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साउदर्न मेथोडिस्‍ट यूनिवर्सिटी में ''आज का भारत'' पर विदेश मंत्री जी का संबोधन

अक्तूबर 03, 2012

प्रतिष्‍ठित प्रोवोस्‍ट श्री पौल ल्‍यूडेन,
राजदूत निरूपमा राव,
कॉन्‍सुल जनरल हरीश,
विधि स्‍कूल के प्रतिष्‍ठित डीन प्रो. अट्टानासियो,
विद्वत समाज के प्रतिष्‍ठित सदस्‍यगण,

दोस्‍तो,


सबसे पहले मैं अध्‍यक्ष टर्नर तथा डीन प्रो. अट्टानासियो के प्रति गहरा आभार व्‍यक्‍त करना चाहता हूँ तथा उनकी प्रशंसा करना चाहता हूँ क्‍योंकि उन्‍होंने मुझे अपने कालेज में वापस आने का उत्‍कृष्‍ट अवसर प्रदान किया। वास्‍तव में यह मेरे लिए घर वापसी जैसा है, हालांकि यह पांच दशक से अधिक समय बाद हो रहा है।

जब मैंने आज एस एम यू के परिसर में प्रवेश किया, तो मुझे स्‍वत: ही अपने सुन्‍दर एवं घटनाओं से भरे पुराने दिन याद आने लगे जिन्‍हें मैंने अपने छात्र जीवन के बहुत रचनात्‍मक वर्षों में बिताया था। मेरा मानना है कि मेरी सफलता में उस ज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है जिसे मैंने इस महान विश्‍वविद्यालय में प्राप्‍त किया।

मैं अध्‍यक्ष टर्नर तथा डीन प्रो. अट्टानासियो का बहुत ही ऋणी हूँ क्‍योंकि उन्‍होंने मुझे मेरे बहुत ही प्रिय विषय ''आज का भारत'' पर इस सभा को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया।

दोस्‍तो,

बहुत दूर की बात नहीं है जब भारत को मात्र विचार समझा जाता था। डेढ़ शताब्‍दि से भी अधिक समय तक भारत उपनिवेशी ताकतों के अधीन रहा। 1947 में स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने के बाद भारत का रूपांतरण विविध तरीकों से तथा विविध क्षेत्रों में हुआ।

पिछले एक - दो दशक में, भारत के संबंध में वैश्‍विक रूचि में बेशुमार वृद्धि हुई है। विश्‍व स्‍तर पर यह नयी सोच भारत में तेजी से हो रहे आर्थिक परिवर्तन तथा नई वैश्‍विक रणनीतिक वास्‍तुशिल्‍प में स्‍थिरक शक्ति के रूप में भारत की उभरती भूमिका की अनुभूति से उत्‍पन्‍न हुई है।

यह सोच इस तथ्‍य से और मजबूत हुई है कि भारी संख्‍या में देशों, जिसमें संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के स्‍थाई सदस्‍य भी शामिल हैं, ने पिछले दशक में सामरिक साझेदारी की है। ऐसी साझेदारियों का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि वे किसी देश के विरूद्ध केन्‍द्रित नहीं हैं; इनका एक मात्र उद्देश्‍य भारत के लोगों तथा ऐसी साझेदारी में शामिल अन्‍य देशों को सर्वाधिक अभीष्‍ठ परस्‍पर लाभ प्रदान करना है।

पिछले दशक में, केवल चीन के बाद भारत विश्‍व की सबसे तेजी से विकास कर रही अर्थव्‍यवस्‍थाओं में शामिल रहा है। पिछले दशक में भारत के सकल घरेलू उत्‍पाद में मोटेतौर पर 8 प्रतिशत से अधिक दर से वृद्धि हुई तथा इस दशक में यह दोगुने से भी अधिक हो गई है। इस साल यह 2 ट्रिलियन अमरीकी डालर के आंकडे को छू जाने वाला है। क्रय शक्‍ति तुल्‍यता (पी पी पी), जो ऐसा मापदंड है जिसे अक्‍सर विश्‍व बैंक एवं अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रयुक्‍त किया जाता है, की दृष्‍टि से यह वास्‍तव में 5 ट्रिलियन अमरीकी डालर में रूपांतरित होता है। इस अवधि में, भारत ने 1990 के दशक में गरीबी घटाने की गति की तुलना में दोगुनी गति से गरीबी घटाने का प्रबंध किया। वास्‍तव में, गरीबी उन्‍मूलन के मोरचे पर अभी भी बहुत कार्य किया जाना शेष है।

दोस्‍तो,

विश्‍व ने उस समय भारत को और भी अधिक सराहना की नजर से देखा जब यह 2008 में पूरे विश्‍व की अर्थव्‍यवस्‍था को हिला देने वाली महामंदी के बाद मंदी के घातक प्रभावों से अछूता रह गया। 2008 से 2010 में भारत की वार्षिक औसत जी पी डी वृद्धि 8 प्रतिशत के करीब थी। 2008 के वैश्‍विक आर्थिक संकटों के बाद, अधिकांश विश्‍लेषकों ने भविष्‍यवाणी की थी कि वैश्‍विक आर्थिक मंदी के हानिकर प्रभावों से भारत तबाह हो जाएगा।

इसमें संदेह नहीं है कि आर्थिक झटके नहीं लगे हैं परंतु अपनी घरेलू अर्थव्‍यवस्‍था एवं अपनी प्रचुर विविधता के कारण अब तक भारत ने इसका सामना करने की उल्‍लेखनीय सामर्थ्‍य का प्रदर्शन किया है। परंतु इस झटके से निपटने के लिए घरेलू अर्थव्‍यवस्‍था की अंतर्निहित लोच से विदेशियों के साथ-साथ भारतीय भी समान रूप से अचंभित हुए।

ऐसा लगता है कि यूरोप आर्थिक मंदी के जाल में फसा हुआ है। पश्‍चिमी देश पहले से भी अधिक रूचि के साथ भारत को देख रहे हैं क्‍योंकि यह बात स्‍पष्‍ट होती जा रही है कि चीन, भारत एवं अन्‍य देशों के नेतृत्‍व में विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं को अगले कुछ दशकों में वैश्‍विक आर्थिक विकास का इंजन बनाया है।

एशिया, लैटिन अमरीका तथा अफ्रीका की तेजी से बढ़ती विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं को पहले से ही वैश्‍विक उत्‍पाद में दो तिहाई से अधिक का श्रेय जाता है। आर्थिक शक्‍ति की धुरी में यह अथक बदलाव आर्थिक, सुरक्षा एवं रणनीति, अभिशासन की वैश्‍विक संस्‍थाओं में भी एक आकर्षक परिवर्तन देख रहा है, जिसका भारत एक बड़ा हिस्‍सा है। संयुक्‍त राज्‍य समेत पूरा विश्‍व यह देखना चाहता है कि वैश्‍विक अभिशासन की संस्‍थाओं में हो रहे इस प्रारंभिक परिवर्तन में भारत महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाए। भारत इस परिप्रेक्ष्‍य से भी ध्‍यान का केन्‍द्र बिन्‍दु होगा।

दोस्‍तो,

भारत एवं संयुक्‍त राज्‍य ने एक मजबूत वैश्‍विक सामरिक साझेदारी निर्मित की है। राष्‍ट्रपति जार्ज डब्‍ल्‍यू बुश ने महान विजन का प्रदर्शन किया तथा हमारे दोनों महान लोकतंत्रों के बीच संबंध के बदलाव में असाधारण राजनीतिक निवेश किया। इसलिए मुझे बड़ी प्रसन्‍नता है कि मेरे अपने कालेज में राष्‍ट्रपति जार्ज डब्‍ल्‍यू बुश का राष्‍ट्रपति पुस्‍तकालय होगा।

राष्‍ट्रपति ओबामा ने 21वीं शताब्‍दी में वैश्‍विक स्‍थिरता एवं खुशहाली के एक प्रमुख कारक के रूप में इस सामरिक साझेदारी को सुदृढ़ करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। भारत में उत्‍तरोत्‍तर सरकारों ने इस सबंध को सामरिक प्राथमिकता के रूप में लिया है। हमारा संबंध दोनों देशों में विस्‍तृत द्विदलीय राजनीतिक समर्थन एवं सार्वजनिक सद्भाव पर खरा उतरा है।

दोस्‍तो,

हमारे संबंध की नींव लोकतंत्र एवं विविधता पर टिकी है। हमारी साझेदारी के अंतर्गत न केवल राजनीतिक, रक्षा, आतंकवाद की खिलाफत एवं सुरक्षा से संबंधित अन्‍य मुद्दे शामिल हैं अपितु अर्थव्‍यवस्‍था, ऊर्जा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्‍वास्‍थ्‍य परिचर्या तथा कृषि भी शामिल है।

हमारे संबंध में असंख्‍य उद्यम एवं कौशल शामिल हैं तथा भारत के तेज विकास एवं अमरीका के वैश्‍विक आर्थिक नेतृत्‍व से आहरित सिनर्जी का लाभ प्राप्‍त है। परस्‍पर खुशहाली में वृद्धि करने एवं वैश्‍विक आर्थिक समुत्‍थान एवं विकास प्रेरित करने के लिए हमारे बीच एक प्राकृतिक साझेदारी है। हम अपनी साझेदारी को न केवल हमारी दोनों अर्थव्‍यवस्‍थाओं के विकास एवं आर्थिक प्रतिस्‍पर्धा के लिए एक उपकरण के रूप में देखते हैं अपितु इसे सामाजिक परिवर्तन एवं लोगों की अधिकारिता के साधन के रूप में भी देखते हैं।

मैंने बस इस बात पर प्रकाश डाला है कि क्‍यों विश्‍व सकारात्‍मक रूप से भारत पर इतना अधिक ध्‍यान दे रहा है। इन सबसे भारत की उम्‍मीदें भी काफी बढ़ गई हैं।

दोस्‍तो,

इस समय, बेहतर अभिशासन एवं संस्‍थानिक परिवर्तनों के माध्‍यम से आर्थिक विकास लाने के लिए बहुत ज्‍यादा न करने के लिए विश्‍व मीडिया की ओर से भारत की आलोचना की जा रही है। आलोचकों को निश्‍चित रूप से मैं भद्रता से याद दिलाना चाहता हूँ कि भारत एक सभ्‍य सत्‍ता है तथा कभी-कभी परिवर्तन बहुत धीमी गति से होते हैं। परंतु इतिहास ने दिखा दिया है कि कैसे भारत हमेशा आलोचकों को गलत साबित करता आया है।

अगर इतिहास पर थोड़ा नजर डालें, तो अंग्रेजी शासन से आजादी के समय, सर विन्‍स्‍टन चर्चिल ने चर्चित रूप में घोषणा की थी कि भारत अभिशासन के अयोग्‍य है तथा शीघ्र ही यहां सामाजिक एवं राजनीतिक अव्‍यवस्‍था फैल जाएगी। यह कोई 65 साल पहले की बात है। यदि चर्चिल इस मुद्दे की आज समीक्षा करेंगे, तो मुझे पूरा विश्‍वास है कि उनको यह देखकर आश्‍चार्य होगा कि कैसे भारत न केवल जिन्‍दा है अपितु इन वर्षों में बहुत अच्‍छा भी किया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत बहुत बड़ा देश है तथा यहां मानव आबादी का छठवां भाग रहता है। इसके भूभाग आश्‍चार्यजनक ढंग से विविधतापूर्ण हैं तथा धर्म, भाषा, जाति, नृजाति के साथ-साथ पारिस्‍थितिकी, प्रौद्योगिकी, पहनावा एवं व्‍यंजन की दृष्‍टि से भी यहां के लोग बटे हैं।

दोस्‍तो,

परंतु भारत के आकार एवं विविधता के अलावा, जो चीज इसे वास्‍तव में रोचक बनाती है वह अनेक तरीकों से असाधारण गति से हो रहा परिवर्तन है। यहां एक साथ शहरी क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सामाजिक क्रांति तथा लोकतांत्रिक क्रांति हो रही है। वास्‍तव में इन सबसे 28 से अधिक भारतीय राज्‍यों के विविधतापूर्ण लोगों में राष्‍ट्रीय अस्मिता की एक नई भावना भी पैदा हो रही है।

भारत की राजनीतिक संस्‍कृति कभी सामंतवादी एवं भेदभावपूर्ण हुआ करती थी, परंतु आज यह युयुत्‍सु एवं सहभागितापूर्ण है। परिवर्तन की गति भले ही धीमी हो परंतु उल्‍लेखनीय भारतीय संविधान, जिस पर लोकतंत्र के महत्‍वपूर्ण स्‍तंभ अर्थात विधायिका, न्‍यायपालिका एवं कार्यपालिका आधारित हैं, की रूपरेखा में अभिशासन की संस्‍थाएं बदल रही हैं।

दोस्‍तो,

उल्लेखनीय है कि भारत में ये परिवर्तन एक साथ हो रहे हैं। संयुक्‍त राज्य में, राष्‍ट्रीय स्‍वतंत्रता 18वीं शताब्‍दी में आई, औद्योगीकरण 19वीं शताब्‍दी में हुआ तथा यह पूर्ण लोकतंत्र 20वीं शताब्‍दी में बना। इस प्रकार ये प्रारंभिक घटनाएं धीमी गति से आरंभ हुई। भारत में यह सब एक साथ हो रहा है, और इसी वजह से आधुनिक भारतीय समाज सच्‍चे सामने में समावेशी है।

उदाहरण के लिए, अमरीकी पूंजीवाद 19वीं शताब्‍दी की अधिकांश अवधि में लोकतांत्रिक संस्‍थाओं द्वारा लगाए अनेक विनियमों के बगैर मुक्‍त एवं अबाध रूप से दौड़ रहा था। भारतीय पूंजीवाद, जिसके विरूद्ध अक्‍सर देश के कोने-कोने में लोकतांत्रिक ढंग से विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं, मजबूत लोकतांत्रिक रूपरेखा के अंदर अपनी जड़े जमा रहा है। इस लोकतांत्रिक रूपरेखा के अंदर स्‍वत: सुधार की मशीनरी भी साथ-साथ काम कर रही है। यह विदेशी निवेशकों के लिए निराशाजनक हो सकता है परंतु जब वे अधिक करीब से देखेंगे तो वे धीरे-धीरे इस प्रक्रिया को समझ जाएंगे।

उदाहरण के लिए, इस समय भारत मल्‍टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश में प्रमुख सुधारों को लागू करने की प्रक्रिया में है, जिसमें आर्थिक दृष्‍टि से देश को परिवर्तित करने की क्षमता है। मल्‍टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश उस तरीके को परिवर्तित करने में सक्षम है जिस तरीके से भारत में कृषि अर्थव्‍यवस्‍था काम करती है।

दोस्‍तो,

संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन (यू पी ए) सरकार एक अनोखा लोकतांत्रिक मॉडल लेकर आई है तथा 28 में से प्रत्‍येक राज्‍य को यह चयन करने का विकल्‍प दिया है कि वे मल्‍टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश आमंत्रित करना चाहते हैं या नहीं। मेरे विचार से, यह संघीय शक्‍तियों के अंशांकित लोकतंत्रीकरण में एक महत्‍वपूर्ण प्रयोग है।

यद्यपि ये प्रयोग चल रहे हैं, तेजी से बढ़ रहा भारतीय मध्‍यम वर्ग स्‍वाभाविक रूप से इस बात का उत्‍सुक है कि उसे समय पर एवं दक्ष ढंग से विभिन्‍न सार्वजनिक माल एवं सेवाएं प्राप्‍त हों। विशाल चुनौती, जो एक अवसर भी है, यह है कि कैसे भारत के 1.2 बिलियन से अधिक लोग उपभोग की सीढ़ी पर कदम रखेंगे।

प्रवर्तकों के लिए, वे किस तरह ऊर्जा का उपयोग करेंगे? प्रतिदिन 3 अमरीकी डालर से कम आय वाले 850 मिलियन से अधिक भारत के लोग स्‍वच्‍छ ऊर्जा का प्रयोग करने के लिए सही उम्‍मीदवार हैं। इस प्रकार इन लोगों को सापेक्षिक गरीबी से ऊपर उठाने तथा स्‍वच्‍छ ऊर्जा की खपत करने में उन्‍हें समर्थ बनाने का कार्य भारत एवं संयुक्‍त राज्‍य जैसे प्रौद्योगिकी की दृष्‍टि से समृद्ध अन्‍य राष्‍ट्रों के बीच सहयोग एवं सहयोगात्‍मक रूपरेखा में ही पूरा हो सकता है।

इसलिए स्‍वच्‍छ ऊर्जा एवं कार्बन अभीष्‍ठ शहरीकरण नई समाजिक, आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी आधारित साझेदारी का केन्‍द्र बिन्‍दु है। राष्‍ट्रपति बुश तथा प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने वैश्‍विक परमाणु व्‍यवस्‍था को परिवर्तित करने में भरपूर योगदान दिया जिससे अक्‍टूबर, 2008 में ऐतिहासिक भारत - अमरीका असैन्‍य परमाणु करार का मार्ग प्रशस्‍त हुआ।

प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह तथा राष्‍ट्रपति ओबामा ने न केवल असैन्‍य परमाणु ऊर्जा को शामिल करने के लिए अपितु स्‍वच्‍छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा दक्षता एवं हाइड्रो कार्बन में प्रतिस्‍पर्धी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए हमारे ऊर्जा सहयोग का आधार विस्‍तृत किया है। हम यह भी आशा करते हैं कि अमरीका भारत को हाइड्रो कार्बन की आपूर्ति करने वाला प्रमुख देश बनेगा, जो हमारे परस्‍पर आर्थिक एवं ऊर्जा सुरक्षा के हित में होगा।

दोस्‍तो,

जैसा कि मैंने शुरू में कहा था, यह एक अन्‍य कारण है जिसकी बजह से विश्‍व भारत नामक विशाल एवं विविधता वाले देश में 1.2 बिलियन लोगों को खुशहाल होते देख रहा है। इस प्रक्रिया के लिए घरेलू एवं वैश्‍विक स्‍तर पर दिव्‍य सोच की जरूरत होगी।

घरेलू नीति के स्‍थान पर, भारत को शीघ्र ही इस बारे में अधिक निर्णायक कदम उठाना होगा कि यह अपने लोगों के लिए किस प्रकार की उपभोग संस्‍कृति का विकास करना चाहता है। उपभोग का कतिपय तरीका, जैसे कि अत्‍यधिक ऊर्जा गहन तरीका उन संसाधनों से सीधे असंगत हो सकता है जो स्‍थानीय एवं वैश्‍विक स्‍तर पर हमारे नियंत्रण में हैं। ऊर्जा की उपलब्‍धता के संबंध में वर्तमान एवं भावी सच्‍चाइयों को ध्‍यान में रखते हुए भारत अभीष्‍ठ ऊर्जा खपत पैटर्न तैयार कर रहा है।

भारत पहले से ही एक भिन्‍न स्‍थिति का सामना कर रहा है। क्‍योंकि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कच्‍चे तेल की अधिक कीमतों से इसका तेल आयात बिल अभूतपूर्व स्‍तर पर पहुंच गया है। भारत के तेल आयात, जो इसकी खपत का लगभग 80 प्रतिशत है, से हमारा चालू खाता घाटा बढ़ रहा है। वास्‍तव में, वैश्‍विक अर्थव्‍यवस्‍था में तेजी से मंदी तथा पश्‍चिमी अर्थव्‍यवस्‍थाओं के सिमटने के बावजूद तेल की कीमतें बढ़ रही हैं।

भारत के लिए दीर्घावधिक समाधान यह है कि हाइड्रो कार्बन पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जाए तथा ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों की दिशा में आगे बढ़ा जाए। आज यह भारत की सबसे बड़ी ऊर्जा सुरक्षा चुनौती है।

दोस्‍तो,

भारत में निरंतर उच्‍च आर्थिक विकास के विभिन्‍न सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों से निपटने के लिए अंदरूनी लोकतांत्रिक नियंत्रण एवं संतुलन हैं। जैसा कि मैंने बताया, यह विकास मात्र नहीं है अपितु यह समावेशी विकास है जो हमारी विकास नीतियों एवं कार्यक्रमों का उद्देश्‍य है। इसके लिए भारत के अंदर तथा अन्‍य देशों के साथ भी वार्तालाप को गहन करने की जरूरत है क्‍योंकि आज हम भूमंडलीकरण के युग में जी रहे हैं।

एक बिलियन से अधिक आबादी वाले राष्‍ट्र के रूप में, अपने युवाओं की ऊर्जा एवं उद्यमशीलता से चालित, लोकतांत्रिक रूपरेखा में रहने वाले, अपनी अद्वितीय विविधता का जश्‍न मनाने वाले, संपोषणीय एवं समावेशी विकास के पथ पर चलने वाले तथा जिम्‍मेदार अंतर्राष्‍ट्रीय नागरिक के रूप में अपनी भूमिका निभाने वाले राष्‍ट्र के रूप में भारत 21वीं शताब्‍दी में वैश्‍विक शांति, स्‍थिरता, विकास एवं खुशहाली का एक प्रमुख कारक होगा।

डलास
3 अक्‍टूबर, 2012



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