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रायसीना संवाद 2021 में “जंक्शन काबुल : द रोड टू पीस” विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में विदेश मंत्री की भागीदारी (अप्रैल 16, 2021)

अप्रैल 17, 2021

पालकी शर्मा उपाध्याय: नमस्कार और "काबुल जंक्शन : द रोड टू पीस" विषय पर होने वाली इस बातचीत में आप सभी का स्वागत है। जैसा कि आप जानते हैं, अफगानिस्तान पिछले दिनों से एक शांति सौदे को लेकर सुर्खियों में रहा जिससे वास्तव में शांति के अपेक्षाकृत परिणाम हासिल नहीं हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने अमेरिकी नाटो सैनिकों को वापस बुलाने की समय सीमा बढ़ाकर 11 सितंबर कर दी, जो 9/11 हमलों की 20वीं वर्षगांठ भी है। और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी कल काबुल में थे, जो आज चर्चा में है। तालिबान का कहना है कि, अमेरिकी द्वारा सैनिकों को वापस बुलाने में देरी ने उनके लिए "जवाबी कार्रवाई करने का रास्ता खोल दिया है, और आगे जो कुछ भी होगा उसकी जिम्मेदारी अमेरिका की होगी, न कि इस्लामिक अमीरात की।" तो ऐसी स्थिति में शांति समझौता का क्या औचित्य है? और काबुल में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार की भूमिका क्या है? क्षेत्र में सुरक्षा के क्या निहितार्थ हैं और अफगानिस्तान के लोगों का भविष्य क्या है? हम आज अपने पैनल के सदस्यों के साथ इन्हीं विषयों पर चर्चा करेंगे। आज हमारे साथ ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ; भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर; और अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डॉ. हमदुल्ला मोहिब मौजूद हैं जो अफगान के नेतृत्व में हल तलाशन में काफी सक्रिय रहे हैं। देवियों और सज्जनों, रायसीना संवाद में आप सभी का स्वागत है। अगर स्थिति सामान्य होती, तो यह बातचीत तुर्की में हो रही होती, लेकिन हमें खुशी है कि इसका आयोजन इस तरह से हो रहा है।

मोहम्मद जवाद ज़रीफ: थोड़ी देर में आपके साथ जुड़ता हूं।

पालकी शर्मा उपाध्याय: आज की चर्चा की शुरुआत डॉ. हमदुल्ला मोहिब जी से करते हैं। तालिबान ने जीत की घोषणा की है। अमेरिका ने सैन्य टुकड़ी को वापस बुलाने की समय सीमा घोषित कर दी है। ऐसे में अफगानिस्तान सरकार का क्या रुख है?

हमदुल्लाह मोहिब: आपको और ज़रीफ़ को, और जयशंकर जी को नमस्कार। मुझे लगता है कि यह एक बड़ा मौका है। यह एक ऐसा समय है जिसमें अफगान का अपनी देश की सुरक्षा स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण है। मैं पहले भी कई मौकों पर यह कह चुका हूं कि अफगानिस्तान को अपने यहां अमेरिकी सैनिकों की जरूरत नहीं है, हमें तो बस एएनडीएसएफ को समर्थन चाहिए, जिसका हमें आश्वासन दिया गया है कि यह समर्थन जारी रहेगा। और इससे अफगानिस्तान को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। बड़े स्तर पर बात करें तो, तालिबान के पास अब अफगानिस्तान में अपनी हिंसा जारी रखने की कोई वजह नहीं है। जिन कारणों से वो हिंसा कर रहे थे, वे अब पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं। और यह उनके लिए अफगान सरकार के साथ शांति स्थापित करने और मुख्यधारा के राजनीतिक समाज का हिस्सा बनने का अवसर है।

पालकी शर्मा उपाध्याय: लेकिन, वास्तविकता तो यह है कि वे ऐसा नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इसी महीने एक हफ्ते के भीतर हुई हिंसक घटनाओं में वहाँ 100 से अधिक लोग मारे गए हैं। जावद ज़रीफ़ जी, जनवरी महीने में, ईरान ने तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के साथ एक बैठक की थी, जिसमें अमेरिका द्वारा शांति वार्ता पर अपने विचार साझा किये थे। तालिबान आखिर क्या सोच रहा है? इस बारे में आपका क्या अनुमान है? क्या वे हिंसा करना जारी रखेंगे?

मोहम्मद जवाद ज़रीफ़: तालिबान के साथ हमारी बातचीत में, सबसे पहली प्राथमिकता हमारी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा है, और दूसरी प्राथमिकता, उन्हें यह समझाना है कि अफगानिस्तान में समावेशी शांति हेतु अफगानिस्तान में व्यापक आधार की शांति की जरुरत है और तालिबान को उस शांति का हिस्सा होना चाहिए, तालिबान को उस शांति को नियंत्रित नहीं करना चाहिए। अफगानिस्तान की वो लोकतांत्रिक संस्थाएं, जो विगत 20 सालों से अफगानिस्तान के लोगों के लिए काम कर रही हैं, उन्हें यथावत रहने देना चाहिए और तालिबान द्वारा हिंसा का रास्ता छोड़ने और राजनीतिक प्रक्रिया में प्रवेश करने के साथ इन्हें और अधिक समावेशी बनना चाहिए। और हम तालिबान से इसलिए प्रभावित हैं कि ईरान तालिबान और अफगानिस्तान के अन्य समूहों, विशेष रूप से अफगानिस्तान सरकार के लिए ऐसा कोई भी मंच मुहैया कराने के लिए तैयार है, जिसपर वार्ता को आगे बढ़ाया जा सके। बिना किसी धमकी और हिंसा के, शांति के लिए काम करना, अफगानिस्तान के संवैधानिक ढांचे के तहत शांति के लिए काम करना, जिसपर लगभग 20 साल पहले से और इन 20 वर्षों में बॉन में एक बहुत ही गंभीर प्रक्रिया के तहत काम किया जा रहा है। मेरा मानना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा करना, एक सकारात्मक कदम है, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि विदेशी बलों की उपस्थिति से हमारे क्षेत्र में कभी भी शांति व स्थिरता नहीं आ सकेगा, और उनके वापस जाने से हिंसा के कारण कम होंगे। और मुझे लगता है कि तालिबान को इसका लाभ उठाकर हिंसा को नहीं बढ़ाना चाहिए क्योंकि अभी हमारे बीच सुलह की कुछ गुंजाइश दिखनी शुरु हुई है, ऐसे में हमें हिंसा को खत्म करने की अफगानिस्तान के लोगों की भावनाओं का सम्मान करना होगा। हिंसा अब बहुत हो चुकी। अब विदेशी बल हमारे देश से वापस जा रहे हैं। अफगानिस्तान में विदेशी सैनिकों को तैनात करने का कोई कारण नहीं है। अब अफगानिस्तान में संवैधानिक ढांचे के आधार पर व्यापक आधार वाली सरकार बनाने की दिशा में काम करने का समय है, जिस पर अफगानिस्तान भी सहमत है।

पालकी शर्मा उपाध्याय: डॉ. जयशंकर, भारत अकेला ऐसा देश है जो इस प्रक्रिया में शामिल सभी हितधारकों के साथ बातचीत कर रहा है। ताजिकिस्तान में, आपने तुर्की और ईरान के विदेश मंत्रियों से मिले, और हाल ही में आपने नई दिल्ली में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात की। आपने अमेरिकी नेताओं से भी बात की। आप शांति प्रक्रिया में किस तरह से शामिल हैं?

डॉ. एस. जयशंकर: देखिए पालकी, हमारा हमेशा से मानना रहा है कि शांति की प्रक्रिया अफगान के नेतृत्व वाली, अफगान स्वामित्व वाली और अफगान नियंत्रित होनी चाहिए, ऐसा कहने की एक वजह है। अफगानिस्तान की भलाई किसमें है, यह अफगान के लोगों द्वारा तय किया जाना चाहिए। इस बात को ज़रीफ़ और डॉ. मोहिब जी ने अलग-अलग तरीकों से कहा, लेकिन शायद हम सभी इस बात पर सहमत होंगे। हम सभी आज यह देखना चाहेंगे कि अफगानिस्तान का हित किसमें है और इस बात को समझना इतना कठिन भी नहीं है। मेरी इस बात से हर कोई सहमत होगा है कि सामूहिक हित शांति, हिंसा की कमी, जिसकी बात ज़रीफ़ जी ने भी कही है, सामूहिक हित में है, सामूहिक हित विकास में है, और लोकतांत्रिक साधनों के माध्यम से लोगों की भावनाओं को मानने में है। इन्हीं बातों को इस प्रक्रिया में रखा गया है। समस्या, अल्पकालिक हितों के कारण सहमति न बनना और अन्य दलों की मौजूदगी के दबाव के बीच हर किसी को एक साथ काम करने के लिए तैयार करने की है। इसलिए मुझे लगता है कि राष्ट्रपति बिडेन की घोषणा एक बहुत बड़ा कदम है जिससे अफगानिस्तान को एक नई दिशा मिलेगी और यह दिशा अफगानिस्तान के लिए सही हो और इसके परिणाम अच्छे हो, इसके लिए यह जरुरी है कि हम सभी साथ मिलकर काम करें।

पालकी शर्मा उपाध्याय: तो हम सभी इस बात से सहमत हैं कि विदेशी सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला सही है। तो, डॉ. जयशंकर जी भारत के लिए क्षेत्र की सुरक्षा और अफगानिस्तान में भारत के विकास के प्रयासों के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं?

डॉ. एस. जयशंकर: इसपर कई लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है, कुछ कहेंगे कि सैनिकों को और अधिक समय तक रहना चाहिए, कुछ कहेंगे उन्हें वापस बुला लेना चाहिए। लेकिन, हममें से बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि वहां से अमेरिकियों को जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से वापस हटाया गया है। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि, वे अफगानिस्तान में केवल अमेरिकी सैनिक ही नहीं हैं, वहां अन्य देशों के भी सैनिक हैं। और जहां भारत का संबंध है, हमने अपनी विकास परियोजनाओं के माध्यम से, और मुझे यकीन है कि डॉ. मोहिब भी मेरी इस बात से सहमत होंगे कि, हमने सभी 34 अफगान प्रांतों में, किसी न किसी तरह की विकास परियोजनाएं की हैं। विगत 20 सालों में, हमने अपने काम और परियोजनाओं से जमीनी स्तर पर यह दिखाया है कि, अफगानिस्तान को लेकर हमारी भावनाएं कैसी हैं। इसलिए हमारा मानना है कि भारत-अफगान के बीच की मित्रता मजबूत है। और हम वास्तव में अफगानिस्तान के लोगों की भलाई चाहते हैं और अफगान के लोगों के हित के लिए हम अपनी क्षमता से, अपने पूरे प्रभाव, अन्य पड़ोसियों के साथ अपने संबंधों के माध्यम से प्रयास करेंगे।

पालकी शर्मा उपाध्याय: डॉ. हमदुल्ला मोहिब जी, तालिबान ने कहा है कि जब तक एक भी विदेशी सैनिक अफगानिस्तान में है, तब तक वह किसी भी सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेगा। क्या आपको लगता है कि तालिबान आगे बढ़ने के लिए राष्ट्रपति बिडेन द्वारा अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए तय की गई 11 सितंबर की तारीख का इंतजार कर रहा है?

हमदुल्ला मोहिब: तालिबान की यह पहली गलती नहीं होगी। अमेरिका-तालिबान समझौते से पहले भी तालिबान के पास एक बड़ा मौका था जब पूरी दुनिया तालिबान को देख रही थी कि वह क्या करता है, उनका समूह क्या करता है। तालिबान बदल गया है, ऐसी बातें कहीं गईं, और कहा गया कि वे अब अधिक विचारशील और दूसरों के प्रति अधिक सहिष्णु हो गए हैं, और वे इस मौके का लाभ उठाकर अफगानिस्तान को अधिक सहिष्णु बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएंगे। समझौते से पहले जब चर्चा शुरू हुई, तो सबसे पहले, तालिबान आगे आया और अपनी जीत की बातें कहने लगा, जो देश के बाकी लोगों को पसंद नहीं आया। दूसरा, उनके अहंकार की वजह से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का उत्साह भी कम हो गया। और तीसरा, वो सभी अफगान जो तालिबान के साथ बातचीत के लिए तत्पर थे, उन्हें जल्द ही पता चल गया कि तालिबान में कोई बदलाव नहीं हुआ है, और समझौता वार्ता की कोई गुंजाइस नहीं है और केवल उनका समय बर्बाद हो रहा है। उन्होंने अपनी राष्ट्रवादी साख खो दी है, उन्होंने कुछ सड़कें बनाईं और कहा कि वे सड़कों को पक्का करेंगे और इसके तुरंत बाद मिलियन डॉलर की राष्ट्रीय अवसंरचना को नष्ट करना शुरू कर दिया।

हमारे अनुमान के अनुसार, तालिबान की विनाश संबंधी गतिविधि की वजह से एक साल में लगभग 900 मिलियन डॉलर की अवसंरचना नष्ट हो रही है, जो किसी भी तरह उनके राष्ट्रवादी होने को नहीं दर्शाता है। इसलिए उन पर लोगों का विश्वास खत्म हो रहा है, वे लड़ाई के मूल कारणों से भटक रहे हैं, इस्लामी दुनिया और भारत के इस्लामी विद्वानों सहित लगभग सभी विद्वानों ने कहा है कि, अफगानिस्तान में युद्ध की कोई धार्मिक वैधता नहीं है। इसलिए वे हर मोर्चे पर हार रहे हैं। और अगर वे इस मौके का भी लाभ नहीं उठाते हैं तो यह तालिबान की एक और चूक होगी। जयशंकर जी ने कुछ जरुरी बातें कही हैं, यह केवल अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी की ही बात नहीं है, बल्कि यह अफगानिस्तान से विदेशी लड़ाकों की वापसी भी है, जिनके साथ तालिबान मिलकर काम कर रहा है और जो हमारे देश में होने वाली विनाशकारी गतिविधियों में शामिल हैं और आतंकवाद फैला रहे हैं और क्षेत्र में यह खतरा बना रहेगा। और यहां दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम एक निर्जन क्षेत्र में हैं, अनिश्चितता बहुत अधिक है, जिसका सामना हम संयुक्त राज्य अमेरिका और नाटो के साथ मिलकर करते हैं, सैनिकों की वापसी के बाद यह भी एक समस्या बना सकती है। अब, एएनडीएसएफ को किस स्तर और किस तरह का समर्थन दिया जाएगा? यह बदलाव कैसे होगा? और इसके बाद इन क्षेत्रों के साथ कैसा रिश्ता होगा। इस संक्रमण को आसान बनाने और शांतिपूर्ण व स्थिर अफगानिस्तान के लिए हम इस समय अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिसमें अफगान के सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो, और हम अपने देश में संप्रभुता एवं एकता बनाए रख सकें। और क्योंकि हम इसके लिए तैयार हैं, इसलिए यह चर्चा बहुत ही सही वक्त पर हो रही है, ताकि हम आगे के रास्ते के बारे में सार्वजनिक चर्चा कर सकें या उसमें शामिल हो सकें।

साथ ही हम अपने साथियों से भी बात कर रहे हैं। आज सुबह मैंने अजीत डोभाल से बात की और बताया कि हमें इस बातचीत को लेकर किस तरह से तैयार रहना चाहिए। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि, राष्ट्रपति गनी इस संक्रमण का नेतृत्व करने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। वह 2014 में अमेरिकी सैनिकों और नाटो सैनिकों के संक्रमण के समय भी प्रभारी थे, जब अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाया गया था, इसलिए वह जानते हैं कि हमें ऐसे समय में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। अगले कुछ दिनों में, हम एक टीम बनाएंगे जो अमेरिका और नाटो के साथ मिलकर इस संक्रमण योजना पर काम करेगी। और जैसा कि मैंने कहा, यह बेहद महत्वपूर्ण होगा कि हम भविष्य में किस तरह का सहयोग करते हैं और एक ऐसे क्षेत्र के रूप में हम कैसे एकजुट होते हैं, जहां आम सहमति त्रिपक्षीय चर्चा से बनी है और जिसमें हमने संयुक्त, लोकतांत्रिक और संप्रभु अफगानिस्तान का स्वागत किया है। और हम इसे हासिल करने की दिशा में काम करेंगे। और हम ऐसा करने की स्थिति में भी हैं। मैं विदेश मंत्री जयशंकर के अफगान की नेतृत्व, अफगान की स्वामित्व और अफगान नियंत्रित प्रक्रिया की बातों को दोहराता हूं। यह बेहतर तरीके से प्रबंधित नहीं किया जा सका है, लेकिन हम अब इस स्थिति में आ कर रहे हैं।

पालकी शर्मा उपाध्याय: जवाद ज़रीफ़ जी, इस सबके बावजूद, ऐसा लगता है कि सभी पक्ष तालिबान के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं। लेकिन हम जानते हैं कि तालिबान ऐसा नहीं है कि उसपर कोई असर नहीं पड़ता। और यह वह तालिबान नहीं है जिसका कभी अफगानिस्तान पर शासन था। क्या आप मानते हैं कि तालिबान पिछले 20-25 वर्षों में बदल गया है और उसमें किस तरह का बदलाव आया है?

मोहम्मद जवाद ज़रीफ़: मेरी कुछ अपनी शंकाएँ हैं। हमारा मानना​है कि हम तालिबान को लेकर जो भी सोचते हैं, वह अफगानिस्तान में होता हुआ नजर आता है और उन्हें किसी की व्यक्तिगत स्व-सेवा शर्तों के आधार पर नहीं बल्कि लोकतांत्रिक शर्तों पर जुड़ना चाहिए। अगर तालिबान 90 के दशक में वापस जाना चाहता है, तो भले ही उसकी विचारधारा बदली हो या न बदली हो, उनका दृष्टिकोण बदल हो या न बदला हो, लेकिन 90 के दशक में वापस जाना संभव नहीं है। अब हम एक अलग अफगानिस्तान में रहते हैं। अफगानिस्तान 20 साल एक नए प्रयोग से गुज़रा है; बेशक इसका अच्छा अनुभव नहीं रहा है। लेकिन इसमें अल्पसंख्यकों के अधिकार शामिल थे, इसमें अफगानिस्तान की विभिन्न जातीयताओं के अधिकार शामिल थे, इसमें लोगों की भावनाओं की बात होती थी। और ये बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम हैं, हम यह भूल नहीं सकते। मैं कहना चाहूंगा कि हम यह सब कुछ भूला नहीं सकते। तालिबान को हमसे ऐसी उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। तालिबान को अब अफगानिस्तान की सरकार, अफगानिस्तान के लोगों और अफगानिस्तान में मौजूद विभिन्न समूहों के साथ बातचीत शुरू करनी चाहिए; यह बातचीत व्यापक होनी चाहिए। एक ऐसी घटना का इंतजार करना जहाँ सब कुछ भूला दिया जाये और तालिबान उन जख्मों को भरना चाहे, यह बहुत बड़ी दुर्घटना होगी। इससे अफगानिस्तान में एक नया युद्ध होने का खतरा है, और हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। हम ईरान में तीन मिलियन अफगान शरणार्थियों के साथ रह रहे हैं, हम और अधिक बोझ नहीं उठा सकते। इससे इस क्षेत्र पर भारी दबाव पैदा होगा।

यहीं पाकिस्तान के साथ भी देखने को मिलता है। हर कोई बहुत अधिक प्रयास कर रहा है; शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत शुरू करना जरुरी है। जरुरी शर्तें तय होने के बाद, मेरा मानना है कि शांति की अवधारणा का होना भी महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक ताकतों को अफगानिस्तान के भविष्य के लिए एक एकीकृत योजना तैयार करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि हमें तालिबान की योजना पहले ही मालूम है। उन्हें अपनी योजना बनाने का पूरा अधिकार है। मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा हूं कि उन्हें अपनी योजना बनाने का अधिकार नहीं है। लेकिन उनकी योजना अफगानिस्तान के भविष्य के लिए अच्छी नहीं होगी। और अमीरात ऐसा नहीं है जिस पर अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण किया जा सके। सभी पक्षों द्वारा कुछ सिद्धांतों को मानना जरुरी है। यह महत्वपूर्ण था कि मास्को में रूस, और हर कोई लोकतांत्रिक संक्रमण की बात पर सहमत हुआ। लेकिन इस स्थिति से निपटने के लिए लोकतांत्रिक तरीके की आवश्यकता है। राष्ट्रपति घानी ने पिछले हफ्ते दुशान्बे में एक प्रस्ताव रखा, जो मेरे हिसाब से काफी उचित है, बशर्ते कि हमारे अफगानिस्तान के मित्र, अफगानिस्तान में डेमोक्रेटिक फ्रंट पर आपसी एकता बना सकें, और उस योजना को भी प्रस्तुत कर सकें, जिससे हमें पता चले आगे क्या किया जा सकता है। मैं एक आखिरी बात यह कहना चाहूंगा कि, मैं भी डॉ. जयशंकर और डॉ. मोहिब की बातों से सहमत हूं कि हमारे अफगानिस्तान के स्वामित्व, अफगानिस्तान के नेतृत्व और अफगानिस्तान नियंत्रित प्रक्रिया की जरुरत है, और इसपर हम सभी अफगानिस्तान के लोगों की सहमति महत्वपूर्ण है। यही एकमात्र रास्ता है। दूसरे देश भी मदद कर सकते हैं। पड़ोसी के रूप में हम और अन्य शक्तियां मदद कर सकती हैं। हम सुविधा कर सकते हैं, हम निर्देशित नहीं कर सकते। यह अफगानिस्तान लोगों को तय करना है। अफगानिस्तान के लोगों को तय करना है कि वो क्या चाहते हैं और उन्हें इसके लिए मिलकर काम करना है। शुरूआत करनी है और उससे बड़ा अंतर लाना है। हमें एक बड़ा बदलाव लाना है और इसके लिए हमें अफगानिस्तान की मदद करनी होगी। मेरे मुताबिक, यह बदलाव ऐसा होना चाहिए जिसमें अफगानिस्तान शांतिपूर्ण हो, जिसमें उसकी अर्थव्यवस्था व्यवहार्य हो, जिसके पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध हों, जो लोकतांत्रिक हो, जिसमें संतुलित जातीय प्रतिनिधित्व हो; इसमें भविष्य की सरकार हो और उस भविष्य में सभी की भागीदारी हो। अगर हम इसके लिए तैयार हैं, तो हम इसे हासिल करने के लिए साथ मिलकर काम कर सकते हैं। और मैं मानता हूं कि विदेशी सेनाओं की वापसी, विदेशी बलों की जिम्मेदारीपूर्ण वापसी, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पालकी शर्मा उपाध्याय: मुझे खुशी है कि आपने जातीयता की बात उठाई है। और मैं डॉ. जयशंकर से जानना चाहूंगी कि पिछले 20 वर्षों में तालिबान में कैसे बदलाव आये हैं, और ऐसा कहा जाता है कि इस्लामिक अमीरात की किसी भी स्थिति में पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होगी और इस्लामी व्यवस्था स्थापित करेगी।

डॉ. एस. जयशंकर: देखिए, मेरे लिए यह कहना बहुत मुश्किल है कि तालिबान में बदलाव कैसे आया। शायद जो लोग बातचीत में सीधे जुड़े हुए हैं, वो इस सवाल का जवाब दे सकते हैं। शायद डॉ. मोहिब इस सवाल का मुझसे बेहतर जवाब दे सकें। मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही कि, अफगानिस्तान बदल गया है, और दुनिया भी बदल गई है, आप माने या न माने, दुनिया आज यानि 2021 में वैसी नहीं है जैसी की यह 2001 में हुआ करती थी। 20 साल का मतलब है कि जो बच्चा 2001 में एक या दो या तीन साल का था, आज उसकी उम्र 20 साल के आस-पास हो चुकी है, जो बच्चा 10 साल का था, वह करीब 30 साल का हो चुका है। उन्होंने एक बहुत ही अलग अफगानिस्तान देखा होगा और उनके लिए वह अफगानिस्तान ऐसा था, जहाँ उनके पास आजीविका थी, अवसर थे, शिक्षा थी, ऐसी चीज़े थी, जिन्हें दुनिया भर के लोग चाहते हैं। इसीलिए मेरे मुताबिक, हमारे लिए और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए यह महत्वपूर्ण है कि, उनके पास अफगानिस्तान के लोगों के भविष्य को निर्धारित करने की स्पष्ट समझ हो। मुझे नहीं लगता कि हमने विगत 20 सालों में जो कुछ हासिल किया है, उसे खत्म कर देना चाहिए, लेकिन, मैं यह नहीं कह रहा कि ये पिछले 20 साल बहुत अच्छे थे। पिछले 20 वर्षों में क्या हुआ, इसको लेकर हमारी अपनी शिकायतें और समस्याएं रही हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि, पिछले 20 वर्षों में कई चीजें हुई हैं। वे आज की वास्तविकता हैं। वे अफगानिस्तान के लोगों के सपनों और मान्यताओं का हिस्सा हैं। और इसके बहुत से कारक हैं। और मैं यहां फिर से अपनी बात दोहराना चाहूंगा, जो मैंने अपनी पहली टिप्पणी में विदेशी सेनानियों के संदर्भ में कही थी। अगर मुझे याद है, तो, अफगानिस्तान में विदेशी लड़ाकों पर संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट जारी की थी। अगर मैं गलत हूं तो डॉ. मोहिब या डॉ. ज़रीफ़ मुझे बता सकते हैं, शायद उन्होंने रिपोर्ट में इस साल की शुरुआत में 8000-9000 या कुछ इतने ही विदेशी लड़ाके मौजूद होने का अनुमान लगाया था। इसलिए आज का वास्तविक मुद्दा 2021 के अफगानिस्तान पर बहस करने का नहीं हैं। आज का असली मुद्दा एक अलग अफगानिस्तान का है, जिसका एक व्यापक आधारित परिणाम होगा, जहां स्थाई शांति होगी। स्थाई शांति के लिए, इसे हर किसी को एकजुट होना होगा। यह केवल समाज के लोगों के सबसे शक्तिशाली समूह की इच्छा मात्र नहीं हो सकती। इससे स्थाई समझ नहीं बन सकती और इसके लिए सभी पड़ोसियों का समर्थन हासिल करना होगा। अगर आप अफगानिस्तान का इतिहास, अफगानिस्तान के पड़ोसियों को देखें, तो शायद ही किसी ने कोई नकारात्मक भूमिका निभाई हो। मैंने दुशान्बे में भी कहा था, कि अफ़गानिस्तान को एक दोहरी शांति चाहिए, उसे आंतरिक शांति के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों में भी शांति चाहिए। और तब तक ऐसा नहीं हो जाता, तब तक इसके पड़ोसियों को भी अफगानिस्तान में बने की जरूरत है और अपने लिए क्या अच्छा है, इसका फैसला अफगानिस्तान के लोगों को करने दें।

पालकी शर्मा उपाध्याय: हमदुल्ला मोहिब जी तालिबान में बदलाव कैसे आया और वे अब क्या चाहते हैं? इसके अलावा, आप इस अमीरात गणराज्य की बाहरी भूमिका को कैसे देखते हैं?

हमदुल्ला मोहिब: सबसे पहले मैं, डॉ. ज़रीफ से आपने तालिबान और समूहों को लेकर जो सवाल पूछा था, उसका जवाब देना चाहूंगा। तालिबान को लगता है कि वो सत्ता में आने वाले हैं और उनके कई गुटों में सत्ता पाने के बाद नेतृत्व को लेकर लड़ाई चल रही है, जो महज एक सबसे जैसी बात है। इसलिए हमें दोहा में मुल्ला भाई के बीच सीधा संघर्ष देखने को मिल रहा है, जो तालिबान में खुद की जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि उन्हें जमीनी हकीकत मालूम नहीं है, उन्होंने मुल्ला फ़ज़ल के साथ मिलकर कुछ लड़ाकों के समूह बनाने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही हिबातुल्लाह ने यह घोषणा कर दी कि कोई भी स्वतंत्र समूह नहीं बनाया जा सकता है, इसके लिए हर किसी को प्रांत के अपने प्रतिनिधि को रिपोर्ट करना होगा, जिसे वे गवर्नर कहते हैं। जाहिर है, ऐसा कहना उचित नहीं है। लेकिन वो ऐसा ही कहते हैं। इसलिए मुल्ला भाई और हिबतुल्लाह के बीच संघर्ष है और फिर इस मसले में मुल्ला यक़ुब भी शामिल हो जाता है जो अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहता है। इसलिए उनके बीच एक और समूह भी है। इसलिए यह तीसरा और फिर चौथा समूह है, लेकिन तालिबान का सबसे बड़ा समूह निश्चित रूप से हक्कानी नेटवर्क है, जिसका प्रभाव में क्वेटा शूरा की वजह से कमी आ रही है। इसलिए उन क्षेत्रों में गवर्नर नियुक्त करना जहां पहले इसे हक्कानी का क्षेत्र माना जाता था। इसलिए यह एक तीसरा या चौथा समूह है। और एक ऐसा और समूह भी है जो हेलमंड स्थित है। यह समूह खुद को बाकियों से अलग मानता है, क्योंकि वे क्वेटा शूरा की सदस्यता नहीं लेना चाहते और इससे स्वतंत्र रखने की कोशिश करते हैं। तो तालिबान में ऐसे कई समूह हैं, जो सत्ता पाने का इंतजार कर रहे हैं। और अगर तालिबान के साथ कोई शांति समझौता करना है, तो इन सभी समूहों को शामिल करना होगा। इसके लिए सिर्फ दोहा की बातचीत करने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले भाई की ही नहीं, बल्कि याकूब के समूह या उसके प्रतिनिधि की उपस्थिति, भाइयों और हिबतुल्लाह की मौजूदगी और हक्कानी को भी शामिल करने की जरूरत है और तब कहीं कोई समझौता हो सकता है। तो इस पर हमारा एक सवाल है।

दूसरा, आज अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति 1990 के दशक से काफी समान है। और अन्य देशों के साथ भी इसकी समानताएं हैं जहां से अमेरिकी सेना को वापस बुलाया गया है या जहां बड़ी शक्तियां एक साथ आई या विघटित हुई हैं। और मुझे लगता है कि यह गलत है। जरीफ और जयशंकर जी ने अफगानिस्तान में होने वाले बदलावों की बात की, जो कि पहले नहीं था। जैसा कि मैंने पहले कहा था कि यह एक अनधिकृत क्षेत्र, जहाँ बहुत अधिक अनिश्चितता है। लेकिन एक बात तय है कि ये समानताएं अफगानिस्तान की वास्तविकताओं को बिल्कुल नहीं दर्शाती हैं या बिल्कुल भी प्रतिबिंबित नहीं करती हैं। तीसरी बात विनाशकारी भूमिका की है, जो तालिबान अगले कुछ वर्षों में निभा सकता है। अब, अगर वे विद्रोह करना चाहते हैं और उग्रवाद में बने रहते हैं और झगड़े पैदा करते हैं और विनाशकारी ताकत बने रहते हैं, तो वे समय के साथ सत्ता से बाहर हो जाएंगे। लेकिन उन्हें यह समझने की जरूरत है कि वे बल से सत्ता हासिल नहीं कर सकते। वे गृहयुद्ध शुरू कर सकते हैं, लेकिन इससे वो सत्ता में नहीं आ सकते।

1990 के दशक और उसके बाद के अन्य समूहों ने ऐसा करने की कोशिश की थी और तालिबान को पिछले 18 महीनों के अपने खुद के व्यवहार और उन समूहों से भी सबक सीखने की जरूरत है। यह महत्वपूर्ण है कि वे इन वास्तविकताओं के बारे में सोचते हैं और खुद को अफगानिस्तान की सच्चाई मानते हैं। लेकिन मुख्य बात यह है कि, अफगानिस्तान की हमारी वास्तविकता, अफगानिस्तान की वास्तविकता नहीं है, ऐसे अन्य समूह भी हैं जो समान रूप से देश की वास्तविकता हैं, और इन सभी का डेमोक्रेटिक रिपब्लिक में एक जगह है। गणराज्य देश में सभी लोगों का प्रतिनिधित्व किया जा सकता है और वे एक साथ आ सकते हैं, और अफगानिस्तान में अपनी भूमिका निभा सकते हैं और देश की एकजुट वास्तविकता बना सकते हैं। लेकिन यह सोचना कि, तालिबान अफगानिस्तान के लोगों पर हावी हो जायेगा, अवास्तविक है। चौथी बात, एएनडीएसएफ की मुकाबला करने की क्षमता है। 2014 के बाद से, अफगान सुरक्षा बल प्रभार में रहे हैं और फरवरी 2020 में अमेरिका के तालिबान समझौते के बाद से, अफगान सुरक्षा बल प्रमुख रहे हैं। उनके 94% लड़ाकू अभियानों का नेतृत्व स्वतंत्र रूप से एएनडीएसएफ द्वारा किया गया है और यह आगे भी जारी रहेगा। जैसा कि मैंने पहले कहा था, समर्थन के क्षेत्रों पर पहले से ही बात हो चुकी है, और हम इसी पर अपने सहयोगियों के साथ मिलकर काम करेंगे। पांचवीं बात जिसका दोनों मंत्रियों ने जिक्र किया, इस क्षेत्र की भूमिका और पड़ोसी एवं निकटता। पिछले 18 महीनों में एक बात साफ हो गई, हमारे पड़ोसियों द्वारा तालिबान के समर्थन, उनके ठिकानों का दौरा करना, उनके घायल सैनिकों से मिलने, हमारे सेनानियों से न मिलने को लेकर जो बातें कही गई थी। और इस पर खुब चर्चा हुई थी, यह सच्चाई थी, लेकिन यह वास्तविकता नहीं बन सका। अब, अगर किसी भी तरह से ऐसा कुछ होता है, तो इसका मतलब अफगानिस्तान के मामलों में पड़ोसी देश की प्रत्यक्ष भागीदारी होगी, जिसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं, अफगानिस्तान की राष्ट्रवादी ताकतें इसको लेकर काफी नाराज हैं। और अगर इसकी सीमा लांघी जाती है, तो उनके देश में मौजूद उन सभी अफ़गानों के लिए समस्याएँ हो सकती हैं, जो अफ़गानिस्तान में हैं और अफ़गानिस्तान से हैं, और उन्हें उन्हें बड़ा झटका लग सकता है जो इन पड़ोसियों के लिए विनाशकारी हो सकता है। इसलिए, मुझे लगता है कि तालिबान और यह उक्त पड़ोसी के लिए इस क्षेत्र में एक साथ आने और अफगान के स्वामित्व वाली और अफगान नियंत्रित प्रक्रिया का समर्थन करने का एक अवसर है।

पालकी शर्मा उपाध्याय: मुझे दर्शकों से बहुत सारे सवाल मिल रहे हैं और चूंकि आपने पड़ोसी देश का उल्लेख किया है, मैं डॉ. जयशंकर से दो सवाल पूछना चाहूंगी। पहला, कि भारत तालिबान के साथ बातचीत को लेकर क्या सोचता है और जब तक तालिबान को पाकिस्तान का समर्थक माना जाता है, क्या इसका कोई औचित्य है। दूसरा सवाल यह है कि भारत अपने पड़ोसियों के साथ खुद के द्विपक्षीय मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए अफगानिस्तान के लिए दीर्घकालिक हल तलाशने में कैसे मदद करेगा?

डॉ. एस. जयशंकर: देखिए, हम क्या करेंगे और क्या नहीं करेंगे, इस पर मैं सार्वजनिक रुप से या रायसीना संवाद में कुछ नहीं कह सकता। लेकिन यह स्थिति पैदा हो रही है, और हर कोई अफगानिस्तान की भलाई में अपना योगदान करना चाहता है। तो जो भी अपनी जिम्मेदारी समझेगा, उसपर और उसके सभी पहलुओं पर विचार किया जायेगा। अब, द्विपक्षीय अंतर की बात करते हैं, इसको लेकर मेरे कुछ विचार हैं। आप देखें कि पिछले 20 सालों में हमने अफगानिस्तान में वास्तव में क्या किया है? एक तरह की कहानी बनाई गयी है। मैं कल पूर्व अमेरिकी एनएसए जनरल मैकमास्टर द्वारा स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के बाहर किया जा रहा एक कार्यक्रम देख रहा था। और उन्होंने कुछ ऐसा कहा, जिसका मेरे हुए काफी प्रभाव पड़ा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को डर है कि भारत उस तरफ है और पाकिस्तान घिरा हुआ है। इस संदर्भ में आप मेरे कार्यों को देखें। क्या इसके लिए मैं दोषी हूँ? काबुल में बिजली लाने के लिए मैं दोषी हूं। क्या मैं हेरात के पास बांध बनाने और खेती की सुविधा देने, काबुल में संसद बनाने, स्वास्थ्य क्लीनिक, रेडियो स्टेशन बनाने, सड़कों का नेटवर्क बनाने के लिए दोषी हूं। हमारे कामों को देखें, क्योंकि यह महज एक कल्पना है, इस क्षेत्र में हमारी उपस्थिति और हमारी गतिविधियां कहीं न कहीं पाकिस्तान की वजह से हैं। ऐसी बातें हमारी उस भावना की अनदेखी हैं जो हम अफगानिस्तान के लोगों के लिए रखते हैं। और यह भावना हमारे इतिहास और हमारी संस्कृति में बहुत गहराई में मौजूद है। इसलिए, अफगानिस्तान को लेकर हमारा एजेंडा हमेशा से बिल्कुल स्पष्ट रहा है। हमारा एजेंडा सकारात्मक एजेंडा रहा है, इसलिए कुछ भी सोचने से पहले हमारे एजेंडे और उसका अन्य देशों में लोगों पर पड़ने वाले असर को देखें। काश, मैं ऐसा किसी और देश के लिए भी कह पाता। हम वही करेंगे जो अफगानिस्तान के विकास, समृद्धि, एकता, अखंडता, लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा। हम वही करेंगे।
पालकी शर्मा उपाध्याय: डॉ. मोहिब ने एक और पड़ोसी की बात कही, जावेद ज़रीफ़ जी इस पड़ोसी की भूमिका पर आपके विचार क्या हैं? और हाल ही में, चीन के ईरान के साथ बढ़ते संबंधों और पाकिस्तान के साथ उसके करीबी संबंधों को विचार में रखते हुए ईरान ने चीन के साथ 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर के समझौते की घोषणा की है। क्या आप मानते हैं कि अफगानिस्तान को साधने के लिए बीजिंग अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है? और इसमें चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाओं की क्या भूमिका है, जो अफगानिस्तान के विकास के लिए भी आवश्यक हैं?

मोहम्मद जवाद ज़रीफ़: मुझे लगता है कि हम सभी के अफगानिस्तान में साझा हित और साझा खतरे हैं। और हम सभी को एक स्थिर और शांतिपूर्ण अफगानिस्तान की जरूरत है। ऐसा अफगानिस्तान, जहां आतंकवादियों को स्वतंत्रता हो, तो ऐसा अफगानिस्तान ईरान, भारत, पाकिस्तान, चीन, मध्य एशिया, रूस और पूरा दुनिया के लिए खतरा है। हमने ऐसा 2001 में, प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या की घटना में देखा है कि आतंकवाद किसी का सगा नहीं है। अब हम दाएश की भूमिका देख रहे हैं। हम नहीं जानते कि अफगानिस्तान में दाएश का समर्थन कौन कर रहा है, लेकिन हमारे पास इराक और सीरिया से अफगानिस्तान में दाएश को लाने के पीछे लोगों का हाथ होने के सबुत हैं। लेकिन दाएश अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान और हर किसी के लिए खतरा है। इसलिए यह हमारा साझा खतरा है। हमारे पास साझा मौका हैं। अफगानिस्तान एक खनिज समृद्ध देश है। यदि हम चाबहार के माध्यम से, किसी अन्य माध्यम से या अंतर्राष्ट्रीय बाजारों के माध्यम से, अफगानिस्तान को परिवहन और पारगमन का अवसर देते हैं, अफगानिस्तान की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, जिसकी बात राष्ट्रपति गनी हमेशा से करते आ रहे हैं। यह ऐसी अर्थव्यवस्था होगी जो मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी, आतंकवाद और हिंसा को जन्म देगी। और हमें इसे अलग रखना होगा। अफगानिस्तान के पास व्यवहार्य आधिकारिक सार्वजनिक अर्थव्यवस्था बनाने हेतु पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं जो ड्रग्स या आतंकवाद या अन्य आपराधिक गतिविधियों पर निर्भर नहीं करता है, जिनमें से सभी आतंकवादी संगठन लगे हुए हैं। और तालिबान का कहना है कि दाएश उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। तालिबान भी यही बात कहता है। तो यह ऐसी समस्या है जिसपर हम सभी एकजुट हो सकते हैं। और यह अफगानिस्तान के भविष्य का एक रास्ता हो सकता है, और मेरा मानना​है कि हम सभी को अपने मतभेदों भुलकर समानताओं पर ध्यान देना चाहिए। मैं मानता हूं कि अफगानिस्तान में इस्लामिक अमीरात से पाकिस्तान को खतरा है, जबकि यह ईरान और भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा खतरा है। यहां हमारे हित और पाकिस्तान के साथ जुड़े हुए है। हमारे ताजिक मित्रों, अपने उज्बेक मित्रों के साथ भी हमारे हित समान हैं, जिन्हें अपने ही देशों में चरमपंथ से खतरा है। इसलिए यह हमें एक साथ बांधता है और यह एक बड़ा अवसर हैं और चीन के पास भी समान अवसर हैं, यहां हमने अपने भारतीय और अपने चीनी दोस्तों से यह स्पष्ट कर दिया है कि चाबहार हर किसी के लिए सहयोग हेतु खुला है। चाबहार चीन या ग्वादर के खिलाफ नहीं है। चाबहार एक ऐसी जगह है, जहां हम सब मिलकर अफगानिस्तान की मदद कर सकते हैं, ताकि क्षेत्र का विकास और समृद्धि हो सके। भारत चाबहार में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, चीन ईरान में और चाबहार में भी सक्रिय भूमिका निभाने में रुचि रखता है। और कई अन्य देशों को पास भी इससे जुड़ने का मौका है। और अफगानिस्तान के पूरे क्षेत्र में शांति व स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में मदद करने के सभी के पास पर्याप्त अवसर मौजूद हैं।

पालकी शर्मा उपाध्याय: डॉ. जयशंकर ने पिछले 20 सालों में अफगानिस्तान में उपलब्धियों के बारे में भी बताया। तो मैं आपसे शुरू करना चाहूंगी। और मैं चाहूंगी कि आप सभी इस पर अपने विचार रखें। डॉ. जयशंकर, आपके हिसाब से पिछले 20 वर्षों में अफगानिस्तान में हासिल की गई उपलब्धियों में सबसे महत्वपूर्ण और कीमती कौन सी उपलब्धियां हैं और जिन्हें आगे बढ़ते हुए संरक्षित करना सबसे जरूरी है?

डॉ. एस. जयशंकर: मुझे लगता है कि ऐसी बहुत सारी उपलब्धियां हैं। इसकी एक अहम बात यह है कि अफगानिस्तान इसके सभी लोगों का है, जिनके द्वारा निर्णय लिए जाते हैं, प्रतिनिधि चुने जाते हैं, और शासन किया जाता है। और मैं यह नहीं कहता कि यह पूरी तरह सही है। वास्तविकता यह है कि अन्य जातीय, समुदायों, मान्यताओं का सम्मान किया जाता है और उन्हें उचित स्थान दिया जाता है, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, बच्चों के अधिकारों का ध्यान रखा जाता है, और इन सभी में भी कुछ खामियां हैं। इसलिए, वास्तविकता यह है कि, अगर मैं 2021 के अफगानिस्तान देखता हूं, और इसकी तुलना 2001 के अफगानिस्तान से करता हूं, तो किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह बेहतर नहीं है। तो निश्चित तौर पर बहुत अधिक विकास हुआ है और ऐसा वही व्यक्ति कह सकता है जो समय-समय पर वहां गया हो। मुझे यकीन है, ज़रीफ़ जी मेरी इन बातो से सहमत होंगे। हमने अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में, अफगानिस्तान के समाज में, और वास्तव में युवाओं के सपनों और उनकी उपलब्धियों में हुए बदलाव को देखा है। हम आज ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां हमें कड़े निर्णय लेने हैं। लेकिन, हम इसे ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। मुझे लगता है कि कुछ बहुत अच्छी चीजें हुई हैं, जिन्हें इस प्रक्रिया में शामिल होने के लिए आज दुनिया को और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पहचानना महत्वपूर्ण है।

पालकी शर्मा उपाध्याय: ज़रीफ़ जी आपने बहुलतावाद, विभिन्न जातीयताओं और उनकी भूमिका के बारे में बात की, जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। पिछले दो दशकों में उनकी वो कौन-सी उपलब्धियां हैं, जिन्हें आपको लगता है कि अफगानिस्तान को संरक्षित करने की सबसे अधिक जरुरत है, यह देखते हुए कि भविष्य में तालिबान की यहां पर राजनीतिक भूमिका हो सकती है?

मोहम्मद जवाद ज़रीफ़: जयशंकर जी ने बेहद ज़िम्मेदारीपूर्ण तरीके से उन्हें सामने रखा है। मुझे लगता है कि समस्याएं गंभीर हैं लेकिन गंभीर उपलब्धियां भी हैं। आज का अफगानिस्तान, आज अफगानिस्तान में नागरिक समाज की भूमिका 1990 और 2001 के दशक से सुसंगत नहीं है। इसलिए यह कल्पना करना अकल्पनीय है कि अफगानिस्तान को 1990 के दशक में वापस लाया जा सकता है। यह असंभव है। और हमने तालिबान के साथ बहुत स्पष्ट व खुली चर्चा की है और यह अलग समाज है, अलग स्थिति है, भले ही अफगानिस्तान शांतिपूर्ण नहीं रहा है। अफगानिस्तान में भ्रष्टाचार, मादक पदार्थों की तस्करी, आतंकवाद हुआ है, और ये सभी नकारात्मक बातें हैं। लेकिन हम सकारात्मक बातों को नहीं भूल सकते और जैसा कि डॉ. जयशंकर ने कहा, हम इसे ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। हमने अफगानिस्तान में जो हासिल किया है, उसे संरक्षित करने की जरूरत है, हम सब कुछ ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। इससे अफगानिस्तान के लोगों की मदद नहीं होगी। इससे केवल हिंसा और गृहयुद्ध का खतरा बढ़ेगा। हमें निरंतरता की आवश्यकता है; हमें समस्याओं को हल करने की जरुरत है। और यहां मैं संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को रेखांकित करना चाहूंगा, संयुक्त राष्ट्र इस वक्त सबसे अच्छी जगह पर जो इसमें सबसे अधिक मदद कर सकता है। मुझे नहीं लगता कि किसी भी शक्ति को इसे केवल खुद से जोड़ना चाहिए। यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का काम है। 2001 सफल साल रहा, बॉन सम्मेलन सफल रहा, क्योंकि यह संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में आयोजित हुआ। हम सभी ने मदद की। मैं 2001 में बॉन में मौजूद था, हम सभी ने मदद की, लेकिन अफगानिस्तान ने इसे नियंत्रित किया और संयुक्त राष्ट्र ने गारंटी दी कि अफगानिस्तान इस प्रक्रिया को नियंत्रित करेगा। और संयुक्त राष्ट्र ने गारंटी दी कि वह अफगानिस्तान की मदद करने के लिए सभी संसाधन उपलब्ध करा सकता है।

मुझे मध्यरात्रि में होने वाली वो बैठकें याद हैं, जिसमें आपसी मतभेद रखने वाले विभिन्न अफगान समूहों को संयुक्त राष्ट्र ने एक साथ लाने का काम किया, ताकि अफगानिस्तान को आम सहमति तक पहुँचने में मदद मिल सके। इसकी जरुरत फिर से है, हमें इन उपलब्धियों को संरक्षित करने की जरुरत है। और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियां अल्पसंख्यकों के अधिकार, महिलाओं के अधिकार, जनसंख्या के अधिकार, अफगानिस्तान सरकार के प्रतिनिधित्व में दृढ़ संकल्प, जातीय संतुलन और लोकतांत्रिक संस्था हैं। राष्ट्रपति लोगों द्वारा चुने जाते हैं, इस प्रक्रिया को जारी रखना होगा। हमें इन संस्थानों को संरक्षित करने की जरुरत है। अगर हम इन संस्थानों को खत्म कर देते हैं, तो इनकी जगह केवल हिंसा ही ले सकती है।

पालकी शर्मा उपाध्याय: हमारे पास समय की कमी है। मैं यही सवाल हमदुल्ला मोहिब जी से भी करना चाहूंगी आपको क्या लगता है कि अफगानिस्तान की कौन-सी सबसे कीमती और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों को संरक्षित करना चाहिए? अगर आप हमें इसका संक्षेप में जवाब दे सके। डॉ. मोहिब जी, शायद 30 सेकंड बचे हैं, उसके बाद हम इस सत्र को समाप्त करेंगे।

हमदुल्ला मोहिब: लोकतंत्र, मुझे लगता है कि यही हमसब को एक साथ लाता है। यह बहुलवादी समाज का अवसर देता है, यह अफगानिस्तान के भविष्य की सभी वास्तविकताओं को हासिल करने का अवसर देता है। हमने ऐसे चुनाव देखें हैं, जिसमें संघर्ष हुए हैं और जो हमारे देश की सच्चाई रही है। हम उन्हें शामिल हुए, उन्हें भी शामिल किया, लेकिन संविधान में इसके लिए कुछ तरीके और प्रक्रियाएं हैं और हम अपने मतभेदों को दूर करने के लिए साथ काम कर सकते थे। मुझे अक्सर अफगानिस्तान में मौजूद समूहों के बीच मतभेद के बारे में सवाल पूछा जाता है और मेरा हमेशा ये यही जवाब रहा है कि यही हमारी खुबसूरती है और हम इसी को हासिल करना चाहते हैं। हम आपस में बात करते हैं, न की एक-दूसरे को गोलियों से मारते हैं। इसलिए एक ऐसा मंच है जहां सभी विभिन्न शिकायतों को अभियोजन के बिना और बिना किसी डर के रखा जा सकता है, और हम अपने मतभेदों पर बात कर सकते हैं और कमियों को खुलकर बता सकते हैं जिससे एक ऐसा माहौल बनाता है जिसमें कोई भी समूह आकर हमसे जुड़ सकता है। और हमने ऐसा हिज्ब-ए-इस्लामी के साथ देखा है, वे श्री हक्मातयार के साथ आए, वह अब काबुल में राजनीतिक समाज का हिस्सा हैं। वह जो करते हैं उससे हम असहमत हो सकते हैं लेकिन, वह अब उस समाज का हिस्सा हैं। तो क्या तालिबान ऐसा हो सकता है, मुझे लगता है कि यह उनके लिए एक मौका है और इसे एक नई शुरुआत के रूप में देखना चाहिए, इसे जैसा कि ज़रीफ जी ने कहा 2001 में 1990 के दशक से कनेक्ट नहीं करना चाहिए। वह एक अलग अफगानिस्तान था। यह अफगानिस्तान की भीतरी और बाहरी सेनाओं के लिए एक नई शुरुआत है। और मैं सबको यही सलाह दूंगा।

पालकी शर्मा उपाध्याय: आपने बहुत अच्छी तरह से समझाया और यह अफगानिस्तान के लिए एक नई शुरुआत है, एक नया अध्याय है, जैसा कि आपने कहा, सभी हितधारकों को अफगानिस्तान से जुड़ने के लिए एक नई सोच अपनाने की जरुरत होगी। मोहम्मद जवाद ज़रीफ़, एस. जयशंकर, हमदुल्लाह मोहिब, रायसीना संवाद के इस सत्र में यहाँ आने और हमारे साथ अपने विचार साझा करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

जवाद ज़रीफ़: धन्यवाद।
हमदुल्लाह मोहिब: शुक्रिया।
डॉ. एस. जयशंकर: धन्यवाद।

नई दिल्ली
अप्रैल 17, 2021

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