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भारत की विदेश नीति : बदलते भू-राजनीतिक संदर्भ में विकल्प

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) के.पी. फेबियन
    Venue: भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलूर
    Date: मार्च 29, 2019

हम एक ऐसे विश्व में रहते हैं जो परिवर्तन के अध्यधीन है। कभी-कभी ये परिवर्तन गति हासिल कर लेते हैं। अब हम स्वयं को एक ऐसे विश्व में पाते हैं जो प्रौद्योगिकी द्वारा एक अभूतपूर्व गति से रूपांतरण के अधीन है जिसमें कृत्रिम आसूचना, नए विचार, नई आकांक्षाएं और कई अन्य विषय शामिल हैं।

इस भू-राजनीतिक परिस्थिति को समझने के लिए एक वैज्ञानिक स्वभाव अत्यंत आवश्यक है। यह आपका एक उत्कृष्ट संस्थान है, जमशेदजी टाटा की कल्पना का मूर्त रूप है जिसे 1909 में स्थापित किया गया था तथा इसका मार्गदर्शन अनेक उत्कृष्ट नेताओं द्वारा किया गया था जहां नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी. रामन ने भी कार्य किया था, जिनका व्यक्तित्व हमारे संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में उल्लिखित वैज्ञानिक स्वभाव को उपलब्ध कराने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

जब भारत ने 1947 में स्वतंत्र राष्ट्रों के समूह में प्रवेश किया था, तो प्रधानमंत्री नेहरू ने बुद्धिमत्ता के साथ शीत युद्ध में शामिल दोनों शक्तिशाली धड़ों में से किसी में भी शामिल न होने का निर्णय लिया। इस युद्ध को हेनरी किसिन्गेर के शब्दों में उचित रूप से वर्णित किया गया है, जो शीत युद्ध के दौरान स्वयं एक प्रधानकर्ता थे। उन्होंने शीत युद्ध का वर्णन इस प्रकार किया है:

"महाशक्तियों ने प्राय: ऐसा व्यवहार किया है जैसे दो सशस्त्र नेत्रहीन व्यक्ति किस कमरे में अपना रास्ता ढूंढ रहे हैं, दोनों ही एक-दूसरे से स्वयं को भारी खतरे में पा रहे हैं, जिनके बारे में वे समझ रहे हैं कि उसकी नज़र बिल्कुल ठीक है। दोनों ही पक्षों को यह समझना होगा कि प्राय: अनिश्चितता, समझौता और असंबद्धता नीति तैयार करने के सत्व हैं। फिर भी, प्रत्येक ही दूसरे के लिए निरंतरता, दूरदृष्टि और संबद्धता प्रदान करने का प्रयास करता है जबकि उसका स्वयं का अनुभव इसके विपरीत होता है। वस्तुत: समय के साथ-साथ दोनों ही नेत्रहीन व्यक्ति एक-दूसरे को काफी नुकसान कारित कर सकते हैं, आप उस कमरे की बात तो छोड़ ही दीजिए।"

वह कमरा हमारी पृथ्वी है। किसिन्गेर एमएडी (पारस्परिक आश्वस्त विध्वंस) की बात कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से, भारत ने उन दोनों नेत्रहीन व्यक्तियों की भांति बनना स्वीकार नहीं किया। भारत ने गुट-निरपेक्ष रहने का विकल्प लिया तथा समूचे महाद्वीप से अन्य राष्ट्र भी उस आंदोलन में शामिल हो गए। यूगोस्लाविया, मिश्र और इंडोनेशिया भी उन देशों के बीच शामिल थे जिन्होंने गुट-निरपेक्ष में शामिल होने का चयन किया।

तथापि, यह कहना गलत होगा कि भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्ष के समान है। गुट-निरपेक्ष भारत के हित और मूल्यों को प्रोत्साहित करने का केवल एक माध्यम था।

7 दिसम्बर, 1946 को, वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में उपाध्यक्ष तथा विदेश मंत्रालय के प्रभारी सदस्य के रूप में शामिल होने के पांच दिन बाद नेहरू ने घोषणा की:

"हम प्रस्ताव करते हैं कि जहां तक संभव हो सके, हम शक्तिशाली राजनीतिक समूहों से दूर ही रहेंगे जो एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं जिनके परिणामस्वरूप पूर्व में दो विश्व युद्ध हुए हैं और जिससे एक अधिक व्यापक पैमाने पर पुन: एक और विध्वंस भी हो सकता है।"

विदेश सचिव के रूप में महाराजा कृष्ण रसगोत्रा ने अपनी 'ए लाइफ इन डिप्लोमेसी' नामक पुस्तक में अपने अंतर्दर्शनों के साथ उन शब्दों का प्रयोग किया है जो यथासंभव महत्वपूर्ण हैं।

संक्षेप में, गुट निरपेक्ष का यह अर्थ नहीं है कि भारत को अमेरिका और सोवियत संघ से समान दूरी पर रखा जाए। किसी भी स्थिति में, यदि भारत को दो महाशक्तियों से स्वयं को समान दूरी पर रखता है, तो भारत अपनी नीति के ऊपर से नियंत्रण खो देगा। गुट-निरपेक्ष का आधारभूत प्रयोजन अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखना तथा युद्धों पर नज़र दौड़ाना और अपने हित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना है। संयोगवश, हितों में मूल्य भी शामिल है। यह भारत के हित में था और है कि एक ऐसा विश्व बनाया जाए जहां साझी प्रगति के लिए शांति और सहयोग का अस्तित्व हो। जो भी देश स्वयं को वाशिंगटन अथवा मास्को के साथ जोड़ता है, वह अपनी स्वतंत्रता को खो देता है।

संयोगवश कुछ देशों द्वारा यह धारणा भी बनाई गई है कि अमेरिका के पास महान शक्तियां तैयार करने की पौधशाला है तथा भारत को निष्कपट रूप से उस पौधशाला में प्रवेश लेना चाहिए था। परंतु ऐसी कोई‍ पौधशाला है ही नहीं। शक्ति का आयात नहीं किया जा सकता है।

शीत युद्ध अमेरिका और सोवियत संघ के बीच था। सोवियत संघ 1991 में विघटित हो गया। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् भू-राजनीति में पर्याप्त परिवर्तन आया है। जब सोवियत संघ का विघटन हुआ, कुछ समय के लिए एकध्रुविता का साम्राज्य छा गया था जैसाकि चार्ल्स क्रॉथामेर द्वारा वर्णित किया गया है जिन्होंने विदेशी मामलों में लिखा था, "यह एकध्रुवीय है। विश्व शक्ति का केन्द्र निर्विवाद रूप से अमेरिका ही जिसका साथ उसके पश्चिम मित्र-राष्ट्रों द्वारा दिया गया है।' यह बात अठारह से भी अधिक वर्ष पूर्व कही गई थी। "पश्चिमी मित्र-राष्ट्र" अब 'निर्विवाद महाशक्ति' की होड़ में शामिल नहीं हो रहे थे।

अब हम हमारे विश्व में शक्ति, सैन्य क्षमता और अर्थव्यवस्था के वितरण पर नज़र दौड़ाएं। अमेरिका का 2019 में रक्षा बजट 686 बिलियन डॉलर था जबकि यह 1990 में 409.7 बिलियन डॉलर था और 1999 में गिरकर 298.4 बिलियन डॉलर हो गया था।

अन्य शक्तियों के साथ तुलना करना भी लाभप्रद रहेगा।

तथापि, हमें उपलब्ध और प्रयोग में लाई जाने वाली सैन्य शक्ति के बीच महत्वपूर्ण विभेद कर लेना चाहिए। स्वाभाविक रूप से, प्रयोग की जाने वाली की तुलना में उपलब्ध सेना अधिक है। दूसरा मुद्दा यह है कि अमेरिका में खर्च किया गया एक डॉलर तथा चीन में खर्च किया गया एक डॉलर हमें अलग-अलग परिणाम दे सकता है जिससे यांत्रिक डॉलर से डॉलर की तुलना औचित्यपूर्ण नहीं रह जाती है।

अमेरिका और रूस के बीच एमएडी (पारस्परिक आश्वस्त विनाश) संबंध भी मौजूद है जैसा कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच में था। इसके अलावा, यूरोप रूस से, या कहें तो यूक्रेन और जार्जिया से सटा हुआ है तथा तैनात की जाने वाली पारंपरिक सैन्य शक्ति के संदर्भ में, रूस का पलड़ा अमेरिका की तुलना में भारी है। रूस ने जार्जिया में सैन्य हस्तक्षेप (2008) किया जब अमेरिका मात्र एक दर्शक ही था। इसी प्रकार, जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा किया (2014) ओर डोनबॉस में सशस्त्र 'स्वयं सेवक' भेजते हुए यूक्रेन को अस्थिर बनाया था, तो इसे नाटो द्वारा असहाय रहते हुए देखा गया था। संक्षेप में अमेरिका अब एक गैर-चुनौतीपूर्ण महाशक्ति नहीं रह गया था जिसका दावा चार्ल्स क्रॉथामेर द्वारा किया गया था कि यह सोवियत संघ की ही भांति समाप्त हो चला था।

इतिहास का एक अधिक वृद्ध पहलू लेते हुए यह स्मरण करना महत्वपूर्ण है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के युग में दो प्रमुख युद्धों अर्थात् कोरियाई युद्ध और वियतनाम युद्ध में अमेरिका को पहले में गतिरोध झेलना पड़ा और दूसरे में हार का सामना करना पड़ा।

तथापि अमेरिका सेवाओं में बेहतर कार्य कर रहा था। 2018 में अमेरिका का माल में व्यापार घाटा 891 बिलियन डॉलर था तथा सेवाओं में 379 बिलियन डॉलर का अधिशेष था।

अमेरिका और चीन के बीच वर्तमान व्यापार विवाद कटुतापूर्ण था परंतु इसमें समानता नहीं थी। चीन को अधिक नुकसान हुआ तथा इसने इस विवाद को समाप्त करने के लिए हर संभव प्रयास किया। परंतु राष्ट्रपति ट्रम्प बातचीत करने के लिए इच्छुक नहीं थे।

कुछ समय के लिए जैसे-जैसे चीन का उदय हो रहा था, ऐसी आशंकाएं भी उठ रही थी कि अमेरिका और चीन जी-2 का निर्माण कर रहे हैं जिससे सारा विश्व एक तरफ होकर कमजोर पड़ जाएगा। राष्ट्रपति ओबामा ने उस आशंका को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जब उन्होंने चीन का दौरा किया और एक संयुक्त प्रकाशनी में कहा कि दोनों पक्ष दक्षिण एशिया के साथ मिलकर कार्य करेंगे। भारत ने इसका विरोध‍ किया तथा इसके बारे में अधिक सुनाई नहीं दिया।

भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और भूटान को छोड़कर अन्य सभी के अमेरिका की तुलना में चीन के साथ अधिक व्यापार संबंध है।

तथापि, हथियारों की ब्रिक्री के संदर्भ में, अमेरिका चीन से कहीं आगे है। दक्षिण चीन सागर में चीन ने अन्य देशों के सामुद्रिक अधिकारों का सफलतापूर्वक अतिक्रमण किया है तथा वे सुनिश्चित नहीं हैं कि अमेरिका चीन की सेना का सामना करने के लिए तैयार होगा।

हाल ही में, हमने एक अत्यंत महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक रूपांतरण देखा है। जैसाकि हमने देखा, रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए तथा क्रीमिया पर उसे द्वारा कब्जा करने के उपरांत उसे जी-8 से निकाल दिया गया। मास्को अब बीजिंग के निकट गया और दोनों देशों ने अपने आर्थिक और राजनीतिक सहयोग में वृद्धि की। यह स्मरण किया जाना चाहिए कि विक्सन के अंतर्गत अमेरिका ने सोवियत संघ का सामना करने के लिए चीन को प्रोत्साहित करने के लिए 1971 में चीन के प्रति 'उदारवादी रवैया' अपनाया था।

क्या चीन कभी अमेरिका की बराबरी कर पाएगा और उसके बाद उससे आगे निकल पाएगा? अनेक अर्थशक्तियों ने यह भविष्यवाणी की है कि ऐसा शीघ्र ही होगा। उदाहरण के लिए अरंविद सुब्रामणियन ने अपनी पुस्तक 'एक्लिप्स : लिविंग इन दि शेडो ऑफ चालनाज़ एकानॉमिक डोमिनेंस' में निम्नलिखित परिदृश्य की परिकल्पना की है:

फरवरी, 2021 में अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति ऋण लेने के लिए आईएमएफ जाएंगे। आईएमएफ की अगुआई करने वाले चीनी राष्ट्रिक मुआवजे के रूप में पूर्वी भूमध्यसागर से अमेरिकी नौसेना को हटाने की मांग करेंगे।

सुब्रामणियन ने यह पुस्तक 2011 में लिखी थी। उन्होंने चीन के विकास की गति तथा जीडीपी में अमेरिका के विकास की गति से पूरे विश्वास के साथ यह बात लिखी थी तथा उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था।

ऐसा बहिर्वेशन हल्के में लिया जाना उचित नहीं होगा। आप युवाओं को आपके वरिष्ठ जनों द्वारा लिखी गई पुस्तकों को समालोचनात्मक रूप से सदैव पढ़ना चाहिए। ऐसे यांत्रिक बहिर्वेशन पारंपरिक अर्थव्यवस्था का भाग हैं। हमें अर्थव्यवस्था के अव्यवस्थित अथवा अति-अव्यवस्थित होने से पूर्व 19वीं और 20वीं शताब्दी में विद्यमान राजनीतिक अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार किए जाने की आवश्यकता है।

राज्य की शक्ति के संदर्भ में चीन द्वारा अमेरिका से आगे निकल जाने के प्रश्न पर वापस आते हुए इस बात का विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि ऐसा अगले पांच वर्षों में भी हो पाएगा। हमें बौद्धिक विनम्रता बरतनी चाहिए तथा 2050 तक क्या होगा इसका पूर्वानुमान लगाना बंद करना होगा क्योंकि कुछ चिंतक ऐसा पहले ही कर चुके हैं।

मेरे अनुसार अमेरिका एक गिरती हुई शक्ति है तथा चीन एक उभरती हुई शक्ति। एक एक ऐसे भवन की कल्पना करें जिसमें कुछ लिफ्टें हैं। एक से चीन ऊपर जा रहा है तथा दूसरी से अमेरिका नीचे उतर रहा है। वे एक ही तल पर कब पहुंचेंगे? इसमें काफी समय लगेगा क्योंकि अमेरिका ने सबसे ऊपर की मंजिल से आरंभ किया है।

इसके अलावा, चीन का आर्थिक उदय वैश्वीकरण पर निर्णायक रूप से निर्भर है तथा वैश्वीकरण के विरुद्ध पहले से ही एक सुदृढ़ विरोध किया जा रहा है जैसा कि ट्रम्प के नाफ्टा, ब्रेजिट और कुछ अन्य घटनाक्रमों के संशोधन में देखा जा सकता है जिसमें इटली, आस्ट्रिया, जर्मनी और किसी अन्य देश के ईयू एकीकरण की पूछताछ भी शामिल है।

अमेरिका का चीन के साथ एक व्यापक व्यापार घाटा हुआ है तथा राष्ट्रपति ट्रम्प इसे काफी कम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। व्यापार का अंतर 2017 में 375.5 बिलियन डॉलर के पूर्व रिकार्ड की तुलना में 2018 में 419.2 बिलियन डॉलर तक बढ़ गया। उसके कतिपय कड़े वार्तालाप और बहलाने वाली तौर-तरीके चीन के लिए एक चुनौती हैं।

आज भू-राजनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पाकिस्तान और चीन के बीच एक गहन संबंध है। चाणक्य ने कहा है कि हर देश का अपने पड़ोसियों के बीच एक 'प्राकृतिक' शत्रु होता है। भारत के ऐसे दो शत्रु हैं। मेरे शब्दों पर ध्यान दें। मैं यह कहीं कर रहा हूं कि भारत को पाकिस्तान या चीन को अपना 'प्राकृतिक शत्रु' समझना चाहिए। मेरा अनुमान यह है कि पाकिस्तान और चीन भारत को अपना 'प्राकृतिक शत्रु' मानते हैं।

पाकिस्तान में, भारत, चीन और अमेरिका के लिए नीति का निर्धारण सेना द्वारा किया जाता है। सेना यह तर्क देती है कि उन्हें भारत से खतरा है तथा वह ही पाकिस्तान को बचा सकती है, अत: वह पाकिस्तानी राजनीति में अपनी उत्कृष्टता का औचित्य सिद्ध कर रही है ताकि इस बात को हल्का बनाया जा सके। पाकिस्तान के साथ भारत की मुख्य समस्या यह है कि यह भारत के विरुद्ध नीति के उपकरण के रूप में आतंकवाद का प्रयोग करता है।

भारत को पाकिस्तान से होने वाले आतंकवाद का निवारण कैसे करना चाहिए? हमें नीतिगत उपायों की आवश्यकता होगी। ऐसा कोई एक कदम नहीं है जिसका प्रयोग वह पाकिस्तान के व्यवहार को बदलने के लिए कर सकता है। इसके साथ-साथ, बालाकोट पर हवाई हमलों ने पाकिस्तान को यह दृढ़ संदेश भेजा है कि उसे उसके कृत्यों की कीमत चुकानी होगी। परंतु जब तक पाकिस्तान के लोग स्वयं एक निर्णय नहीं ले लेते तथा सेना से यह नहीं कह देते कि भारत से जाने वाली धमकियां झूठ बनाई गई हैं, तब तक पाकिस्तान की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आ सकेगा।

भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे पड़ोसी जैसे संबंध स्थापित करने को उच्च महत्व प्रदान करता है। भारत बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव्स के साथ ऐसे संबंध स्थापित करने में सफल रहा है। श्रीलंका और मालदीव्स के मामले में, सरकारों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया लाई गई है जो भारत के साथ पारस्परिक लाभप्रद संबंध रखने के बोध को पहचान गई है। भारत-बांग्लादेश संबंध अन्य देशों के लिए एक उदाहरण हैं। नेपाल भी कुछ झिझका सा रहा है तथा उसने भारत के अच्छे पड़ोसी के दृष्टिकोण के प्रति पूर्णत: प्रतिक्रिया नहीं दर्शाई है।

भारत जापान तक भी पहुंचा है जिसने अत्यंत गर्मजोशी के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की है। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पराजित हुआ था तथा मित्र देशों ने इस पर 1951 में एक क्रूर संधि थोप दी थी। भारत ने उसमें शामिल होने से इंकार कर दिया तथा 1952 में जापान के साथ एक पृथक संधि पर हस्ताक्षर किए जिसमें हर्जाने के सभी दावों को माफ कर दिया गया। तथापि, जब जापान ने शीत युद्ध के संदर्भ में स्वयं को अमेरिका के साथ जोड़ा, तो ये द्विपक्षीय संबंध उस तरह नहीं फल-फूल पाए जैसी कि 1952 की संधि में परिकल्पना की गई थी। वर्तमान में भारत और जापान अपने संबंधों को गहन और व्यापक बनाने में व्यस्त है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच घनिष्ठ वैयक्तिक मित्रता इसमें सहायक है।

क्या हम एक बहुध्रुवीय विश्व में रह रहे हैं? हां या नहीं। विश्व अंतरराष्ट्रीय वित्त के क्षेत्र को छोड़कर बहु-ध्रुवीय है। उस क्षेत्र में, अमेरिका की प्रधानता है जैसाकि ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों तथा भारत और ईरान से तेल के अन्य आयातकों पर तेल के आयात को कम करने के लिए डाले गए राजनयिक दबाव से प्रदर्शित होता है। हमें उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझने की आवश्यकता है जिनके अंतर्गत अमेरिकी कोष ने स्वयं के लिए वैश्विक केन्द्रीय बैंक की भूमिका निर्दिष्ट की है। ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के दौरान (जुलाई, 1944) जॉन मेनार्ड की नेज़ ने एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा (बैंकर) का प्रस्ताव किया था, अमेरिकी प्रतिनिधि हैरी डेक्सटर व्हाइट ने इसका विरोध किया था। अंतिम निर्णय यह था कि एक निश्चित विनियम प्रणाली निर्धारित की जाएगी जहां प्रत्येक मुद्रा को डॉलर के साथ सहयोजित किया जाएगा जो स्वर्ग से संबद्ध होगी, जिसमें एक डालर 35 ओंस स्वर्ण के समान होगा। हालांकि, निक्सन के अंतर्गत अमेरिका स्वर्ग मानक से बहिगर्मन कर दिया, लेकिन अमेरिका की प्रधानता बनी रही।

यह भारत और शेष विश्व के हित में होगा कि अंतर्राष्ट्रीय वित्त मुक्त और उचित बन जाए। ईरान से तेल के आयात को कम करने अथवा उसे रोकने के लिए अन्य देशों पर वांशिगटन द्वारा डाला जा रहा राजनयिक दबाव अस्वीकार्य है।

भारत को क्या लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए? मेरे विचार से भारत को अपनी सैन्य क्षमता को सुदृढ़ करना चाहिए तथा हथियारों और प्रौद्योगिकी पर अन्य देशों पर इसकी निर्भरता को पर्याप्त रूप से कम करना चाहिए। भारत की सेना इतनी मजबूत होनी चाहिए कि कोई भी उस पर हमला करने का साहस न कर सके। भारत की यह मंशा है कि वह संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व को छोड़कर किसी अन्य देश के लिए अपनी सेना को तैनान न करे। संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना सेना के लिए भारत के उल्लेखनीय योगदान की समूचे विश्व में सराहना की जाती है।

भारत को अंतर्वेशी विकास के आधार पर अपने आर्थिक विकास में भी तेजी लाने की आवश्यकता है।

भारत उन महाशक्तियों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने में कुल मिलाकर सफल ही रहा है जो परस्पर युद्ध करती हैं।

भारत के युवाओं के लिए असीम अवसर विद्यमान हैं। सिविल सेवाएं, विशेष रूप से विदेश सेवा एक अच्छा कैरियर विकल्प है (इस प्रश्न के उत्तर में अनेक हाथ ऊपर उठाए गए कि कितने युवा आईएफएस में शामिल होना चाहते हैं तथा इसके उपरांत एक विस्तृत प्रश्नोत्तर सत्र संचालित किया गया)

मैं टैगोर की पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा जिनके पास भारत के लिए एक शाली विचार था:

"जहां मस्तिष्क में कोई भय नहीं है और सिर ऊंचा रखा जाता है, जहां ज्ञान मुक्त है। जहां विश्व संकीर्ण, घरेलू दीवारों द्वारा टुकड़ों-टुकड़ों में विखंडित नहीं है। जहां शब्द सत्यता की गहराई से निकलते हैं जहां अनथक प्रयास उत्कृष्टता की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं।

जहां कारण की स्पष्ट धारा मृत आदतों के भयावह मरुस्थली रेत में अपना मार्ग नहीं खो देती है। जहां आगे बढ़ने के लिए मस्तिष्क का नेतृत्व व्यापार विचारों और कार्यों द्वारा किया जाता है। स्वतंत्रता के उस स्वर्ग में, मेरे ईश्वर, मेरे देश को प्रबुद्ध बना।"

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