लोक राजनय लोक राजनय

9वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर विदेश राज्य मंत्री श्रीमती प्रनीत कौर का सम्बोधन

सितम्बर 22, 2012

  • दक्षिण अफ्रीका के वित्त मंत्री श्री प्रवीन गोर्धन, मारीशस के शिक्षा एवं कला मंत्री माननीय श्री मुकेश्वर चुनी, दक्षिण अफ्रीका के उप विदेश मंत्री, इस मंच पर उपस्थित आदरणीया इला गांधी जी, इस सभागार में उपस्थित दक्षिण अफ्रीका के हिन्दी प्रेमी, देश-विदेश से आए हिन्दी के विद्वान और हिन्दी सेवी तथा मित्रो।
  • आज का दिन हमारे लिए एक ऐतिहासिक दिन है जब हम अपने मित्र देश दक्षिण अफ्रीका में 9वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने के लिए यहाँ आए हैं।
  • मित्रो, जब कभी भी कोई सम्मेलन आयोजित किया जाता है, उसका एक उद्देश्य होता है, कोई वजह होती है और जब सम्मेलन का सिलसिला निरन्तर चलता रहता है तो वह उस सम्मेलन की सफलता का सूचक होता है।
  • विश्व हिन्दी सम्मेलन की शुरुआत जब 1975 में हुई तो उसकी एक बड़ी वजह थी। यह पाया गया कि भारत जैसे विशाल देश में हिन्दी भाषा देश के कोने-कोने में समझी और बोली जाती है और इसके साथ ही बहुत से दूसरे देशों में भी हिन्दी पढ़ाई जाती है और वहां के लोग हिन्दी सीखने में रुचि दिखा रहे हैं।
  • इसलिए इस बात का जायज़ा लेने के लिए कि हिन्दी भाषा का अपने देश और विदेश में क्या दर्जा है, इसके विकास के लिए क्या-क्या करने की जरूरत है अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श करने का इरादा किया गया और पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में भारत में महाराष्ट्र राज्य के शहर नागपुर में आयोजित किया गया। इस तरह शुरु हुई विश्व हिन्दी सम्मेलनों की यात्रा । यह शुरुआत की महाराष्ट्र राज्य के ही शहर वर्धा में हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी द्वारा गठित एक संस्था राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने। तब से यह यात्रा लगातार जारी है।
  • हमने 9वां विश्व हिन्दी सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में आयोजित करने का इरादा किया, इस बात की मुझे बहुत खुशी है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा जिसने विश्व हिन्दी सम्मेलन का बीज बोया और दक्षिण अफ्रीका दोनो ही महात्मा गांधी के जीवन से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही गांधी जी खुद गुजराती-भाषी होते हुए भी हिन्दी भाषा के बड़े हिमायती थे। इस तरह विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए दक्षिण अफ्रीका आना हमारे लिए किसी पिलग्रीमेज से कम नहीं है।
  • यहाँ मैं अपने प्रिय मित्र देश मॉरीशस का जिक्र किए बगैर नहीं रह सकती। लगभग 40 वर्ष की हमारी इस यात्रा में मॉरीशस ने केवल शुरु से हमारे साथ रहा बल्कि मैं कहूंगी कि वह कदम-से-कदम मिला कर हमारे साथ चला।
  • पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन में मॉरीशस के प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम, मॉरीशस से एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल लेकर आए और उन्होंने हमारी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ उस सम्मेलन में अहम भूमिका निभाई। सर शिवसागर रामगुलाम के प्रस्ताव पर उसके अगले ही वर्ष 1976 में दूसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरीशस में आयोजित किया गया और उसके बाद 1993 में चौथा सम्मेलन भी मारीशस में किया गया।
  • इतना ही नहीं, पहले ही सम्मेलन में सर रामगुलाम ने मॉरीशस की भूमि पर विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित करने की बात कही। मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि भारत और मॉरीशस की सरकारों की मिली-जुली और लगातार की गई कोशिशों से यह सचिवालय मॉरीशस में स्थापित किया जा चुका है और इसने काम करना शुरु कर दिया है। अगले दो दिनों में आपको इसके बारे में और जानकारी मिलेगी। यह सब हिन्दी भाषा के लिए मॉरीशस की सरकार और मारीशस के हमारे भाई बहनों का प्रेम ज़ाहिर करता है। मैं अपने बीच उपस्थित मॉरीशस के कला एवं संस्कृति मंत्री माननीय श्री मुकेश्वर चुनी जी के ज़रिए मॉरीशस की सरकार और जनता का दिल से धन्यवाद करना चाहूंगी।
  • अनेक भाषाओं वाले हमारे देश में हिन्दी को एक संपर्क भाषा के रूप में तो अपनाया ही गया है इसके साथ ही में यह देख कर बहुत खुशी होती है कि अन्य अनेक देशों में, सैकड़ों विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है और हिन्दी सीखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब तक आयोजित सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में बड़ी संख्या में विदेशी विद्वानों ने शिरकत की और विदेशों में हिन्दी के बारे में बताया और हमारा ज्ञान बढ़ाया।

    पहले सम्मेलन में ही जर्मनी से डा. लोथार लुत्ज़, उस समय के सोवियत संघ से डा. चेलिशेव, चैकोस्लाविया से डा. ऑदोनेल स्मेकल, फीजी से श्री विवेकानंद शर्मा, यू. के. से डा. आर. एस. मैकग्रेकर, पोलेंड से प्रो. मारिया ब्रिस्की के साथ-साथ मॉरीशस के अनेक विद्वानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इसके अलावा श्रीलंका, गयाना, त्रिनिडाड एवं टोबेगो तथा फ्रांस आदि अनेक देशों से विद्वान आए और सम्मेलन की शोभा बढ़ाई। तब से लेकर 8वें विश्व हिन्दी सम्मेलन तक विदेशी विद्वानों की भागीदारी ने विदेशों में हिन्दी के बारे में हमें जानकारी देने के अलावा यह भी दिखाया कि कैसे हिन्दी एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गई है।

    भारत की एक बड़ी जनसंख्या की भाषा होने के साथ-साथ जिस तरह से विदेश में भी हिन्दी भाषा का विकास हो रहा है और जिस तरह से यह अपनाई जा रही है तो इसका संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनने का दावा बनता ही है।
  • दक्षिण अफ्रीका में भी भारतीय मूल के लोगों ने, जिनके दादा, परदादा लगभग डेढ़ सौ साल पहले यहाँ आए, अपनी भाषा को बनाए रखा। पं. नरदेव वेदालंकार जी ने हिन्दी शिक्षा संघ की नींव रख कर इस काम को बढ़ावा दिया।
  • इस सम्मेलन में हमेशा की तरह अलग-अलग विषयों पर चर्चाएं होंगी। शैक्षिक सत्रों के विषय और स्वरूप के बारे में आपको जानकारी मिल ही गई है। जैसा कि शैक्षिक सत्रों में आप देखेंगे कि हिन्दी भाषा के लगभग सभी पहलुओं को शामिल करने की कोशिश की गई है। सभी विषय काफी प्रासंगिक हैं जैसेकि हिन्दी का सूचना प्रोद्योगिकी में इस्तेमाल, मीडिया की भाषा के रूप में हिन्दी, फिल्मों, थियटर आदि की भूमिका। इन विषयों पर देश विदेश से आए हिन्दी विद्वानों, लेखकों आदि के विचार जानने का मौका मिलेगा और मैं उम्मीद करती हूं कि इन चर्चाओं से कुछ अहम बिन्दु उभर कर आएंगे जिनके आधार पर हम मिलकर हिन्दी के काम को और आगे ले जाने का संकल्प ले सकेंगे।

सम्मेलन की सफलता के लिए मैं अपनी शुभ कामनाएं देती हूं।

धन्यवाद।



Page Feedback

टिप्पणियाँ

टिप्पणी पोस्ट करें

  • नाम *
    ई - मेल *
  • आपकी टिप्पणी लिखें *
  • सत्यापन कोड * Verification Code
केन्द्र बिन्दु में
यह भी देखें