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इंडिया टुडे को विदेश मंत्री का साक्षात्कार

मार्च 08, 2020

साक्षात्कारकर्ता: भारत के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पहली राजकीय यात्रा के पीछे का मुख्य विचार क्या है?

विदेश मंत्री: यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का सातवाँ दौरा है, और पहली बार विशेष रूप से केवल भारत का दौरा किया गया है, जो मेरे विचार में, अपने-आप में ही बहुत कुछ कहता है। यह दौरा उनके पहले कार्यकाल में हुआ है, यह तथ्य कि उन्होंने इसके लिए कुछ समय का अवकाश लिया था, जैसा कि राजनीतिक कैलेंडर से पता चलता है, यह प्रकट करता है कि हम दोनों अपने संबंधों को कितना महत्व देते हैं। इसलिए मेरे विचार में इस यात्रा को देखने का सही तरीका यह है कि आप वास्तव में भारत-अमेरिका संबंधों को विकसित, परिपक्व होते देख रहे हैं... कई मायनों में, सहयोग के नए क्षेत्र हैं ... यह गहरा होता जा रहा है, संख्याएं बढ़ रही हैं ... यह, एक अर्थ में, संघटित रूप से, बड़ी ही अबाध गति से आगे बढ़ रहा है, लेकिन कई और आयाम भी हैं ... बहुत, बहुत करीबी सहयोग है और आप देख सकते हैं कि आज, संबंधों की राजनीति में, सामरिक अभिसरण में, रक्षा संबंध की गुणवत्ता में -- कुछ ऐसे समझौते हुए जो इस दौरे का आधार बने हैं -- आप देख सकते हैं कि आतंकवाद, गृह-भूमि सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में, आर्थिक मुद्दों के समग्र क्षेत्र में - व्यापार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में ... आप वह ऊर्जा संबंध देख सकते हैं, जो पहले नहीं था। कई वर्षों से, अमेरिका परमाणु पर अपना ध्यान केंद्रित करता था, लेकिन आज हम संयुक्त राज्य अमेरिका से पर्याप्त मात्रा में तेल और गैस का आयात कर रहे हैं ... भविष्य में संभवतः हम कोयला भी आयात कर सकते हैं। और आप देख सकते हैं, लोगों-से-लोगों के संपर्क में ... आज इस संबंध की एक अनूठी विशेषता यह है कि, आज दोनों देशों के बीच एक मजबूत P2P घटक सामने आया है, और, भारतीय पक्ष के लोग वीजा को लेकर चिंतित हैं.... मेरे विचार में यह कहना उचित होगा कि यह दौरा P2P के साथ शुरू हुआ, और अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में एक प्रभावशाली P2P के साथ शुरू हुआ। क्योंकि यह वास्तव में आज इस तथ्य को प्रदर्शित करता है कि इस संबंध के लिए लोगों के मन में बहुत सद्भावना है, और लोगों का समर्थन भी है। बेशक, ऐसे कई मुद्दे हैं जिनके बारे में आप सोचते हैं...

साक्षात्कारकर्ता:
आइए उन मुद्दों के साथ शुरू करते हैं, विशेष रूप से व्यापार का मुद्दा। यह देखते हुए कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने व्यापार पर बहुत बल दिया है और भारत के व्यापार संतुलन को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि हमारा टैरिफ बहुत अधिक है। इस दौरे पर हमें एक मिनी-डील (छोटा सौदा) करना चाहिए जो शायद इसका केंद्रबिंदु बनेगा। वह मिनी-डील क्यों नहीं चला और ये बिग-डील (बड़ा सौदा) क्या है जिसके बारे में बातें की जा रही हैं?

विदेश मंत्री: हमने अपने व्यापार मंत्रियों के बीच वार्ता की है ... उनमें से अधिकांश संवाद बाजार पहुंच मुद्दों से संबंधित हैं, कुछ टैरिफ के मुद्दों से संबंधित हैं, और वो क्या करने का प्रयास कर रहे थे कि वो एक उचित पैकेज लाना चाहते थे। अब, उसी बीच, कुछ ऐसा हुआ, जिसे मैं कहूँगा कि लोगों के मन में दुविधा थी ... आप जानते होंगे, कि क्या हमें मिनी-डील करना चाहिए, या बिग-डील करना चाहिए, या दोनों करना चाहिए, या कोई एक डील करना चाहिए ... मेरे कहने का तात्पर्य है कि यहीं मुद्दे थे। तो, आखिरकार कल शाम को ये फैसला हुआ कि हम एक डील (सौदा) करेंगे। वास्तव में, मैं आप लोगों को वह संरूपण पढ़ कर सुनाऊंगा जिसमें वो चल रहे समझौतों को तत्परता सहित संपन्न करने के लिए सहमत हुए हैं, और अपेक्षा करते हैं कि यह एक वृहद द्विपक्षीय व्यापार समझौते का पहला चरण बनेगा। तो, मेरे विचार में, इसके पीछे का मूल विचार ये है कि, देखिए, आप तात्कालिक मुद्दों को लेते हैं, यदि आप उन्हें संबोधित करने में सक्षम होते हैं, तो इससे कुछ लंबित मुद्दों का समाधान होता है, जो वास्तव में आपको आगे बढ़ने के लिए एक बुनियाद देता है।

साक्षात्कारकर्ता:
तो आप ये कहना चाहते हैं कि हमें जल्द ही पहले चरण का सौदा मिलने जा रहा है, शायद कुछ सप्ताह में।

विदेश मंत्री: हाँ।

साक्षात्कारकर्ता: और जिसमें सभी विवादास्पद मुद्दें शामिल होंगे ... हम जी.एस.पी (प्राथमिकताओं की सामान्यकृत प्रणाली) को पुनःस्थापित करना चाहते थे, जो हमें अमेरिका में 3,000 माल को शुल्क मुक्त निर्यात करने की अनुमति देता था।

विदेश मंत्री: अब तक आप जान ही चुके होंगे कि जब तक कोई सौदा संपन्न नहीं हो जाता तब तक वह सौदा नहीं कहलाता। किसी सौदे का पूर्वानुमान लगाना अच्छा विचार नहीं है। लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि मुझे जानकारी है कि लोगों ने एक ऐसा पैकेज बनाने का प्रयास करने में कड़ी मेहनत की है...जो एक उचित पैकेज हो, जो कई मुद्दों, जिन पर अब तक कई बहस हो चुके हैं, को निपटाने की अनुमति देगा ताकि अब हम वास्तव में बड़े मुद्दों को देख सकें...

साक्षात्कारकर्ता:
जब हम बड़े मुद्दों को देखते हैं, तो अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर बात होती है। कुछ समय के लिए ऐसी बातें होती रही हैं। जब हम बड़े सौदे की बात करते हैं, तो क्या यहीं बड़ा सौदा है, या किसी अन्य प्रकार के अधिमान्य व्यवस्था पर काम किया जा रहा है जिसे हम बड़ा सौदा कह सकते हैं?

विदेश मंत्री: आपने अहमदाबाद में राष्ट्रपति ट्रम्प को इसके बारे में कहते हुए सुना था, आपने हमारे प्रधान मंत्री जी को भी बड़े समझौते के बारे में बोलते सुना था। आपको थोड़ा धीरज रखना होगा। क्योंकि लोगों को परिरेखा पर चर्चा करनी है, लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि ... मैं आपको अब भारत का परिप्रेक्ष्य बताता है। हमारे पांच बड़े व्यापार भागीदार हैं, ये बड़े व्यापार भागीदार जिनके साथ 100 बिलियन डॉलर से अधिक का व्यापार होता है, जो हैं अमेरिका, चीन, आसियान, यूरोपीय संघ और खाड़ी देश, पर इनका अनुक्रम भिन्न है। जापान के साथ पर्याप्त व्यापार होता है, लेकिन इस पैमाने का नहीं। अब, हमें देखना है कि, यदि हमें अपने आर्थिक जुड़ाव बढ़ाने हैं, अपने निर्यात बढ़ाने हैं, तो इनमें से कौन सा देश अधिक अनुपूरक होगा? कहाँ हमारे निर्यात क्षेत्र में वृद्धि की संभावना है? कहाँ हितों का कम संघर्ष हो सकता है? और, स्पष्ट रूप से, अमेरिका ऐसा देश है, आप जानते हैं, यह एक विकसित अर्थव्यवस्था है, यहाँ सब अच्छा चल रहा है,अमेरिका में मांग बढ़ रही है। तो, आज यह बहुत स्वाभाविक है कि हम अमेरिका को देखेंगे। लेकिन हम अन्य संभावनाओं की भी तलाश करेंगे।

साक्षात्कारकर्ता:
कल पढ़ कर सुनाए गए संयुक्त वक्तव्य में, एक विशेष वाक्यांश का उपयोग किया गया था – वृहद वैश्विक सामरिक भागीदारी। क्या ये एक अपग्रेड है? क्या आप हमें बता सकते हैं कि इसमें और इससे पहले वाले में मूल रूप से क्या अंतर है?

विदेश मंत्री:
ये एक अपग्रेड है, क्योंकि राजनय के लोग किसी संबंध को परिभाषित करने के लिए शब्दों का उपयोग करते हैं और इसी व्यवसाय में संलग्न लोग इन संकेतों को समझ लेते हैं। यह एक प्रकार की रेटिंग प्रक्रिया है। आप जो विशेषण जोड़ते हैं, उसके आधार पर और वो विशेषण क्या हैं ... लेकिन यदि आप इसकी बात करें, तो मुझे लगता है कि सहयोग के दायरे, सहयोग क्षेत्र और हम जो कुछ भी करने का प्रयास कर रहे हैं उसके महत्व के अर्थों में जो कुछ भी एक अधिक संकीर्ण संबंध के रूप में आरम्भ हुआ था ... मुझे लगता है कि आज वह संबंध वास्तव में वृहद हो गया है, इसका वैश्विक प्रभाव है। और बाकी की दुनिया आज यथावत् उसी कारण से इस संबंध का अनुसरण करती है। और यह वास्तव में व्यापक है। मानव गतिविधियों का ऐसा कोई पहलु नहीं है जो किसी न किसी तरीके से इस संबंध से अछूता रहा है।

साक्षात्कारकर्ता: रक्षा और सह-उत्पादन से संबंधित सौदे की बात करते हैं। रक्षा – विशेष रूप से खरीद – के अर्थों में अमेरिका के साथ हमारे संबंध उल्लेखनीय ढंग से बढ़े हैं। हेलिकॉप्टरों की इस हालिया खरीद को शामिल करते हुए, ये कुल मिलाकर लगभग 20 बिलियन डॉलर होगा। हमने अमेरिकी सशस्त्र बलों के साथ संयुक्त अभ्यास भी किया है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने हमें हाई-टेक उपकरण बेचने की बात भी कही है। क्या अब हम पूरी तरह से अमेरिकियों से चीजें खरीदने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं? रूसियों के साथ भी एक मुद्दा है।

विदेश मंत्री: नहीं, मेरे विचार में व्यापक रूप से रक्षा क्षेत्र में हम जो कुछ भी कर रहे हैं, वह समग्र रणनीति में हमारे कामों को प्रतिबिंबित करता है। आज हम एक बहु-ध्रुवीय जगत को देखते हैं। विभिन्न शक्तियां हैं जिनके बीच आपसी संबंध हैं। हमारा उद्देश्य एकाधिक सकारात्मक संबंध बनाना और हमारे हित के लिए उन संबंधों का यथासंभव लाभ उठाना है। तो, जब आप कहते हैं, क्या आपने अमेरिका से अधिक खरीदा है, हाँ, क्योंकि 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद 40 वर्षों से हमने अमेरिका से कुछ नहीं खरीदा था, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि वो हमें कुछ भी बेचना नहीं चाहते थे। उसके बाद से, अब एक दशक के दौरान, अमेरिका के साथ उपकरणों की आपूर्ति का संबंध एक विकल्प बना है। विशिष्ट रूप से, अनेक क्षेत्रों में, हमारी सेना चीजें अधिप्राप्त करने के लिए कई अवसरों की तलाश करती है, कभी निविदा जारी करती है, कभी बिल जारी होता है, ये सब परिस्थिति पर निर्भर करता है, इसके लिए अनेक मॉडल हैं। ये तथ्य कि हमने अमेरिका से एक विशेष मंच खरीदा है, निश्चित यहाँ अच्छा माना गया है। लेकिन हमने अपने अन्य आपूर्तिकर्ताओं से भी चीजें खरीदी हैं। और मेरे विचार में ये ऐसा ही होना चाहिए, क्योंकि एकाधिक संबंधों का होना और इसके हिस्से के रूप में रक्षा में निकट भागीदार बनना भी भारत के हित में है।

साक्षात्कारकर्ता: अमेरिकियों ने हमारे रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने पर आपत्ति जताई है। इस मुद्दे को कैसे हल किया गया है? उनका कहना था कि अंतर-परिचालन संबंधी समस्याएँ खड़ी होंगी, वो सी.ए.ए.टी.एस.ए (प्रतिबंध कार्रवाइयों के माध्यम से अमेरिका के विरोधियों का सामना) भी लागू करना चाहते थे।

विदेश मंत्री: वैसे, मैं जानता हूँ कि इसमें प्रेस की कहानी शामिल है। मैं आपको इतना बता सकता हूँ कि हम वहीं करेंगे जो राष्ट्रीय हित में होगा। हमने अमेरिकियों से ये बात स्पष्ट कही है, मैंने जनता के सामने भी ये बात कही है। मैं आशा और अपेक्षा करता हूँ कि लोग समझेंगे। यह भारत का व्यक्तिव्य है, हम मुक्त-विचार रखने वाला देश हैं। हम सर्वोत्तम निर्णय लेंगे, इस आधार पर कि हमारे हित में सबसे उत्तम क्या होगा।

साक्षात्कारकर्ता: क्या इस बार हुई वार्ता में ये मुद्दा उठाया गया था, क्या अमेरिकियों ने ये मुद्दा उठाया था?

विदेश मंत्री: नहीं, नहीं उठाया था।

साक्षात्कारकर्ता: हमें मानचित्रों और मानचित्रण पर अंतिम बुनियादी समझौते पर हस्ताक्षर करना था, इसके लिए पारिभाषिक शब्द बी.ई.सी.ए का प्रयोग किया गया था। ये 2+2 वार्ता का हिस्सा था, क्या इस पर भी चर्चा हुई थी?

विदेश मंत्री: मेरे विचार में इस पर कुछ चर्चाएँ हुई थीं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह संपन्न होने के निकट है। संयुक्त वक्तव्य में इसका सन्दर्भ दिया गया है

साक्षात्कारकर्ता:
संयुक्त वक्तव्य के अन्य हिस्से में अमेरिका के साथ हमारे हिन्द-प्रशांत जुड़ाव के बारे में कहा गया है। ये कितना महत्वपूर्ण है, क्या ये भी एक पारिभाषिक शब्द है, या यह चीन के खिलाफ प्रतिकार का एक प्रयास है?

विदेश मंत्री: वैसे, हिन्द-प्रशांत एक वास्तविकता है, यह एक नौसेना वास्तविकता है, यह एक राजनीतिक वास्तविकता है, एक व्यापार वास्तविकता है, एक आर्थिक वास्तविकता है। यह एक वास्तविकता क्यों है? क्योंकि हिन्द-प्रशांत का अर्थ है कि हम हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को दो अलग-अलग क्षेत्रों की तरह नहीं देख सकते और पृथक नहीं कर सकते हैं। हिन्द-प्रशांत की समग्र धारणा ये है कि लोगों को इस तरह के गंभीर मुद्दों को पहचानने, उनके लिए योजना बनाने और कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। पुनः मैं आपके सामने भारतीय परिप्रेक्ष्य रख रहा हूं। हमने 'लुक ईस्ट' शुरू किया, और फिर हमने इसमें संपर्कता और सुरक्षा और उद्देश्य की ठोस भावना को भी शामिल किया और यह 'एक्ट ईस्ट' बन गया। आज तथ्य यह है कि हमारे प्रमुख व्यापारिक भागीदारों में चीन, जापान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, जिनमें से सभी, ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर, हिंद महासागर से परे हैं। तो ऐसा नहीं है कि भारत का हित, आर्थिक या सामरिक रूप से, केवल हिंद महासागर तक ही सीमित है। ऐसा नहीं है कि भारतीय पदचिह्न केवल यहीं तक सीमित है। हम उससे आगे भी काम करते हैं, हम राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक रूप से काम करते हैं। तो ऐसा नहीं है कि हमने किसी तरह की भविष्यवाणी के तौर पर या भविष्य की किसी संभावना के रूप में हिन्द-प्रशांत का आविष्कार किया है। इसका अस्तित्व है, हम सभी हिन्द-प्रशांत विधि से काम करते हैं। हमें नहीं लगता कि यह किसी एक देश का विशेषाधिकार है। हम ये कह रहे हैं कि हमारा एक दृष्टिकोण है, आपका भी एक दृष्टिकोण होगा, आसियान का भी एक दृष्टिकोण है, अमेरिकियों और जापानियों का भी है। हम एक खुली बहस, एक खुला दृष्टिकोण चाहते हैं।

साक्षात्कारकर्ता:
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान ने भारत के साथ मिलकर चतुष्कोणीय पहल (क्वाड इनिशिएटिव) आरम्भ की है। क्या ये इस बात का संकेत नहीं है कि ये समूह गंभीरता से एक-साथ आ रहा है, क्योंकि एक समय था जब बहुत ही निम्न स्तर पर चर्चाएँ होती थीं, लेकिन अब आपके स्तर पर चर्चाएँ हो रही हैं। क्या इसे, चीन के खिलाफ प्रतिकारी बल नहीं समझा या कहा जा सकता है?

विदेश मंत्री: सबसे पहले तो ये कहूँगा कि ये एक राजनयिक तंत्र है। और, वैसे, अगर मैं और आप मुलाकात करते हैं, तो किसी तृतीय पक्ष को इस बात की चिंता क्यों होनी चाहिए कि हम क्यों मिल रहे हैं? ऐसा हो सकता है कि आप मुझे पसंद हों, या मुलाकात का कोई आम प्रयोजन हो। मेरे विचार में इस दुनिया में हर कोई इतना सुरक्षित और आत्मविश्वासी होना चाहिए कि उसे कोई समस्या न हो। जब दूसरे लोग आपस में मुलाकात करते हैं तब मुझे कुछ एहसास नहीं होता। तो हर बार मेरे पड़ोसियों के मिलने पर, क्या मुझे ये कहना चाहिए कि मुझे आपके मिलने से समस्या है क्योंकि हो सकता है कि आप मेरे खिलाफ योजना बना रहे हों? मेरे विचार में, अपनी पसंद से किसी से भी मिलना हमारा विशेषाधिकार है, और आज के समय में अंतर्राष्ट्रीय संबंध हमारे अभिसरणों के आधार पर इसी तरह से काम करते हैं। इन देशों के साथ हमारा अभिसरण है, इसलिए हम मुलाकातें करते हैं। वैसे, ये भी समझिए कि हम आर.आई.सी (रूस, भारत और चीन), ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) की भी बैठक करते हैं, और यह बहुत पुरानी बैठक है। लोगों को इस संबंध में निष्पक्ष बनने की आवश्यकता है।

साक्षात्कारकर्ता:
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जब भारत का दौरा किया, तब उन्होंने एक बात कही थी जिसमें उन्होंने आश्वासन दिया था कि वे भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने की दिशा में प्रयास करेंगे। राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी इसका उल्लेख किया है, लेकिन क्या यह सिर्फ कहने के लिए है। उन्हें यह कहते हुए लगभग 10 साल हो गए हैं। क्या कोई प्रगति हुई है?

विदेश मंत्री: वैसे तो, सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के रूप में अमेरिका का समर्थन स्वागत योग्य है। केवल इतना ही नहीं, यह महत्वपूर्ण और मूल्यवान भी है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र का पुनर्गठन अन्य देशों के लिए चिंता का सबब है। इसका कोई परिणाम न निकलना केवल भारत-अमेरिका का मुद्दा नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र का मुद्दा है। और आज हमारी समझ यह है कि बड़ी संख्या में देश संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन के विचार का समर्थन करते हैं। तथ्य ये है कि ये संगठन 1945 का डिज़ाइन है, और यह निश्चित ही 75 साल पुराना डिज़ाइन है, इसे कालभ्रमित कहना सही होगा। पिछले 75 सालों में विश्व में कितना कुछ बदल गया है। यहाँ तक कि G-7, एक तरह से, G-20 में बदल गया है, जो दर्शाता है कि दुनिया बदल गई है। तो, बाकी जगहों में अगर यह बदलाव हुआ है और लोगों ने इसका समर्थन किया है, यदि इसमें किसी का हित निहित नहीं है तो हमें इसी क्षेत्र में पीछे क्यों रहना चाहिए? मेरे विचार में, आज विश्व एक पुनर्गठित संयुक्त राष्ट्र के लिए तैयार है, और हमारा मानना है कि बहुत सारे देश इसका समर्थन करते हैं। हम इस पर लेख आधारित समझौता देखना चाहते हैं, और हम अन्य देशों, विशेष रूप से उनसे जो संयुक्त राष्ट्र में एक प्रधान भूमिका रखते हैं, से आग्रह करेंगे कि वो हमारा साथ दें।

साक्षात्कारकर्ता:
यदि हम अमेरिका की प्रवासन नीति की चिंताओं के अर्थों में और विशेष रूप से हमारे H1-B वीजा और H-4 वीजा पर इसके प्रभाव की बात करें तो...क्या इस बारे में आपको राष्ट्रपति ट्रम्प से कोई आश्वासन मिला है, कहने का अर्थ ये है कि क्या भारतीयों पर उनकी किसी भी नीति का प्रभाव होगा?

विदेश मंत्री: मुझे नहीं लगता कि आपका ये कहना सही है। मैं इसकी व्याख्या इस तरह से करूँगा और ऐसा ही हुआ है। भारत आज खुद नवाचार का एक स्रोत है और प्रतिभा का एक बहुत महत्वपूर्ण स्रोत है। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बहुत विश्वास है, क्योंकि हम लोकतांत्रिक समाज हैं, हम बाजार के आर्थिक नियमों को समझते हैं और उनका सम्मान करते हैं। प्रतिभा और नवाचार के बीच सीधा संबंध है। प्रतिभा का प्रवाह केवल भारत के लिए अधिमान्य नहीं है। हमारा मानना ​​है कि यह अमेरिकी हित में भी है। और ज्यादातर अमेरिकी इस चीज को पहचानते हैं। तो आज मुद्दा यह है कि, आप कैसे ... यदि संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में नवाचार और प्रौद्योगिकी में अग्रणी बना रहना चाहता है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रतिभा के प्रवाह के लिए खुला रहना समझ में आता है। और प्रतिभा और नवाचार दोनों में भारत का हित निहित है। और इस H1-B वीजा श्रेणी में प्रतिभा महत्वपूर्ण है। क्या हम H1-B वीजा का समर्थन करते हैं और इसे अधिक अबाध, अधिक उदार, H1-B वीजा बनाना चाहते हैं? बेशक हम ऐसा ही चाहते हैं और इस अवसर पर हमने यहीं किया। क्या हम दूसरों को भी यह समझाना चाहेंगे, समझाने का प्रयास करेंगे कि आपका एक प्रौद्योगिकी अग्रणी बना रहना कितना महत्वपूर्ण है? बेशक, यह स्वाभाविक है और हम यहीं कर रहे हैं।

साक्षात्कारकर्ता: ऊर्जा की बात करें तो, अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए हैं और हमें ईरान से कुछ भी खरीदने से मना कर दिया है। वेनेजुएला ऐसी दूसरी जगह है जिसके लिए अमेरिका ने कुछ ऐसा ही कहा है ... हम अब अमेरिका से तेल आयात कर रहे हैं, और इसके अलावा, कुछ अन्य ऊर्जा समझौते भी हैं। इसमें, दूरी और बाकी की चीजें देखते हुए, क्या यह मूल्य सुसंगत है? आपने स्थिरता की बात की थी। आप चाहते थे कि ईरान पर प्रतिबन्ध लगने के बाद सुनिश्चित किया जाए कि कीमतें यथोचित बनी रहें। क्या ऐसा हुआ है?

विदेश मंत्री: मुझे हमारे ऊर्जा व्यापार की विस्तृत जानकारी नहीं है। ये एक ऐसी चीज है जिससे लोग सीधे तौर पर निपटते हैं। लेकिन मैं समझता हूँ कि आज, संयुक्त राज्य अमेरिका या रूस से स्रोतन को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा है। अन्यथा, हम स्रोतन नहीं कर रहे होते।विदेश मंत्री: मुझे हमारे ऊर्जा व्यापार की विस्तृत जानकारी नहीं है। ये एक ऐसी चीज है जिससे लोग सीधे तौर पर निपटते हैं। लेकिन मैं समझता हूँ कि आज, संयुक्त राज्य अमेरिका या रूस से स्रोतन को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा है। अन्यथा, हम स्रोतन नहीं कर रहे होते।

साक्षात्कारकर्ता:
और आप ऊर्जा को अमेरिका के साथ बढ़ती साझेदारी के रूप में भी देखते हैं? क्या यह कुछ अर्थों में, खाड़ी देशों और क्षेत्र के अन्य देशों से हमारी आपूर्ति के लिए जोखिम उत्पन्न कर रहा है?

विदेश मंत्री: एक सामान्य ज्ञान प्रस्ताव के रूप में, कोई भी देश, किसी भी मामले में, किसी एक स्रोत या एक भूगोल पर अत्यधिक निर्भर रहना पसंद नहीं करेगा ... इस अर्थ में, आपके पास जितने अधिक विकल्प होंगे, आप उतना अधिक सुरक्षित होंगे, आप उतना ही बचें रहेंगे। और अमेरिका और रूस जैसे आपूर्तिकर्ताओं के साथ अनुबंध में प्रवेश, आपको कई और विकल्प देते हैं।

साक्षात्कारकर्ता: अब हम अधिक सामान्य विदेश नीति के सवाल पर आते हैं। पुरानी व्यवस्था ने एक ऐसी नई व्यवस्था को जन्म दिया है जिसे हम वैश्विक अव्यवस्था कह सकते हैं। वैश्वीकरण घट रहा है, नए राष्ट्रवाद और निर्लिप्ततावाद का उदय हो रहा है, और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानें कमजोर हो रही हैं। टेक्टोनिक शिफ्ट के इस युग में आप भारत के हितों का अनुसरण कैसे करेंगे?

विदेश मंत्री: आत्मविश्वास रख कर, जोखिम विरोधी न बन कर, चतुर बन कर। तो जब आप कोई परिवर्तन देखते हैं, वास्तव में ये एक खेल खेलने जैसा है। यदि मैं आपको अपनी ओर आते हुए देखता हूँ और मैं आपको समझ नहीं पा रहा हूँ, तो मुझे उन परिवर्तनों के साथ समायोजन करने की मानसिकता रखनी होगी। तो हमने वास्तव में वैश्विक राजनीति और इन वैश्विक संबंधों का बहुत ही सावधानी से अनुसरण करने का प्रयास किया है, उन्हें समझने, और फिर ये देखने का प्रयास किया है कि ये हमारे लिए कैसे काम करेंगे। मेरे विचार में, हमने बड़ी सफलता के साथ ऐसा किया है। यदि आप आज हमारे संबंधों की स्थिति को देखते हैं...तो पाएंगे कि हमने अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बढ़ाया है। साथ ही, रूस के साथ हमारे संबंध दृश्यमान रूप से कुछ वर्षों पहले के संबंधों की तुलना में काफी बेहतर हुए हैं। चीन के साथ हमारे संबंध बहुत ही जटिल हैं। इसे यथोचित रूप से अच्छी तरह से प्रबंधित किया गया है। हम आज यूरोप के साथ एक ऐसी तीव्रता से काम कर रहे हैं जो हमने कई वर्षों से नहीं दिखाई है। जापान के साथ संबंध बहुत अच्छे हैं। आसियान के साथ भी संबंध बहुत अच्छा रहा है। तत्व ये है कि आपको बड़े लीग में बेहतर काम करना होता है। लेकिन इसमें, जिसे आप अव्यवस्था कहते हैं, कई सारी मध्य शक्तियां भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाती हैं। हमारे पास ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, सऊदी अरब है। यदि हम G-20 देशों को देखें, तो आप वास्तव में पाएंगे कि विशेष रूप से पिछले कुछ वर्षों में, उन G-19 देशों के साथ हमारे संबंधों पर गहन द्विपक्षीय ध्यान दिया गया है। ये केवल शीर्ष चार या पांच देशों के लिए नहीं है। और साथ ही, हमने अपने पदचिन्हों का भी विस्तार किया है। उदाहरण के लिए, अफ्रीका को ले लें, वहां पर 18 नए दूतावास खुले हैं। पहले की तुलना में, पिछले पांच वर्षों में हमारे ज्यादा से ज्यादा नेताओं ने वहां का दौरा किया है। यदि आप हमारे विकासात्मक सहायता कार्यक्रमों को देखें, तो पाएंगे कि ये सहायता कार्यक्रम कैरीकॉम (कैरिबियाई समुदाय) से लेकर प्रशांत द्वीपसमूह से लेकर मोंगोलिया तक फैले हैं। तो, इस तरह हमारा पदचिन्ह बढ़ा है, हमारा उत्साह बढ़ा है, प्रतिबद्धता बढ़ी है, जुड़ाव अब और अधिक व्यापक बने हैं। लेकिन अंततः, आपमें केवल वैश्विक रुझानों का पूर्वानुमान लगाने और उन संबंधों का निर्माण करके ऐसे तरीके से प्रबंधित करने की क्षमता होनी चाहिए जिससे आप ये सभी चीजें एक-साथ कर सकें।

साक्षात्कारकर्ता:
जब आप वैश्विक रुझानों की बात करते हैं, और यदि आपने उन्हें पढ़ा है, तो भारत के लिए 2020 की और उसके बाद की बड़ी चुनौतियां क्या होंगी?

विदेश मंत्री: भारत उन्ही चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो बाकी की ज्यादातर दुनिया कर रही हैं। साथ ही हमें कुछ विशेष चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक बड़ी चुनौती अमेरिका और चीन के बीच तीक्ष्ण होता विरोधाभास है। दूसरा, पश्चिमी जगत के अंतर्गत चल रही बहस है। उसके बाद, अमेरिका का रुख बदलना है, क्योंकि अमेरिका का दुनिया भर में, अफगानिस्तान या मध्य पूर्व या शायद पूर्वी एशिया जैसी जगहों में भी, पदचिह्न रहा है। तो मैं कहूंगा कि ये सभी महत्वपूर्ण चुनौतियां रहेंगी, लेकिन ये सभी केवल चुनौतियां नहीं हैं। मुझे लगता है कि चीन का उदय आगे भी होता रहेगा और इसका तरंग प्रभाव पड़ेगा। मैं कहूंगा कि पश्चिम जगत के लिए पश्चिम एशिया-मध्य-पूर्व अधिक अशांत है। और मुझे लगता है कि अफ्रीका में कुछ बड़ी चुनौतियां हैं। तो यह एक आसान दुनिया नहीं है।

साक्षात्कारकर्ता: प्रधानमंत्री मोदी विदेश नीति में क्या अंतर लेकर आए हैं? वो कौन से परिवर्तन लेकर आए हैं? क्या कोई ‘मोदी सिद्धांत’ है?

विदेश मंत्री: एक बहुत ही प्रत्यक्ष परिवर्तन आया है। ये हर कोई जानता है। आप इसे पसंद कर सकते हैं, आप इसे नापसंद भी कर सकते हैं। कोई भी नहीं कह सकता कि उन्होंने (प्रधानमंत्री मोदी) हमारे प्रोफाइल में कोई विशाल परिवर्तन नहीं लाया है। मेरे विचार में, वे विदेश नीति में एक अधिक आधुनिकतावादी सोच, एकाधिक खिलाड़ियों के साथ जुड़ाव करने की अत्यधिक इच्छा, हमारे राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए एक कड़ी प्रतिबद्धता लेकर आए हैं। लेकिन साथ ही, दुनिया के लिए सचमुच अच्छा सोचते हैं। तो, लोग जब अक्सर राष्ट्रवाद की बात करते हैं, तो वास्तव में कई देशों में राष्ट्रवादी नेताओं का दुनिया के साथ ज्यादा लेना-देना नहीं होता है। आप हमारे पिछले कुछ वर्षों, हमारे ट्रैक रिकॉर्ड देख लीजिए। रिकॉर्ड में आपको अत्यधिक इच्छा दिखेगी ... आज हम मानवीय और आपदा अनुक्रिया परिस्थितियों में फर्स्ट रेस्पोंडर हैं। हमने कई बड़े पहल का नेतृत्व किया है, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, और अब आपदा प्रतिस्कंदी संघ (आपदा प्रतिस्कंदी अवसंरचना के लिए संघ)। हमारे विकासात्मक सहायता कार्यक्रम बहुत आगे बढ़ चुके हैं। चाहे अफ्रीका शिखर सम्मेलन हो या प्रशांत द्वीपसमूह हो, इनका अभ्यास बहुत ही गंभीर बन गया है, बहुत ही परिश्रमपूर्ण बन गया है। एक उत्साह के साथ इनका अनुसरण किया जाता है। मेरे विचार में, लोगों ने इसे पहचाना है और उससे भी बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के व्यक्तित्व का अधिक बेहतर प्रक्षेपण हुआ है। मेरे ख्याल से, भारत का ब्रांड पहले की तुलना में अब और भी बड़ा और मजबूत बन गया है।

साक्षात्कारकर्ता: आपने दिल्ली के हठधर्मिता की बात की है। क्या आप हमारे विचारों के अर्थों में कैद को तोड़ने में सक्षम रहे हैं? क्या आप उस कैद से बाहर आने में सक्षम रहे हैं?

विदेश मंत्री: आप जानते हैं, मैं कोई कैद में बंद व्यक्ति नहीं हूँ। मैं ऐसे लोगों से बात कर रहा था, जो मेरे विचार में, कभी-कभी उस कैद में होते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह कार्य प्रगति पर है। यदि कई वर्षों से आपका कोई निश्चित दृष्टिकोण रहा है, तो यह इतनी जल्दी नहीं बदलता है। यह आंशिक रूप से जनसांख्यिकी और आपके सोचने के तरीके पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, मैंने पाया है कि मुंबई में दर्शक दिल्ली के दर्शकों से बहुत अलग हैं।

साक्षात्कारकर्ता:
लेकिन जब आपने हठधर्मिता कहा, तो इससे आपका क्या अर्थ था? उनकी सोच अटकी हुई थी?

विदेश मंत्री: मेरे विचार में, लोगों में इस तरह की सोच ज्यादा थीं कि 'ऐसा मत करो?' या 'हमने यह नहीं किया है?', 'हम ऐसा क्यों कर रहे हैं?', 'यह अलग है'। देखिए, कहने का तात्पर्य यह है कि, यदि कुछ अलग है तो उसे मत करो, ‘यह जोखिम न लो, उस सूत्र से न हटो’।

साक्षात्कारकर्ता:
हम पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों को लेकर एक हठधर्मिता पर बात करते हैं। मोदी शासन जिस तरह से उनसे निपटी है, उससे हमारे और पाकिस्तान के बीच क्या कोई आमूल परिवर्तन आया है?

विदेश मंत्री: देखिए, मुझे लगता है कि एजेंडा में अंतर आया है। दृष्टिकोण में अंतर आया है और अधिक स्पष्टता मिली है। आख़िरकार, इन सबका परिणाम क्या होता है? देखिए, हम पड़ोसी हैं, हम सभी ये बात जानते हैं, लेकिन यह महत्वपूर्ण क्यों है? आख़िरकार ये सारी बातें, सीमा-पार आतंकवाद के मुद्दे पर आकर रूकती हैं और क्या हमारा दृष्टिकोण, किसी तरह से, इसे सामान्यीकृत कर रहा है या सामान्यीकृत करने में योगदान कर रहा है और इस संबंध में वैश्विक जागरूकता को रोकता है या बढ़ाने में मदद नहीं करता है। हमें यह सुनिश्चित करना है कि विश्व किसी भी परिस्थिति में एक राजनयिक उपकरण के रूप में सीमा-पार आतंकवाद के इस्तेमाल को स्वीकार न करे। इसका अर्थ है कि मुझे इस पर बल देते रहना होगा, स्पष्ट करना होगा कि यह उचित नहीं है। साथ ही ये मुद्दा नहीं है कि ‘क्या आप उनसे बात करते हैं? क्या आप उनसे बात नहीं करते हैं?’। मुद्दा ये है कि आप उनसे किस बारे में क्या बात करते हैं और बातचीत करते समय व्यावहारिक स्वरूप क्या होना चाहिए। तो, यदि हम, पीड़ित, खुद ही हमारे खिलाफ आतंकवाद फैलाने वाले व्यक्तियों के साथ नरमी से पेश आएँगे, तो बाकी की दुनिया से क्या उम्मीद की जा सकती है? आप जिस तरह से अपने लिए खड़े हो सकते हैं, क्या वो भी आपके लिए खड़े होंगे? तो ये उतना जटिल नहीं है।

साक्षात्कारकर्ता:
बालाकोट और उरी में हुए हमलों से, कुछ अर्थों में, क्या बदल गया है? हमने यह जिस तरह से किया, क्या इससे कोई आमूल परिवर्तन हुआ है? इससे हमें क्या मिला है?

विदेश मंत्री: मुझे नहीं पता कि इसका उत्तर क्या है, लेकिन आप जानते हैं, लोगों को यह एहसास होना चाहिए कि ये सरकार एक ऐसी सरकार है जिसने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प लिया है और लोगों के हित की कीमत पर परीक्षा देने को तैयार नहीं है।

साक्षात्कारकर्ता: और अब मुद्दा ये है, जिसे लोग पाकिस्तान के साथ एक शीत शांति कहते हैं - हम इस बातचीत को संवाद के संदर्भ में मेज पर वापस लाने के लिए क्या कर सकते हैं?

विदेश मंत्री: मुझे नहीं लगता कि कोई भी समझदार व्यक्ति कहेगा, 'हमें बातचीत नहीं करनी चाहिए।' मेरे कहने का तात्पर्य है कि केवल भारत-पाकिस्तान को ही नहीं, बल्कि किसी भी दो पड़ोसियों को आपस में बातचीत करनी चाहिए। लेकिन मैं आपसे उल्टा सवाल पूछता हूं – ऐसे कौन सा पड़ोसी है, जो दूसरे के खिलाफ सीमा-पार आतंकवाद करवाता है? क्योंकि जिस क्षण आप इस प्रश्न से हटते हैं और इन सभी अन्य प्रश्नों को पूछते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप बहस को टाल रहे हैं। इसलिए, उस पर ध्यान केंद्रित रखें।

साक्षात्कारकर्ता: आप जानते हैं, कल, प्रेस कॉन्फ्रेंस में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की, यदि दोनों देश तैयार हों तो। क्या इसमें अमेरिका की कोई भूमिका है?

विदेश मंत्री: मेरे विचार में हमने अपनी स्थिति बहुत स्पष्ट कर दी है कि यह एक द्विपक्षीय मामला है और हम द्विपक्षीय रूप से इससे निपटने को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं।

साक्षात्कारकर्ता: इसके अलावा, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धारा 370 के निरसन को कैसे लिया गया है? आप यूरोप में आयोजित होने वाली विभिन्न बैठकों में इससे कैसे निपट रहे हैं? इसे लेकर अमेरिका में भी चिंता जताई गई है। इस बारे में आपको क्या सामान्य समझ मिल रही है?

विदेश मंत्री: मुझे लगता है कि यदि आप उन्हें समझाएंगे कि गैर-हठधर्मिता के संदर्भ में क्या हुआ है, तो वे समझ जाएंगे कि यहां कई मुद्दें थे - विकास, सामाजिक-आर्थिक अधिकार और कानून के मुद्दे, अलगाववाद और आतंकवाद के मुद्दे और ये सभी एक तरह आपस में जुड़े हुए हैं। मेरे कहने का यह तात्पर्य है कि यदि आप लोगों को ऐतिहासिक दृष्टिकोण समझाते हैं, और पूछते हैं कि इन सभी के संबंधों पर आपका क्या विचार है, तो खुले विचार वाले लोग आपकी बात सुनने के इच्छुक होंगे, और आप जानते हैं, आपके इस कदम की सराहना करेंगे। और, स्पष्ट है कि, जो खुले विचार वाले नहीं हैं, वो आपकी बात नहीं सुनेंगे। तो मेरी अपनी समझ में मुझे लगता है कि अगस्त में निरसन के कुछ महीने बाद, आज व्यापक तौर पर लोगों ने इसे समझा है, विशेष रूप से सरकारों ने समझा है क्योंकि सरकारें इस प्रथा को लेकर बहुत गंभीर हैं। मेरे कहने का तात्पर्य है कि, मैं मीडिया का अपमान नहीं कर रहा, लेकिन सरकारें कम विवादात्मक हैं, कम वैचारिक हैं, इसलिए वहां पर इस संबंध में कोणीय दृष्टि नहीं रखती हैं जहाँ किसी विशेष अवधारणा के समर्थन में तथ्यों में परिवर्तन किया जाता है। तो मेरे विचार में, आज कई सरकारों ने इसे स्वीकार कर लिया है या हमारा पक्ष सुना है और हमारे विचारों की अच्छी समझ प्राप्त की है। अब, हमने अपने कई राजदूतों को भी जम्मू और कश्मीर भेजा था। उन्होंने राज्य का दौरा स्वयं किया और लोगों से मिले हैं, और मेरी समझ में, भारत में कभी-कभी लोग सरकार की आलोचना करते हैं पर फिर वापस उनके साथ मिल जाते हैं और मेरे विचार में उन्हें अब समझ आ गया है कि जम्मू और कश्मीर में विकास की दिशा सकारात्मक है। मेरा तात्पर्य है, बेशक कुछ ऐसे मुद्दें हैं जिन्हें संबोधित करना बाकी है, हम इसे छुपा नहीं रहे, लेकिन मुझे लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी देशों ने इस कार्रवाई को कुछ हद तक समझा है।

साक्षात्कारकर्ता:
अमेरिकी कांग्रेस के कुछ वर्ग हमारे खिलाफ संकल्प पारित करना चाहते हैं। यूरोपीय संसद में भी कुछ ऐसे सदस्य थे, जो हमारे खिलाफ संकल्प पारित करना चाहते थे। आप इस विशेष पहलू से कैसे निपटे हैं? क्या यह अब समाप्त हो चुका है?

विदेश मंत्री: ऐसा तो चलता रहेगा, क्योंकि याद रखिए वो भी राजनीति का खेल खेल रहे हैं। ये सभी अनिवार्य रूप से भारत में हो रही घटनाक्रमों के एक वस्तुपरक प्रेक्षण नहीं हैं। तो वो अपनी राजनीती खेल रहे हैं। जब आप इनमें से कई लोगों की वैचारिक स्थिति देखेंगे, तो आपको स्पष्ट नज़र आएगा। लेकिन, समग्र रूप से, मैं कहूँगा कि, जो कुछ भी हुआ है, आज सभी ने उसे यथोचित रूप से समझा है।

साक्षात्कारकर्ता: क्या घाटी के बड़े नेताओं की नजरबंदी और यह तथ्य कि इंटरनेट संचार अभी भी पूरी तरह से बहाल नहीं हुआ है, आपकी किसी भी चर्चा में आया है?

विदेश मंत्री: मुझे लगता है कि लोग इस समय की प्रगतिशील दिशा को देखते हैं। हमने यह कभी नहीं कहा था कि चीजें तुरंत सामान्य हो जाएंगी और सब कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार ने ऐसा कभी नहीं कहा था।

साक्षात्कारकर्ता:
क्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपके सभी मामलों में सी.ए.ए और एन.आर.सी शामिल हुआ है? हमने इसे कैसे समझाया है?

विदेश मंत्री: वैसे, कभी-कभी ये मुद्दा सामने आया है, उदाहरण के लिए, जब मैं ब्रुसेल्स में था- अधिकतर लोग जानना चाहते थे ... ऐसा होता था कि कोई विदेश मंत्री, या उसी स्तर के कोई अन्य मंत्री मेरे पास आते थे और पूछते थे, "मैंने ऐसा-ऐसा सुना है, क्या आप मुझे अपना परिप्रेक्ष्य सुना सकते हैं?” और स्वाभाविक है कि हम उन्हें मामले का सटीक परिप्रेक्ष्य बताते थे। अब, हम उन्हें समझाते हैं – क्योंकि आपने सी.ए.ए के बारे में सवाल किया है – यदि आप विधान में परिवर्तनों के उद्देश्यों को देखते हैं, तो वास्तव में इसका क्या कार्य है? इस देश में पहले से अनेक राज्य-हीन लोग हैं। यह राज्य-हीनता घटाता है। यह किसी से भी उसकी नागरिकता नहीं छीनता है। आज जिन लोगों के पास नागरिकता नहीं हैं ... उन्हें नागरिकता देता है। तो, परिणाम ये है कि भारत की कुल राज्य-हीनता कम हो गई है। और आप इसे ऐसे तरीके से प्रबंधित कर रहे हैं ... जिसमें आप अपने पड़ोस में एक बड़ा ‘आकर्षण कारक’ नहीं बनाना चाहते हैं, क्योंकि, आप जानते हैं, इस देश की अपनी खुद की चुनौतियां हैं। इस पर व्यापक क्षेत्र की चुनौतियों का बोझ नहीं डालना चाहिए। अब, यदि आप ये बात उनके सामने रखेंगे .... आप जानते हैं, सैद्धांतिक रूप से उन्हें समझाएंगे, तो यूरोप के लोग इसे समझेंगे। क्योंकि आख़िरकार, प्रवासन के मामले में आज यूरोप क्या करने का प्रयास कर रहा है? यूरोप भी राज्य-हीनता घटाने का प्रयास कर रहा है। यूरोप भी ‘आकर्षण कारक’ बने बिना ऐसा करना चाहता है। जब आप समस्या का समाधान कर रहे होते हैं, तब आप ये नहीं चाहते कि अधिक प्रवासियों का सृजन हो जिससे समस्या बढ़े। और जब आप उनसे पूछते हैं, "देखिए, आप मुझे समझाइए ... आपके देश में नागरिकीकरण/ देशीकरण की प्रथा तो होगी। क्या इसका कोई सन्दर्भ है? क्या इसका कोई मानदंड है? क्या इसके लिए निश्चित मानदंडों – सामाजिक, संजातीय, धार्मिक, भाषीय मानदंडों का उपयोग नहीं किया जाता?” यदि वे अपने नियमों और विनियमों को देखें, तो उत्तर में "हाँ” मिलेगा।

साक्षात्कारकर्ता: दिल्ली में जो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटीं, क्या उसने, कुछ अर्थों में, राष्ट्रपति ट्रम्प के दौरे को क्षति पहुंचाई है? आपको इस हिंसा के पीछे क्या नज़र आता है?

विदेश मंत्री: मैं केवल विदेश मामलों पर ही टिप्पणी करना चाहूँगा।

साक्षात्कारकर्ता: चीन की बात करते हैं। हमने ‘चेन्नई स्पिरिट’ देखा है। सीमा मुद्दे पर चीन के साथ हमारे मतभेद रहे थे। उनके पक्ष में व्यापार असंतुलन को लेकर हमारे बीच मतभेद हैं। और, निश्चित रूप से, पाकिस्तान के साथ चीन के संबंध को लेकर, विशेष रूप से पी.ओ.के में बनाए गए कॉरिडोर सी.पी.ई.सी या अथवा, पी.ओ.के में बनाए जाने वाले आर्थिक कॉरिडोर को लेकर मतभेद हैं। चेन्नई में दोनों नेताओं द्वारा दिखाई गई निकटता को देखते हुए, चीन के संदर्भ में, हम किन-किन चिंताओं को संबोधित करने में सक्षम रहे हैं?

विदेश मंत्री: मैं आपके सामने दो अलग बिन्दुएँ रखूँगा, और यह आवश्यक है कि आप दोनों को समझें। एक, चीन के साथ हमारा संबंध असाधारण रूप से जटिल है। आपने स्वयं कहा, सीमा को लेकर मुद्दा है, सुरक्षा मुद्दे हैं, उसके बाद पाकिस्तान के साथ चीन के संबंध के मुद्दे हैं, व्यापार संबंधी चिंताएँ हैं। हर मुद्दा अपने आप में जटिल है। कुल मिलकर .... सरकार कई सालों से इन मुद्दों से जूझ रही है, और चीन के उदय के साथ ये मुद्दे छोटे नहीं हुए हैं, क्योंकि चीन की क्षमता बढ़ गई है, इसकी महत्वाकांक्षा बढ़ गई है, इसका प्रभाव बढ़ गया है। सबसे पहले, ये पहचानना आवश्यक है कि इन मुद्दों के लिए हमें कोई आसान और तैयार समाधान नहीं मिलने वाला है। यदि ऐसा कोई समाधान होता, तो पिछले राजनेता और पिछली सरकारें अब तक इसे सुलझा चुकी होतीं।

दूसरा मुद्दा जिसे देखने की जरूरत है, यह पहचानना है कि ये मुद्दे जटिल हैं, उसके बाद क्या आप चीन के साथ अधिक वार्ता करेंगे या कम वार्ता करेंगे? चीन के साथ उच्च स्तर पर या निम्न स्तर पर वार्ता करेंगे? चीन के साथ अधिक गहन और अधिक खुले-विचार के साथ वार्ता करेंगे या नहीं? मैं आपको ये बताना चाहूँगा कि क्योंकि ये मुद्दे इतने गंभीर और जटिल हैं, तो बहुत उच्च स्तर पर संवाद करना आवश्यक है। और, इसलिए, 2017 में, हमने ये सुझाव दिया और कहा, "आप एक उभरती शक्ति हैं, हम भी एक उभरती शक्ति हैं, बाकी की दुनिया के साथ हमारे संबंधों में अंतर आने वाला है, एक-दूसरे के साथ भी हमारे संबंध बदलेंगे। तो यदि हम एक-दूसरे के साथ ईमानदारी से संवाद नहीं करते हैं, तो ये हम दोनों के लिए अच्छा नहीं होगा”। और मुझे लगता है कि उन्हें ये बात समझ में आई, और इसलिए हमारे दोनों देशों के बीच शिखर सम्मेलन हुए हैं, और मेरे विचार में, ये शिखर सम्मेलन बहुत ही सहायक रहे हैं, क्योंकि शिखर सम्मेलन की सामग्री के अलावा, दोनों देशों के नेता एक-दूसरे से सच्ची और साफ-साफ बात करेंगे, मेरे विचार में यह प्रणाली को एक अच्छा सन्देश भेजता है।

साक्षात्कारकर्ता:
‘एक्ट ईस्ट’ के अलावा ‘थिंक वेस्ट’ पर बात करते हैं, अब हम ‘पश्चिम पर विचार’ कर रहे हैं यानी सऊदी अरब, यू.ए.ई और अन्य खाड़ी देशों पर विचार कर रहे हैं ... हमने अब ऐसी क्या व्यवस्थाएं की हैं जो कुछ अर्थों में उनके साथ हमारे संबंधों को रूपांतरित कर रहा है?

विदेश मंत्री: जब आपने सवाल किया था कि ‘प्रधानमंत्री मोदी जी ने विदेश नीतियों में क्या परिवर्तन लाया है’ – मेरे विचार में, यह उसका एक सटीक उदाहरण है। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जो हमारे बहुत करीब हैं। हम इस क्षेत्र के साथ बहुत व्यापार करते हैं। लेकिन, पिछले कुछ सालों तक, हम इस क्षेत्र को मुख्य रूप से प्रवासियों की दृष्टि से देखते थे, और मुख्य रूप से तेल और कुछ व्यापारों की दृष्टि से देखते थे। इस क्षेत्र में ऐसे कई बड़े देश हैं, जिनके साथ कई-कई वर्षों से कोई सामरिक जुड़ाव नहीं हुआ है। अब, विरोधाभास ये है कि ये देश वास्तव में भारत में हो रहे परिवर्तनों का अनुसरण कर रहे थे। और वे भारत के साथ जुड़ने के लिए अत्यंत उत्सुक थे। लेकिन स्पष्ट रूप से वे हमारे सामरिक गणना का हिस्सा नहीं थे। पर आज, हैं। आज, हमारे गणतंत्र दिवस के समारोह में यू.ए.ई मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेता है.....

साक्षात्कारकर्ता: आपके कहने का तात्पर्य है कि ये एक आमूल परिवर्तन रहा है.....

विदेश मंत्री: हाँ...यू.ए.ई, सऊदी अरब, कई देश, यहाँ तक कि इजराइल भी।

साक्षात्कारकर्ता: अफ़ग़ानिस्तान की बात की जाए तो, अफ़ग़ानिस्तान में एक नई सरकार की गठन के लिए अमेरिका और तालिबान के बीच एक समझौता होने की संभावना है। इसका हम पर कितना प्रभाव पड़ता है, होने वाले समझौते की प्रकृति को लेकर हमारी क्या चिंताएं हैं, और जब राष्ट्रपति ट्रम्प यहाँ आए थे, क्या उनके साथ इस पर चर्चा हुई थी?

विदेश मंत्री: हाँ, अफ़ग़ानिस्तान पर चर्चा हुई थी। अन्य मुद्दों पर भी चर्चाएँ हुई थीं। मैंने राज्य सचिव माइक पोम्पिया के साथ, सचिव एस्पेर के साथ चर्चाएँ की थीं, मैं राजदूत खलीलज़ाद से भी मिला और पिछले सप्ताह जब मैं म्युनिक में था तब उन्होंने मुझे ब्रीफ भी किया था। तो, हम नज़र रखते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में क्या हो रहा है, हमारे एन.एस.ए भी आपस में संवाद करते रहते हैं। और हमें सचमुच अफ़ग़ानिस्तान में रूचि है – हमारी सभ्यताओं का जुड़ाव बहुत मजबूत है, हमारा लोगों-से-लोगों का संपर्क भी बहुत मजबूत है – ये एक ऐसा समाज है जहाँ एक भारतीय होने के नाते जाने पर आपको गर्व का अनुभव होता है, क्योंकि लोग समझते हैं कि हमने कई वर्षों से उनके देश के लिए बहुत कुछ अच्छा किया है, और मेरे विचार में...

साक्षात्कारकर्ता: हम आश्वस्त थे कि वो हमारे कुछ हितों पर विचार करेंगे?

विदेश मंत्री: लेकिन, आप इसके लिए जो दृष्टिकोण अपनाते हैं, इससे ऐसा लगता है कि दूसरे आपके लिए काम कर रहे हैं! आप जानते हैं, आख़िरकार, आप ... यदि आपका कोई हित है, तो आपको आगे बढ़कर उसे सुरक्षित करना चाहिए। मेरे कहने का तात्पर्य है कि, बेशक, मैं वांछित परिणाम पाने के लिए प्रयत्न करके सभी को प्रभावित करने की कोशिश करूँगा। लेकिन, आख़िरकार, प्रयास तो मुझे ही करना होगा और अपने साधनों के उपयोग से मुझे ही विदेश नीति बनानी होगी और अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए मुझमे क्षमता होनी चाहिए।

साक्षात्कारकर्ता: राष्ट्रपति ट्रम्प ने [अमेरिका में] अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा के लिए जमीन पर प्रतिबन्ध लगाने का संकेत दिया है। हम इस मोर्चे पर ऐसे किसी भी विकल्प पर विचार नहीं कर रहे हैं?

विदेश मंत्री: (नहीं कहते हुए सिर हिलाते हैं)

साक्षात्कारकर्ता: आर्थिक मोर्चे पर, हमारी अर्थव्यवस्था को जिस मंदी का सामना करना पड़ रहा है, क्या उससे, कुछ अर्थों में, हमारे राजनयिक महत्व पर कोई प्रभाव पड़ा है? हमें सबसे तेजी से बढ़ती एक अर्थव्यवस्था के रूप में देखा गया था, हमारे बाजार का आकार भी बढ़ा था ... क्या यह किसी भी तरह से आपकी क्षमता को प्रभावित करता है ...?

विदेश मंत्री: जैसा कि आपने अन्य सवाल किए थे – जम्मू और कश्मीर में 370, सी.ए.ए – मुझे लगता है कि हम विदेशों को समग्र रूप से यह सन्देश पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं कि आज की ये सरकार बड़े सुधारों के प्रति गहराई से कटिबद्ध है। बड़े सामाजिक सुधार, आर्थिक सुधार, राजनीतिक सुधार, सुरक्षा सुधार। हमारी ये मानसिकता नहीं कि ‘अब हम सत्ता में आ चुके हैं और साथ ही हमें कई सारी समस्याएं विरासत में मिली हैं और हम, किसी न किसी तरीके से, इनसे अपना दामन छुड़ा लेते हैं और लोगों को ये बोझ उठाने के लिए छोड़ देते हैं’। मेरे विचार में, हम समस्याओं को सुलझाने की सक्रिय इच्छा रखते हैं। जिसमें विरासत में मिले बोझ की समस्या शामिल है ... और कुछ मुद्दें जैसा कि आपने उल्लेख किया, नागरिकता के मुद्दे, सी.ए.ए या जी.एस.टी या, यहाँ तक कि 370 का मुद्दा .... ये सभी कोई नए मुद्दें नहीं हैं, वास्तव में ये मुद्दें कई-कई सालों से चलते आ रहे हैं..

साक्षात्कारकर्ता: लेकिन इस सरकार ने इनसे निपटने से कोई परहेज या विलम्ब नहीं की...

विदेश मंत्री: हां, मुझे लगता है कि गंभीरता से विचार करने वाले लोग समझते हैं कि इसका क्या अर्थ है। तो मैं ये सब क्यों बता रहा हूं? क्योंकि चीजों को गंभीरता से लेने वाले लोग अर्थव्यवस्था में हो रहे घटनाक्रमों को भी गंभीरता से देखते हैं। इसलिए, मेरी समझ में, लोग इस बात को जरूर समझते हैं कि हम किन-किन चुनौतियों को संबोधित कर रहे हैं, जिसमें, आप जानते हैं, एन.पी.ए जैसे मुद्दे शामिल हैं। वो समझते हैं कि एक बड़ा बदलाव हो रहा है - प्रणाली की सफाई चल रही है। वो इस बात की भी सराहना करते हैं कि हमने, आप जानते हैं, बढ़ती वृद्धि की अनिवार्यता और वित्तीय घाटे का स्तर बनाए रखने के लिए दीर्घावधिक आवश्यकताओं के बीच एक बहुत ही अच्छा संतुलन बनाकर रखा है। तो, मेरे विचार में, लोग इसे वित्त का एक बहुत ही जिम्मेदारीपूर्ण, कुशल प्रबंधन के रूप में देखते हैं। तो, कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि लोग बजट, समग्र आर्थिक प्रबंधन की सराहना करते हैं, लेकिन आपके सवाल का जवाब भी यही होगा, मैं चाहे जहाँ भी जाऊं, मैं भारत के साथ व्यापार में विशाल हित तलाशता हूँ। लोग हम पर दांव लगाते रहे हैं। मुझे इन सभी में कोई खामी नहीं नज़र आती है। तो, हमारी समस्याओं का एक हिस्सा और फिर कभी-कभी, हमारी अपनी आंतरिक बहस भी होती है, जो सही है – हमारे लोकतांत्रिक समज में, ऐसा होना स्वाभाविक है – लेकिन मैं लोगों से कहता हूँ कि देखिए, हम कभी-कभी अपने बातों में इतना उलझ जाते हैं कि हम दूसरों के विचार नहीं सुनते हैं। कभी-कभी दूसरों के विचार भी सुनने चाहिए। देखना चाहिए कि लोग जो कह रहे हैं, उसका आधार क्या है। और, मेरा मानना है कि आज दुनिया को भारत में बहुत रूचि है - मेरे ख्याल में लोग हमें वैश्विक आर्थिक वृद्धि के संचालक के रूप में देखना चाहते हैं। वो हमें एक स्थिरिकारक शक्ति मानते हैं, एक जिम्मेदार शक्ति मानते हैं। वो एक ऐसे भारत को देखते हैं जो निर्णय लेने की इच्छा रखता है, बड़ी बहसों से बचता नहीं है। और मुझे लगता है कि कई घरेलु बहस ... बहुत दिलचस्प हैं, आप जानते हैं, मैंने आपसे ब्रुसेल्स जाने की बात कही तो आपने मुझसे पूछा कि क्या वहां पर सी.ए.ए पर चर्चा हुई थी। भारत के सामाजिक पक्ष में जो कुछ भी चल रहा है, लोग उससे बहुत आकर्षित हुए हैं - कैसे लिंग भेदभाव समाप्त हो रहा है, लड़कियों की शिक्षा कैसे बेहतर हो रही है, कौशल कार्यक्रम कैसे बढ़ रहा है, डिजिटल पक्ष में क्या हो रहा है। इनके लिए ये सभी चीजें बहुत दिलचस्प हैं।

साक्षात्कारकर्ता: व्यापार पर एक आखरी सवाल, आपने उल्लेख किया कि लोग भारत के साथ व्यवसाय करने की इच्छा रखते हैं। तो फिर हमने आर.सी.ई.पी से अपने कदम पीछे क्यों लिए? अपेक्षा थी कि हम इस पर हस्ताक्षर करेंगे। हमने ऐसा क्यों नहीं किया?

विदेश मंत्री: देखिए, दुबारा कहूँगा, यह व्यापार मंत्री का मामला है, लेकिन क्योंकि मैं भी वहां मौजूद था ... मेरे विचार में, सामान्य बोध में इसका उत्तर होगा - क्योंकि हमें जो प्रस्ताव मिले वो अच्छे नहीं थे। वो प्रस्ताव पर्याप्त अच्छे क्यों नहीं थे? क्योंकि मेरे विचार में उन्होंने हमारी बहुत सारी चिंताओं को संबोधित नहीं किया था। संभावना है कि यदि हम इन समझौतों में प्रवेश करते जहाँ आर.सी.ई.पी देशों के समक्ष हमें बड़े घाटे से कोई सुरक्षा नहीं मिल रही थी। और हमें घाटे के बारे में चिंता है क्योंकि हमारा मानना है कि घाटा प्रतिस्पर्धी लाभ के परिणामस्वरूप नहीं उभरा है बल्कि गैर-टैरिफ बाधाओं और बाजार पहुँच की कमी और विभिन्न प्रकार के देशों में विनियामक और नीतियों के अवरोधों के परिणामस्वरूप उभरा है। तो, हमारे मुख्य मुद्दे इस संबंध में थे। और हम, उस समय हमें फैसला लेना पड़ा – क्या हमारी चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित किया गया है या नहीं? मेरे विचार में, हमने बहुत ही साहसिक लेकिन आवश्यक फैसला लिया है।

साक्षात्कारकर्ता: और हम तैयार हैं .. यदि ..?

विदेश मंत्री: वैसे, आप जानते हैं, ये फैसला करना हमारे ऊपर नहीं है।

साक्षात्कारकर्ता: और आखिर में आप भारत की व्याख्या कैसे करेंगे? यह एक निर्माण शक्ति है, यह एक प्रमुख शक्ति है, भारत के संबंध में आपकी व्याख्या क्या होगी? एक बार आपने इसे दक्षिण पश्चिमी शक्ति भी कहा था..

विदेश मंत्री: मुझे लगता है कि यह प्रासंगिक है। यह आपके द्वारा मुझसे पूछे गए सवाल पर निर्भर करता है। मेरा तात्पर्य है, मैं कहूंगा, एक ऐसा देश, जो जल्द ही, एक दिन, दुनिया में सबसे अधिक लोकप्रिय देश होगा, हमें निश्चित रूप से एक प्रमुख शक्ति बनने की आकांक्षा रखनी चाहिए। मुझे नहीं लगता कि इस बारे में हमें क्षमाप्रार्थी या विनम्र होने की आवश्यकता है। मेरे विचार में, हमारा एक प्रमुख शक्ति बनना सही है। लेकिन अभी हम उस मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं क्योंकि यदि आप इसकी इच्छा रखते हैं या आकांक्षा करते हैं – तो आपको अपनी कड़ी मेहनत से उस मुकाम तक पहुंचना होगा, अपना राजनय सही ढंग से करना होगा, सही रणनीति बनानी होगी। और हम, कुछ अर्थों में, यही करने का प्रयास कर रहे हैं।

तब मैंने दक्षिण पश्चिमी शक्ति क्यों कहा था, क्योंकि लोग अक्सर कहते हैं, वे अक्सर पश्चिम और लोकतंत्र को बराबर मानते हैं। बहरहाल, जो मेरे विचार में लोकतंत्र की बुनियादी रूप से एक गलत परिभाषा है। मुझे लगता है कि आज, ज्यादातर लोकतंत्र पश्चिमी जगत के बाहर मौजूद है। लेकिन मैं लोगों को याद दिलाना चाहता था कि हम भी उत्तर औपनिवेशिक समाज हैं – हमने अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया है; जैसा कि एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका की कई अन्य देशों ने किया है। ये एक नैतिक घटक है। मुझे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर पूरा विश्वास है ... और मुझे लगता है कि यहीं वो क्षेत्र है जिनसे हमें सम्मान और प्रेम मिलता है। तो, मेरे लिए, आज, मैं ... मैं भारत से बाहर लगभग 500 और कुछ 535 और 540 परियोजनाएं चलाता हूँ – और इनमें से अधिकतर परियोजनाएं इन्हीं देशों में हैं। और, ऐसा करने के पीछे हमारा कारण ये है कि हम इन देशों, जो एक तरह से साम्राज्यवाद युग के शिकार रहे हैं, के मध्य भाईचारे का सन्देश दुनिया तक पहुँचाना चाहते हैं और आज हमें अपनी असली जगह मिल रही है, लेकिन अभी हमें इसमें थोड़ा समय लगेगा।

साक्षात्कारकर्ता: एक व्यक्तिगत सवाल है, विदेश सचिव रहने के बाद विदेश मंत्री बनने पर आपको क्या अंतर अनुभव होता है। इन दोनों के बीच बड़ा अंतर क्या है?

विदेश मंत्री: अरे, इसका जवाब देने के लिए एक और साक्षात्कार करना पड़ जाएगा।

साक्षात्कारकर्ता:
विदेश मंत्री जी, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद। धन्यवाद।

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