लोक राजनय लोक राजनय

ब्राउन विश्‍वविद्यालय द्वारा ‘‘भारत पहल’’ की शुरूआत के अवसर पर विदेश मंत्री द्वारा ‘‘21वीं शताब्‍दी के लिए भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताएं’’ विषय पर भाषण

सितम्बर 28, 2012

प्रतिष्ठित प्रोवोस्‍ट मार्क शिल्‍सेल
राजदूत निरूपमा राव
प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्‍णेय

प्रिय छात्रो,

अमेरिका के सबसे पुराने एवं सबसे सम्‍मानित विश्‍वविद्यालयों में से एक में यहां आना मेरे लिए सम्‍मान की बात है। जहां तक मैं समझता हूँ, ब्राउन विश्‍वविद्यालय शीघ्र ही अपनी स्‍थापना की 250वीं वर्षगांठ मनाएगा।

इतने विख्‍यात विश्‍वविद्यालय का दौरा करने का मुझे अवसर प्रदान करने के लिए मैं प्रेजीडेंट पैक्‍सन तथा प्रोवोस्‍ट शिल्‍सेल एवं प्रोफोसर आशुतोष वार्ष्‍णेय का धन्‍यवाद करता हूँ।

अध्‍ययन एवं अनुसंधान की संस्‍थाओं में रखी गई नींव पर राष्‍ट्र प्रगति करता है तथा समाज समृद्ध होते हैं। इस देश के महान विश्‍वविद्यालयों से न केवल संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के छात्र लाभांवित हुए हैं बल्कि पूरे विश्‍व के छात्र एवं विद्वान यहां आए हैं जिसमें आज भारत से 10,000 से अधिक छात्र शामिल हैं।

पिछले दशकों में, भारत एवं अमरीका के बीच संबंधों में उतार - चढ़ाव के माध्‍यम से उच्‍च शिक्षा, विज्ञान एवं अनुसंधान में हमारी भागीदारी हमारे दोनों देशों के बीच एक मजबूत सेतु थी। इसने उस घनिष्‍ठ संबंध के निर्माण में अमापेय ढंग से योगदान दिया है जो आज हमारे दोनों देशों के बीच है।

दोस्‍तो,

भारत - अमरीका उच्‍च शिक्षा वार्ता आज भारत - अमरीका रणनीतिक वार्ता का मुख्‍य स्‍तंभ है। इस वार्ता के माध्‍यम से हमारी शैक्षिक संस्‍थाओं, विद्वानों एवं छात्रों के बीच घनिष्‍ठ साझेदारी निर्मित हो रही है। हमारे दोनों देशों की सरकारें अपने संबंध में युवाओं पर बहुत बल देती हैं, जो न केवल आसानी से भविष्‍य को गले लगाएंगे अपितु उसके निर्माण के लिए भी वे जिम्‍मेदार होंगे।

मैं ‘भारत पहल’ शुरू करने पर ब्राउन विश्‍वविद्यालय को बधाई देना चाहता हूँ। मुझे उम्‍मीद है कि यह भारत की विरासत एवं इसकी प्रगति, इसकी उपलब्धि एवं इसकी चुनौतियों, विश्‍व के साथ इसकी संलिप्‍तता तथा भारत एवं अमरीका के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी पर बल देगा। मैं उम्‍मीद करता हूँ कि भारत पहल इस शताब्दि में ब्राउन विश्‍वविद्यालय की कहानी का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा बन जाएगी।

दोस्‍तो,

अब मैं 21वीं शताब्दि में भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं के बारे में अपने विचारों को साझा करना चाहता हूँ।

यह कहना कठिन है कि यह शताब्दि कौन सा रूप लेगी, किंतु हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब हमारी एक दूसरे पर निर्भरता तथा नेटवर्क साथ-साथ मौजूद हैं। चूंकि हमारे विश्‍व का भूमंडलीकरण हो रहा है इसलिए हमारे समाज एवं समुदाय अधिक विविध हो रहे हैं। आज हमारे पास समृद्धि का विस्‍तार करने की अभूतपूर्व संभावनाएं हैं किंतु हम साझी अरक्षिताओं द्वारा भी गहन रूप से लाचार हैं।

दोस्‍तो,

हमारी अर्थव्‍यवस्‍थाएं एवं सुरक्षा उत्‍तरोत्‍तर राष्‍ट्रीय सीमाओं के बाहर, बाहरी अंतरिक्ष, समुद्र या साइबर स्‍पेस में अपना आकार ग्रहण कर रही हैं। भूमंडलीकरण का यह युग तथा समाजों के बीच तथा उनके अंदर सत्‍ता का उत्‍तरोत्‍तर परिवर्तन राष्‍ट्रों के बीच अधिक सहयोग तथा वैश्विक भागीदारी एवं अभिशासन के नए मॉडलों की मांग करता है।

भारत एक आकर्षक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। जिस राष्‍ट्र में विश्‍व की आबादी का छठा भाग रहता है वह असाधारण पैमाने पर आर्थिक एवं सामाजिक बदलाव से गुजर रहा है। यह लोकतांत्रिक एवं संघीय रूपरेखा में, बढ़ते राजनीतिक अनेकवाद एवं सामाजिक विविधता के बीच तथा समता, अवसर एवं संपोषणीयता पर निरंतर विचार - विमर्श के संदर्भ में घटित हो रहा है।

हमारी नीतियां न केवल सकल विकास के बारे में चिंतित हैं अपितु व्‍यक्ति के कल्‍याण के बारे में भी सरोकार रखती हैं। यह एक जटिल राजनीतिक एवं आर्थिक चुनौती है। हमें उच्‍च विकास के पथ पर चलते रहने की जरूरत है तथा इसे और समावेशी बनाने की भी जरूरत है। यह अपने आस-पास की दुनिया के साथ नवाचारी, गतिशील एवं संपोषणीय भागीदारी का आह्वान करता है।

आज विश्‍व पर किसी बड़े युद्ध की छाया नहीं मंडरा रही है, फिर भी इसे समाजों, संस्‍कृतियों, धर्मों, लोगों एवं राष्‍ट्रों के बीच एवं उनके अंदर संघर्ष से खतरा है। अनेकवाद, परस्‍पर सम्‍मान एवं सहमति के मूल्‍यों को बढ़ावा देना हमारे युग की एक बड़ी चुनौती है तथा यह एक ऐसा कार्य है जो वैश्विक स्थिरता एवं सुरक्षा के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है।

प्राचीन काल से ही भारत वसुधैव कुटुम्‍बकम – पूरा विश्‍व एक परिवार है तथा सर्व धर्म समभाव – सभी धर्म समान हैं – के आदर्शों पर चलता आ रहा है। समय-समय पर असहिष्‍णुता, भेदभाव एवं हिंसा की ताकतों ने भारत को चुनौती दी है किंतु हर बार तथा जब भी सबसे कठिन परीक्षा की घड़ी आई, भारतीयों ने एक राष्‍ट्र एवं एक व्‍यक्ति के रूप में आवाज दी।

अनेकवादी लोकतंत्र के रूप में जो एशिया के सांस्‍कृतिक चौराहे पर खड़ा है, भारत विभिन्‍न क्षेत्रों के बीच और वास्‍तव में विश्‍व की महान विविधता के बीच सेतु के रूप में काम करेगा।

अंतर्राष्‍ट्रीयतावाद, बाहरी संबंधों के संचालन में निर्णय की स्‍वतंत्रता, विश्‍व व्‍यवस्‍था के लोकतंत्रीकरण के लिए सहायता तथा अंतर्राष्‍ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने में योगदान के प्रति भारत की प्रतिबद्धता हमारे राष्‍ट्रीय आंदोलन की शाश्‍वत विरासत है। भारत के सभी राजनीतिक दल इसका पूरी तरह से समर्थन करते हैं।

दोस्‍तो,

21वीं शताब्दि में भारत की विदेश नीति का आधार यही प्रमुख मूल्‍य बने रहेंगे किंतु यह निरंतर बदलती बाहरी परिस्थितियों एवं बदलती घरेलू आवश्‍यकताओं के अनुसार अनुकूलित भी होगी।

जब हम भविष्‍य की ओर देख रहे हैं, तो हम भारत की विदेश नीति के लिए कुछ और प्रमुख प्राथमिकताओं की पहचान करेंगे।

भारत की विदेश नीति की सबसे प्रमुख प्राथमिकता भारत के सभी लोगों की सामूहिक खुशहाली एवं व्‍यक्तिगत कल्‍याण के लिए अनुकूल बाहरी वातावरण का सृजन करना है। हमारे हित स्थिर विश्‍व व्‍यवस्‍था तथा शांतिपूर्ण पड़ोस पर दृढ़ता से टिके हुए हैं। हमें एक खुली एवं साम्‍यपूर्ण अंतर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार व्‍यवस्‍था, स्थिर वित्‍तीय व्‍यवस्‍था, किफायती एवं सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा की जरूरत है।

अपने विकास की चुनौतियों के असाधारण पैमाने को पूरा करने के लिए हमें प्रौद्योगिकी एवं नवाचार के क्षेत्र में द्विपक्षीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय साझेदारियों की जरूरत होगी। बदले में, अपने विनम्र ढंग से भारत की अपनी प्रगति लोकतंत्र एवं अनेकवाद के मूल्‍यों की पुष्टि करेगी, शांति एवं स्थिरता में योगदान करेगी और वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था के लिए एक स्‍तंभ प्रदान करेगी।

इसलिए हमारी विदेश नीति न केवल हमारे विकास का एक माध्‍यम होगी अपितु यह हमारी वैश्विक जिम्‍मेदारियों को पूरा करने का एक वाहन भी होगी।

दोस्‍तो,

हमारी विदेश नीति की दूसरी प्रमुख प्राथमिकता दक्षिण एशिया में शांति एवं खुशहाली के क्षेत्र का सृजन करना है। तीन दशक से अधिक समय से इस उप महाद्विप के उत्‍तर - पश्चिम भागों में काफी उथल-पुथल रही है तथा संघर्ष से न केवल भारत प्रभावित हुआ है अपितु पूरा विश्‍व प्रभावित हुआ है।

इस क्षेत्र में जड़ जमा चुके हिंसक अतिवाद के दानव को पराजित करने के लिए भारत इस क्षेत्र के अपने पड़ोसियों तथा विश्‍व की महाशक्तियों के साथ मिलकर काम करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है। भारत युद्ध से ध्‍वस्‍त अर्थव्‍यवस्‍था का पुनर्निर्माण करने के लिए अफगानिस्‍तान के लोगों के प्रयासों में सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। अफगानिस्‍तान के लिए हमारी प्रतिबद्धता पिछले साल हस्‍ताक्षरित सामरिक साझेदारी में परिलक्षित हुई है।

पाकिस्‍तान के साथ संबंधों को सामान्‍य बनाने के लिए हमारे प्रयास सामान्‍य व्‍यापार संबंध के लिए एक रोड मैप को अंतिम रूप देने तथा अधिक जन दर जन संपर्क को बढ़ावा देने के लिए वीजा व्‍यवस्‍था के उदारीकरण से भी स्‍पष्‍ट होते हैं।

हमारा विजन इस क्षेत्र की राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक आधुनिकीकरण एवं क्षेत्रीय अखंडता का पक्षधर है। इससे भारत मध्‍य एशिया के साथ अधिक घनिष्‍ठता से पुन: जुड़ने और दक्षिण एवं मध्‍य एशिया के आपस में जुड़े क्षेत्रों की स्थिरता एवं खुशहाली में योगदान करने में भी समर्थ होगा।

भारत दक्षिण एशिया के अन्‍य देशों के लिए व्‍यवस्थित ढंग से अपने बाजारों को भी खोल रहा है और इस प्रकार आंतरिक स्थिरता में योगदान कर रहा है तथा बकाया द्विपक्षीय मुद्दों का सक्रियता से समाधान कर रहा है। भारत ने दक्षिण एशिया को सकारात्‍मक दिशा देने में राजनीतिक इच्‍छा शक्ति का प्रदर्शन किया है। हम दक्षिण एशिया को शांतिपूर्ण एवं खुशहाल क्षेत्र के रूप में परिवर्तित करना चाहते हैं।

दोस्‍तो,

स्थिर एवं सुरक्षित एशिया, हिंद महासागर तथा प्रशांत क्षेत्र आदि 21वीं शताब्दि में भारत की अपनी सुरक्षा एवं खुशहाली की एक प्रमुख आवश्‍यकता है तथा हमारी विदेश नीति की भी एक अन्‍य प्रमुख प्राथमिकता है।

‘एशियाई संघ’ का विचार गहन रूप से भारतीय राष्‍ट्रीय आंदोलन से जुड़ा हुआ है। हाल में आजाद हुए एशिया के अंदर राजनीतिक भाईचारा एवं आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना स्‍वतंत्र भारत की राजनयिक पहलों में से एक था। ये विचार अपने समय से काफी आगे के थे।

6 से अधिक दशक बाद इनमें से अनेक विचार आज सच हो गए हैं। एशिया के अधिक एकीकरण से एशिया में अभूतपूर्व स्‍तर की खुशहाली का जन्‍म हुआ है। पिछले कुछ दशकों में एशिया ने जो असाधारण उपलब्धियां प्राप्‍त की है वे मिट्टी में मिल सकती हैं यदि इस क्षेत्र में सत्‍ता के लिए प्रतिद्विं‍द्विता, राष्‍ट्रीय अंधभक्ति और हथियारों की होड़ का बोलबाला बना रहता है।

इस क्षेत्र के गहन आर्थिक एकीकरण तथा एशिया एवं प्रशांत के लिए स्थिर एवं समावेशी राजनीतिक एवं सुरक्षा व्‍यवस्‍था के निर्माण में सक्रियता से योगदान करके भारत ऐसे परिणाम से बचने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है।

बहुत अक्‍सर एशिया, हिंद महासागर एवं प्रशांत क्षेत्र में संतुलन एवं स्थिरता के विचार को पिछली शताब्दि के सिद्धांतों की दृष्टि से देखा जाता है किंतु यह न तो अपरिहार्य है और न ही व्‍यवहार्य अथवा वांछनीय है। हम एक ऐसा क्षेत्रीय वास्‍तुशिल्‍प का निर्माण करने के लिए काम करेंगे जो सहयोग को बढ़ावा देता है, अभिसरण को सुदृढ़ करता है, संघर्ष एवं विवाद के जोखिमों को कम करता है तथा इस क्षेत्र के सभी देशों को भागीदारी के मानदंडों एवं सिद्धांतों की सामान्‍य रूपरेखा के अंदर लाता है।

दोस्‍तो,

यह समुद्री सुरक्षा की चुनौतियों से अधिक संबंधित है, जो इस क्षेत्र में स्थिरता एवं शांति के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है। हम अंतर्राष्‍ट्रीय कानून के अनुसरण में नौकायन की स्‍वतंत्रता, बाधा रहित विधिसम्‍मत वाणिज्‍य, समुद्री विवादों के शांतिपूर्ण समाधान तथा संसाधनों तक पहुंच के सिद्धांतों की साझी स्‍वीकृति का माहौल तैयार करने के लिए अन्‍य देशों के साथ काम करेंगे। इस क्षेत्र में स्‍थायी व्‍यवस्‍था के लिए न केवल सभी देशों की भागीदारी की जरूरत है अपितु स्‍थायी प्रतिबद्धता की भी जरूरत है।

एशिया प्रशांत क्षेत्र में हमारी भागीदारी की विशेषता म्‍यांमार से लेकर आस्‍ट्रेलिया तक के साथ हमारे मजबूत द्विपक्षीय संबंध, क्षेत्रीय संगठनों, विशेष रूप से आसियान के साथ गहरे संबंध, व्‍यापक आर्थिक साझेदारी करारों का संजाल तथा संयोजकता की महत्‍वाकांक्षी योजनाएं हैं।

यद्यपि हमारी ‘पूर्व की ओर देखो’ नीति एक मजबूत आर्थिक बल एवं अंतर्वस्‍तु के साथ शुरू हुई, आज इसके अंतर्गत इस क्षेत्र में सामरिक एवं सुरक्षा भागीदारी भी शामिल हो गई है। आसियान के साथ दो दशक की भागीदारी का उत्‍सव इस साल दिसंबर में भारत - आसियान यादगार शिखर बैठक के माध्‍यम से मनाया जाएगा। हम इस अवसर का प्रयोग आसियान के साथ अपने संबंधों को और गहन बनाने के लिए एक रोड मैप तैयार करने के लिए करेंगे।

हम चीन के साथ स्थिर एवं सहयोगात्‍मक संबंध निर्मित करने की दिशा में निवेश करना जारी रखेंगे, जो एक दूसरे के लिए लाभप्रद है तथा क्षेत्रीय स्थिरता एवं खुशहाली का स्रोत भी है।

दोस्‍तो,

आज पश्चिम एशिया में 6 मिलियन भारतीय रहते हैं तथा यह ऊर्जा एवं निर्यात आय का एक प्रमुख स्रोत है। ऊर्जा के एक प्रमुख स्रोत के अलावा यह हमारे देश के साथ मजबूत सांस्‍कृतिक एवं धार्मिक संबंध के साथ हमेशा हमारा निकट पड़ोसी तथा हमारी अर्थव्‍यवस्‍था एवं हमारी सुरक्षा के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण बना रहेगा।

हिंद महासागर क्षेत्र में, इस क्षेत्र के देशों के साथ न केवल द्विपक्षीय भागीदारी के माध्‍यम से अपितु क्षेत्रीय सहयोग के लिए हिंद महासागर रिम-संघ जैसी क्षेत्रीय पहलों के माध्‍यम से भी हम सुरक्षा एवं स्थिरता की महती जिम्‍मेदारी धारण कर रहे हैं।

रूस के साथ हमारी विशेष एवं अनूठी सामरिक साझेदारी न केवल समय की कसौटी पर खरी उतरी है अपितु इसने संतुलित एवं समावेशी विश्‍व व्‍यवस्‍था का निर्माण करने में भी सहायता की है और इसने दोनों अर्थव्‍यवस्‍थाओं के त्‍वरित विकास में योगदान किया है। आने वाले दशकों में अधिक आर्थिक अंतर्वस्‍तु के साथ इस भागीदारी के अगले स्‍तर पर ले जाना है।

भारत एवं यूरोपीय संघ के बीच सामरिक साझेदारी की नींव शिखर सम्‍मेलन स्‍तरीय वार्षिक बैठकों के साथ मजबूत है। भारत के विकास एजेंडा में यूरोपीय संघ की अधिक भागीदारी से यह संबंध और सुदृढ़ होगा। यह आने वाले वर्षों में अधिक वैश्विक महत्‍व ग्रहण करेगा।

दोस्‍तो,

अफ्रीका के साथ साझेदारी के लिए भारत के विजन का आधार यह है कि अफ्रीका के लोगों को इस साझेदारी का प्राथमिक लाभग्राही बनाया जाए। इसीलिए अखिल अफ्रीकी संस्‍था - निर्माण के विकास को ध्‍यान में रखकर 2008 में भारत – अफ्रीका मंच शिखर बैठक की प्रक्रिया शुरू की गई। आने वाले वर्षों में इन पहलों का महत्‍व बढ़ जाएगा।

लैटिन अमरीका के देशों के साथ हमारे संबंध बहु आयामी हो गए हैं। लैटिन अमरीका एवं कैरेबियन राज्‍यों का नवगठित समुदाय (सी ई एल ए सी) ने पिछले महीने दिल्‍ली में भारत के साथ अपनी अब तक की पहली मंत्री स्‍तरीय बैठक आयोजित की। हम चाहते हैं कि यूरोपीय संघ एवं अफ्रीका के साथ समान शिखर सम्‍मेलन स्‍तरीय बैठकों की तर्ज पर इसे शिखर सम्‍मेलन के स्‍तर का बनाया जाए।

एक ऐसे देश के रूप में जो परमाणु प्रसार के चाप की छाया में रह चुका है, भारत न केवल परमाणु अप्रसार पर अपने त्रुटिहीन ट्रैक रिकार्ड को बरकरार रखेगा अपितु परमाणु प्रसार पर रोक लगाने तथा परमाणु निरस्‍त्रीकरण के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय साझेदारी निर्मित करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएगा।

अंत में, हम समकालीन सच्‍चाइयों को प्रति‍बिंबित करने एवं नई चुनौतियों का सामना करने की उनकी सामर्थ्‍य में सुधार करने के लिए सुरक्षा परिषद, विश्‍व बैंक एवं अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष समेत बहुपक्षीय संस्‍थाओं जैसे कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में और सुधार लाने का प्रयास करेंगे।

दोस्‍तो,

चूंकि हम आने वाले दशकों में भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर नजर डाल रहे हैं, हम न केवल संयुक्‍त राज्‍य के साथ हितों का अभिसरण देखते हैं अपितु अपने साझे लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने में हमारे दो महान लोकतंत्रों के बीच मजबूत साझेदारी के महत्‍व में विश्‍वास को भी देखते हैं।

इसी मान्‍यता ने भारत – अमरीकी संबंधों को परिवर्तित करने तथा वैश्विक सामरिक साझेदारी की एक स्‍थायी एवं विस्‍तृत रूपरेखा स्‍थापित करने में दोनों देशों में असाधारण राजनीतिक निवेश का मार्ग प्रशस्‍त किया है।

हमारी राजनीतिक वार्ता अभूतपूर्व स्‍तर पर है तथा हमारे सामरिक विचार - विमर्श का दायरा इतना विस्‍तृत हो गया है कि इसके अंतर्गत विश्‍व का प्रत्‍येक प्रमुख क्षेत्र एवं चुनौती शामिल हो गई है। हमारे बीच एक मजबूत एवं बढ़ती रक्षा साझेदारी है जिसकी विशेषता सुरक्षा वार्ता, नियमित सैन्‍य अभ्‍यास एवं रक्षा व्‍यापार व सहयोग में वृद्धि है। हमारा आसूचना एवं आतंकवाद विरोधी सहयोग हमारी मजबूत सामरिक साझेदारी को प्रतिबिंबित करता है। हमने गैर प्रसार एवं निरस्‍त्रीकरण के अपने साझे लक्ष्‍यों को आगे बढ़ाने के लिए अपने संबंध की रूपरेखा को पुन: परिभाषित किया है।

दोस्‍तो,

संयुक्‍त राज्‍य अमरीका विकास के हमारे प्रयासों में हमारा एक महत्‍वपूर्ण साझेदार है। व्‍यापार एवं निवेश के क्षेत्र में हमारे बीच तेजी से बढ़ रहे संबंध हमारी साझेदारी की एक मजबूत नींव हैं। न केवल वैश्विक प्रतिस्‍पर्धा एवं नेतृत्‍व प्राप्‍त करने के लिए अपितु अवसंरचना, स्‍वच्‍छ ऊर्जा, शिक्षा, कृषि, स्‍वास्‍थ्‍य एवं सेवाओं की सुपुर्दगी में सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के लिए भी हमारे व्‍यवसाय, विश्‍वविद्यालय एवं प्रयोगशालाएं नवाचार की आकर्षक नई साझेदारियां निर्मित कर रही हैं।

वास्‍तव में हमारी साझेदारी की स्‍थायी मजबूती हमारे दोनों देशों में सार्वजनिक सद्भाव तथा हमारे लोगों के बीच संबंधों की गरमाहट से आती है।

हम भिन्‍न – भिन्‍न परिस्थितियों, इतिहास, स्‍थान एवं विकास के स्‍तरों से आते हैं किंतु हम साझे मूल्‍यों द्वारा एकजुट हैं। हम अपनी पसंद की स्‍वतंत्रता का गहन रूप से सम्‍मान करते हैं किंतु एक दूसरे की सफलता में भी हमारा मौलिक कर्तव्‍य है। कभी-कभी हमारे दृष्टिकोणों में भिन्‍नता हो सकती है किंतु हम अपने लोगों एवं पूरे विश्‍व के लिए समान भविष्‍य चाहते हैं। हमारी सहयोगात्‍मक उप‍लब्धियां हमें प्रचुर संभावनाओं के बारे में बताती हैं जो हमारे आगे खड़ी हैं, साथ ही वे हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करती हैं।

भारत – संयुक्‍त राज्‍य साझेदारी की सफलता न केवल हमारे दोनों देशों में खुशहाली लाने में योगदान करेगी अपितु महान परिवर्तन एवं विविधता वाले विश्‍व में यह अंतर्राष्‍ट्रीय साझेदारी का मॉडल बनेगी और वैश्विक एवं क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा एवं स्थिरता का कारक बनेगी। भारत के लिए, 21वीं शताब्दि में यह बहुत महत्‍व एवं प्राथमिकता वाला संबंध बना रहेगा।

धन्‍यवाद।

ब्राउन विश्‍वविद्यालय
न्‍यू इंग्‍लैंड
28 सितंबर 2012



टिप्पणियाँ

टिप्पणी पोस्ट करें

  • नाम *
    ई - मेल *
  • आपकी टिप्पणी लिखें *
  • सत्यापन कोड * Verification Code
केन्द्र बिन्दु में
यह भी देखें