्टिकोण के साथ प्रबंधित किया जाना होता है। और ऐसा ही द्विपक्षीय, प्रादेशिक और वैश्विक महत्व के मामलों पर दृष्टिकोणों और स्थितियों का विनियम करते हुए रणनीतिक भागीदारी के अधिकार क्षेत्र के भीतर किया गया। यह एक लाभप्रद भागीदारी है जो आने वाले वर्षों में और भी व्यापक होगी।

29. दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी 9 फरवरी, 2018 को फिलीस्तीन-रामल्ला की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने जिन्होंने अरब राष्ट्रों के मन में पनपने वाले सभी संदेहों को समाप्त कर दिया। यह भारत की स्थिति को स्पष्टत: दोहराने वाला कदम था। राष्ट्रपति अब्बास ने प्रधानमंत्री मोदी को ग्रैंड कॉलर पुरस्कार प्रदान किया जो बहुत कम व्यक्तियों को दिया गया फिलीस्तीन का सर्वोच्च पुरस्कार है। फिलीस्तीनी नेतृत्व, जिसने 'शांति के ईमानदार दूत' के रूप में अमेरिका को खारिज कर दिया था, ने आशा व्यक्त की कि संभवत: भारत मध्य-पूर्व में एक अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकता है। यहां तक कि सीरिया और अन्य देश में एक संवर्धित राजनीतिक भूमिका का निर्वहन करने के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी अम्मान के रास्ते रामल्ला गए जहां उन्होंने आतंकवाद और कट्टरवाद को समाप्त करने तथा आर्थिक और सुरक्षा सहयोग स्थापित करने और साथ ही येरूसलेम और फिलीस्तीन के मुद्दे पर व्यापक चर्चाएं की। सम्राट अब्दुल्ला-II, जो पाकिस्तान और यूएई की यात्रा पर गए थे, ने अपनी यात्रा में कटौती की और वे प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक करने के लिए शीघ्र अम्मान लौट आए। दोनों ही नेताओं ने एक गहन संबंध विकसित किया। कुछ सप्ताहों के भीतर ही सम्राट अब्दुल्ला-II लगभग 12 वर्ष के अंतराल के उपरांत भारत की अत्यंत उल्लेखनीय राजकीय यात्रा पर आए जिसमें लगभग एक दर्जन करारों और समझौता-ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए जिनमें से एक रक्षा सहयोग पर भी था जो जॉर्डन के पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंधों के स्थापित होने के बाद से अब भ्रामक हो गया है। इनके अलावा, विशेष रूप से फॉस्फेट और पोटाश क्षेत्र में 10 बी2बी समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। आईसीटी और नवीकरणीय ऊर्जा सहित सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान की गई तथा भावी मार्ग निर्धारित किया गया। जॉर्डन भारत की खाद्य सुरक्षा में एक मुख्य सहयोगकर्ता के रूप में उभरा है तथा वह शेल उत्पादों का पर्याप्त भंडार होने के कारण हमारी भावी ऊर्जा सुरक्षा में विश्वसनीय भागीदार बन सकता है।

ओमान और ईरान

30. मैं दो अन्य महत्वपूर्ण यात्राओं का उल्लेख भी करना चाहूंगा जिनमें से एक प्रधानमंत्री मोदी की 11-12 फरवरी, 2018 को की गई ओमान की प्रथम यात्रा है तथा दूसरी 15-18 फरवरी तक ईरान के राष्ट्रपति रूहानी की हाल की भारत यात्रा है। प्रधानमंत्री मोदी ने मई, 2016 में तेहरान की यात्रा की। ओमान क्षेत्र में एक ऐसा देश है जिसने इजराइल ईरान और अन्य जीसीसी देशों के साथ बेहतर रिश्ते कायम किए हैं तथा जो अंतरा-क्षेत्रीय मामलों और विवादों में एक विश्वसनीय सहायक के रूप में कार्य कर सकता है। भारत और ओमान के संबंध अत्यंत घनिष्ठ और ऐतिहासिक रहे हैं। गहन व्यापार और आर्थिक संबंधों के अलावा, ओमान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रक्षा और समुद्री दस्युता निरोधी भागीदार रहा है। भारतीय नौसेना के पोत नियमित रूप से सालाह और दकम पत्तनों पर जाते रहते हैं। यात्रा के दौरान सेना, स्वास्थ्य, पर्यटन, न्यायिक सहयोग, पर्यटन और अंतरिक्ष क्षेत्रों में आठ करारों पर हस्ताक्षर किए गए। भारत अपनी सैन्य संभार-तंत्र आवश्यकताओं के लिए दक्म पत्तन का प्रयोग करने में समर्थ रहेगा। इसे आगे उस करार से और भी मदद मिलेगी जो भारत के राष्ट्रपति मैक्रोन की यात्रा के दौरान फ्रांस के साथ हस्ताक्षरित किया है जो भारत को क्षेत्र में उनके नौसेना ठिकानों और सुविधाओं का प्रयोग करने की अनुमति प्रदान करता है।

31. जहां तक ईरान का संबंध है, यह यात्रा उल्लेखनीय रही तथा इसने स्पष्टत: यह दर्शाया कि भारत अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक स्वतंत्र तरीके से निष्पादित करता है, जिसमें उसके राष्ट्रीय हित भी सम्मिलित होते हैं। ईरान हमारा प्रमुख ऊर्जा सुरक्षा भागीदार है तथा रणनीतिक चाबहार पत्तन अथवा उत्तर-दक्षिण गलियारा संयोजनता के विकास के साथ ही भारत की मध्य एशिया अथवा अफगानिस्तान में पहुंच निर्बाध और सुनिश्चित होगी। हालांकि, अमेरिका और पश्चिमी प्रतिबंधों ने कतिपय प्रभाव छोड़ा है, फिर भी भारत ने द्विपक्षीय संबंधों में गति बनाए रखी है। राष्ट्रपति रूहानी की यात्रा के दौरान अनेक क्षेत्रों में नौ समझौता-ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें से एक महत्वपूर्ण पहलू एशियाई निर्गम तंत्र के माध्यम से ऊपया-रियाल व्यापार के लिए एक तंत्र का सृजन करना था जो हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में वैमनस्यपूर्ण मुद्दों का समाधान करने के लिए पश्चिमी बैंकिंग आउटफिटों पर लगाए गए प्रतिबंध के प्रभाव को कम करने में सहायक होगा। संयुक्त वक्तव्य ने इस बात को रेखांकित किया, "ऊर्जा क्षेत्र में हितों और प्राकृतिक भागीदारी के संपूरणता को ध्यान में रखते हुए, यह सहमति हुई कि पारंपरिक क्रेता-विक्रेता संबंध के परे जाया जाए और एक दीर्घकालिक रणनीतिक भागीदारी विकसित की जाए, दोनों पक्ष ऊर्जा सहयोग पर उपयुक्त परिणाम प्राप्त करने के लिए बातचीत जारी रखने तथा उसकी गति में तेजी लाने के लिए सहमत हुए जिसमें फर्जाड बी गैस क्षेत्र भी शामिल है। राष्ट्रपति रूहानी और प्रधानमंत्री मोदी ने सभी स्तरों पर द्विपक्षीय आदान-प्रदान की तेज और व्यापक परिधि के माध्यम से विद्यमान उच्च-स्तरीय संबंध को और भी गहन बनाने और उसका वैविध्यीकरण करने पर सहमति व्यक्त की। इस संदर्भ में, इस वर्ष के भीतर भारत-ईरान संयुक्त आयोग तथा इसके सभी कार्यकारी समूहों, विदेश कार्यालय परामर्शों की बैठक आयोजित किए जाने तथा दोनों देशों की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद संरचनाओं के बीच वार्तालाप किए जाने, नीति आयोजना वार्तालाप संचालित करने तथा संसदीय आदान-प्रदानों को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया गया।" भारत ईरान से निरंतर तेल खरीद रहा है तथा उसने अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता की पूर्ति करने के पीछे तर्क और कारण से अमेरिका को अवगत करा दिया है। अंतत: अमेरिका ने निर्दिष्ट समय-सीमा के माध्यम से दबाव बनाते हुए अपेक्षित छूट प्रदान कर दी है परंतु यह तेल और गैस के लिए भारत में गुंजाइश की ओर भी देख रहा है। इसने पहले ही आपूर्ति प्रारंभ कर दी है।

हम आगे बढ़ते गए ...

32. क्षेत्र अत्यंत गहन अस्त-व्यस्तता और अस्थिरता का सामना कर रहा है जिसमें भारत को उसकी निरंतर बढ़ती हुई साख के कारण निश्चित तौर पर एक व्यापक भूमिका का निर्वहन करने के लिए कहा जाएगा, चाहे वह मध्य-पूर्व शांति प्रक्रिया हो या फिर फिलीस्तीन अथवा सीरिया से संबंधित हो, परंतु भारत को इन घटनाक्रमों में सावधानीपूर्वक कार्यवाही करनी होगी क्योंकि नए समीकरण तथा तत्कालीन प्रादेशिक और बाहरी शक्तियों के मध्य प्रतिस्पर्धा, जैसे तुर्की, जो नाटो का सदस्य है, अमेरिका-रूस, चीन और ईरान तथा सउदी-यूएई साथ मिलकर शिया-सुन्नी विवाद को और अधिक भड़का सकते हैं जो जीसीसी को कमजोर बनाएगा और क्षेत्र के लिए हानिकारक होगा और जिससे हमारे महत्वपूर्ण हितों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अतीत से विपथित होने तथा रीयल पॉलीटिक का पालन करने पर प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका तथा क्षेत्र में अन्य शक्तियों के साथ सहयोग करने से झिझकते प्रतीत नहीं होते हैं क्योंकि परिकल्पित वापसी के बावजूद अमेरिका उसकी शक्ति, सैन्य आधार और दीर्घकालिक संबंधों तथा क्षेत्र में रणनीतिक रुचि के कारण अभी भी प्रधान बना हुआ है। यूएई, बहरीन और मिश्र के बीच हालिया संकट का संबंध है, भारत ने पक्ष लेने से स्पष्ट इंकार कर दिया है क्योंकि भारत सभी देशों के साथ द्विपक्षीय उत्कृष्ट संबंध स्थापित करता है तथा उसका उनमें से प्रत्येक में और उनकी सुरक्षा एवं संरक्षा में पर्याप्त हित विद्यमान है। अत: यह आशा की जाती है कि उसकी नीति के अनुसार वार्ताओं के माध्यम से मुद्दों का हल निकल जाएगा। खाड़ी संकट के मद्देनजर दौरे पर आए कतर और यूएई के विदेश मंत्रियों ने भारत सरकार को उसका संक्षिप्त ब्योरा प्रस्तुत किया है लेकिन सार्वजनिक तौर पर यह कहा है कि जबकि भारत ने उनके दृष्टिकोण को रेखांकित किया है, वे भारत से किसी का पक्ष लेने की अपेक्षा नहीं करते हैं। भारत ने क्षेत्र में देशों की सैद्धांतिक अथवा पंथवादी विचाराधारा को प्रभावित किए बगैर उन देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध स्थापित करने की नीति का अनुपालन किया है। यह विदेश नीति की एक मुख्य सफलता है क्योंकि भारत उनके चल रहे विवादों में घसीटे जाने का इच्छुक नहीं है परंतु क्षेत्र में गठबंधनों के परिवर्तन के इस अशांति भरे युग में तथा क्षतिज पर द्वितीय विश्व युद्ध जैसी स्थिति के उत्पन्न होने पर, भारत को अपनी निराशा और नापसंद के अनुसार ही अपने विकल्पों का प्रयोग करना होगा। इस दौरान, भारत द्विपक्षीय आदान-प्रदानों और बहुपक्षीय संबंधों के माध्यम से अपने संबंधों को संपोषित करना जारी रखे हुए है। तथापि, हमें उस उचित संतुलन का अन्वेषण करने के लिए कार्य जारी रखने की आवश्यकता है जो हमारे राष्ट्रीय और रणनीतिक हितों की बेहतर पूर्ति कर सकता है। जैसे-जैसे भारत के दर्जे और महत्वाकांक्षा में वृद्धि होती जा रही है तथा वह ऐसी नीति का पालन कर रहा है जिससे विषयपरक आकलन स्पष्टत: प्रतिपादित होता है, यह शांति और उत्पादक संबंधों के ईमानदार सहयोगकर्ता की अपेक्षित साख हासिल करने में समर्थ रहेगा।

33. मैं अपनी बात की समाप्ति प्रधानमंत्री के एक वक्तव्य के साथ करूंगा। उन्होंने पिछले वर्ष 18 अप्रैल को वेस्टमिंस्टर, यूके में बोलते हुए ये उद्गार प्रकट किए थे और यह संभवत: पहली बार है जब भारत की हालिया स्वतंत्र विदेश नीति, जो एक व्यापक भारत और उसके राष्ट्रीय हित द्वारा चालित हुई थी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उनके 'भारत की बात - सबके साथ' दृष्टिकोण में बिना किसी अनिश्चित शतों के प्रतिपादित की गई थी। पश्चिमी सीमा के निकट आतंकवादी हमलों के विरुद्ध निर्णयकारी किए गए हवाई हमलों के बारे में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत के प्रधानमंत्री को इजराइल जाने से किस बात ने रोका है। जी हां, मैं इजराइल जाउंगा और मैं फिलीस्तीन भी जाउंगा। मैं सउदी अरब के साथ भी सहयोग करूंगा तथा भारत की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं के लिए मैं ईरान के साथ भी संबंध स्थापित करूंगा।" तथ्य यह है कि उन्होंने पश्चिम एशिया का उल्लेख करने का विशेष रूप से निर्णय किया जो स्पष्ट रूप से उस महत्व को रेखांकित करता है, जो भारत क्षेत्र के साथ अपने संबंधों में परिलक्षित करता है और साथ ही जिसमें एक अत्यंत परिष्कृत योजक और रणनीतिक स्वायत्ता का भी अवयव शामिल रहता है।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
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