विशिष्ट व्याख्यान विशिष्ट व्याख्यान

गांधी, भारत और संयुक्त राष्ट संघ: भारत ने इस संगठन को किस प्रकार नयी दिशा दी।

  • Distinguished Lectures Detail

    By: दिलीप सिन्हा
    Venue: गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान, मदुरै
    Date: दिसम्बर 11, 2018

मैं भारत की विदेश नीति पर बातचीत करने के लिए गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान द्वारा दिए गए निमंत्रण से सम्मानित हूं। मैं अपनी यात्रा को प्रायोजित करने के लिए विदेश मंत्रालय को धन्यवाद देता हूं।

भारत की विदेश नीति के संबंध में सामान्य बातें कहने के बदले मैं भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ को आज की स्थिति में लाने में निभायी गयी भूमिका पर अपनी बात को केन्द्रित करूंगा। जिस संयुक्त राष्ट्र संघ को हम आज जानते हैं वह 70 वर्ष पूर्व सृजित संगठन से काफी भिन्न है। आजयह संगठन, अपने 6 अंगों और दर्जन भर से अधिक विशेषीकृत एजेंसियों के साथ, की सर्वव्यापी पहुंच है। जीवन के ऐसे किसी पहलू के बारे में सोचना कठिन है जो किसी भी प्रकार से संयुक्त राष्ट्र से अछूता नहीं रहा हो। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत की विदेश नीति हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार की गयी थी जो महात्मा गांधी के शिष्य थे और उनसे बहुत अधिक प्रभावित थे। भारत की अहिंसावादी स्वतंत्रता संग्राम ने राजनीतिक विद्रोह के एक नए और क्रांतिकारी रूप को प्रस्तुत किया – व्यापक सविनय अवज्ञा आंदोलन अथवा सत्याग्रह- जिसने विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा। भारत ने बड़े उत्साह के साथ संयुक्त राष्ट्रों के प्रति अपने दृष्टिोण में अपने स्वतंत्रता संग्राम के विचारों को लागू किया और इस संगठन की प्रकृति में आमूलचूल परिवर्तन में महत्वपूर्ण सफलता पायी।

संयुक्त राष्ट संघ युद्धकाल संधि के रूप में शुरू हुआ था। इसका गठन द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका पर जापान के हमले के तत्काल बाद किया गया था। अमेरिका, जो उस समय तक तटस्थ था, ब्रिटेन और रूस के पक्ष में युद्ध में शामिल हुआ। 1 जनवरी, 1942 में चार राष्ट्रों- अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ और चीन- ने वाशिंगटन घोषणा को जारी किया जिसमें उन्होंने यह घोषणा की कि वे जर्मनी, इटलीऔर जापान से युद्ध में एकजुट होंगे। बाईस और देश अगले दिन और अगले तीन वर्षों में इक्कीस देशइसमें शामिल हुए। इस गठबंधन के लिए 30 अक्टूबर 1943 के चार राष्ट्र के मास्को घोषणा में एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र संघ शब्द का इस्तेमाल किया गया। इस घोषणा में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना करने के लिए चार शक्तियों की प्रथम प्रतिबद्धता भी निहित थी।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अंग

युद्ध काल में गठित यह गठबंधन युद्ध के पश्चात एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में परिवर्तित हो गया। इसने पूर्व में अस्तित्व में रहे ‘लीग आफ नेशन’ का स्थान लिया। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर को 1945 में युद्ध के अंतिम दिन सैंन फैंसिस्को सम्मेलन में अंतिम रूप दिया गया, यद्यपि तीन बड़े देशों यथा अमेरिका, रूस और ब्रिटेन द्वारा पूर्व में हीं इनकी मुख्य बातों को अंतिम रूप दे दिया गया था। यह चार्टर 24 अक्टूबर, 1945 को प्रभावी हुआ और इस दिन को संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखना इस संगठन का एकमात्र उद्देश्य है। इसमें आर्थिक और सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए एक परिषद्, आर्थिक और समाजिक परिषद् है किंतु इसका सृजन एक सिफारिशकर्ता निकाय के रूप में किया गया क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के संस्थापक उन आर्थिक और सामाजिक कारणों से परिचित थे जिसके कारण जर्मनी में हिटलर का उत्थान हुआ था। संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे शक्तिशाली अंग सुरक्षा परिषद् है, जिसे ग्यारह सदस्यों के साथ छोटा रखा गया है जिन्हें पांच प्रमुख देशों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इसमें सैन्य बल का भी प्रावधान रखा गया ताकि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को संकट में डालने वाले किसी देश के विरूद्ध इसका इस्तेमाल किया जा सके। इसका प्रक्रिया बहुत साधारण है किंतु इसकी शक्ति असीम थी। यह संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्य अंगों की तुलना में एकदम भिन्न है क्योंकि अन्य अंग केवल सिफारिशें कर सकते हैं। यहां तक की अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार भी न तो अनिवार्य है और न ही व्यापक।

आज संयुक्त राष्ट्र संघ को इसके शांति कायम करने और विकास कार्य और लोकतंत्र व मानवाधिकार के समर्थक के रूप में जाना जाता है। इसके एक लाख से अधिक शांतिरक्षक युद्धरत देशों में कार्य कर रहे हैं। फिर भी, इनमें से किसी भी बात का उल्लेख संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के समय नहीं था। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में लोकतंत्र शब्द का उल्लेख नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ के 51 संस्थापक सदस्यों में से कुछ ही देश लोकतांत्रिक थे और इनमें से कुछ यथा भारत स्वतंत्र भी नहीं था। मानवाधिकार का उल्लेख इसमें बाद में किया गया और इस विश्व निकाय के लिए उपनिवेशवाद को समाप्त करना इनके लक्ष्यों में से नहीं था।

इस संघ के गठन के तत्काल बाद ही इसके लक्ष्य को पुनर्निर्धारित करना कठिन और सतत कार्य था जिसमें कई वर्ष लगे। इसे स्थापित शक्तियोंजिनमें सुरक्षा परिषद् के पांच स्थायी सदस्य हैं, से कड़े विरोध के बावजूद किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के शुरूआती वर्षों में भारत की विदेश नीति उल्लेखनीय रूप से दूरदर्शी और परिपक्व थी। उपनिवेशवाद, रंगभेद नीति, परमाणु निशस्त्रीकरण की समाप्ति, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में साम्यता और उत्तर-दक्षिण संबंध, शीत युद्ध में गुटनिरपेक्ष, दक्षिण-दक्षिण सहयोग, लोकतंत्र जैसे मुद्दों पर भारत का रूख समय से काफी आगे रहा।

उपनिवेशवाद की समाप्ति

जब पांच स्थायी सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर को तैयार किया तो उनकी कार्यसूची में लोकतंत्र और उनिवेशवाद की समाप्ति नहीं थी और न ही उनमें से किसी सदस्य की विदेश नीति का उद्देश्य था। जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो धूरी राष्ट्रों द्वारा कब्जाए गए उपनिवेशों को पाने के लिए उनमें होड़ लग गयी। फ्रांस ने वियतनाम, कंबोडिया और लाओस को वापस पाने की कोशिश की, और ब्रिटेन ने मलेशिया, सिंगापुर और एशिया के अन्य उपनिवेशों को प्राप्त किया। नीदरलैंड इंडोनेशिया को वापस पाना चाहता था। अमेरिका ने प्रशांत क्षेत्र में द्वीपों पर कब्जा किया। रूस ने पूर्वी यूरोप के सभी उपनिवेशों को कब्जा लिया। चीन, जिसकी संयुक्त राष्ट्र संघ की सीट पर क्युमिंटांग सरकार द्वारा कब्जा था, ने भी तिब्बत और झिंजियांग को मिला लिया। संयुक्त राष्ट्र संघ के पास इस चीज को रोकने की कोई नीति नहीं थी। भारत नीदरलैंड और फ्रांस के विरूद्ध आवाज उठाने वाले प्रथम देशों में से था। भारत ने सभी उपनिवेशों के बारे में आवाज बुलंद की और और उपनिवेशवाद के विरूद्ध जागरूकता फैलायी। 1960, जब तक एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देश आजाद हो चुके थे और संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हो गए थे, में महासभा ने उपनिवेशवाद की समाप्ति के संबंध में एक संकल्प पारित किया।

विडम्बनात्मक रूप से कम्युनिस्ट देश सोवियत संघ ने इस श्रमजीवी वर्ग के तानाशाह का समर्थन किया, जिसने 1960 में महासभा द्वारा अंगीकृत उपनिवेशवाद की समाप्ति- ‘औपनिवेशिक देशों और लोगों को स्वतंत्रता देने संबंधी घोषणा’- संबंधी प्रथम घोषणा में मुख्य भूमिका अदा की। इस संकल्प ने आत्म निर्णय के अधिकार और अपनी राजनीतिक स्थिति को निर्धारित करने के लिए सभी लोगों के अधिकारों की पुनर्पुष्टि की। इसमें घोषणा की गयी कि लोगों को पराधीन करने का अर्थ उनके मानवाधिकारों को समाप्त करना है और यह विश्व शांति की प्राप्ति के लिए बाधक है। उस वर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हुए 19 नव स्वतंत्रता प्राप्त राष्ट्रों के कारण यह संकल्प संभव हुआ था। इसे 89-0 मतों से स्वीकार किया गया था। 9 राष्ट्रों ने इसमें भाग नहीं लिया। तीन पश्चिमी स्थायी सदस्य- अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस- उनमें से थे। अन्य औपनिवेशिक शक्तियां- बेल्जियम, पुर्तगाल और स्पेन भी इससे दूर रहे और आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और डोमिनिकन रिपब्लिक भी दूर रहे। अमेरिका ने कहा की कि यह संकल्प अनावश्यक है।ब्रिटेन ने तर्क दिया कि यदि औपनिवेशिक नियम को देखें तो उपनिवेशों को स्वतंत्र करने से पूर्व उनका विभिन्न चरणों में विकास आवश्यक है।

तथापि, जहां महासभा ने संयुक्त राष्ट्र संघ को उपनिवेशवाद की समाप्ति की ओर प्रेरित करने की कोशिश की वहीं सुरक्षा परिषद् अपने युद्ध पश्चात औपनिवेशिक दृष्टिकोण में ही फंसा रहा । इसने औपनिवेशिक शक्तियों के विरूद्ध अथवा एशिया और अफ्रीका के देशों में स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में कोई कार्रवाई नहीं की।

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों में से एक सिद्धांत मानवाधिकार और मूलभूत स्वतंत्रता को बढ़ावा देना और इसके सम्मान को प्रोत्साहित करना है। तथापि, इस चार्टर में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की मनाही है। शीतयुद्ध के दौरान सुरक्षा परिषद् ने मानवाधिकार उल्लंघन के लिए किसी राष्ट्र के विरूद्ध शायद ही कोई प्रतिबंध लगाया हो अथवा कोई अन्य उपाए किए हों। एकमात्र अपवाद दक्षिणी रोडेशिया और दक्षिण अफ्रीका है जिन पर हल्का सा प्रतिबंध लगाया गया था।

यद्यपि अब मानवाधिकार को संयुक्त राष्ट्र संघ के एक स्तंभ के रूप में प्रायोजित किया जाता है जबकि इसके सभी स्थायी सदस्यों ने मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में संकल्प को वीटो किया था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने पूर्व में दक्षिणी रोडेशिया, दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के मामले में कई मौकों पर ऐसा किया और मध्य पूर्व में ऐसा करना जारी रखा। रूस और चीन ने म्यांमार, सीरिया और जिम्बाबे के संबंध में संकल्पों को असफल बनाने के लिए साथ मिलकर कार्य किया है।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार एजेंडे को आकार प्रदान करने में महात्मा गांधी का प्रभाव प्रत्यक्ष और बहुत गहरा है। वर्ष 1946 में भारत के स्वतंत्र होने के पूर्व ही इसने महासभा में दक्षिण अफ्रीका में भारतीय के साथ व्यवहार के संबंध में एक संकल्प प्रस्तुत किया। बाद में यह भारत के साथ रंगभेद नीति के विरूद्ध एक आंदोलन के रूप में बन गया और यह दक्षिण अफ्रीकी देशों में चला। इस मुद्दे पर अफ्रीका के साथ भारत के निकट सहयोग ने बैंडंग सम्मेलन में 1955 में एफ्रो-एशिया पहचान को गति मिली। यह एशिया और अफ्रीका के नए स्वतंत्र हुए देशों के गुटनिरपेक्ष आंदोलन की उत्पत्ति भी थी, जिन्होंने विश्व युद्ध में शामिल नहीं होने की इच्छा जतायी। बाद में लैटिन अमेरिका के कई देश इस समूह में शामिल हुए।

लोकतंत्र

शीत युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने अपनी नीति में बदलाव किया और यह घोषित किया कि अंतरराष्ट्रीय शांति, मानवाधिकारों और सतत विकास के लिए लोकतंत्र अनिवार्य है। लोकतंत्र के लक्ष्य को वर्ष 1996 में महासभा में महासचिव बुतरस घाली द्वारा प्रस्तुत ‘लोकतंत्रवाद संबंधी कार्यसूची’ में संयुक्त राष्ट्र में रखा गया था। उन्होंने घोषणा की कि लोकतंत्र के कारण अधिक खुला, अधिक भागीदारी पूर्ण और कम अधिकारवादी समाज का निर्माण होता है और कि यह विचार संपूर्ण विश्व में प्रबल हो रहा था और बहुत सारे देश इसकी प्राप्ति हेतु सहायता प्राप्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की शरण में जा रहे थे। उन्होंने नोट किया कि अब संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति व्यवस्था बनाने वाले अधिदेश में लोकतंत्र की पुनर्बहाली और मानवाधिकारों की रक्षा को शामिल किया जाए।

निशस्त्रीकरण

निशस्त्रीकरण के मुद्दे पर भी यही स्थिति थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में निशस्त्रीकरण को इस संगठन के एक लक्ष्य में रूप में उल्लेख किया गया किंतु शीत युद्ध काल में पांच स्थायी देशों में हथियारों की होड़ शुरू हो गयी। परमाणु हथियार के आविष्कार ने इस होड़ को विश्व के लिए और खतरनाक बना दिया तथा भारत उन कुछ देशों में से था जिन्होंने इसके विरूद्ध आवाज उठायी। इस मुद्दे पर गांधी के अहिंसा वादी दर्शन का प्रभाव भी गहरा है। भारत ने परमाणु क्लब में शामिल होने से मना कर दिया जबकि चीन 1964 में ही परमाणु हथियार से लैस हो गया था। पांचों स्थायी सदस्यों ने परमाणु निशस्त्रीकरण की बढ़ती मांग के लिए सांकेतिक रियायत दिया और अंततोगत्वा 1968 में धोखेबाजी और भेदभाव कारी परमाणु अप्रसार संधि के साथ अपने आधिपत्य को सुनिश्चित किया।

भारत परमाणु शस्त्रों के विरूद्ध अभियान में अग्रणी रहा है। यह पहला ऐसा देश है जिसने 1954 में परमाणु परीक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया था। उसके बाद आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि के संबंध में और अधिक उदार लक्ष्य लेकर आया। वर्ष 1978 में इसने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल अथवा इस्तेमाल की धमकी पर प्रतिबंध का प्रस्ताव किया। वर्ष 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वर्ष 2010 तक विश्व को परमाणु हथियार मुक्त करने की एक महात्वाकांक्षी योजना दी। इसके बावजूद कि भारत 1998 में भारत परमाणु संपन्न देश बन गया, इसने वैश्विक परमाणु निशस्त्रीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जीवित रखे हुए है।

शांति बनाए रखना

शांति बनाए रखने के कार्य को अब सुरक्षा परिषद् का नियमित कार्य माना जाता है। किंतु इसका उल्लेख चार्टर में नहीं है। इसमें सुधार किया गया ताकि संयुक्त राष्ट्र संघ अपने पांच स्थायी सदस्य राष्ट्रों की अकर्मण्यता के बावजूद सहायता चाहने वाले देशों को सहायता प्रदान करने में समर्थ हो सके। ऐसा करते हुए परिषद् ने शांति की निगरानी की सीमित भूमिका को स्वीकार कर सके जिस शांति को अन्य प्रक्रियाओं के माध्यम से समझौता किया गया था। अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के अविभावक के रूप में सुरक्षा परिषद् के लिए शांति स्थापित करना मुख्य कार्य है किंतु यह उसका सृजन नहीं था। संयुक्त राष्ट्र सैनिक के लिए सुरक्षा परिषद् हेतु सैनिक प्रदान करने में पांच स्थायी देशों की असफलता के कारण संयुक्त राष्ट्र महासचिव डांग हैमरशोल्ड को महासभा के माध्यम से प्रथम प्रमुख शांति बहाली बल को गठित करने के लिए बाध्य किया। इसकी वैधता पर फ्रांस और सोवियत संघ ने प्रश्न खड़ा किया और वे इसके लिए धन देने से मना कर दिया।

शांति स्थापित करने वाले बलों को सामान्यता एशिया और अफ्रीका के देशों से लिया जाता है। चीन को छोड़कर चार स्थायी देश केवल आंशिक अंशदान करते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए हैमरशॉल्ड द्वारा नामोद्दिष्ट किया गया था कि ये उन देशों लिए स्वीकार्य होगा जहां इन शांति सैनिकों को तैनात किया जा रहा था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1948 के बाद से 71 शांति स्थापना मिशन का आयोजन कर चुका है। भारत शांति स्थापना मिशन के लिए सैनिक भेजने में सदा अग्रणी रहा है।

वीटो अधिकार

वीटो के अधिकार को दस वर्षों की अवधि के लिए सीमित करने के लिए सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में भारत के प्रयास के बारे में व्यापक रूप से नहीं जाना जाता है। इस वीटो के अधिकार के लिए चुनौती की अगुवाई आस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री हर्बर्ट वेरेइवैट और छोटे देशों – मैक्सिको, बेल्जियम, अल सल्वाडोर, चिली, कोलंबिया, पेरू और न्यूजीलैंड के एक छोटे से समूह ने की थी। उन्होंने इस चार्टर में उल्लिखित संप्रभु समानता के सिद्धांत की अनुकूलता पर प्रश्न किया और इसके इस्तेमाल को विनियमित करते हुए संशोधनों का प्रस्ताव दिया।

उस समय तक भारत ब्रिटिश उपनिवेश ही था और उसने वीटो के अधिकार को चुनौती नहीं दी। किंतु इसके प्रतिनिधि सर आर. एम. मुदालियर ने यह प्रस्ताव दिया कि यह वीटो का अधिकार केवल प्रथम दस वर्षों तक ही प्रयोज्य हो और उसके बाद समीक्षा सम्मेलन में इसकी समीक्षा की जाए जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत होना था। तथापि, इस वाद-विवाद का इस बैठक के परिणाम पर कोई खास असर नहीं पड़ा। भारतीय मंशा को निरस्त कर दिया गया। समीक्षा सम्मेलन कभी आयोजित नहीं किया गया।

आज संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व के लिए अपरिहार्य है। इसका मुख्य योगदान मानव कल्याण और विकास के क्षेत्रों में है जिसके लिए भारत जैसे देशों ने अपना ध्यान दिया केन्द्रित किया और इसी क्षेत्र में इसने अपनी प्रतिष्ठा बनायी है। जहां तक इसके प्राथमिक क्षेत्रों, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, में रिकार्ड का संबंध है, जितना कहा जाए उतना बेहतर है।

यह भी देखें