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प्रधानमंत्री जी की थाईलैंड यात्रा पर बैंकाक में सचिव (पूर्व) द्वारा मीडिया वार्ता का प्रतिलेखन (30 मई, 2013)

मई 31, 2013

सरकारी प्रवक्‍ता (श्री सैयद अकबरूद्दीन) :दोस्‍तो, नमस्‍कार। हमारे साथ धैर्य रखने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत धन्‍यवाद। हमने सोचा था कि हम शिष्‍टमंडल स्‍तरीय वार्ता एवं दावत के बाद सीधे यहां आएंगे। इस प्रकार, हमने लगभग 15 मिनट पहले ही उन दोनों कार्यक्रमों को पूरा किया है तथा उसके बाद हम सीधे यहां चले आए हैं।

मेरे साथ यहां मेरी दायीं ओर सचिव (पूर्व) श्री अशोक कांता तथा उनके दायीं ओर राजदूत वाधवा हैं जो थाईलैंड में हमारे राजदूत हैं। मैं सचिव (पूर्व) से अनुरोध करूँगा कि वह इस संपूर्ण यात्रा के बारे में कुछ उद्घाटन टिप्‍पणी करें। इसके पश्‍चात यह मंच खुला होगा तथा आप उनसे या राजदूत वाधवा से ऐसा कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं जिसे आप आज के कार्यक्रम के बारे में या भारत - थाईलैंड संबंधों के बारे में तथा इस बारे में पूछना चाहते हैं कि हम इस संबंध को भविष्‍य में किस रूप में देखते हैं।

इन्‍हीं शब्‍दों के साथ मैं सचिव (पूर्व) से निवेदन करूँगा कि वह दो शब्‍द बोलें।

सचिव (पूर्व) (श्री अशोक कांता) :नमस्‍कार।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह थाईलैंड के राजकीय दौरे पर हैं। यह इस देश की उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा है, हालांकि वह यहां पहले भारत - आसियान शिखर बैठक के लिए तथा बिम्‍सटेक शिखर बैठक के लिए 2004 और 2009 में बहुपक्षीय संदर्भ में आ चुके हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं, पिछले साल थाईलैंड के प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा ने भारत का दो बार दौरा किया था, पहला जनवरी में गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्‍य अतिथि के रूप में और फिर दिसंबर में भारत - आसियान शिखर बैठक के लिए।

आज प्रधान मंत्री जी ने सरकारी भवन में प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा के साथ आधिकारिक बातचीत की। बातचीत का आयोजन बहुत गर्मजोशीपूर्ण, सौहार्द्रपूर्ण तथा सहयोगात्‍मक वातावरण में हुआ। मेरी समझ से मैं जो सबसे बढि़या काम कर सकता हूँ वह इन वार्ताओं के बारे में स्‍वयं प्रधान मंत्री जी के चित्रण का प्रयोग करना है। अपने मीडिया वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा के साथ अपनी बातचीत को ‘साझे हित के द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर बहुत सार्थक, रचनात्‍मक एवं संतोषप्रद विचार -‍ विमर्श’ के रूप में बताया।

प्रधान मंत्री जी ने हमारी साझी सांस्‍कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में महामहिम नरेश को एक विशेष उपहार के रूप में बोध गया से पवित्र बोधि वृक्ष का पौधा भी प्रस्‍तुत किया। अपने मीडिया वक्‍तव्‍य में उन्‍होंने बताया कि यह थाईलैंड के साथ हमारे संबंध के विकसित होने का भी प्रतिनिधित्‍व करता है। थाईलैंड पक्ष ने प्रधान मंत्री जी के इस विशेष व्‍यवहार की बहुत सराहना की।

जिन करारों पर हस्‍ताक्षर किया गया है उनकी सूची हमने परिचालित कर दी है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, हमने प्रत्‍यर्पण संधि की है। हमने थाईलैंड - भारत विनिमय कार्यक्रम पर एक एम ओ यू, शहरी मानचित्रण पर एक एम ओ यू, पुरातात्विक एटलस पर एक एम ओ यू, धन शोधन तथा आतंकवाद के वित्‍त पोषण से संबंधित आसूचना के आदान - प्रदान पर एक एम ओ यू, थम्‍मासेट विश्‍वविद्यालय में हिंदी चेयर की स्‍थापना पर एक एम ओ यू तथा सजायाफ्ता व्‍यक्तियों के अंतरण पर संधि की पुष्टि के लिखत के आदान - प्रदान के लिए एक प्रोसेस वर्बल पर हस्‍ताक्षर किया है।

मैं आप सभी को सं‍क्षेप में ऐसे कुछ क्षेत्रों के बारे में जानकारी प्रदान करूँगा जिन पर विचार - विमर्श के दौरान बल दिया गया, तथा इस यात्रा से उत्‍पन्‍न कुछ प्रमुख टेक अवे के बारे में भी बताऊँगा। इस संबंध का एक प्रमुख स्‍तंभ राजनीतिक वार्ता, सुरक्षा एवं न्‍यायिक सहयोग के क्षेत्रों में हमारी भागीदारी है। यहां सबसे महत्‍वपूर्ण परिणाम प्रत्‍यर्पण संधि पर हस्‍ताक्षर है जिस पर वास्‍तव में लगभग दो दशक से बातचीत चल रही थी, जैसा कि थाईलैंड के अपने समकक्ष के साथ अपनी बातचीत में प्रधान मंत्री जी ने बताया।

हमारे पास पहले से ही आपराधिक मामलों में एक एम एल ए टी स्‍थापित है। पिछले साल हमने सजायाफ्ता कैदियों के आदान - प्रदान पर एक करार पर हस्‍ताक्षर किया था तथा इस संबंध में आज औपचारिकताएं पूरी हो गई हैं। इसके अलावा, आज हमने धन शोधन तथा आतंकवाद के वित्‍त पोषण से संबंधित वित्‍तीय आसूचना के आदान - प्रदान पर एक एम ओ यू पर भी हस्‍ताक्षर किया। इस प्रकार, हमने सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के लिए वास्‍तुशिल्‍प स्‍थापित किया है जो बहुत महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि जैसा कि प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा ने ऐसा बताया। जब आपके पास अधिक संयोजकता होगी तो राष्‍ट्रपा‍रीय चुनौतियों में भी तदनुसार वृद्धि होगी, इसलिए आपको इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपेक्षित रूपरेखा स्‍थापित करने की जरूरत होगी।

हमारे पास कतिपय आपराधिक तत्‍वों से संबंधित कुछ मामले हैं जहां हमने थाईलैंड के अपने दोस्‍तों से प्रत्‍यर्पण में न्‍यायिक सहायता की मांग की है। और आज प्रधान मंत्री जी ने थाईलैंड में अपने समकक्ष के साथ अपने विचार - विमर्श के दौरान इस मुद्दे को उठाया था। और जवाब में प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा ने बताया कि इन अनुरोधों को प्रोसेस करने की गति तेज की जाएगी। हम आशा करते हैं कि नई प्रत्‍यर्पण संधि के लागू हो जाने से इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति होगी।

एक अन्‍य पहलू जिस पर मैं बल देना चाहता हूँ वह भारत एवं थाईलैंड के बीच उच्‍च स्‍तर पर आदान - प्रदान के लिए दोनों नेताओं द्वारा दिया गया बल है। हमारे प्रधान मंत्री जी ने पिछले साल थाईलैंड की प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा की भारत की उल्‍लेखनीय यात्रा तथा हमारे दोनों देशों के बीच संबंधों के विकास में उनके निजी योगदान का बार-बार उल्‍लेख किया। उन्‍होंने अगले दो महीनों में हमारे रक्षा मंत्री; वाणिज्‍य, उद्योग एवं कपड़ा मंत्री; और विदेश मंत्री की आगामी यात्राओं का भी उल्‍लेख किया। इससे पता चलता है कि दोनों पक्ष इस संबंध को आगे बढ़ाने पर कितना महत्‍व दे रहे हैं।

जब हम रिश्‍ते के संदर्भ के बारे में बात करते हैं तो इसे सामरिक साझेदारी की रूपरेखा में मानना महत्‍वपूर्ण होता है जिसे हमने विकसित किया है, हमने पिछले साल दिसंबर में आसियान के साथ स्‍थापित की है तथा हमने इसकी घोषणा की है। और जहां तक द्विपक्षीय रूपरेखा का संबंध है, हम इस संबंध को सामरिक साझेदारी में परिवर्तित करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

जहां तक सुरक्षा का संबंध है, दोनों नेताओं ने इस बात का उल्‍लेख किया कि समुद्र की दृष्टि से हम पड़ोसी हैं तथा समुद्री सुरक्षा हमारे लिए एक महत्‍वपूर्ण पूर्वापेक्षा है। तदनुसार समुद्री सुरक्षा के संबंध में हम अपने सहयोग का पैमाना बढ़ाने पर सहमत हुए हैं तथा विभिन्‍न उपायों के माध्‍यम से हम अपने रक्षा सहयोग को गहन करने पर भी सहमत हुए हैं जिसमें प्रशिक्षण, संयुक्‍त अभ्‍यास तथा सहयोग के अन्‍य रूप शामिल हैं। थाईलैंड पक्ष ने विशेष रूप से पिछले साल रक्षा मंत्री की भारत यात्रा के दौरान इस संबंध में रूचि का प्रदर्शन किया है। जब हमारे रक्षा मंत्री 5 और 6 जून को बैंकाक के दौरे पर होंगे तब इस मुद्दे पर और विचार - विमर्श होगा।

जल दस्‍युतारोधी प्रचालन, संचार के समुद्री लेनों का अनुरक्षण एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण क्षेत्र है जिसे हम अपने द्विपक्षीय सहयोग के अंग के रूप में तथा अपनी विद्यमान क्षेत्रीय रूपरेखा में भी आगे बढ़ाएंगे।

दूसरा महत्‍वपूर्ण क्षेत्र, जिसकी पहचान की गई, संयोजकता से संबंधित है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, थाईलैंड हमारे लिए दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया के लिए गेटवे के रूप में है और विशेष रूप से भारत के उत्‍तर पूर्वी क्षेत्र के विकास के संबंध में यह बहुत महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस संदर्भ में दोनों नेताओं के बीच इस बात पर सहमति हुई कि भारत, थाईलैंड एवं म्‍यांमार की भागीदारी वाली त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर निष्‍पादित एवं कार्यान्वित किया जाएगा तथा इसे 2016 तक पूरा किया जाएगा। प्रधान मंत्री जी ने इस परियोजना के संबंध में प्रगति का जायजा लेने तथा यह देखने के लिए त्रिपक्षीय मंत्री स्‍तरीय बैठक आयोजित करने संबंधी थाईलैंड की पहल का स्‍वागत किया ताकि इसे जल्‍दी से जल्‍दी कार्यान्वित किया जाए।

एक अन्‍य क्षेत्र जिसे प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा द्वारा उठाया गया वह उनकी देवई परियोजना से संबंधित है। यह एक गहन समुद्री पत्‍तन तथा विशेष आर्थिक क्षेत्र है। थाईलैंड इसे म्‍यांमार के साथ मिलकर विकसित कर रहा है। वे इस परियोजना को बहुत महत्‍व दे रहे हैं तथा वे चाहते हैं कि भारत भी इससे जुड़ जाए, विशेष रूप से भारत की निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा निवेश के माध्‍यम से, और हमने इसका सकारात्‍मक रूप से जवाब दिया है।

आज अपनी बातचीत के दौरान प्रधान मंत्री जी ने बताया कि देवई चेन्‍नई एवं कोलकाता जैसे भारतीय बंदरगाहों को लघु एवं अधिक व्‍यवहार्य रूट उपलब्‍ध कराएगा तथा भारत के उत्‍तर पूर्वी क्षेत्र के विकास को भी बढ़ावा देगा। इस परियोजना में निवेश के अवसरों का पता लगाने तथा विशिष्‍ट सिगमेंट में भागीदारी करने के लिए हम अपनी कंपनियों को प्रोत्‍साहित करेंगे। संयोजकता एवं अवसंरचना पर हमने एक संयुक्‍त कार्य समूह का गठन किया है जो इस मामले के साथ-साथ संयोजकता से संबंधित अन्‍य परियोजनाओं को भी देखेगा तथा सहयोग की रूपरेखा विकसित करेगा। हमने इस परियोजना पर एक रोड-शो का आयोजन करने के लिए थाईलैंड पक्ष को आमंत्रित किया है ताकि इसे और आगे बढ़ाया जा सके।

कुछ संबंधित क्षेत्र जिनके बारे में संयोजकता पर विचार -‍विमर्श किया गया, हमारी एक पूर्व - पश्चिम संयोजकता परियोजना है जो भारत एवं म्‍यांमार को सी एल एम वी देशों से जोड़ती है, तटीय पोत परिवहन व्‍यवस्‍थाओं की संभावना तथा निश्चित रूप से हवाई संयोजकता जहां थाईलैंड एवं भारत में नौ डेस्टिनेशन के बीच प्रति सप्‍ताह कम से कम 150 उड़ानों के साथ उत्‍कृष्‍ट बंदोबस्‍त किया है।

तीसरा प्रमुख क्षेत्र जिसका प्रधान मंत्री जी ने हमारे संबंध की प्रमुख विशेषता के रूप में उल्‍लेख किया वह अर्थव्‍यवस्‍था एवं व्‍यापार से संबंधित है। चूंकि पिछले साल 2012-13 में हमारा व्‍यापार 9.2 बिलियन डालर था तथा भारतीय कंपनियों ने 25 परियोजनाओं में 200 मिलियन डालर मूल्‍य के निवेश की प्रतिबद्धता भी की है, प्रधान मंत्री जी ने इस बात का उल्‍लेख किया कि हमने जो उपलब्धि हासिल की है वह मौजूद क्षमता से काफी कम है।

दोनों नेताओं द्वारा एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण निर्णय लिया गया जो व्‍यापक मुक्‍त व्‍यापक करार से संबंधित है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, इस पर कुछ समय से विचार -विमर्श चल रहा था। दोनों नेताओं ने अपने-अपने वाणिज्‍य मंत्रियों को इन वार्ताओं की व्‍यक्तिगत रूप से जिम्‍मेदारी लेने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दिया था कि वार्ता जल्‍दी से जल्‍दी तथा वरीयत: इस साल अक्‍टूबर से पहले पूरी हो जाए। मेरी समझ से यह ऐसी चीज है जो भारत एवं थाईलैंड के बीच व्‍यापार एवं निवेश संबंध को और विकसित करने में बहुत सार्थक ढंग से योगदान देगी।

एक अन्‍य पहल जिसकी इस यात्रा के दौरान घोषणा की गई वह एक व्‍यवसाय मंच की स्‍थापना से संबंधित है जिसमें हमारे दोनों देशों के बीच निजी व्‍यावसायिक साझेदारी को प्रेरित करने की क्षमता है। प्रधान मंत्री जी ने दिल्‍ली - मुंबई औद्योगिक कोरिडोर, चेन्‍नई - बंगलुरू औद्योगिक कोरिडोर, बौद्ध सर्किट तथा उत्‍तर पूर्व में थाई निवेश को आमंत्रित किया।

एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण क्षेत्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा अंतरिक्ष से संबंधित है जिसे उन करारों से भी देखा जा सकता है जिन पर आज हस्‍ताक्षर किए गए हैं। पुरातात्विक एटलस पर बहुत रोचक करार किया गया है। यह भारत से दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के विस्‍तार को मानचित्रित करने के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी एवं जिओ-स्‍पेटियल प्रौद्योगिकी के उपकरणों को संयोजित करेगा। इस प्रकार, संभावित रूप से यह बहुत रोचक परियोजना है जो उस संयोजकता को हाईलाइट करेगी जिसे हमने सभ्‍यता की दृष्टि से दक्षिण पूर्व एशिया के साथ स्‍थापित किया है। प्रधान मंत्री जी ने वास्‍तव में थाईलैंड को भारत के सभ्‍यतागत पड़ोसी के रूप में बताया।

संस्‍कृति, जन दर जन संपर्क एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण आयाम है जिस पर विचार - विमर्श किया गया। पवित्र महा बोधि वृक्ष के पौधे का विशेष उपहार थाईलैंड के साथ हमारे विशेष रिश्‍ते का प्रतिनिधित्‍व करता है। थाईलैंड नालंदा विश्‍वविद्यालय परियोजना में भी शामिल है जिसका प्रधान मंत्री जी ने थाईलैंड के अपने समकक्ष के साथ अपनी चर्चा स्‍तरीय बातचीत के दौरान आभार व्‍यक्‍त किया।

इस यात्रा के दौरान जिन करारों पर हस्‍ताक्षर किया गया उनमें से एक हिंदी अध्‍ययन के चेयर की स्‍थापना से संबंधित है जो प्रतिष्ठित थम्‍मासेट विश्‍वविद्यालय में भारतीय अध्‍ययन पर भी बल देगा। प्रधान मंत्री यींगलुक शिनवात्रा ने वास्‍तव में इस बात का उल्‍लेख किया कि भारतीय अध्‍ययन अधिक ध्‍यान आकर्षित कर रहे हैं तथा थाईलैंड के अनेक विश्‍वविद्यालय भारतीय अध्‍ययन पर पाठ्यक्रम संचालित कर रहे हैं तथा इससे भी हमारे दोनों देशों के बीच घनिष्‍ट संबंधों का पता चलता है।

दोस्‍तो, समाप्‍त करने से पूर्व, मैं पुन: उस बात का उल्‍लेख करना चाहूँगा जिसे प्रधान मंत्री जी ने अपने दावत भाषण में कहा था। अपने दावत भाषण में उन्‍होंने कहा कि आज हमने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और सुदृढ़ करने के लिए घनिष्‍ट सहयोग, मजबूत संयोजकता, बेहतर वाणिज्‍य की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है तथा इसके अलावा, उन्‍नत समुद्री सुरक्षा से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लाभ प्राप्‍त होंगे, शिक्षा, संस्‍कृति एवं पर्यटन के माध्‍यम से हमारे संबंधों का और विकास होगा। हम साथ मिलकर क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण, संयोजकता को बढ़ावा देने तथा आसियान की केंद्रीय भूमिका पर आधारित खुले, संतुलित एवं नियम पर आधारित क्षेत्रीय वास्‍तुशिल्‍प के विकास के लिए काम करेंगे।

कुल मिलाकर हमारा यह विश्‍वास है कि इस यात्रा ने थाईलैंड के साथ हमारे संबंधों को और गहन करने एवं विविधतापूर्ण बनाने में बहुत सार्थक ढंग से योगदान दिया है जो पहले से ही बहुत सारवान है।

एक महत्‍वपूर्ण बात जिसे मैं हाईलाइट करना चाहता हूँ तथा एक बार पुन: बल देना चाहता हूँ वह यह है कि इस संबंध को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों की ओर से बहुत सशक्‍त प्रतिबद्धता है जो उच्‍च स्‍तरीय आदान - प्रदान में प्रचुर मात्रा में प्रतिबिंबित हुई है जिसे हमने हाल के वर्षों में देखा है तथा जिसे आप आने वाले महीनों में देखेंगे।

धन्‍यवाद।

प्रश्‍न :महोदय, क्‍या प्रधान मंत्री जी ने थाईलैंड के महामहिम नरेश के साथ बैठक की?

थाईलैंड में भारत के राजदूत (श्री अनिल वाधवा): महामहिम नरेश की चिकित्‍सा स्थिति के बारे में इस महीने की 5 तारीख को एक चिकित्‍सा परामर्शी जारी की गई थी तथा उस चिकित्‍सा परामर्शी को इस यात्रा के लिए नहीं उठाया गया था। इसलिए, बोधि वृक्ष प्रधान मंत्री को भेंट किया गया तथा वह इस उपहार को महामहिम नरेश को हस्‍तांतरित कर देंगी।

प्रश्‍न :आप जानते हैं कि महामहिम सम्राट कुछ समय से अस्‍पताल में हैं।

प्रश्‍न :प्रधान मंत्री जी ने इस बारे में बात की तथा आपने भी इस बात का उल्‍लेख किया कि इसमें लगभग 20 साल लग गए। क्‍या आप हमें इस बारे में कुछ बता सकते हैं कि इतना लंबा समय क्‍यों लग गया? दूसरा, आपने कहा कि भारत ने कुछ अनुरोध किया था। इनमें से कितने अनुरोध हैं?

सचिव (पूर्व) :प्रत्‍यर्पण संधि आमतौर पर कठिन विषय हुआ करती है क्‍योंकि इसमें कुछ समय लगता है। इस मामले में, मेरी समझ से जो बात महत्‍वपूर्ण है वह यह है कि हमने इन वार्ताओं को सफल अंजाम पर पहुंचाया तथा हमने प्रत्‍यर्पण संधि पर हस्‍ताक्षर किया है। और यह केवल एकबारगी करार नहीं है। जैसा कि मैंने बताया यह करारों एवं समझौतों के बहुत व्‍यापक वास्‍तुशिल्‍प का अंग है जिन्‍हें हमने स्‍थापित किया है। अब, आप इनमें से एक या दो मामलों के बारे में जानते हैं। मैं राजदूत वाधवा जी से भी अनुरोध करूँगा कि वह इस बारे में थोड़ा विस्‍तार से बताएं। हमने कोई विशिष्‍ट अनुरोध नहीं किया है जिसमें उस व्‍यक्ति से संबंधित अनुरोध भी शामिल है जो मुंबई से भगोड़ा घोषित है। हमने सैयद मुजाकिर मुदस्‍सर हुसैन उर्फ मुन्‍ना झिंगादा के प्रत्‍यर्पण के लिए औपचारिक रूप से अनुरोध किया है। वह अंडरवर्ल्‍ड से जुड़ा भगोड़ा है जो अनेक मामलों में मुंबई पुलिस द्वारा भारत में वांछित है। वह झूठी पहचान के तहत थाईलैंड की एक जेल में सजा काट रहा है। हमने थाईलैंड सरकार को संगत सूचना उपलब्‍ध करायी है तथा वे इस मामले पर विचार कर रहे हैं।

अनिल, क्‍या आप इसमें कुछ और जोड़ना चाहेंगे?

थाईलैंड में भारत के राजदूत :मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि थाईलैंड के साथ हमने पिछले साल जब एम एल ए टी करार पर हस्‍ताक्षर किया तो उसके बाद से वार्ता में बहुत तेज गति से प्रगति हुई। मेरी समझ से यह इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए दोनों देशों की ओर से सामान्‍य इच्‍छा को प्रतिबिंबित करता है ताकि यह आश्‍वस्‍त करने के लिए कोई कानूनी आधार हो कि इस तरह के मामलों पर शीघ्रता के साथ कार्रवाई हो सके। मैं नहीं समझता कि हम अनेक मामलों में पड़ सकते हैं क्‍योंकि समय - समय पर इनमें परिवर्तन होता रहता है। यह बहुत लोचपूर्ण एवं उतार - चढ़ाव से पूर्ण है। इस प्रकार, मैं नहीं समझता कि किसी संख्‍या का उल्‍लेख करना उचित होगा। अनुरोध इतने ज्‍यादा नहीं हैं परंतु मुझे पूरा यकीन है कि अब चूंकि यह प्रत्‍यर्पण संधि स्‍थापित हो गई है, हम इस तरह के मामलों का शीघ्रता से समाधान करने में समर्थ हो सकेंगे।

प्रश्‍न :आज की वार्ता के बाद दोनों प्रधान मंत्रियों द्वारा जो संयुक्‍त वक्‍तव्‍य जारी किया गया है उसके बिंदु संख्‍या 11 की ओर मैं आप सबका ध्‍यान आकर्षित करना चाहूँगा। इस चीज की आवश्‍यकता के बारे में विशेष रूप से उल्‍लेख किया गया है जिसको लेकर मुझे थोड़ा कुतूहल है तथा क्‍या आप इसे स्‍पष्‍ट करना चाहेंगे और इस संबंध में ब्‍यौरा उपलब्‍ध कराना चाहेंगे। ''इस सिलसिले में थाईलैंड के अपेक्षित क्षेत्रों में भारत से श्रम की विनियमित तैनाती को समर्थ बनाने के लिए एक रूपरेखा की स्‍थापना के लिए वे एक प्रस्‍ताव पर चर्चा करने के लिए सहमत हुए।” क्‍या आप थोड़ा विस्‍तार से बता सकते हैं कि ये क्षेत्र कौन हैं तथा क्‍या श्रम की आवाजाही दोनों ओर से है?

थाईलैंड में भारत के राजदूत :मेरी समझ से यहां मुद्दा यह है कि थाईलैंड को विशेष रूप से ऐसी परियोजनाओं के लिए श्रमिकों की सामान्‍य अल्‍पता की समस्‍या का सामना करना पड़ रहा है जिन्‍हें पड़ोसी देशों में कार्यान्वित किया जा रहा है। स्‍पष्‍ट रूप से श्रमिकों की आवश्‍यकता है तथा थाईलैंड ने इस प्रयोजनार्थ पड़ोसी देशों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्‍ताक्षर किया है। जहां तक भारत का संबंध है, जैसा कि आप सभी जानते हैं। अतीत में भारत ने अनेक देशों को तथा मुख्‍य रूप से खाड़ी के देशों को तथा मध्‍य पूर्व को श्रमिकों का निर्यात किया है। साथ ही हम हमेशा चाहते हैं कि हमारे श्रमिकों के बाहर जाने के लिए एक विनियमित रूपरेखा हो ताकि उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके और उनके साथ दुर्व्‍यवहार न हो। इस प्रयोजनार्थ, दोनों पक्षों की ओर से दो बातों पर विचार किया जा रहा है। थाईलैंड पक्ष की ओर से श्रम मंत्रालय तथा भारतीय पक्ष की ओर से प्रवासी भारतीय मामले मंत्रालय, एक मुद्दा सामाजिक सुरक्षा करार पर हस्‍ताक्षर से संबंधित है जो इस समय वार्ता के अधीन है तथा दूसरा मुद्दा रूपरेखा एम ओ यू को देखना है जो भारत से थाईलैंड में या तीसरे देशों में श्रमिकों की आवाजाही को विनियमित करेगा।

अगली 6 माह की अवधि में यह कार्य हो जाएगा तथा इसके बाद हम यह कहने की स्थिति में होंगे कि क्‍या हम इस एम ओ यू तथा इस करार पर हस्‍ताक्षर कर सकते हैं। यह करार सतत रूप से जारी एफ टी ए वार्ता में भी एक उपयोगी निविष्टि है। इस प्रकार, हम थाईलैंड के श्रम मंत्रालय के साथ इस दिशा में काम कर रहे हैं।

प्रश्‍न :महोदय, ‘पूरब की ओर देखो नीति’ को वास्‍तव में प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल के दौरान शुरू किया गया था। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए कि वास्‍तव में एक नई शताब्दी शुरू हो चुकी है, क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता कि प्रधान मंत्री जी की थाईलैंड यात्रा बहुत देर से हो रही है?

सचिव (पूर्व) :सबसे पहले मैं यह कहना चाहूँगा कि ‘पूरब की ओर देखो नीति’ को वास्‍तव में इससे भी थोड़ा पहले लांच किया गया था। वास्‍तव में इसकी शुरूआत प्रधान मंत्री नरसिम्‍हा राव के कार्यकाल के दौरान 1990 के दशक के पूर्वार्ध में हुई थी। ऐसा नहीं है कि प्रधान मंत्री जी ने थाईलैंड का दौरा नहीं किया है। वास्‍तव में यह थाईलैंड का उनका तीसरा दौरा है। यदि सही अर्थों में कहा जाए, तो पिछले दौरे द्विपक्षीय दौरे नहीं थे, वे बहुपक्षीय संदर्भ में थे। परंतु इसके बावजूद वे थाईलैंड के दौरे थे।

जैसा कि प्रधान मंत्री जी ने कहा है, थाईलैंड अनेक कारणों से हमारे सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण साझेदारों में से एक है, सामरिक लोकेशन के कारण, विभिन्‍न क्षेत्रों में इस देश के साथ विभिन्‍न प्रकार की हमारी भागीदारी के कारण, दक्षिण पूर्व एशिया के गेटवे के रूप में, आसियान के स्प्रिंग बोर्ड के रूप में। इस प्रकार, हम इसे बहुत महत्‍व देते हैं। परंतु आपने हमारे आदान - प्रदान एवं रिश्‍तों में कतिपय बढ़ोत्‍तरी देखी होगी। मेरी समझ से इससे भी उस महत्‍व का पता चलता है जो हम अपने थाई मित्रों को प्रदान करते हैं।

प्रश्‍न :अब म्‍यांमार के खुलने के संदर्भ में - मेरा विश्‍वास है कि भारत के प्रधान मंत्री पिछले साल वहां गए थे तथा उन्‍होंने अवसंरचना विकास के लिए 500 मिलियन डालर की सहायता की घोषणा की थी - और भारत वास्‍तव में इन सभी दशकों में वहां मौजूद नहीं था जिसकी वजह से इन सभी वर्षों में म्‍यांमार में अपनी उपस्थिति का हम अवसर खो चुके हैं, क्‍या म्‍यांमार में प्रवेश करने के लिए एक बड़े मोर्चेबंदी के रूप में थाईलैंड का प्रयोग करके भारत और थाईलैंड सहयोग पर कोई विचार - विमर्श हुआ?

सचिव (पूर्व) :सबसे पहली बात यह है कि मेरी समझ से यह कहना सही नहीं है कि भारत मौजूद नहीं है या म्‍यांमार में मौजूद नहीं रहा है। वास्‍तव में, विभिन्‍न क्षेत्रों में म्‍यांमार में हमारी बहुत व्‍यापक मौजूदगी है। अब मैं आपके प्रश्‍न के दूसरे भाग पर आता हूँ। जी हां, म्‍यांमार का उल्‍लेख हुआ किंतु यह उल्‍लेख इस संदर्भ में अधिक था कि कैसे हम म्‍यांमार के माध्‍यम से संयोजकता में वृद्धि कर सकते हैं।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, हमारी एक भारत - म्‍यांमार - थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना है जिसे भारत और थाईलैंड बहुत अधिक महत्‍व प्रदान करते हैं। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ, अन्‍य संयोजकता परियोजनाएं जिसमें देवई गहन समुद्री बंदरगाह, एक विशेष आर्थिक क्षेत्र, म्‍यांमार से गुजरने वाले अन्‍य आर्थिक कोरिडोर शामिल हैं, चर्चा के दौरान इनका जिक्र हुआ।

प्रश्‍न :दोनों देशों के बीच एफ टी ए पर लगभग एक दशक से बात चल रही है। अब आप यह कह रहे हैं कि आप उम्‍मीद करते हैं कि यह अक्‍टूबर तक हो जाएगा।

सचिव (पूर्व) :वरीयत: अक्‍टूबर तक, मैंने कहा कि जितना जल्‍दी संभव हो सके उतना जल्‍दी, वरीयत: अक्‍टूबर तक।

प्रश्‍न :इसमें रूकावट क्‍या है?

सचिव (पूर्व) :भारत - थाईलैंड के मामले में आपको जो बात समझने की जरूरत है वह यह है कि ऐसा नहीं है कि दशकों के विचार - विमर्श से कोई परिणाम प्राप्‍त नहीं हुआ है। हमने 2003 में थाईलैंड के साथ एक रूपरेखा एफ टी ए स्‍थापित किया था। 2004 में हमने इसे और आगे बढ़ाया। इस प्रकार, इन वार्ताओं के फलस्‍वरूप व्‍यापार में बहुत उल्‍लेखनीय उदारीकरण का मार्ग प्रशस्‍त हुआ। इस समय हम जिस चीज का प्रयास कर रहे हैं वह एक व्‍यापक एफ टी ए है जिसके तहत न केवल माल में व्‍यापार शामिल होगा अपितु सेवाओं में व्‍यापार तथा दोतरफा निवेश प्रवाह भी शामिल होगा। नवंबर, 2012 में औपचारिक बातचीत के पिछले चक्र के बाद से हाल के महीनों में हमने अच्‍छी प्रगति की है। अनौपचारिक विचार - विमर्श के अलावा वीडियो कांफ्रेंसिंग भी हुई है। और मेरा विश्‍वास है कि अनेक मुद्दों का समाधान कर लिया गया है। अभी कुछ मुद्दे बकाया हैं जिनका समाधान करने की जरूरत है। दोनों नेताओं ने अपने-अपने वाणिज्‍य मंत्रियों से यह देखने के लिए अनुरोध किया है कि उन मुद्दों का समाधान जल्‍दी से जल्‍दी किया जाए।

प्रश्‍न :इस प्रकार, यह एक तरह से सी ई पी ए का संक्षिप्‍त रूप है।

सचिव (पूर्व) :यह बस नामकरण से जुड़ा प्रश्‍न है। यह एक व्‍यापक एफ टी ए भी है। यह माल में व्‍यापार से आगे भी जाता है।

प्रश्‍न :क्‍या आज किसी सांस्‍कृतिक करार पर हस्‍ताक्षर किया गया?

सचिव (पूर्व) :जी, हां। वास्‍तव में हमने उन करारों का ब्‍यौरा आपको उपलब्‍ध करा दिया है। हमने एक हिंदी चेयर की स्‍थापना के संबंध में एक एम ओ यू पर हस्‍ताक्षर किया है जो वास्‍तव में थम्‍मासेट विश्‍वविद्यालय में भारतीय अध्‍ययन चेयर होगा। मैंने पुरातात्विक एटलस का उल्‍लेख किया था। मेरा विश्‍वास है कि इसका भी सांस्‍कृतिक पहलुओं से बहुत गहरा संबंध है तथा इसके अतिरिक्‍त आयाम हैं। इसके अलावा निश्चित रूप से बहुत महत्‍वपूर्ण पहल - भारत - थाईलैंड विनिमय कार्यक्रम - यह वास्‍तव में ऐसी है जिसे हमने अब तक अपने पड़ोसी देशों के साथ बहुत उपयोगिता के साथ किया है। वास्‍तव में, मैं कोलंबों से आ रहा हूँ जहां श्रीलंका - भारत फाउंडेशन उपलब्‍ध साधनों में से बहुत उपयोगी साधन है तथा दोनों देशों के राजदूत इसके सह अध्‍यक्ष हैं। इस प्रकार, अब हमने थाईलैंड के साथ भी इसी तरह की एक पहल शुरू की है।

सरकारी प्रवक्‍ता :आप सभी का बहुत - बहुत धन्‍यवाद।

(समाप्‍त)



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