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इडसा, नई दिल्‍ली में ‘भारत का विस्‍तारित पड़ोस : संभावनाएं एवं चुनौतियां’ पर छठवें आईआईएसएस - एमईए संवाद में सचिव (पूर्व) द्वारा बीज भाषण

मार्च 04, 2014

विदेश मंत्रालय, अंतर्राष्‍ट्रीय सामरिक अध्‍ययन संस्‍थान (आई आई एस एस), लंदन और इडसा, नई दिल्‍ली के बीच संवाद के पांचवें संस्‍करण को संबोधित करने के लिए मुझे आमंत्रित करने के लिए आपका धन्‍यवाद। मैं आई आई एस एस के अपने दोस्‍तों का विशेष रूप से स्‍वागत करना चाहूँगा जो लंबी यात्रा तय करके हमारे साथ उपस्थित हुए हैं ताकि भारत की विदेश नीति के इस उभरते आयाम पर इस महत्‍वपूर्ण चर्चा को समृद्ध कर सकें।

देवियो एवं सज्‍जनो, इस सम्‍मेलन के लिए चुना गया विषय ''भारत का विस्‍तारित पड़ोस : संभावनाएं एवं चुनौतियां’’ बहुत संगत है तथा समय के इस महत्‍वपूर्ण अवसर पर अधिक महत्‍वपूर्ण है जब भारत के आर्थिक एवं सामरिक हित अधिक मात्रा में बड़े एशियाई गोलार्ध के साथ जुड़ रहे हैं जो हमारे सन्निकट दक्षिण एशियाई पड़ोस से काफी आगे तक जाता है। स्‍पष्‍ट रूप से हमारा सन्निकट पड़ोस अर्थात दक्षिण एशिया हमारे राष्‍ट्रीय हितों के लिए निर्णायक रूप से महत्‍वपूर्ण बना हुआ है, परंतु भारत की विकासशील अर्थव्‍यवस्‍था, बड़े सन्निकट क्षेत्र में बढ़ते राजनयिक प्रोफाइल एवं बहुस्‍तरीय हितों को देखते हुए आज भारत व्‍यापार, निवेश एवं सामरिक सरोकारों के जटिल जाल में अधिक एकीकृत है जो इसके सन्निकट पड़ोस के साथ बढ़ती भागीदारी के अभिन्‍न अंग हैं। हमारे राष्‍ट्रीय हितों को आगे बढ़ाते हुए भारत न केवल पूरब की ओर देख रहा है - स्‍पष्‍ट रूप से पूरब की ओर देखो नीति काफी सफल रही है तथा प्रत्‍येक गुजरते वर्ष के साथ नए मील पत्‍थरों को पार कर रही है - परंतु यह उत्‍तर की ओर भी देख रहा है, पश्चिम की ओर देख रहा है और दक्षिण की ओर देख रहा है, यह सब इसके विस्‍तारित पड़ोस एवं इससे आगे के कंपास के अंदर हो रहा है।

तात्विक दृष्टि से भारत की विदेश नीति बहु-आयामी एवं सर्वदिशीय हो रही है - एक तरह का 360 डिग्री विजन जिसकी मांग तेजी से बदलती विश्‍व व्‍यवस्‍था द्वारा की जा रही है - जो इसके 1.2 बिलियन प्‍लस लोगों की आकांक्षाओं से उत्‍पन्‍न हो रहा है तथा विश्‍व व्‍यवस्‍था में एक अनपेक्षित फ्लक्‍स के प्रति दक्षता के साथ कार्रवाई कर रहा है। विशेषज्ञों के इस समुदाय में पश्चिम से पूरब की ओर तथा पश्चिम से शेष विश्‍व की ओर आर्थिक शक्ति के भूकंपीय परिवर्तन - जो 21वीं शताब्‍दी के पहले दशक की निश्‍चायक रूझान है और ऐसी रूझान है जो आज भी जारी है - के बारे में शायद ही ज्‍यादा कुछ बताने की जरूरत है। परंतु सत्‍ता का यह वैश्विक स्‍तर पर ऐतिहासिक परिवर्तन भारत की विदेश नीति के व्‍यवहार्य एवं निरूपण में ''विस्‍तारित पड़ोस’’ पर निरंतर अधिक बल के लिए उपयुक्‍त संदर्भ प्रदान करता है।

पहली चीजों को पहले रखते हुए इस परिव्‍यापक क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियां एवं अवसरों का उल्‍लेख करने से पूर्व मैं उस संकल्‍पना को संक्षेप में प्रतिपादित करना चाहूँगा जिसे भारत अपने विस्‍तारित पड़ोस के रूप में देखता है। कुछ विद्वान एवं विशेषज्ञ ऐसे हैं जिन्‍होंने विस्‍तारित पड़ोस की संकल्‍पना को भारत की विदेश नीति के व्‍यवहार्य एवं वार्तालाप में अपेक्षाकृत नए इंजेक्‍शन के रूप में प्रतिपादित किया है। यद्यपि यह सच है कि विस्‍तारित पड़ोस नामक पद को पिछले डेढ़ दशक में भारत की विदेश नीति के हितों की अभिव्‍यक्ति में घोषित बल प्राप्‍त हुआ है, फिर भी विस्‍तारित पड़ोस की संकल्‍पना आजादी के समय से ही भारत की विदेश नीति को आकार देती आ रही है। दार्शनिक दृष्टि से विस्‍तारित पड़ोस नामक पद वसुधैव कुटुम्‍बकम के प्राचीन वैदिक आदर्श में अभिन्‍न रूप से सम्मिलित है, जिसका आशय यह है कि समूचा विश्‍व एक बड़ा परिवार है। वसुधैव कुटुम्‍बकम का आदर्श संभवत: विदेश नीति के भूमंडलीकृत नजरिए के सबसे प्राचीन प्रतिपादनों में से एक है और एक विश्‍व के आदर्श का उपयुक्‍त संघनन है जहां विश्‍व के एक भाग की घटनाएं अनिवार्य रूप से ध्रुव के दूसरे छोर को प्रभावित करती हैं, हालांकि ऊपरी तौर। विश्‍व एवं मानवता के आपस में जुड़े होने की यह भावना विश्‍व के साथ, और विशेष रूप से इसके विस्‍तारित पड़ोस के साथ भारत की भागीदारी को जन्‍म देती है।

आप जितने करीब होंगे - भौगोलिक दृष्टि से, आर्थिक दृष्टि से और सांस्‍कृतिक दृष्टि से - विदेश नीति एवं सामरिक हितों के पुन: संरूपण एवं घनिष्‍ठ अंत:क्रिया की आवश्‍यकता उतनी अधिक होगी। भारत की आजादी से पूर्व भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मार्च, 1947 में नई दिल्‍ली में एशियाई संबंध सम्‍मेलन में उत्‍थानशील एशिया के बारे में वाकपटुता के साथ अपनी बात रखी थी। चीन, मिस्र एवं अरब जगत, ईरान, इंडोनेशिया एवं भारत - चीन, तुर्की, कोरिया, मंगोलिया, थाईलैंड (सियाम), मलय, फिलीपीन्‍स, मध्‍य एशिया, सभी हमारे पड़ोसी हैं, जिसमें आ‍स्‍ट्रेलिया एवं न्‍यूजीलैंड भी शामिल हैं, के प्रतिनिधियों का गर्मजोशी के साथ स्‍वागत करते हुए उन्‍होंने आपस में जुड़े एशिया के इस विजन का अनावरण किया तथा इस उभरते महाद्वीप के देशों के बीच सहयोग की नई राहों को चित्रित करने की आवश्‍यकता के बारे में अपनी बात रखी। उत्‍थानशील एशिया के नेहरू जी के विजन में विस्‍तारित पड़ोस की संकल्‍पना शामिल थी तथा ऐसा बहुत पहले हो चुका था जब यह पद स्‍पष्‍ट रूप से भारत की विदेश नीति के सिद्धांत का हिस्‍सा नहीं बना था।

1990 के दशक के पूर्वार्ध में भारत के आर्थिक सुधारों के साथ ही भारत की पूरब की ओर देखो नीति शुरू हुई तथा पूर्वी एवं दक्षिण पूर्व एशिया के साथ आर्थिक एवं सामरिक भागीदारी में बहु-आयामी वृद्धि के लिए मंच तैयार हुआ, जहां विश्‍व की सबसे जीवंत अर्थव्‍यवस्‍थाओं में कुछ अर्थव्‍यवस्‍थाएं पाई जाती हैं तथा जो इस क्षेत्र में नवाचारों को केंद्र है। अगले दशक में भारत की अर्थव्‍यवस्‍था ने निरंतर विकास किया तथा इसी तरह हाइड्रो कार्बन के लिए इसकी भूख में भी वृद्धि हुई जिससे ऊर्जा की दृष्टि से समृद्ध पश्चिम एशिया एवं मध्‍य एशिया इसके करीब आए। आर्थिक एवं ऊर्जा हितों में विस्‍तार की वजह से भारत की सुरक्षा एवं सामरिक क्षमताओं का फिर से मूल्‍यांकन करने एवं मानचित्रित करने की आवश्‍यक भी उत्‍पन्‍न हुई ताकि भारत के विस्‍तारित पड़ोस के साथ इसकी अधिक भागीदारी की रक्षा हो सके। इस प्रकार, जिस रूप में हम इसे देखते हैं, भारत के विस्‍तारित पड़ोस को स्‍वेज नहर से दक्षिण चीन सागत तक के क्षेत्र को कहा जा सकता है। इसके तहत भिन्‍न - भिन्‍न प्रोफाइल वाले आपस में जुड़े क्षेत्र शामिल हैं तथा इसमें पश्चिम एशिया / खाड़ी क्षेत्र, मध्‍य एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया तथा हिंद महासागर क्षेत्र आते हैं। अपने विस्‍तारित पड़ोस के साथ भारत की बढ़ती भागीदारी अनेक भू-आर्थिक एवं भू-सामरिक अनिवार्यताओं द्वारा प्रेरित है। भू-आर्थिक अनिवार्यता व्‍यापार एवं निवेश, प्रौद्योगिकी अंतरण एवं नवाचार के माध्‍यम से घनिष्‍ट आर्थिक एकीकरण को आवश्‍यक बनाती है। इसके तहत इस क्षेत्र में संकेंद्रित एवं आपस में जुड़ी मुक्‍त व्‍यापार क्षेत्र व्‍यवस्‍थाओं को आकार देना भी शामिल है। भू-सामरिक अनिवार्यता अनेक तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए घनिष्‍ट परामर्श एवं सहयोग को आवश्‍यक बनाती है जिसमें आतंकवाद, समुद्री जलदस्‍युता, राष्‍ट्रपारीय अपराध, आपदा उपशमन तथा राष्‍ट्रपारीय महामारियों से निपटना शामिल है।

यह सम्‍मेलन भारत के विस्‍तारित पड़ोस की संकल्‍पना एवं इसके प्रभावों से संबंधित इनमें से अनेक मुद्दों पर विस्‍तार से विचार - विमर्श करेगा, परंतु मैं बस संक्षेप इस बात को रेखांकित करना चाहूँगा कि कैसे हमारा विदेश मंत्रालय तीन क्षेत्रों में संभावनाओं एवं चुनौतियों को देखता है, जो भारत के सतत बदलाव तथा विश्‍व में अर्थात दक्षिण पूर्व एशिया / पूर्वी एशिया एवं मध्‍य एशिया में इसके स्‍थान के लिए महत्‍वपूर्ण हैं।

दक्षिण पूर्व एशिया : पूरब की ओर देखो

आसियान एवं वृहत्‍तर पूर्वी एशियाई क्षेत्र के साथ भारत के बहु-आयामी संबंधों का विकसित होना भारत के लिए एक राजनयिक शानदार करतब है तथा लघु रूप में हमारी प्राथमिकताओं, हितों तथा हमारे विस्‍तारित पड़ोस के साथ बढ़ती भागीदारी में हमारे सरोकारों को शामिल करता है। दस राष्‍ट्रों वाला आसियान भारत की पूरब की ओर देखो नीति की धुरी है तथा भारत ने अथक रूप से 2015 तक एशियाई आर्थिक समुदाय के निर्माण में आसियान की केंद्रीय भूमिका की पुष्टि की है और बार-बार पुष्टि की है। भारत की पूरब की ओर देखो नीति का महत्‍वपूर्ण विजन की नींव ''पूरब के लिए सेतु’’ के रूप में आसियान की भूमिका में आस्‍था है। यह भूमिका ऐसी है जो इस क्षेत्र के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्‍कृतिक संबंधों पर आधारित है जो प्राचीन भारतीय महाकाव्‍य यानी रामायण एवं महाभारत के समय से चले आ रहे हैं।

तेजी से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍थाओं, नवीनतम नवाचारों एवं उद्यमों के देश के रूप में इस क्षेत्र के उद्भव से सांस्‍कृतिक भाई-चारे की यह भावना और सुदृढ़ हुई है तथा इसकी वजह से भारत एवं आसियान लाभप्रद अवसरों के संजाल में शामिल हो गए हैं। माल में भारत - आसियान व्‍यापार करार के कार्यान्‍वयन से भारत और आसियान 2015 तक द्विपक्षीय व्‍यापार को 80 बिलियन डालर से बढ़ाकर 100 बिलियन डालर करने के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के पथ पर हैं। वास्‍तव में, आसियान - भारत व्‍यापार पिछले दस वर्षों में 23 प्रतिशत के आकर्षक चक्रवृद्धि वार्षिक विकास दर (सी ए जी आर) से दस गुना बढ़ गया है। सेवाओं में व्‍यापार तथा निवेश के लिए आसियान - भारत करार भी अब हस्‍ताक्षर के लिए तैयार है तथा हम उम्‍मीद करते हैं कि हम 2015 तक 100 बिलियन अमरीकी डालर तथा 2022 तक 200 बिलियन अमरीकी डालर के व्‍यापार के महत्‍वाकांक्षी आंकड़ों को प्राप्‍त कर लेंगे। यदि आर्थिक मोर्चें पर परस्‍पर उत्‍साह जारी रहता है, तो भारत एवं आसियान के बीच आर्थिक संबंधों की सीमा आकाश ही है, जहां लगभग 1.8 बिलियन लोग रहते हैं, जिनमें से अधिकतर लोग युवा हैं तथा अपने जीवन का पुनर्निर्माण करने के लिए बेचैन हैं। राह में नए मील पत्‍थर हैं : भारत ने एक अलग आसियान - भारत व्‍यापार एवं निवेश केंद्र पर चर्चा शुरू कर दी है। हम दोनों पक्षों की ओर से निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आसियान - भारत व्‍यवसाय परिषद को सुदृढ़ करने का भी प्रयास कर रहे हैं।

आज इस संबंध की आर्थिक अंतर्वस्‍तु को आसियान - भारत संबंधों तथा भारत - पूर्वी एशिया संबंधों को सामरिक गहराई एवं अभिविन्‍यास प्रदान करने के लिए सतत प्रयासों के माध्‍यम से जोश के साथ संपूरित किया जा रहा है। दवाओं का अवैध व्‍यापार, राष्‍ट्रपारीय अपराध, समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन तथा उपशमन एवं परमाणु अप्रसार सहित अनेक राष्‍ट्रपारीय गैर परंपरागत सुरक्षा चुनौतियों की वजह से अपने विकास की गति को बनाए रखने के लिए चिंतित आसियान के लिए इन क्षेत्रों में भारत - आसियान साझेदारी का विस्‍तार करने के लिए काफी गुंजाइश है। वृहत्‍तर पूर्वी एशियाई क्षेत्र में राजनीतिक - सुरक्षा मुद्दे अधिक महत्‍वपूर्ण हो गए हैं - यह एक ऐसी रूझान है जो पूर्वी एशिया शिखर बैठक के एजेंडे में, विशेष रूप से 2011 में रूस एवं यूएस के पूर्वी एशिया शिखर बैठक में शामिल होने के बाद से प्रतिबिंबित हुई है। अपने विशिष्‍ट सिंद्धात में आसियान के देश पूर्वी एशिया में इस समय निर्माणाधीन राजनीतिक, आर्थिक एवं सुरक्षा वास्‍तुशिल्‍प के पुनर्निर्माण में महाशक्तियों की राजनीति के घटकों से अपने आपको सुरक्षित रखने के लिए उत्‍सुक हैं।

यह उभरता परिदृश्‍य आसियान तथा आसियान प्‍लस तंत्रों जैसे कि पूर्वी एशिया शिखर बैठक तथा ए डी एम एम प्‍लस के साथ अपनी सामरिक साझेदारी के कैनवस का विस्‍तार करने के लिए भारत के लिए नए अवसरों के दरवाजे खोल रहा है। जलदस्‍युता जैसी चुनौतियों तथा समुद्री क्षेत्र में दावा एवं विरोध के नए सुरों के उत्‍थान से समुद्री सुरक्षा सहयोग के एक उर्वर क्षेत्र के रूप में उभरी है। पिछले कुछ वर्षों में, हम देख सकते हैं आसियान भी यह चाहता है कि भारत समुद्री सुरक्षा एवं इससे संबंधित मामलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाए। संचार के समुद्री लेन (एस एल ओ सी) में नौवहन की आजादी तथा समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना यह देखते हुए इस क्षेत्र की विकासशील अर्थव्‍यवस्‍थाओं के लिए अपरिहार्य है कि यह ऊर्जा एवं आर्थिक सुरक्षा से करीबी ढंग से जुड़ा है। यह देखते हुए कि भारत सामरिक दृष्टि से महत्‍वपूर्ण व्‍यापार धमनियों पर स्थित है, यह एक स्‍वाभाविक कोरोलरी है कि भारत को इस क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के मामले में अधिक भूमिका निभानी चाहिए। समुद्री सहयोग के लिए एजेंडा में जलदस्‍युता से निपटना, समुद्री आपात स्थितियों से निपटना, सहयोगात्‍मक शीघ्र चेतावनी प्रणाली स्‍थापित करना तथा त्‍वरित एवं कारगर आपदा राहत प्रदान करना आदि शामिल हो सकते हैं। इस पृष्‍ठभूमि में, भारत ने निरंतर नौवहन की आजादी का समर्थन किया है जिसे आसियान के देशों एवं पूर्वी एशिया के देशों से भरपूर समर्थन प्राप्‍त हो रहा है। 2012 में नई दिल्‍ली में भारत - आसियान संस्‍मारक शिखर बैठक के अंत में जारी किए गए विजन दस्‍तावेज में ''समुद्री सुरक्षा एवं नौवहन की आजादी तथा अंतर्राष्‍ट्रीय कानून के अनुसरण में व्‍यापार की अबाध आवाजाही के लिए संचार के समुद्री लेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सहयोग सुदृढ़ करने के लिए’’ आवश्‍यकता को भारत एवं आसियान के नेताओं के लिए रेखांकित किया।

मोटेतौर पर भारत की आसियान एवं पूर्वी एशिया क्षेत्र के बढ़ती भागीदारी की नींव वह है जिसे हमारे प्रधान मंत्री जी ने समूचे क्षेत्र में ''समृद्धि का आर्क’’ सृजित करने एवं बनाए रखने की संज्ञा दी है। इसके लिए अनिवार्य रूप से एक समावेशी, बहुलवादी एवं संतुलित क्षेत्रीय वास्‍तुशिल्‍प का सृजन करने के लिए सक्रियता के साथ सहयोग करना आवश्‍यक है ताकि कोई भी अकेली सत्‍ता एजेंडा निर्धारित न कर पाए। आर्थिक एवं सुरक्षा दोनों ही क्षेत्रों में साझे मूल्‍यों तथा लाभप्रद अवसरों द्वारा सहयोजित वास्‍तविक बहुध्रुवीय एशिया की तलाश भारत की विदेश नीति तथा इसके विस्‍तारित पड़ोस के इस महत्‍वपूर्ण भाग के साथ इसकी भागीदारी का एक प्रमुख दीर्घावधिक सामरिक उद्देश्‍य है।

पश्चिम एशियाआर्थिक एवं सामरिक हितों के इस संगम ने पश्चिम एशिया के साथ भारत की भागीदारी को भी चिन्हित किया है। पश्चिम एशिया भारत के विस्‍तारित पड़ोस का अभिन्‍न अंग है तथा यह केवल भूगोल ही नहीं है जिसने इस क्षेत्र को भारत के अभिभावी राष्‍ट्रीय हितों के लिए महत्‍वपूर्ण बनाया है। इस क्षेत्र के महत्‍व को कुछ तथ्‍यों के माध्‍यम से आंका जा सकता है: भारत अपने हाइड्रो कार्बन के आयात में से लगभग 60 प्रतिशत आयात पश्चिम एशिया से करता है जिसकी वजह से यह क्षेत्र हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अपरिहार्य स्‍तंभ बन गया है। इस क्षेत्र में तकरीबन 7 मिलियन भारतीय समुदाय रहता है जो अपने देश में 30 बिलियन डालर से अधिक धन भेजते हैं जो प्रतिवर्ष 70 बिलियन अमरीकी डालर के हमारे कुल अंतवर्ती धन प्रेषण के 40 प्रतिशत से अधिक है।

ऊर्जा की दृष्टि से समृद्ध होने तथा निवेश के योग्‍य अतिरिक्‍त पूंजी से लैस होने के कारण, भारत पश्चिम एशिया एवं खाड़ी क्षेत्र के साथ अपनी आर्थिक साझेदारी का विकास करने के लिए अथक रूप से प्रयास करता रहा है। क्षेत्र के रूप में पश्चिम एशिया भारत का सबसे बड़ा व्‍यापार साझेदार है। इस क्षेत्र के साथ भारत का द्विपक्षीय व्‍यापार बढ़कर 2012-13 में 180 बिलियन अमरीकी डालर से अधिक हो गया है। स्‍पष्‍ट रूप से, इस क्षेत्र से आयात की वस्‍तुओं में तेल सबसे बड़ी एकल वस्‍तु है, परंतु हाल के रूझान दर्शाते हैं कि द्विपक्षीय व्‍यापार की टोकरी अधिक विविधतापूर्ण होती जा रही है। उदाहरण के लिए सऊदी अरब को भारत के निर्यात में 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है तथा बताया जाता है कि आज यह 10 बिलियन डालर से अधिक है। खाड़ी क्षेत्र के साथ भारत का संबंध प्रचुर संभावनाओं, विशेष रूप से निवेश के क्षेत्र में संभावनाओं से भरपूर है। अवसंरचना के लिए भारत की बढ़ती भूख को देखते हुए इस क्षेत्र से निवेश हमारे देश की विकास संबंधी आकांक्षाओं के लिए संभावित रूप से गेम चेंजर हो सकता है। यह बहु-स्‍तरीय संबंध दोनों पक्षों के बीच लोगों के निरंतर दो-तरफा प्रवाह में भी परिलक्षित होता है। यात्रा एवं पर्यटन दिनोंदिन बढ़ रहा है - अकेले भारत एवं संयुक्‍त अरब अमीरात के बीच सप्‍ताह में 700 उड़ानें हैं।

यद्यपि आर्थिक एवं ऊर्जा से जुड़ी अनिवार्यताएं प्रेरक बल हैं, फिर भी संबंध की सामरिक अंतर्वस्‍तु भी पिछले कुछ वर्षों में विकसित हो रही है। भारत और सऊदी अरब ने 2006 में शाह अब्‍दुल्‍ला की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान एक महत्‍वपूर्ण सामरिक साझेदारी पर हस्‍ताक्षर किया, जिसमें दोनों देशों के बीच आतंकवादरोधी सहयोग बढ़ाने के लिए मंच तैयार किया। वास्‍तव में, खाड़ी के देशों के साथ सुरक्षा सहयोग अधिक महत्‍व ग्रहण कर रहा है। यह आतंकवाद की खिलाफत, धन शोधन, संगठित अपराध तथा जलदस्‍युतारोधी अभियान जैसे क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग में परिलक्षित हो रहा है। रक्षा के क्षेत्र में, हम नौसेना के पोतों के मैत्रीपूर्ण दौरों का आयोजन करते हैं। हमारे सुरक्षा हित अन्‍य क्षेत्रों में अधिकाधिक रूप से अंतर्ग्रथित हो रहे हैं।

पश्चिम एशिया की शांति, स्थिरता एवं समृद्धि में हमारी भागीदारी एवं हमारे बहु-आयामी स्‍टेक की प्रचुर गहराई को देखते हुए हम समूचे क्षेत्र में परिवर्तन की बह रही हवा पर बारीकी से नजरें गढ़ाए हुए हैं तथा अरब प्रायद्वीप के देशों एवं समाजों पर तथा‍कथित अरब स्प्रिंग के प्रभावों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। हम लोकतंत्र का निर्यात करने के व्‍यवसाय में नहीं हैं। विश्‍व का सबसे बड़ा एवं सबसे अधिक आबादी वाला लोकतंत्र होने के नाते, जो बहुलवादी एवं सामाजिक संस्‍कृति पर आधारित है, विश्‍व के किसी भी क्षेत्र में लोकतांत्रिक भावना एवं संस्‍थाओं का उदय देखकर हमें प्रसन्‍नता होगी। मैं एक बारीक किंतु महत्‍वपूर्ण भेद करना चाहूँगा: यद्यपि भारत लोकतांत्रिक बहुलवाद एवं धार्मिक संयम का मजबूती से पालन कर रहा है, फिर भी हम घुसपैठ करने वाले अलोकप्रिय और कड़े आदेशों में विश्‍वास नहीं रखते हैं। इसके विपरीत हमने सदैव पालन किया है एवं कहा है कि अपनी परंपराओं एवं इतिहास को ध्‍यान में रखकर इन लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने की गति एवं साधनों का निर्णय लेना इस क्षेत्र के लोगों पर निर्भर है। इसी वजह से, हम इस क्षेत्र में या विश्‍व के किसी भाग में राजनीतिक मुद्दों के समाधान के तरीके के रूप में सशस्‍त्र संघर्ष या बाहरी हस्‍तक्षेप का विरोध करते हैं।

उदाहरण के लिए, सीरिया में हमने सभी पक्षों द्वारा हिंसा की लगातार निंदा की है तथा सीरिया के नेतृत्‍व में विस्‍तृत एवं समावेशी राष्‍ट्रीय सामंजस्‍य प्रक्रिया का समर्थन किया है। हमने सरकार तथा अलगाववादियों के बीच संवाद एवं वार्ता का समर्थन किया है जिससे संक्रमणकालीन शासी निकाय के गठन का मार्ग प्रशस्‍त हो और इसके बाद चुनाव कराए जाएं, जैसा कि जून, 2012 की जिनेवा घोषणा के तहत परिकल्‍पना है। पिछले महीने जिनेवा-2 बैठक में हमने जोरदार शब्‍दों में इस रूख को दोहराया क्‍योंकि हमारा विश्‍वास है कि किसी बाहरी सैन्‍य हस्‍तक्षेप का न केवल सीरिया पर प्रतिकूल प्रभाव होगा अपितु इससे क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता पर भी विनाशकारी प्रभाव होंगे। इस संदर्भ में, इस श्रेष्‍ठ सभा के साथ मुझे इस बात को साझा करते हुए प्रसन्‍नता हो रही है कि भारत ने सीरिया के रासायनिक हथियारों के विनाश के लिए 1 बिलियन अमरीकी डालर के साथ - साथ विशेषज्ञ एवं प्रशिक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया है।

इस क्षेत्र की हाल की घटनाओं में भारत के इस विश्‍वास को वैधता प्रदान की है कि केवल कूटनीति एवं संवाद के माध्‍यम से कठिन राजनयिक संकटों का समधान हो सकता है। इसलिए हमने ईरान एवं ई3*3 के बीच 24 नवंबर को जिनेवा में जो करार हुआ उसका शीघ्रता स्‍वागत किया। हम ईरान एवं आई ए ई ए, जिसे हम ईरान की परमाणु गतिविधियों के अनन्‍य शांतिपूर्ण स्‍वरूप का सत्‍यापन करने के लिए सक्षम तकनीकी एजेंसी के रूप में मानते हैं, के बीच 11 नवंबर को जो करार हुआ उसका भी स्‍वागत करते हैं। आगे देखते हुए हम पूरी निष्‍ठा के साथ उम्‍मीद करते हैं कि जिनेवा में जिन अंतरिम कदमों के बारे में हमारे बीच सहमति हुई है उनसे ईरान एवं अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के बीच भरोसा एवं विश्‍वास उत्‍पन्‍न होगा तथा ईरान के परमाणु मुद्दे के स्‍थायी एवं दीर्घावधिक समाधान का मार्ग प्रशस्‍त होगा।

मध्‍य एशिया

अब मैं मध्‍य एशिया के साथ भारत की बढ़ती भागीदारी के बारे में संक्षेप में बताने का प्रयास करूँगा। मध्‍य एशिया भारत के विस्‍तारित पड़ोस का एक महत्‍वपूर्ण अंग है जिसके साथ भारत के सदियों पुराने सांस्‍कृतिक संबंध हैं तथा भारत के प्रति उनमें प्रचुर सद्भभाव है। अफगानिस्‍तान में तथा आसपास सुरक्षा संबंधी संकटों के उत्‍पन्‍न होने के कारण यह क्षेत्र सामरिक कैनवस के केंद्र के करीब पहुंच गया है। यद्यपि भारत के लिए इस क्षेत्र की भू-सामरिक स्थिति महत्‍वपूर्ण है, परंतु हमारे बीच जो भावनात्‍मक रिश्‍ते हैं वे कम महत्‍वपूर्ण नहीं हैं। ये रिश्‍ते हमारे सभ्‍यतागत संपर्कों से उत्‍पन्‍न हुए हैं। तापी जैसी महत्‍वाकांक्षी परियोजनाओं के साथ ऊर्जा सुरक्षा भी भारत के संबंध के लिए महत्‍वपूर्ण प्रेरक है। हमारी भागीदारी को सुदृढ़ करने के लिए भारत ने 2012 में मध्‍य एशिया को जोड़ो नीति शुरू की। इसमें इस क्षेत्र के साथ हमारे संबंध को गहन करने एवं विविध बनाने के लिए सबको शामिल करने वाला एक टेंपलेट शामिल है जिसके तहत उच्‍च स्‍तरीय दौरों की बारंबारता में वृद्धि करना, सामरिक साझेदारियां निर्मित करना, व्‍यापक आर्थिक भागीदारी, संयोजकता में नवाचारी समाधान तथा ऊर्जा एवं प्राकृतिक संसाधनों के विकास में साझेदारी शामिल है। योजना के तहत अखिल अफ्रीका ई-नेटवर्क की तर्ज पर एक ई-नेटवर्क स्‍थापित करने का प्रस्‍ताव भी शामिल है जो मध्‍य एशिया के तकरीबन 60 मिलियन लोगों को टेली-मेडिसीन एवं टेली-एजुकेशन के लाभ प्रदान करेगा।

2014 में अफगानिस्‍तान में ऐतिहासिक परिवर्तन की वजह से यह क्षेत्र आने वाले महीनों एवं वर्षों में भारत के लिए सामरिक दृष्टि से विशेष महत्‍वपूर्ण हो गया है। इस संदर्भ में, भारत अफगानिस्‍तान में अफगानिस्‍तान के नेतृत्‍व में तथा अफगानिस्‍तान के स्‍वामित्‍व में एक राष्‍ट्रीय सामंजस्‍य प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। भारत ने अफगानिस्‍तान को स्थिर करने के लिए एक क्षेत्रीय स्‍टेक होल्डिंग दृष्टिकोण का भी समर्थन किया है। इस संदर्भ में, भारत ने अफगानिस्‍तान के लिए एस सी ओ के नेतृत्‍व वाली पहल के लिए अधिक भूमिका का जोश के साथ समर्थन किया है। इस समय भारत शंघाई सहयोग संगठन में प्रेक्षक की भूमिका निभा रहा है, परंतु मध्‍य एशिया में शांति एवं स्थिरता सहित इस क्षेत्र में आपस में जुड़े अपने बहु-आयामी हितों को ध्‍यान में रखते हुए यह पूर्ण सदस्‍य के रूप में शामिल होने का इच्‍छुक है।

मध्‍य एशिया क्षेत्र के विशाल ऊर्जा संसाधनों तथा विकास एवं अवसंरचना के लिए उनकी भूख को देखते हुए क्षमता निर्माण एवं प्रशिक्षण में अपनी प्रमाणित दक्षता के साथ भारत इस क्षेत्र के बदलाव में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए भारत अनूठे ढंग से लैस है। परंतु मध्‍य एशिया क्षेत्र में सीधी भूमि संयोजकता के अभाव के कारण यह परोपकारी मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। अफगानिस्‍तान में अस्थिरता तथा भारत को भूमि मार्ग से अक्‍सेस प्रदान करने में पाकिस्‍तान की अनिच्‍छा की वजह से इस क्षेत्र के साथ भारत के संबंध की क्षमता साकार नहीं हो पा रही है। इस संदर्भ में, ईरान के साथ भारत के संबंध तथा संयोजकता की प्रमुख परियोजनाओं के साकार होने से स्थिति बदलने में भारत महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत चाबाहार पत्‍तन का निर्माण करने का इच्‍छुक है, जो भारत के लिए मध्‍य एशिया तक पहुंचने का एक नया मार्ग प्रदान करेगा। चाबाहार पत्‍तन के निर्माण का कार्य शीघ्रता से पूरा होने से यह गेम चेंजर की भूमिका निभा सकता है क्‍योंकि भारत इस क्षेत्र के साथ अपने संबंधों को बदलना चाहता है। तुर्कमेनिस्‍तान - अफगानिस्‍तान - पाकिस्‍तान - भारत पाइपलाइन (तापी) का साकार होना, जब भी यह साकार हो, भारत को इस क्षेत्र के करीब लाने तथा असंख्‍य लाभप्रद अवसरों के द्वार खोलने में एक अन्‍य बड़ा कदम होगा।

आगे का रास्‍ता

अपने व्‍यापक पड़ोस के साथ भारत के विकासशील संबंधों का विस्‍तृत कैनवस रेखांकित करने के बाद अब मैं आने वाले महीनों तथा वर्षों में इस महत्‍वपूर्ण संबंध के भावी पथ के लिए कुछ महत्‍वपूर्ण मार्कर को रेखांकित करना चाहूँगा। इसके अलावा, सारांश के रूप में मैं कुछ समस्‍यापरक मुद्दों एवं चुनौतियों पर रोशनी डालना चाहूँगा जिन पर आई आर विद्वानों एवं चिंतकों का यह विशिष्‍ट समूह अगले दो दिनों में चर्चा के दौरान विचार करना चाहेगा।

पहला एवं सबसे महत्‍वपूर्ण, इस बात को रेखांकित करने की जरूरत है कि अनगिनत चुनौतियों तथा आसपास के क्षेत्र में सतत फलक्‍स के बावजूद, बहु-आयामी एवं परस्‍पर संबद्ध हितों को देखते हुए अपने विस्‍तारित पड़ोस के साथ भारत का संबंध आने वाले दिनों में गहन एवं विविध ही होगा।

दूसरा, आर्थिक क्षेत्र में लाभप्रद परिणाम तथा संबंध के भू-आर्थिक आयाम आने वाले वर्षों में अधिक स्‍पष्‍ट होंगे।

तीसरा, यद्यपि अर्थशास्‍त्र एक प्रमुख चालक होगा, अपने विस्‍तारित पड़ोस के साथ भारत का संबंध अधिक सामरिक गहराई प्राप्‍त करेगा, जो स्‍वयं को अधिक रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग में अभिव्‍यक्‍त करेगा। यह तार्किक एवं अपरिहार्य है क्‍योंकि आर्थिक हितों के विस्‍तार के लिए आतंकवाद एवं जलदस्‍युता से लेकर साइबर अपराध एवं परमाणु अप्रसार तक अनेक अधुनातन चुनौतियों से निपटने के लिए परामर्श एवं सहयोग में समवर्ती वृद्धि आवश्‍यक होगी।

चौथा, अपने विस्‍तारित पड़ोस के साथ भागीदारी में भारत को एक तरफ चीन एवं जापान जैसे एशिया के अन्‍य खिलाडि़यों की भूमिका में उभरना होगा और दूसरी तरफ यूएस जैसी गैर निवासी महाशक्तियों की भूमिका तथा यूएस की पुन: संतुलन स्‍थापित करने की नीति के प्रभावों को समझना होगा। इस क्षेत्र में बाहरी महाशक्तियों की बहुलता से सहयोग के नए अवसर उत्‍पन्‍न हो सकते हैं, यदि चतुराई एवं दूर दृष्टि से हैंडल किया जाए।

पांचवां, अपने विस्‍तारित पड़ोस के साथ-साथ सन्निकट पड़ोसियों के साथ हम अपने संबंध को किस तरह हैंडल करेंगे - इसका महाशक्ति के रूप में एवं वैश्विक खिलाड़ी के रूप में भारत के सतत उद्भव से महत्‍वपूर्ण सरोकार होगा। उभरते एशिया एवं उभरती एशियाई शताब्‍दी के सामूहिक भाग्‍य को साकार करने के लिए हम प्रेरक एवं समर्थकारक बनना चाहते हैं।

मैं कोई क्रिस्‍टल बॉल गेजर या भविष्‍यवादी परिदृश्‍य पेंटर नहीं हूँ। प्रैक्टिशनर एवं कूटनीतिज्ञ होने के नाते मैंने यह स्‍पष्‍ट करने के लिए एक विस्‍तृत संकल्‍पनात्‍मक रूपरेखा प्रस्‍तावित की है कि हमारा विदेश मंत्रालय हमारे विस्‍तारित पड़ोस में अवसरों एवं चुनौतियों को किस रूप में देखता है। हमारा विस्‍तारित पड़ोस इस क्षेत्र की एक विशाल पट्टी है जो आने वाले वर्षों में आर्थिक महाशक्ति एवं भू-सामरिक क्‍लाउट में वृद्धि देखने के लिए उद्यत प्रतीत होता है। मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आप व्‍यापक स्‍तर पर चर्चा करेंगे जो अंतर्दृष्टि एवं मौलिकता से भरपूर होगा; तथा करणीय सिफारिशें / सुझाव प्रस्‍तुत करेंगे जिससे न केवल इस महत्‍वपूर्ण क्षेत्र के बारे में हमारी समझ का दायरा विस्‍तृत होगा अपितु भारत के विस्‍तारित पड़ोस के साथ हमारी भागीदारी को गहन करने एवं परिष्‍कृत करने में भी हमारी मदद करेगा।

मेरी यह शुभकामना है कि आपकी चर्चा हर तरह से सफल हो।

ध्‍यान से सुनने के लिए आप सभी का धन्‍यवाद।



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