विशिष्ट व्याख्यान विशिष्ट व्याख्यान

लुकिंग ईस्ट से लेकर एक्टिंग ईस्ट तक

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    By: डॉ. जितेन्द्र नाथ मिश्रा
    Venue: नागालैंड विश्वविद्यालय
    Date: नवम्बर 22, 2018

उपकुलपति, प्रोफेसर परदेशी लाल, प्रोफेसर एम. के. सिंह, प्रो. ए. के. सिंह, डॉ. लिखासे संगतम, और मित्र गण,

मैं नागालैंड विश्वविद्यालय, लुमामी का बड़ा आभारी हूं कि उसने मुझे आज यहां बोलने के लिए आमंत्रित किया। आपके उदार आतिथ्य और मुझे दिए गए सम्मान के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं अतिविशिष्ट व्याख्यान माला के अंतर्गत मेरे यहां के दौरे के प्रयोजन के लिए विदेश मंत्रालय के बाह्य प्रचार प्रभाग को धन्यवाद देता हूं।

भारत की एक्ट ईस्ट नीति को समझने के लिए हमें इतिहास को देखने की आवश्यकता है।

आधुनिक युग के पूर्व भारत पूर्वी भाग में स्थित देशों के साथ बेहतर तरीके से संबद्ध था। चोल और कलिंग राजाओं ने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ मजबूत समुद्री संबंध स्थापित किए थे और इससे एक साझा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रथाएं विकसित हुईं।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत को दक्षिण पूर्व एशिया के साथ ऐतिहासिक रूप से समृद्ध संबंध के आधार पर पश्चिम की ओर रूख करने को प्रेरित किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी शीत युद्ध ने भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बड़े भूभाग को विभिन्न भू-राजनैतिक स्थान पर ला खड़ा किया।

किंतु गहरे ऐतिहासिक संबंधों के साथ भारतीयों ने कभी पूर्व के साथ सहयोग के विचारों को नहीं त्यागा। शीत युद्ध की समाप्ति ने भारत की 1991 में लुक ईस्ट नीति को पूर्व सूचित किया। पूर्व की ओर शक्ति के चले जाने के साथ लुक ईस्ट की नीति को एक्ट ईस्ट में बदले जाने की आवश्यकता थी।

एक्ट ईस्ट नीति क्या है?

इसके रणनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और आंतरिक आयामों को भी हम देखें।

इसकी नीतिगत आयाम इस क्षेत्र में नई शक्ति के खेल की एक प्रतिक्रिया है। भारत बेहतर साम्य के लिए एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बहुपक्षीय संतुलन चाहता है।

व्यापक रूप से लुकिंग ईस्ट से एक्टिंग ईस्ट में परिवर्तन भारत की परिधि में चीनी रणनीतिक दखल की भारतीय प्रतिक्रिया है।

किंतु एक्टिंग ईस्ट शक्ति नीति का शून्य संतुलन नहीं है। भारत का चीनी दृढ़ता से निपटने के लिए एशिया में अमेरिकी पुनर्संतुलन के साथ जुड़ना अविश्वसनीय है। बल्कि, इससे भारत के मुख्य हितों को कम करके आंकने से चीन को रोकने में एक साझेदारी बनेगी। इससे चीन को रोकने के लिए किसी गठबंधन यथा क्यूयूएडी की प्रत्याशा सीमित होगी।

न ही एक्टिंग ईस्ट केवल चीन के संबंध में है। भारत के अधिक प्रभुत्व पाने के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भारत संतुलनकारी भूमिका की अपेक्षा शीर्ष वैश्विक भूमिका निभाना चाहता है। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ संबंध इस विवरणात्मक कहानी का हिस्सा है।

एक्टिंग ईस्ट इसमें जुड़ा एक अन्य रणनीतिक स्तर है। चूंकि पाकिस्तान भारत की लुक वेस्ट नीति को कमजोर कर रहा है, इसलिए भारत एक्टिंग ईस्ट नीति के साथ अपनी पड़ोसी प्रथम की नीति को समंजित करने को तैयार है। अक्टूबर, 2016 में गोवा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बिम्सटेक तक पहुंच एक उदाहरण है। पिछले अगस्त में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में संयुक्त सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव रखा गया।

मुख्य आधार के रूप में अर्थव्यवस्था

आर्थिक पहलू भारत के विकास के लिए सहायता हेतु सरकार की खोज है। विदेश नीति विकास के लिए है। यह पूर्व के राष्ट्रों के साथ संबंधों का बचाव है।

रणनीतिक आयाम

भारत आसियान को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा संरचना के केन्द्र में मानता है। यह स्पष्ट है कि क्यूयूएडी इसका कोई विकल्प नहीं है।

भारत दक्षिण पूर्व एशिया में सुरक्षा संबंधों को बढ़ा रहा है। वर्ष 2016 में भारत ने प्रथम बार कोबरा गोल्ड, थाइलैंड में आयोजित एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे बड़ा वार्षिक सैन्य अभ्यास में एक पर्यवेक्षक के रूप में भाग लिया। थाईलैंड के राजदूत चुटीनटोर्न गोंगसाडकी ने हिन्दुस्तान टाइम्स को कहाः "सभा पटल पर रखा गया प्रस्‍ताव है- थाईलैंड-सिंगापुर-भारत का संयुक्त नौसेना अभ्यास, मल्लका जलडमरूमध्य में संयुक्त गश्त और कोबरा गोल्ड अभ्यास में भारत के पूर्व भागीदारी स्थिति।

क्या यह एशिया की स्वर संगति है?

सांस्कृतिक रूप से एक्ट ईस्ट नीति इतिहास और सभ्यता के पश्चिम केन्द्रित विचार के सरकार की विरोधी विवरण का एक हिस्सा है। इतिहास के माध्यम से भारत के समृद्ध हस्तक्षेप ने सभ्यताओं के बीच वार्ता को समृद्ध किया है। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत की बातचीत विशिष्ट और प्रमुख है।

द्विपक्षीय सममिति के लाभ

क्या आसियान, पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और मेकांग गंगा सहयोग भारत के साझेदार देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों का एक विकल्प है?

मेरा विचार यह है कि मुख्य रूप से द्विपक्षीय रूपरेखा ही एक्ट ईस्ट नीति को आगे बढ़ाता है। क्योंकि वे उस गति से आगे बढ़ते हैं जिस गति में सभी सदस्य देश आसियान, ईएएस और मेकोंग गंगा कोओपरेशन गंभीर मुद्दों पर साथ साथ चलने के लिए सुविधापूर्ण होते हैं। किंतु भारत और इसके साझेदारों को इस द्विपक्षीय स्तर पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। वे किसी भी मुद्दे के साथ निपटारा करते हैं।

वियतनाम और थाईलैंड

अब मैं एक्टिंग ईस्ट के मामला अध्ययन के रूप में वियतनाम और थाइलैंड के मामलों को लेता हूं।

मजबूत सभ्यतागत संबंध से इन दोनों साझेदारों के संबंध बेहतर सुनिश्चित होते हैं।

वियतनाम

वियतनाम और भारत का शांतिपूर्ण सांस्कृतिक प्रवर्जन की तरंगों तथा नए भूमार्ग व समुद्री मार्गों की खोज के साथ एक प्राचीन साझा संबंध है।

भूतकाल के बारे में बात करना केवल फील गुडभाषा के साथ संयुक्त वक्तव्य के तेलाभिषेक करने का दिखावा भर नहीं है। राजनीतिक नेताओं का इस संबंध पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। जहां वियतनाम में हो चिह्न मिन्ह और वो न्युगुएन गियेप हुए हैं वहीं भारत में गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे नेता हुए हैं।

जहां राजनीतिक विचारों के आदान-प्रदान प्रमुख रहे हैं, वहीं यह आश्चर्यजनक नहीं है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी, शिक्षा व व्यापार में सहयोग को बढ़ाने के लिए दोनों देशों का एक संयुक्त आयोग, एक रणनीतिक वार्ता, विदेश कार्यालय परामर्श, सुरक्षा वार्ता तथा एक संस्थागत तंत्र है।

रणनीतिक आधार प्रदान करना

रणनीतिक स्तर पर भारत और वियतनाम का कोई द्वंद्वात्मक इतिहास नहीं है। ऐसी किसी बुरी घटना का स्मरण भार नहीं है जिसका अन्यथा दुराग्रहपूर्ण अवधारण हो। वहीं इसकी तुलना में चीन एक ऐसा पड़ोसी देशरहा है जिसने ऐतिहासिक रूप से वियतनाम को अधीन करना चाहा, जो वास्तविक किंतु अप्रिय है।

वियतनाम दक्षिण चीन सागर के दोनों ओर प्रभावशाली स्थिति में है। उस क्षेत्र में उसकी स्थिति उसे विश्व के सबसे प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में रणनीतिक परिणाम देने में केन्द्रीय भूमिका प्रदान करती है। जहां दक्षिण चीन सागर में कई पक्ष दावेदार हैं वहीं वियतनाम कई प्रतिस्पर्धियों और इस विवाद के चारों ओर के कई दावेदारों के साथ बातचीत करने की स्थिति में है। बातचीत किए बिना दक्षिण चीन सागर पर कोई समझौता नहीं हो सकता है।

इस प्रकार वियतनाम चीन, अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, फिलीपिंस, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और अन्य वैश्विक व क्षेत्रीय देशों के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है।

जहां हिमालय एशिया के साथ भूमार्ग से व्यापार में बाधा उत्पन्न करता है वहीं भारत को उन देशों के साथ व्यापार करने में समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना पड़ता है। भारत के लिए वियतनाम दक्षिण चीन सागर तक पहुंच प्रदान करता है जिसके माध्यम से भारत का 55 प्रतिशत व्यापार होता है।

भारत का सुदूरपूर्व प्रायद्वीपीय प्रदेश मल्लका जलडमरूमध्य तक पहुंचने में पश्चिमी भाग से केवल 90 समुद्री मील है और दक्षिणी चीन सागर दो महासागरों को जोड़ता है जिस पर भारत का व्यापार निर्भर करता है।

इसलिए, जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत को ‘’सुरक्षा का निवल प्रदाता’’ के रूप में एक प्रकाशक चाहिए। उसी प्रकार प्रधानमंत्री मोदी ने सागर शब्द का प्रयोग किया, जिसका अर्थ इस क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास है, एक ऐसा दृष्टिकोण जो समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाए।

सितम्बर, 2016 में वियतनाम की प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के लिए वर्ष 2007 में स्थापित रणनीतिक साझेदारी को और बुलंद किया। चीन और रूस के बाद भारत ही तीसरा ऐसा देश है जिसका वियतनाम के साथ ऐसी साझेदारी है।

यद्यपि भ्रातृ सुलभ पार्टी संबंध के साथ चीन भारत से आगे है किंतु भारत के साथ वियतनाम का राजनीतिक महत्व असंदिग्ध है। वियतनाम की स्थिति भारत के लिए वही नहीं हो जो पाकिस्तान का चीन के लिए है, किंतु रणनीतिक वर्चस्व को रोकने के लिए यह व्यापक रणनीतिक साझेदारी एक बचाव है।

पूर्व में भारत का आकलन यह था कि वियतनाम के साथ रक्षा संबंधों को उन्नत बनाने से अन्य ताकतें तिलमिला सकती हैं। किंतु अब इस तर्क में बदलाव आ गया है। वास्तव में वियतनाम के साथ एक मजबूत रक्षा साझेदारी से इस क्षेत्र में अन्य देशों के प्रभाव में बढ़ोतरी हो सकती है।

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री ग्युयेन टेनडंग के भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वियतनाम के साथ भारत का रक्षा सहयोग भारत के सबसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदारियों में से एक है। वर्ष 2015 में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के वियतनाम दौरे के दौरान दोनों पक्षों ने 2015-2020 के लिए रक्षा सहयोग संबंधी एक संयुक्त विवरण पर हस्ताक्षर किया था।

नौसेना सहयोग में जहां भारत की प्रेरणा अपूर्वानुमेय क्षेत्र में इसकी उपस्थिति बतलाता है वहीं वियतनामी दृष्टिकोण से भारतीय नौसेना की उपस्थिति से रणनीतिक संतुलन सृजित हो सकता है। वर्ष 2014 में प्रदत्त क्रेरिड के तहत भारत वियतनाम के लिए अपतटीय पेट्रोल जलयान बना रहा है।

वियतनाम में सैटेलाईट ट्रैकिंग और इमेजिंग केन्द्र की स्थापना, ब्रह्मोस मिसाइल की बिक्री पर स्पष्ट चर्चा और प्रतिस्पर्धी दक्षिण चीन सागर में भारत द्वारा तेल और गैस की खोज के संबंध में एक समझौता हुआ है।

प्रेरक बल के रूप में अर्थव्यवस्था

अब हम आर्थिक पहलू पर आते हैं। वियतनाम ने 1986 में डोईमोई को लागू किया। जैसा कि मैंने कहा कि 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण शुरू हुआ।

अब आर्थिक संबंध उपयुक्त रूप से विकसित हो गया है। वर्ष 2014 में व्यापार 8.03 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था और भारत वियतनाम के शीर्ष दस व्यापारिक साझेदारों में से एक है। दोनों पक्ष इस व्यापार को 2020 तक बढ़ाकर 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने पर सहमत हुए हैं।

किंतु कारोबार तथा लोगों के बीच संबंध खराब कनेक्टिविटी से अटकता रहा है। दोनों देशों के बीच कोई सीधी उड़ान नहीं है। आर्थिक संबंध को आधुनिक संबंध के केन्द्र में होने की आवश्यकता होगी जिसे दोनों पक्ष निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं।

थाईलैंड

अब मैं थाईलैंड की चर्चा करूंगा।

भारत और थाईलैंड में भी सांस्कृतिक संबंध शताब्दियों से है। थाईलैंड ने भारत के दर्शन और संस्कृति को इस प्रकार से अपनाया है जिन्हें देखकर वहां जाने वाले आश्चर्यचकित हो सकते हैं। हजारों की संख्या में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं, बैंकाक में इवारन ब्रह्मा और घर-घर में गणेश के मंदिर भारतीय और थाई संस्कृति के भव्य संमिश्रण के उदाहरण हैं।

जहां वियतनाम के साथ संबंध में रणनीति प्रमुख है, वहीं थाईलैंड में लोगों के बीच मजबूत संबंध प्रमुख है। हर हफ्ते 150 उड़ानों के साथ थाईलैंड में हर वर्ष हजारों की संख्या में भारतीय यात्री जाते हैं। कवि चोंगकितनवर्न द नेशन में लिखते हैं कि 2012 में 1.2 मिलियन भारतीयों ने थाईलैंड की यात्रा की, 120,000 थाई लोगों ने भारत की यात्रा की और 10,000 थाई छात्र भारत में अध्ययन करते थे।

रणनीतिक स्तर पर भारत की एक्ट ईस्ट नीति और थाईलैंड की लुक वेस्ट नीति समपूरक हैं। थाइलैंड की लुक वेस्ट नीति में पाकिस्तान, ईरान और तुर्की सहित पश्चिम एशिया शामिल है किंतु इसका प्रमुख केन्द्र बिंदु भारत है।

अंडमान सागर में 1000 किलोमीटर समुद्री सीमा के साथ दोनों देशों ने 2006 से ही समन्वित समुद्री निरीक्षण करते रहे हैं। नौसेना प्रशिक्षण और कर्मचारियों के बीच में बातचीत का आयोजन किया जाता है। दावई गहरे समुद्र पत्तन और इसके विशेष आर्थिक क्षेत्र में निवेश के लिए भारत को थाईलैंड का आमंत्रण भारत के लिए थाई रणनीतिक आस्ति में एक पणधारक बनाने का संकेत है।

अक्सर राजनीतिक आदान-प्रदान ने एक स्थायी बातचीत प्रदान की है। थाईलैंड ने भारत के साथ आसियान +1 शिखर सम्मेलन को शुरू करने के लिए सिंगापुर के प्रस्ताव को समर्थन दिया जिस पर वर्ष 2001 में ब्रुनेई में आसियान के शिखर सम्मेीलन में एक सकारात्मक निर्णय लिया गया था। इसमें उन आतंकवादियों और आपराधियों के विरूद्ध प्रस्ताव किया गया है जिसका निशाना भारत रहा है। तथापि, व्यापार की पूर्ण क्षमता के लक्ष्य को हासिल नहीं किया गया है जो 2015-16 में 8.52 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है।

उत्तर-पूर्व और नागालैंड की भूमिका

इसमें नागालैंड कहां आता है? इसे स्मरण करें कि जापान द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कोहिमा तक घुस गया था। इस घटना ने भारत की रक्षा के लिए नागालैंड की रक्षा को महत्वपूर्ण बना दिया था।

नागालैाड के मुख्यमंत्री श्री नैफ्यु रियो ने सितम्बर, 2010 में वियतनाम की यात्रा की थी। नागालैंड सरकार ने नागालैंड में अगार लड़की कारखाना की स्थापान करने के संबंध में लाओस के एचएसएमएम समूह के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। यह दक्षिण पूर्व एशिया के साथ आर्थिक संबंध की शुरूआत हो सकती है।

एक्ट ईस्ट से लेकर कार्य करने हेतु पूर्वोत्तर क्षेत्र को विकसित करना है। यह भौगोलिक स्थिति है। भूमार्ग से दक्षिण पूर्व एशिया तक जाने के लिए व्यक्ति को उत्तर-पूर्व क्षेत्र से होकर जाना होता है। दक्षिण पूर्व एशिया के साथ कनेक्टिविटी इस देश में ही कनेक्टिविटी को मजबूत कर शुरू किया जा सकता है।

भावी संभावनाएं

इसका भविष्य क्या है?

मेरे विचार से भारत का वियतनाम और थाईलैंड के साथ संबंध और वास्तव में दक्षिण पूर्व एशिया के साथ संबंध सामान्यतया भावना पर कम और शक्ति संतुलन की वास्तविकताओं पर अधिक आधारित है। राष्ट्रवादी भावना, क्षेत्रीय विवादों और ऐतिहासिक संघर्षों से पीड़ित ऐसे क्षेत्र में इन दोनों देशों के साथ हमारा संबंध एक स्थिरीकरण कारक हैं।

वियतनाम और थाईलैंड के साथ भारत के संबंध पर एक सरसरी नजर एक आवर्तक विषय दर्शाता है: इन संबंधों में अन्य द्विपक्षीय संबंधों की खटास नहीं देखी गयी है। एक कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है बल्कि यह समकालीन सच्चाई है।

किंतु किसी भी संबंध में किसी महाविस्फोट की स्थिति नहीं है। पूर्व में शक्ति संतुलन के चले जाने के साथ ऐसी परिस्थितियां हैं जो भारत के वियतनाम और थाईलैंड के साथ संबंध को नवीन परिणाम तक ले जा सकता है।

इस स्थिति में ये तीनों देश अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी द्वारा चालित अपने संबंधों में अधिक घटकों को जोड़ने पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। नई दिल्ली स्थित सरकार के कार्यनिष्पादन के इरादे के साथ भारत के लिए समय आ गया है कि वह एक्टिंग ईस्ट के लिए प्रभावी रूप से कार्य करे।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अब मैं प्रश्न का जबाव
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