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संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार कार्यतंत्र के समक्ष दुविधा

जुलाई 27, 2014

लेखिका : राजदूत भास्‍वती मुखर्जी

गाजा संबंधी दुविधा

1. गाजा में इजराइली हमलों की जांच शुरू करने के संकल्‍प का समर्थन करते हुए, जेनेवा में संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार परिषद में 23 जुलाई को भारत द्वारा इसके पक्ष में किया गया मतदान ब्राजील में हाल ही के ब्रिक्‍स सम्‍मेलन में व्‍यक्‍त भारत के रूख के अनुरूप था जहां हमारे प्रधान मंत्री ने इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्‍यक्‍त की थी और बातचीत के जरिये इसका समाधान किए जाने का आह्वान किया था। साथ ही, भारत ने ‘‘गाजा में भारी हवाई हमलों और जमीन पर सेना के अत्‍यधिक उपयोग के परिणामस्‍वरूप नागरिकों के जीवन की त्रासद क्षति होने और संपत्‍ति का भारी नुकसान होने’’ पर चिंता व्‍यक्त करते हुए और ‘‘नॉन-स्‍टेट कार्रवाई कर्ताओं को हिंसा बढ़ाने और शांति प्रक्रिया को परिहार्य रूप से बाधित करने’’ का दोषी ठहराते हुए अलग से अपने निष्‍पक्ष वक्‍तव्‍य जारी किए हैं। न्‍यूयॉर्क में भारत के स्‍थायी प्रतिनिधि ने कहा था कि भारत ‘‘दोनों पक्षों के बीच एक दीर्घकालिक युद्ध विराम के प्रति आशान्‍वित है जिससे फिलिस्‍तीन मुद्दे के व्‍यापक समाधान के लिए शांति प्रक्रिया बहाल होगी’’

images/Untitled_2.jpg2. आम लोगों के बीच पैदा हुए जटिल हालात और दोनों पक्षों द्वारा हिंसा का सहारा लिए जाने के चलते, भारत सहित परिषद के सदस्‍य देशों ने बार-बार इस बात की आवश्‍यकता जताई है कि ऐसे मुद्दों पर अंतिम निर्णय लेने से पहले स्‍थिति को सावधानीपूर्वक तोल लेना और उसका मूल्‍यांकन कर लेना चाहिए। यह बात संयुक्‍त राष्‍ट्र सिस्‍टम में मानवाधिकार कार्यतंत्र के समक्ष आई दुविधा को संपुटित करता है जहां सभी पक्षों की ओर से मानवाधिकारों का उल्‍लंघन किए जाने से एक संतुलित निर्णय लेना लगातार कठिन होता जा रहा है। ‘‘पूर्वी यरूशलम सहित कब्‍जाये गए फिलिस्‍तीनी क्षेत्रों में अंतरराष्‍ट्रीय कानून का सम्‍मान सुनिश्‍चित करने’’ के संबंध में फिलिस्‍तीन द्वारा बनाए गए प्रारूपित संकल्‍प पर भारत ने अन्‍य ब्रिक्‍स देशों (ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के साथ मतदान में हिस्‍सा लिया। 47-सदस्‍यीय परिषद के 29 देशों ने इसके पक्ष में मतदान किया। यूरोपियन यूनियन के सदस्‍य देशों सहित 17 देशों ने मतदान में हिस्‍सा नहीं लिया। संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका एकमात्र ऐसा देश रहा जिसने संकल्‍प के विरोध में मतदान किया। इजराइल इस परिषद का सदस्‍य नहीं है। अब यह देखने वाली बात है कि परिषद इस संकल्‍प को यथार्थ रूप में किस प्रकार कार्यान्‍वित करती है।

मानवाधिकार मानक संस्‍थापन में संयुक्‍त राष्‍ट्र की भूमिका

3. प्रत्‍येक संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार कार्यतंत्र 1948 की सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पर आधारित है जिसका यह सिद्धांत है कि मानव जाति के सम्‍मान और अधिकार आज की प्रत्‍येक संस्‍कृति और सभ्‍यता, धर्म और दर्शन के सिद्धांतों के मामले में जन्‍मजात रूप से समान हैं। भारत इस घोषणा का मूल हस्‍ताक्षरकर्ता था। एक समय था जब संयुक्‍त राष्‍ट्र के मौजूदा सदस्‍यों में से दो तिहाई सदस्‍य औपनिवेशिक शासन के अधीन थे, इस घोषणा ने समय पर यह याद दिलाने का काम किया कि सभी देशों के लोग और सभी देश मानवाधिकार तथा मूलभूत स्‍वतंत्रताएं प्राप्‍त करने के हकदार हैं।

images/Untitled_3.jpg(चित्र में: वियना में 1993 में संयुक्‍त राष्‍ट्र विश्‍व मानवाधिकार सम्‍मेलन)4. अतीत में, भारत के नेतृत्‍व में विकासशील देशों ने इस बात पर बल दिया था कि सभी अधिकारों, जिनमें आर्थिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक अधिकारों के साथ-साथ नागरिक और राजनीतिक अधिकार शामिल हैं, का समान दर्जा है और इनका समान रूप से आदर किया जाना चाहिए। 70 के दशक में शीत युद्ध के राजनीतिक एवं वैचारिक मतभेदों के संदर्भ में इस संदर्श का पाश्‍चात्‍य देशों द्वारा जोरदार विरोध किया गया। सौभाग्‍य से, शीत युद्ध की समाप्‍ति के साथ ही, समान आधार पर और समान बल के साथ सभी मानवाधिकारों के सम्‍मान, संवर्धन और संरक्षण के सिद्धांत ने सार्वभौमिक मान्‍यता प्राप्‍त की। वियना के विश्‍व मानवाधिकार सम्‍मेलन तक तैयारी समितियों का नेतृत्‍व करने वाले सचिव के रूप में और विश्‍व सम्‍मेलन की प्रारूप समिति के सचिव के रूप में, प्रारूप समिति के अध्‍यक्ष ब्राजील के राजदूत सबोइया के योग्‍य नेतृत्‍व में, मुझे उस जटिल विचार-विमर्श का साक्षी बनने का अवसर मिला था जिसके परिणामस्‍वरूप 1993 में वियना घोषणा और प्रोग्राम ऑफ एक्‍शन को अंगीकार किया गया जिसमें ‘सभी मानवाधिकारों की अविभाज्‍यता, परस्पर निर्भरता और परस्‍पर संबद्धता की पुनरभिपुष्‍टि की गई।’ संयुक्‍त राष्‍ट्र के अंतर्गत मानवाधिकारों के वैचारिक आधार-स्‍तंभों में एक नाटकीय परिवर्तन आया और वे पुन: कभी शीत युद्ध की राजनीति में रंजित नहीं होंगे। यद्यपि वे कुछ नई चुनौतियों, जैसे आतंकवाद और नॉन स्‍टेट एक्‍टर्स, से प्रभावित होंगे।

संयुक्‍त राष्‍ट्र प्रणाली में मानवाधिकार कार्यतंत्र

5. यह रेखांकित करना महत्‍वपूर्ण है कि यद्यपि 1993 की वियना घोषणा की तरह 1948 की सार्वभौमिक घोषणा कानूनी बाध्‍यता वाली नहीं हैं, तथापि, उनके मुख्‍य सिद्धांतों ने विशिष्‍ट अंतरराष्‍ट्रीय कानून का दर्जा प्राप्‍त कर लिया है, जिसका सम्‍मान करने के लिए देश कानूनी रूप से बाध्‍य हैं।

मानवाधिकार परिषद


6. जैसाकि ऊपर स्‍पष्‍ट किया गया है, यह महत्‍वपूर्ण अंतर-सरकारी निकाय विश्‍व भर में मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण को सशक्‍त बनाने और मानवाधिकारों के उल्‍लंघन की स्‍थितियों का समाधान करने तथा उन पर सिफारिशें करने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र प्रणाली का शीर्षस्‍थ निकाय है। इसका सृजन संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा द्वारा 15 मार्च 2006 को 60-251 से पारित संकल्‍प द्वारा किया गया था और इसका प्रथम सत्र 19 से 30 जून 2006 तक चला था। इसमें 47 सदस्‍य राष्‍ट्र हैं और इसने पूर्ववर्ती संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार आयोग का स्‍थान लिया जिसने शीत युद्ध के दौरान अत्‍यधिक सक्रिय भूमिका निभा कर अपनी उपादेयता सिद्ध की थी। इस परिषद का दर्जा भिन्‍न है और यह मानवाधिकार के उन सभी मुद्दों और स्‍थितियों पर स्‍थायी रूप से काम करता है जिन पर वर्ष भर ध्‍यान दिया जाना अपेक्षित है। ऐसे मुद्दों को सदस्‍य राष्‍ट्रों द्वारा किसी भी समय ध्‍यान में लाया जा सकता है।

मानवाधिकार परिषद की प्रविधियां और कार्यतंत्र


7. ये अनेक हैं और इनमें सभी 194 संयुक्‍त राष्‍ट्र सदस्‍य देशों में चार वर्ष में एक बार मानवाधिकारों का मूल्‍यांकन करने वाली सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा से लेकर, परिषद के ‘‘थिंक-टैंक’’ के रूप में कार्य करने वाली सलाहकार समिति तक, मानवाधिकारों के उल्‍लंघन के मामलों को परिष्‍द के ध्‍यान में लाने के लिए व्‍यक्‍तियों और संगठनों को अनुमति देने वाली शिकायत प्रविधि तक शामिल है।

8. ‘‘विशेष प्रविधियां’’ परिषद की एक अन्‍य प्रविधि है जो ‘‘कंट्री मेंडेटों’’ के रूप में परिभाषित विशिष्‍ट देशों अथवा भू-भागों में मानवाधिकारों की स्‍थिति पर अथवा ‘‘थीमेटिक मेंडेटों’’ के रूप में विश्‍व भर में होने वाले मानवाधिकार उल्‍लंघनों के बड़े पैटर्नों की मॉनीटरिंग करने, उस पर सलाह देने और सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट देने का कार्य करती है। इन मेंडेटों में विशेष प्रतिवेदक, विशेष प्रतिनिधि, स्‍वतंत्र विशेषज्ञ और कार्य समूह शामिल हैं। बुलाए जाने पर ये देशों का दौरा करते हैं और फिर परिषद को रिपोर्ट देते हैं।

9. वर्तमान में परिषद द्वारा सीरिया पर और डेमोक्रेटिक पीपुल्‍स रिपब्‍लिक ऑफ कोरिया पर गठित दो जांच आयोगों के अलावा एक हाल ही में गाजा पर गठित किया गया है। 37 थीमेटिक प्रतिवेदक और 14 देश विशिष्‍ट प्रतिवेदक भी हैं। वे सभी मानवाधिकारों पर रिपोर्ट देते हैं, चाहे वे आर्थिक, सामाजिक हों अथवा सांस्‍कृतिक अथवा नागरिक एवं राजनैतिक हों।

10. देश विशिष्‍ट मेंडेट प्रतिवेदकों का कार्य राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मानवाधिकारों की स्‍थिति का विश्‍लेषण करना है। वे संबद्ध देश को बुलावा भेजने का अनुरोध करते हैं, उसके बाद वे दौरा करते हैं। 2006 के बाद से अब तक स्‍थापित किए गए नए कंट्री मेंडेटों में सूडान (2009), ईरान इस्‍लामिक गणराज्‍य (2011), आइवरी कोस्‍ट (2011), सीरिया-अरब गणराज्‍य (2011), बेलारूस (2012), एरिट्रिया (2012), माली (2013) और मध्‍य अफ्रीकी गणराज्‍य (2013) से संबंधित विशेषज्ञ/प्रतिवेदक शामिल हैं।

परिषद के संबंध में भारत का दृष्‍टिकोण

11. भारत इस परिषद का संस्‍थापक सदस्‍य है और 2006-2007 और 2007-2010 के दो कार्यकाल तक सदस्‍य रहा। भारत को 2011-2014 के कार्यकाल के लिए अभूतपूर्व 181 मतों से चुना गया और परिषद के लिए 2015-2017 के कार्यकाल के लिए भी पुन: चयन की उम्‍मीद करेगा। परिषद में भारत को उच्‍च सम्‍मान प्राप्‍त है। भारत का विश्‍वास है कि मानवाधिकारों और मौलिक स्‍वतंत्रताओं के संवर्धन और संरक्षण का कार्य संवाद और सहयोग से ही सर्वश्रेष्‍ठ ढंग से किया जा सकता है। हमने परिष्‍द के कार्यतंत्र के अंतर-सरकारी स्‍वरूप के परिरक्षण की लगातार और सफलतापूर्वक वकालत की है और मानवाधिकारों को यथार्थ रूप देने के लिए राष्‍ट्रीय प्रयासों को सुदृढ़ करने के प्रयासों को प्रोत्‍साहन दिया। हमने राष्‍ट्रीय संप्रभुता और भौगोलिक अखण्‍डता, देशों के आंतरिक मामलों में गैर-हस्‍तक्षेप, निष्‍पक्षता, गैर-वरेण्‍यता और पारदर्शिता का आदर किया है।

12. जैसा कि पूर्व में कहा गया है, मुद्दे जटिल हैं और दुनिया के किसी विशेष क्षेत्र में मानवाधिकारों के भारी उल्‍लंघन पर सैद्धांतिक रूख अख्‍तियार किया जाना महत्‍वपूर्ण है। भारत ने देश विशिष्‍ट स्‍थितियों पर एक तरफा अथवा असंतुलित संकल्‍पों से खुद को अलग रखा है क्‍योंकि हमारा विश्‍वास है कि किसी पर ‘‘उंगली उठाना’’ ऐसे मुद्दों का उचित और प्रभावी समाधान नहीं हो सकता।

एक विशेषज्ञ एजेंसी की केस स्‍टडी: मानवाधिकार कार्यान्‍वयन में यूनेस्‍को की भूमिका

images/Untitled_4.jpg13. यह बात सर्वविदित नहीं है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र की विशेष एजेंसियां, विशेषत: यूनेस्‍को, सार्वभौमिक घोषणा और इसकी दो अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिज्ञाओं को विस्‍तार देने में सक्रिय रूप से भागीदार थी। 1978 में जब शीत युद्ध अपने चरम पर था, तब यूनेस्‍को ने एक संप्रेषण प्रविधि स्‍थापित की थी। इसमें अपनी योग्‍यता की परिधि में आने वाले मानवाधिकारों के कथित उल्‍लंघन पर व्‍यक्‍तिगत याचिकाओं द्वारा यूनेस्‍को को प्रस्‍तुत मामलों और मसलों के परीक्षण की व्‍यवस्‍था की गई है। इन याचिकाओं पर यूनेस्‍को के सहयोगी अंग अभिसमय एवं सिफारिश समितियों, भारत जिनका सदस्‍य है, द्वारा परीक्षण किया जाता है।

14. इस समिति के सदस्‍य के रूप में, 2004 से 2010 तक यूनेस्‍को के स्‍थायी प्रतिनिधि राजदूत के रूप में, मैंने यह देखा था कि याचिकाओं की स्‍वीकार्यता की शर्तों को सावधानीपूर्वक तय किया गया था ताकि वे यूनेस्‍को की योग्‍यता के दायरे, अर्थात् शिक्षा, विज्ञान, संस्‍कृति और सूचना क्षेत्र के भीतर होने वाले मानवाधिकार उल्‍लंघनों पर केंद्रित हों। मानवाधिकार परिषद के विपरीत, जहां असहमति की स्‍थिति में मतदान का सहारा लिया जा सकता है, यह समिति मतैक्‍य द्वारा कार्य करती है और इस सिद्धांत से मार्गदर्शन प्राप्‍त करती है कि इस प्रविधि द्वारा कथित पीड़ित को लाभ होगा। इस हेतु, अपनी निराली कार्य पद्धति के कारण, समिति ने उल्‍लेखनीय सफलता प्राप्‍त की है।

निष्‍कर्ष चिंतन

15. इन प्रविधियों के सामने अब नई चुनौतियां हैं। यह सुनिश्‍चित करने के लिए कि ये कार्यतंत्र दुनिया भर में होने वाले मानवाधिकार उल्‍लंघनों से जुड़े मुद्दों का उचित और निष्‍पक्ष ढंग से समाधान करने में सक्षम हों, भारत सहित सदस्‍य देशों के प्रयासों के बावजूद इन निकायों के बढ़ते राजनीतिकरण के परिणामस्‍वरूप समाधान में गतिरोध उत्‍पन्‍न हो जाता है और मामला कमजोर पड़ जाता है जिससे मुख्‍य मुद्दे का समाधान नहीं हो पाता। आतंकवाद और मानवाधिकार उल्‍लंघन में प्रत्‍यक्ष संबंध एक चुनौती रहा है। राष्‍ट्रीय सीमाओं के पार कार्रवाई करने वाले नॉन-स्‍टेट एक्‍टर्स, जैसे 9/11 और मुम्‍बई की कार्रवाइयां, द्वारा किए जाने वाले मानवाधिकार उल्‍लंघनों का समाधान करना अनिवार्य है। ये चुनौतियां भयावह बनी हुई हैं। तथापि, जहां तक इन निकायों के अंतर-सरकारी स्‍वरूप का संबंध है, न्‍याय के लिए सार्वभौमिक सम्‍मान में बढ़ोतरी, विधि का शासन तथा मानवाधिकार एवं मौलिक स्‍वतंत्रता का मसला साध्‍य होगा। यह ऐसे विश्‍व की वैचारिक ललक से जुड़ा हुआ है, जहां लोकतंत्र, अनेकत्‍व और विधि का शासन के मूल सिद्धांत पर आधारित मानवाधिकारों और मौलिक स्‍वतंत्रताओं का पूरी तरह बोध हो, उनका सम्‍मान हो और परिपुष्‍टि हो।

[लेखिका पूर्व राजनयिक हैं और 2004 से 2010 तक यूनेस्‍को में भारत की स्‍थायी प्रतिनिधि थीं। यह लेख अनन्‍य रूप से विदेश मंत्रालय की वेबसाइटwww.mea.gov.in के ‘केंद्र बिंदु में’ खंड के लिए लिखा गया है।]
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