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प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे की यात्रा : भारत - जापान संबंधों की पराकाष्‍ठा

जनवरी 22, 2014

लेखक : आर्चिस मोहन

जापान के प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे इस साल गणतंत्र दिवस परेड में मुख्‍य अतिथि होंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है जब इस अवसर पर कोई जापानी डिग्‍नेटरी मौजूद होगा।

नई दिल्‍ली और टोकियो प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे की भारत की आगामी यात्रा को भारत - जापान द्विपक्षीय संबंधों की पराकाष्‍ठा के रूप में देख रहे हैं, जो जापान के सम्राट अकिहितो एवं साम्राज्ञी मिचिको की अब तक की पहली ऐतिहासिक भारत यात्रा के लगभग डेढ़ महीने बाद हो रही है।

एशिया की नंबर दो एवं नबंर तीन अर्थव्‍यवस्‍थाओं के बीच सहयोग इतने व्‍यापक क्षेत्रों में कभी भी इतना करीबी नहीं रहा है। इन क्षेत्रों में व्‍यापार, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा तथा रक्षा भी शामिल हैं जिसमें अब काफी वृद्धि हो रही है। जापान के रक्षा मंत्री श्री इत्‍सुनोरी आनोडेरा भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग गहन करने पर चर्चा करने के लिए इस माह के शुरू में नई दिल्‍ली आए थे।

जापान के सम्राट एवं साम्राज्ञी, जापान के रक्षा मंत्री ओनोडेरा की यात्राएं तथा प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे की आगामी यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब जापान अपनी वर्तमान भू-सामरिक चुनौतियों को अधिक सामंजस्‍यपूर्ण बनाने के लिए अपने दृष्टिकोण की समीक्षा कर रहा है। प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे लंबे समय से मजबूत भारत - जापान सामरिक संबंधों के पक्षधर रहे हैं। (नवबरं - दिसंबर, 2013 में जापान की अपनी यात्रा के दौरान राष्‍ट्रपति भवन में औपचारिक स्‍वागत के अवसर पर सम्राट अकिहितो एवं साम्राज्ञी मिचिको)

अबे : मजबूत भारत जापान के सर्वोत्‍तम हित में है

सितंबर, 2011 में भारतीय विश्‍व मामले परिषद (आई सी डब्‍ल्‍यू ए) में एक व्‍याख्‍यान में प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे ने कहा था: ''मजबूत भारत जापान के सर्वोत्‍तम हित में है, और मजबूत जापान भारत के सर्वोत्‍तम हित में है।’’ 2012 के अंत में, जापान के प्रधान मंत्री के रूप में वापस लौटने के बाद मजबूत भारत - जापान संबंधों के लिए भरपूर प्रयास किया है। वह 1948 के बाद इस पद पर वापस लौटने वाले जापान के अब तक के पहले पूर्व जापानी प्रधान मंत्री हैं।

श्री शिंजो अबे सितंबर, 2006 से सितंबर, 2007 तक एक वर्ष के लिए जापान के प्रधान मंत्री थे जिसके दौरान उन्‍होंने भारत - जापान द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने के लिए बहुत काम किया। 2007 में, श्री शिंजो अबे भारतीय संसद के संयुक्‍त सत्र को संबोधित करने वाले जापान के पहले प्रधान मंत्री बने। उन्‍होंने भारत के संसद सदस्‍यों को भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय के बारे में बताया जब श्री शिंजो अबे के नाना तथा जापान के तत्‍कालीन प्रधान मंत्री श्री नोबुसुके किशी की 1957 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मेजबानी की थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक सार्वजनिक स्‍वागत समारोह में श्री किशी का परिचय इस रूप में दिया था : ''यह जापान के प्रधान मंत्री हैं, जो ऐसा देश है जिसका मैं सबसे अधिक सम्‍मान करता हूँ।'' द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद किसी सार्वजनिक रैली में जापान के किसी प्रधान मंत्री का इस तरह से गुणगान किया जाना दुर्लभ चीज थी तथा वह भी पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे व्‍यक्तित्‍व वाले किसी नेता द्वारा।चित्र में : 30 मई, 1957 को नई दिल्‍ली में जापान के प्रधान मंत्री नोबुसुके किशी के साथ प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू

श्री शिंजो अबे ने 2011 में आई सी डब्‍ल्‍यू ए में अपने भाषण में स्‍मरण सुनाया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाव-भाव उनके नाना को कितने गहरे तक छू गए थे। श्री शिंजो अबे ने कहा: ''उनके घुटने पर बैठे नन्‍हें बालक के रूप में मैं उनको मुझसे यह कहते हुए सुन रहा था प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सबसे बड़ी भीड़ के समक्ष उनका परिचय कराया, उन्‍होंने अपने जीवन में दस लाख लोगों की भीड़ कभी नहीं देखी है। उन्‍होंने मुझसे कहा कि भारत ही था जो उनके ओ डी ए को स्‍वीकार करने के लिए किसी अन्‍य देश के सामने आगे आया, जिसे जापान अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के सदस्‍य के रूप में प्रदान करना चाहता था। इस सबके लिए वह अपने पूरे जीवन में गहन रूप से आभारी बने रहे।''

जापान भारत के लिए सबसे बड़ा द्विपक्षीय दाता बना हुआ है। ओडीए (आधिकारिक विकास सहायता) ने भारत में अनेक अवसंरचना परियोजनाओं की सहायता की है। मार्च, 2013 तक जापान ने संचयी रूप से 40 बिलियन अमरीकी डालर के ओ डी ए की प्रतिबद्धता की है। फरवरी, 2013 की स्थिति के अनुसार, इस सहायता से 60 से अधिक परियोजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं। ये परियोजनाएं विद्युत क्षेत्र, परिवहन, पोत परिवहन, रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा आदि जैसे क्षेत्रों में हैं।

द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद जापान को भारत का महत्‍वपूर्ण राजनीतिक समर्थन

जापान के सम्राट एवं साम्राज्ञी की हाल की यात्रा भारत - जापान संबंधों में एक अन्‍य ऐतिहासिक क्षण थी। इस युगल ने पांच दशक पहले भारत की जो यात्रा की थी उसे दोहराया। क्राउन प्रिंस अकिहितो एवं प्रिंसेज मिचिको की 1960 की यात्रा ने मैत्री का मजबूत हाथ स्‍वीकार था जिसे नव स्‍वतंत्र भारत ने जापान की ओर बढ़ाया था जो पहले से ही आर्थिक महाशक्ति था किंतु उस क्षति से उबर रहा था जो द्वितीय विश्‍व युद्ध से उसका आर्थिक एवं सामाजिक जीवन नष्‍ट हो गया था।

भारत की मैत्री की अभिव्‍यक्ति इंडियन नेशनल आर्मी (आई एन ए) की सहायता करने के लिए जापान के प्रति इसका आभार थी। जापान ने इंडियन नेशनल आर्मी के गठन में सहायता के लिए सुभाष चंद्र बोस के अनुरोध पर भारत के युद्ध कैदियों को रिहा कर दिया था, जो सिंगापुर, बर्मा एवं उत्‍तर पूर्व भारत में जापान के साथ-साथ लड़े थे। इंफाल में युद्ध शमशान, जहां भारत एवं जापान के सैनिकों का एक साथ अंतिम संस्‍कार किया गया था, इस बलिदान का साक्षी है। 1950 के दशक में प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जापान को भारी मात्रा में खनिज की आपूर्ति करने के लिए भारत के लौह अयस्‍क के निर्यातकों को प्रेरित किया ताकि जापान के इस्‍पात उद्योग के पुनर्निर्माण में सहायता प्रदान की जा सके। यह ऐसा समय था जब आस्‍ट्रेलिया एवं अन्‍य देशों से लौह अयस्‍क प्राप्‍त करना जापान के लिए कठिन कार्य था।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने, मानवीय भंगिमा, जिसे आज भी याद किया जाता है, के साथ टोकियों के यूनो जू को हाथी का एक बच्‍चा दान में दिया। इस चिडि़याघर के अधिकांश जानवरों को युद्ध के वर्षों के दौरान जहर दे दिया गया था या भूख से उनकी मौत हो गई थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा के नाम पर इस हाथी का नाम रखा गया जिसने जापान के बच्‍चों का खूब मनोरंजन किया। 1983 में इसकी मौत पर जापान में काफी शोक मनाया गया।(1957 में टोकियो में सम्राट हीरोहितो, साम्राज्ञी नगाको तथा क्राउन प्रिंस अकिहितो के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा उनकी बेटी इंदिरा)

ये वर्ष ऐसे भी थे जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्‍व में भारत ने सैन फ्रांसिसको की शांति संधि पर हस्‍ताक्षर करने से मना कर दिया, जिसे जापान ने अपनी गरिमा पर बहुत ठेस पहुंचाने वाला पाया। 48 देशों द्वारा 8 सितंबर, 1951 को इस संधि पर हस्‍ताक्षर किया गया तथा यह संधि 28 अप्रैल, 1952 को लागू हुई। भारत ने माना कि यह संधि जापान की संप्रभुता पर अनुचित प्रतिबंध लगा रही है। भारत ने जापान के साथ 1952 में एक अलग शांति संधि पर हस्‍ताक्षर किया जिसने प्रायश्चित करने वालों के सभी अधिकारों को छूट प्रदान की।

इससे जुड़ा एक अन्‍य उदाहरण जिसमें भारतीयों ने भारत के साथ अपनी एकता का परिचय दिया। टोकिया युद्ध अपराध अधिकरण में राधाबिनोद पाल भारतीय न्‍यायमूर्ति थे जिन्‍होंने अन्‍य न्‍यायाधीशों के इस दावे से असहमति व्‍यक्‍त की कि ट्रायल युद्ध के विजेताओं द्वारा कठोर दंड की कवायद है तथा यह कि जापान के युद्धकाल के नेता दोषी नहीं हैं।

प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने 16 दिसंबर, 2006 को डायट में एक भाषण में भारत - जापान संबंधों में पाल के योगदान को याद किया। ''युद्ध के पश्‍चात न्‍यायमूर्ति राधाबिनोद पाल के सिद्धांतों पर निर्णय को जापान में आज भी याद किया जाता है। देवियो एवं सज्‍जनो, ये घटनाएं हमारी मैत्री की गहराई तथा इस तथ्‍य को दर्शाती हैं कि हमने अपने इतिहास के नाजुक क्षणों में एक दूसरे का साथ दिया है।'' जापान के प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे ने अगस्‍त, 2007 में कोलकाता में न्‍यायमूर्ति राधाबिनोद पाल के अस्‍सी वर्ष के बूढ़े बेटे प्रशांत से मुलाकात की।

भारत - जापान संबंधों में सद्भाव के ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। जापान के राजनेता 1989 में सम्राट शोवा (हीरोहितो) के निधन के समय भारत में राष्‍ट्रीय शोक की घोषणा का बड़े चाव से उल्‍लेख करते हैं। तथापि, 1960 से 1980 के दशकों के बीच घनिष्‍ट संबंधों की यह गति थोड़ी कमजोर पड़ी थी। जापान के प्रधान मंत्री हयातो इकेडा ने 1961 में भारत का दौरा किया था परंतु जापान के किसी प्रधान मंत्री द्वारा अगली यात्रा लगभग दो दशक बाद प्रधान मंत्री यसुहीरो नकासोने द्वारा 1984 में हुई। प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने 1988 में टोकियो का दौरा किया, जिससे स्‍थायी राजनीतिक संपर्कों के पुनरूद्धार की शुरूआत हुई।

शांतिपूर्ण एशिया के निर्माण के लिए साझेदारी

आज जापान और भारत सबसे करीबी दोस्‍त हैं। वर्ष, 2006 से टोकियो के साथ वार्षिक शिखर बैठकों का नई दिल्‍ली का एक संस्‍थानीकृत सिस्‍टम है। रूस एकमात्र दूसरा देश है जिसके साथ भारत ने यह तंत्र स्‍थापित किया है। प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने 17वीं वार्षिक बैठक के लिए मई, 2013 में जापान का दौरा किया था।

भारत और जापान ऐसे साझेदार है जो शांतिपूर्ण एवं स्थिर एशिया - प्रशांत क्षेत्र का तानाबाना बुनने में व्‍यस्‍त हैं। एशिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों तथा एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में से दो अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में यह नई दिल्‍ली एवं टोकियो के हित में हैं तथा उनकी यह जिम्‍मेदारी भी है कि इस क्षेत्र का समुद्री वाणिज्‍य न केवल भारत एवं जापान अपितु एशिया के सभी देशों के लिए भी परस्‍पर आर्थिक समृद्धि में योगदान करने के लिए अबाध रूप से जारी रहे।

मजबूत आर्थिक संबंध

भारत आज भी जापान को ऐसे कुछ एक देशों के रूप में याद करता है जिसने 1991 में भुगतान संतुलन के संकट के दौरान भारत की सहायता की है। 1980 के दशक के पूर्वार्ध में, जापान के सुजुकी मोटर्स ने अपने मारूति 800 के माध्‍यम से भारत के लाखों मध्‍यमवर्गीय लोगों के लिए कार का स्‍वामी बनने के सपने को साकार करते हुए भारतीयों के यात्रा करने के तरीके को बदल दिया। एक दशक से थोड़ा अधिक समय बाद, एक बार फिर जापान ने दिल्‍ली के यात्रा करने के तरीके को बदल दिया। दिल्‍ली मेट्रो के निर्माण में जापान के योगदान तथा दर्जनों अन्‍य शहरों में इसी तरह की परियोजनाओं में इसकी सहायता सर्वविदित है, जैसे कि दिल्‍ली - मुंबई औद्योगिक कोरिडोर परियोजना तथा मुबंई - दिल्‍ली तथा दिल्‍ली - हावड़ा मार्गों पर समर्पित फ्रेट कोरिडोर परियोजनाओं में जापान की सहायता।

तथापि, भारत एवं जापान को अपने द्विपक्षीय व्‍यापार में तेजी लाने की जरूरत है। यह व्‍यापार 2011-11 में 18.43 बिलियन अमरीकी डालर था, जो मामूली रूप से बढ़कर 2012-13 में 18.61 बिलियन अमरीकी डालर हो गया है। 2012-13 में भारत का जापान को निर्यात 6.1 बिलियन अमरीकी डालर था तथा आयात 12.51 बिलियन अमरीकी डालर था।

भारत - जापान व्‍यापक आर्थिक साझेदारी करार (सी ई पी ए) अगस्‍त, 2011 में लागू हुआ। भारत द्वारा निष्‍पादित किए गए इस तरह के सभी करारों में से यह सर्वोत्‍तम व्‍यापक करारों में से एक है तथा विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्‍य भारत एवं जापान के बीच व्‍यापार की लगभग 94 प्रतिशत मदों से टैरिफ का उन्‍मूलन करना है। उम्‍मीद है कि यह करार द्विपक्षीय व्‍यापार की मात्रा बढ़ाने में सहायता प्रदान करेगा।(2007 में नई दिल्‍ली की अपनी यात्रा के दौरान प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे)

भारत - जापान तथ्‍य पत्रक:

  • अगस्‍त, 2000 : प्रधान मंत्री योशिरो मोरी तथा प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘21वीं शताब्‍दी में वैश्विक साझेदारी’ पर हस्‍ताक्षर किया
  • 2006 : प्रधान मंत्री श्री शिंजो अबे तथा प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने ‘भारत - जापान सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी’ पर हस्‍ताक्षर किया तथा पहली वार्षिक शिखर बैठक का भी आयोजन किया
  • 2007 : श्री शिंजो अबे तथा डा. मनमोहन सिंह ने ‘भारत एवं जापान के बीच सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी के नए आयामों के लिए रोड मैप’ पर तथा ‘पर्यावरणीय संरक्षण तथा ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग में वृद्धि’ पर हस्‍ताक्षर किया
  • 2008 : ‘सुरक्षा सहयोग’ पर एक संयुक्‍त घोषणा तथा ‘भारत एवं जापान के बीच सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी की उन्‍नति’ पर एक संयुक्‍त वक्‍तव्‍य पर हस्‍ताक्षर किया गया
  • 2009 : ‘भारत - जापान सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी का नया चरण’ पर संयुक्‍त घोषणा पर हस्‍ताक्षर किया गया
  • 2010 : ‘अगले दशक में भारत - जापान सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी के लिए विजन’ तथा ‘भारत - जापान व्‍यापक आर्थिक साझेदारी करार (सी ई पी ए)’ पर एक संयुक्‍त वक्‍तव्‍य
  • 2011 : राजनयिक संबंधों की स्‍थापना की 60वीं वर्षगांठ के वर्ष में प्रवेश करने पर ‘भारत - जापान सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी में वृद्धि के लिए विजन’ नामक संयुक्‍त वक्‍तव्‍य
*आर्चिस मोहन स्‍टार्ट पोस्‍ट डाट कॉम के विदेश नीति संपादक हैं। यहां व्‍यक्‍त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।

 



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