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अंतरराष्ट्री य संबंध और भारत की विदेश नीति

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्तभ) आर विश्व नाथन
    Venue: सिक्किम विश्वेविद्यालय
    Date: अप्रैल 29, 2019

29 जुलाई, 2019 को सिक्किम विश्‍वविद्यालय, गंगटोक में राजदूत (सेवानिवृत्‍त) आर. विश्‍वनाथन द्वारा उत्‍कृष्‍ट व्‍याख्‍यान का सार।

जब मैंने 1977 में आईएफएस को ज्‍वाइन किया, तो भारत को अंतरराष्‍ट्रीय संबंध में कोई महत्‍वपूर्ण देश नहीं माना जाता था। तथापि, जब मैं 2000 में राजदूत बना, तो काफी बदलाव आ चुका था। ईक्‍कीसवीं सदी के भारत को एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा गया। भारत में तेजी से बढ़ता हुआ बड़ा बाजार और भारतीयों के नई मनोवृत्ति ने वैश्विक अवधारणा को बदल दिया था। जब सिक्किम विश्‍वविद्यालय के श्रोताओं के कुछ सदस्‍यों का चुनाव आईएफएस के लिए होगा और वे 2040 तक राजदूत बनेंगे तो भारत एक वैश्विक ताकत बन जाएगा। इस आशा का कारण नया विश्‍वास, कर-सकते-हैं विश्‍वास, तकनीकी से लैस स्‍मार्टनेस और लाखों भारतीयों का लक्ष्‍य। जापान और जर्मनी जैसे देशों के भविष्‍य में उनकी जनसंख्‍या में कमी, कुशल युवाओं की कमी और बढ़ते वरिष्‍ठ नागरिकों की संख्‍या के कारण महत्‍व घटने की संभावना है। दूसरी ओर, भारत जनसांख्यिकी संबंधी लाभ का फायदा उठाएगा जो भारत के वैश्विक महत्‍व को और सुदृढ़ करेगा। गुगल और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ के रूप में सुंदर पिचाई और सत्‍या नडेला का उभरना भारत की नयी युवा शक्ति का द्योतक बन गया है।

अंतरराष्‍ट्रीय संबंध संस्‍कृति, धर्म, विचारधारा, संसाधनों, वित्‍त अैर बाधा रहित शक्ति जैसे कई कारकों द्वारा बनता और आकार लेता है। किंतु मूलभूत वाहक डार्विन का सिद्धांत है: योग्‍यतम की उत्‍तरजीविता, प्रबलतम का आधिपत्‍य, कुशल की सफलता और सबसे कमजोर की हानि।

अंतरराष्‍ट्रीय संबंध (आईआर) यह है कि कैसे कई देश और देशों के समूह एक दूसरे के साथ द्विपक्षीय रूप से और बहुपक्षीय रूप से जुड़े हुए हैं। आईआर मजबूत और कमजोर देश; विजेता और हारने वाले देशों के बीच समीकरण और साम्‍यता को परिलक्षित करता है। मजबूत, शक्तिशाली और विजेता देश अंतरराष्‍ट्रीय कानून लिखते हैं और इन्‍हें अंतरराष्‍ट्रीय संगठन में अपने आधिपत्‍य को स्‍थापित करते हैं जैसा कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ, आईएमएफ और विश्‍व बैंक के मामले में देखा जा सकता है।

एक दो ध्रुवीय विश्‍व में जहां भी परस्‍पर निश्चित बर्बादी की संभावना हो तो वहां शक्तियां आपस में सीधे नहीं टकराती हैं। वे छद्म युद्ध करते हैं, सहअस्तित्‍व की कोशिश करते हैं और देशों को विभाजित करते हैं। पुर्तगाली और स्‍पेन के साम्राज्‍यों ने विश्‍व को 1494 में टोर्डासिलस की संधि के तहत स्‍वयं के लिए विभाजित किया और इसकी मध्‍यस्‍थता पोप ने की।‍ ब्रिटिश और फांसिसी ने अफ्रीका को अपने हित वाले क्षेत्रों में बांट दिया। अमेरिका और सोवियत संघ ने यूरोप को नाटो की अगुवाई वाले लोकतांत्रिक पश्चिमी यूरोप और वार्साय संधि की अगुवाई वाले कम्‍युनिस्‍ट पूर्वी यूरोप में बांटा।

कमजोर देश एक समूह में हो जाते हैं यथा नाम और जी-77 ताकि अपने हितों की रक्षा कर सकें और उन्‍हें आगे बढ़ा सकें। वे संकल्‍पों को पारित करने तथा अपने मुद्दों को रखने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा और अन्‍य ऐसे लोकतांत्रिक मंचों का इस्‍तेमाल करते हैं।

कभी – कभी कोई मजबूत देश हत्‍या के बाद भी निकल जाता है जैसा कि जमाल खशोगी के मामले अथवा यमन में युद्ध में देखा गया है। मजबूत देश अन्‍य देशों के भूभाग पर कब्‍जा कर लेते हैं। उदाहरण के लिए, इजराइल का फिलिस्‍तीनी क्षेत्रों पर कब्‍जा; क्‍यूबा में अमेरिका का गुआंतानामो बेस; और स्‍पेन में जिब्राल्‍टर पर ब्रिटिश नियंत्रण। मजबूत देश कमजोर देश को एनपीटी जैसे संस्‍थागत रूपरेखा द्वारा मजबूत बनने से रोकते हैं। मजबूत देश आईसीजे के निर्णयों का पालन नहीं करते हैं और अंतरराष्‍ट्रीय आपराधिक न्‍यायालय को मान्‍यता नहीं देते हैं जिनका उपयोग केवल कमजोर देशों से निपटने के लिए किया जाता है। मजबूत देश एकपक्षीय प्रतिबंध लगाते हैं (क्‍यूबा और ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध) और अन्‍य देशों को इनका अनुसरण करने के लिए बाध्‍य करते हैं।

इसलिए, ऐसा प्रतीत होता हो कि इस कहानी का सार यह है कि आईआर अनुचित और अन्‍यायपूर्ण है। किंतु यह आईआर का केवल काला पक्ष है। आशा को प्रेरित करने के लिए इसके उज्‍ज्‍वल और सकारात्‍मक पक्ष भी हैं।

कभी-कभी छोटे देश बड़े देशों का हरा सकते हैं। वियतनाम ने फ्रांस, अमेरिका और चीन को सैन्‍य और राजनीतिक रूप से हराया है। अफगानिस्‍तान ने कब्‍जा करने वाली शक्ति नामत: ब्रिटेन, सोवियत संघ और अब अमेरिका को भगा दिया है। क्‍यूबा और निकारागुआ अमेरिका के अपघर्षण के प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष युद्ध से बचा रहा है। छोटे देश बड़ी शक्तियों से एक दूसरे के खिलाफ का खेल खेलते हैं और उनमें से बाहर निकल जाने की कोशिश करते हैं जैसे कि नेपाल, श्रीलंका और मालदीव में भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा देने के रूप में देखा गया है। कुछ छोटे देश जैसे कि सिंगापुर और कतर अपने हिसाब से अधिक महत्‍व रखते हैं और आईआर में वे गैर अनुपातिक रूप से उच्च प्रभाव रखते हैं। एक छोटा देश कोस्टा रिका, ने 1948 में अपनी सशस्त्र बलों को समाप्त करके एक प्रेरणादायक उदाहरण स्थापित किया है, जिसमें हथियारों और गोला-बारूद के बजाय शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर दुर्लभ संसाधनों को खर्च करने की घोषणा की। यह मध्‍य अमेरिका में शांतिपूर्ण लोकतंत्र का रोल मॉडल बना हुआ है जबकि उसके पड़ोसी देशों ने विनाशकारी गृह युद्धों और सैन्य तानाशाही को झेला है। आईआर में शांति की संस्कृति को प्रभावित करने के लिए कोस्‍टा रिका में एक यूनिवर्सिटी आफ पीस है।

अपनी खामियों के बावजूद संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ कई मामलों में युद्धों को सफलतापूर्वक रोकने और निवारण के लिए मजबूत और कमजोर देशों हेतु बैठक और बातचीत का मंच बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र शांति अभियान मिशनों ने संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान को सुविधाजनक बनाते हुए गुटों और युद्धरत देशों को दूर रखा है। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के संगठन यथा यूएनडीपी, यूनिसेफ, यूएनएचसीआर और युनेस्‍को ने अपने संचालन क्षेत्रों में सराहनीय काम किया है।

यूरोपीय संघ ने वस्‍तुओं, सेवाओं और शेंगेन वीजा, साझा मुद्रा और पासपोर्ट धारी लोगों की मुक्त आवाजाही के लिए सीमा नियंत्रण हटाकर दुनिया के लिए एक मिसाल कायम की है। हलांकि यह संपूर्ण नहीं है, तो भी यह एक सभ्यतागत विकास है और इसने अन्य क्षेत्रीय एकीकरण समूहों जैसे मर्कोसर और आसियान को प्रेरित किया है।

इन शक्तियों की जीवनावधि होती है। उनका उत्‍थान और पतन होता है जैसा कि यूनानी, रोमन, मंगोलियाई, स्पेनिश, पुर्तगाली, हैप्सबर्ग, ब्रिटिश और फ्रांसीसी साम्राज्यों के मामले में देखा गया है। कमजोर को मजबूत बनने का मौका मिलता है। चीनी, जो उन्नीसवीं शताब्दी में लैटिन अमेरिका में कुली के रूप में काम करने गए थे, अब 150 बिलियन डॉलर के सबसे बड़े ऋणदाता और 120 बिलियन डॉलर के निवेश के साथ इस क्षेत्र के संरक्षक और भागीदार बन गए हैं।

आईआर में संस्कृति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उत्तर और दक्षिण अमेरिका की विभिन्न संस्कृतियां बताती हैं कि उत्तर समृद्ध और उन्नत क्यों है जबकि लातीनी संस्कृति ने मोनरो सिद्धांत के समय से इस क्षेत्र को गरीब और अमेरिका के पिछवाड़े के रूप में रखा है। पूर्व गौरव के साथ जुनून की संस्कृति ब्रेक्सिट और यूके के अलगाव और कमजोर होने का कारण है। भारत और चीन भविष्योन्‍मुखी संस्कृतियाँ हैं जो समृद्धि और उन्नति की ओर अग्रसर हैं।

सभी धर्म लोगों के बीच शांति, सद्भाव और दया का उपदेश देते हैं लेकिन कट्टरता और शक्तियाँ समाजों को विभाजित करने और विवाद और युद्ध का माहौल बनाने के लिए धर्म का दुरुपयोग करती हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के कब्‍जे के विरूद्ध लड़ने के लिए तालिबान को बनाया। अमेरिका ने सद्दाम हुसैन और गद्दाफी जैसे धार्मिक नरमपंथियों को बर्बाद कर दिया और इन देशों को सांप्रदायिक चरमपंथियों से विभाजित कर दिया। अमेरिका ने असद सरकार के खिलाफ सीरिया में धार्मिक चरमपंथियों का इस्तेमाल और समर्थन किया है। ये अब फ्रेंकस्टीन राक्षस बन गए हैं जिससे दुनिया को खतरा है।

पिछली शताब्दी में साम्‍यवाद का आईआर पर बड़ा प्रभाव था। इसने बुद्धिजीवियों, युवाओं और कामगारों को शुद्ध मार्क्सवादी आदर्शों के माध्यम से स्वप्नलोक का सपना दिखाने के लिए प्रेरित किया। सोवियत संघ, चीन और क्यूबा साम्यवादी शक्तियाँ बन गए। इससे अमेरिका से शीत युद्ध के साम्‍यवाद विरोधी प्रतिक्रिया को जन्‍म दिया। सोवियत संघ का पतन साम्‍यवाद में विश्‍वास करने वाले के लिए एक घातक झटका था। लेकिन चीन ने "चीनी विशेषता वाले साम्‍यवाद" का एक नया मॉडल खोजने में कामयाब रहा है। क्यूबा और वियतनाम अपने तरीके से चीनी मॉडल की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं। ब्राजील के लूला जैसे उदारवादी वामपंथियों ने इस सदी के पहले दशक में लैटिन अमेरिका में गरीब हितैषी और कारोबार अनुकूल नीतियों के एक संतुलित और व्यावहारिक मिश्रण के साथ इस सदी के प्रथम दशक में पिंक टाइड का सृजन किया।

पूर्व में बारूद, महासागर दिक्‍चालन, भाप इंजन, विमान और परमाणु हथियारों जैसी प्रौद्योगिकियों ने आईआर को प्रभावित किया था। सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, सोशल मीडिया और साइबर युद्ध नवीनतम प्रौद्योगिकी हैं जिनका इस्‍तेमाल आईआर में वर्चस्व और व्यवधान उत्‍पन्‍न करने के लिए किया जाता है।

विकसित देशों ने अन्य देशों को अपना बाजार खोलने के लिए वैश्वीकरण के एजेंडे का उपयोग किया था। लेकिन अब वे संरक्षणवादी बन गए हैं और मुक्त व्यापार और लोगों के आंदोलन के खिलाफ एक अलग एजेंडा चला रहे हैं। द वॉल स्ट्रीट, वॉशिंगटन डीसी और फंड / बैंक पूंजी परिचालन को सीधे नियंत्रित करते हैं जिससे दुनिया में कभी-कभी दिवालियापन और बुलबुला फूटने की घटनाएं होती हैं। शेल क्रांति के कारण अमेरिका दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है। इस ऊर्जा सुरक्षा विश्वास के साथ अमेरिका ने मध्य पूर्व को अस्थिर करने के लिए स्वतंत्र महसूस किया है जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए अनिश्चितता और चुनौतियां पैदा हुई हैं।

अर्जेंटीना ने 2002 में स्‍वयं को 90 बिलियन डॉलर के ऋण के साथ दुनिया का सबसे बड़ा ऋण चूककर्ता घोषित किया था। ऋण के संचय का कारण अधिशेष पेट्रोडोलर थे जो अमेरिकी बैंकों में जमा किए गए थे जिसने इन पैसों को अर्जेंटीना में उच्च उत्‍पादन के लिए दिया था। चूंकि उत्पादक उद्देश्यों के लिए बहुत अधिक ऋण का उपयोग नहीं किया गया था, इसलिए वह देश पुनर्भुगतान नहीं कर पाया और उसे चूककर्ता घोषित करना पड़ा। हालाँकि, राष्ट्रपति नेस्टर किरचनर ने लेनदारों को एक डॉलर में 30 सेंट प्राप्त करने के लिए सहमत होने का एक चेतावनी देकर ऋण का पुनर्गठन करने में कामयाब रहे। उन्होंने आईएमएफ की सलाह के खिलाफ जाकर इसका पुनर्गठन किया। सात प्रतिशत से कम क्रेडिट वाले वल्‍चर निधि ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और सभी प्रकार के क्रूर दबावों के माध्यम से अर्जेंटीना सरकार को परेशान किया। उन्होंने अर्जेंटीना के नौसैनिकों के जहाज को जब्त कर लिया और अर्जेंटीना के राष्ट्रपति के विमान को भी ऐसा करने की धमकी दी। इस धमकी के कारण अर्जेंटीना के राष्ट्रपति को अमेरिका और यूरोप की यात्राओं के लिए चार्टर विमान से यात्रा करनी पड़ी। वॉल स्ट्रीट माफिया ने अर्जेंटीना को पश्चिमी वित्तीय बाजारों से अलग – थलग कर दिया और यह सुनिश्चित किया कि देश को पश्चिमी वित्तीय स्रोतों से प्रतिबंधित कर दिया जाए। इसलिए अर्जेंटीना को ऋण के लिए चीन जाना पड़ा। कई अन्य लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देशों में पश्चिमी वित्‍तीय प्रदाताओं और बैंकों द्वारा इस तरह के अपमान किए गए।

चीन पश्चिमी बैंकों को निष्प्रभावी बनाते हुए नयी वैश्विक वित्तीय शक्ति बन गयी है। इसने लैटिन अमेरिकी देशों को 150 बिलियन डॉलर से अधिक और अफ्रीकी देशों को लगभ 140 बिलियन डॉलर का ऋण दिया है। इसने दुनिया भर में कंपनियों, आस्तियों, खदानों और तेल क्षेत्रों के अधिग्रहण में आक्रमक तरीके से निवेश भी किया है।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से अमेरिका द्वारा एकपक्षीय घोषणा और कई युद्ध कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित किया है। प्रथम शीत युद्ध था जिसमें अमेरिका ने विश्व भर में साम्यवाद के खिलाफ संघर्ष किया। साम्यवाद विरोधी संघर्ष के नाम पर अमेरिका ने कई देशों के लोकतंत्र को अस्थिर करते हुए तथा तानाशाही को समर्थन देते हुए हस्तक्षेप किया था। अमेरिका की इस विचारधारा वाली लड़ाई में सबसे अधिक नुकसान लैटिन अमेरिकी देशों को हुआ।

अमेरिका ने ईराक और लीबिया जैसे कुछ देशों में सत्ता परिवर्तन के लिए युद्ध किया और जिसका परिणाम बड़ा भयानक रहा। अब अमेरिका वेनेजुएला, निकारागुआ और क्युबा में सत्ता परिवर्तन करने का प्रयास कर रहा है। अमेरिका नशीले पदार्थ के खिलाफ लड़ाई के नाम पर लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप करता रहा है। किंतु सच्चाई यह है कि नशीले पदार्थों का कारोबार पूरी तरह से उपभोक्ता चालित है। लाख अमेरिकी नागरिक नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं और अपने आनंद के लिए डॉलर खर्च कर रहे हैं। इन उपभोक्ताओं द्वारा चुकाए गए 100 डॉलरों मे से 80 प्रतिशत अमेरिका में ही रह जाता है और केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही बाहरी तस्करों और उत्पादकों तक पहुंचता है। यदि अमेरिका अपने नागरिकों को नशीले पदार्थों को लेने से रोक दे/ कम कर दे तो बाहर से तस्करी बंद हो जाएगी। कोलंबिया या बोलिबिया के खेतों में विनाशक रसायनों का छिड़काव नशीले पदार्थों के विरूद्ध लड़ाई का गलत तरीका है। इस युद्ध को अमेरिका में ही लड़ा जाना है। एक समाधान यह है कि इसके सेवन को कानूनी रूप दे दिया जाए जैसा कि उरूग्वे और अमेरिका के ही कुछ राज्यों ने किया है।

आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई ने अमेरिका के लिए अन्य देशों में हस्तक्षेप करने का एक नया अवसर प्रदान किया है। किंतु सच्चाई यह है कि स्वयं अमेरिका अफगानिस्तान में तालिबान जैसे दानवों को तैयार करने और सीरिया में कई चरमपंथी समूहों को सहायता देने के लिए उत्तरदायी है।

विगत सदी में भारत की विदेश नीति असुरक्षा और स्वतंत्रता के पश्चात देश के समक्ष कई चुनौतियों को देखते हुए अधिक रक्षात्मक थी। यहां पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन, विदेश मुद्रा, प्रौद्योगिकी और उद्योग धंधों की समस्या थी। भारत की कमजोर सैन्य ताकत की वजह से चीन और पाकिस्तान ने शांतिप्रिय भारत के खिलाफ युद्ध किया।

किंतु ईक्कीसवीं सदी में इसमें भारी बदलाव हुआ है। भारत राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से एक मजबूत देश बन गया है। तेजी से बढ़ता भारत के बड़े बाजार ने अन्य देशों को व्यापार और निवेश के लिए आकर्षित किया है। विश्व ने भारत को एक उभरती हुई ताकत के रूप में माना और सम्मान दिया है। विश्वास से भरा और महात्वाकांक्षी भारत लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और विश्व के अन्य भागों में स्थित देशों तक पहुंच बना रहा है जिस पर इसने पूर्व में कोई ध्यान नहीं दिया था।

भारत अब तथ्यात्मक रूप से देशों और देश समूहों के साथ मिलकर वैश्विक मुद्दों पर स्वतंत्र रूख अपनाने के लिए स्मार्ट कूटनीतिक रास्ता अपना रहा है। भारत चीनी प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता और खतरे के प्रति सचेत होकर चीन के साथ अनुबंध, सहयोग और साथ कार्य कर रहा है।

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