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विदेश मंत्री द्वारा आइमा के छठे राष्ट्रीय नेतृत्व सम्मेलन में संबोधन(अप्रैल 19, 2021)

अप्रैल 20, 2021

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज: शुक्रिया संजू। माननीय मंत्री जी, समय निकालने के लिए धन्यवाद। मैं संजीव, हर्ष तथा रेखा द्वारा की गई टिप्पणियों से कुछ संकेतक लेने जा रहा हूं। मेरे अपने भी कुछ है, और हमने दर्शकों को आमंत्रित किया है उनके प्रश्नों को भेजने के लिए, मैं वहाँ से भी एक प्रश्न लूँगा। चूंकि हम महामारी की स्थिति के बारे में बात कर रहे थे जिसने पूरे विश्व को प्रभावित किया है। जब मैं यह कह रहा हूं, मैं महामारी के बारे में अभी बात कर रहा हूं। कुछ महीने पहले, ऐसा लग रहा था जैसे हम इस से बाहर आ रहे थे। यह निश्चित रूप से आज की तारीख में ऐसा नहीं दिखता। तो, स्वयं के लिए, महामारी ने पिछले एक वर्ष हमे क्या बड़ा सबक सिखाया है।¬

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर: सबसे पहले मैं यह कहते हुए शुरुआत करता हूं कि आज आप सभी के साथ होना बहुत प्रसन्नता की बात है और हर्ष जी सही कह रहें हैं, आइमा के राष्ट्रीय नेतृत्व सम्मेलन में मै पहली बार शामिल हो रहा हूँ। मैं आपको आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद देता हूं कि मैं अपने विचारों को यहाँ साझा कर सकता हूँ। आज दोस्तों से मिलना बहुत प्रसन्नता की बात है और जब आप उनसे डिजिटल रूप से मिलते हैं तो यह एक सुरक्षित प्रसन्नता है। आपको देख कर खुशी हुई।

चलिए महामारी के साथ शुरू करते हैं। मैं फिर से हर्ष जी से सहमत हूं कि हमें अभी कोविड पश्चात के बारे में बात नहीं करनी चाहिए, हालांकि हमारे विचार वहां जरूर होने चाहिए। हम कोविड के बिच जी रहें हैं, इसमें कोई प्रश्न नहीं । अब आज क्या स्थिति है? मुझे लगता है कि किसी को भी, जो इसके बारे में ईमानदार है, अगर आप दोषारोपण दिनचर्या शामिल नहीं हैं जो अक्सर हमारी राजनीति की विशेषता है, लोग यह स्वीकार करेंगे कि अभी वर्तमान में ऐसे कई वायरस के अलग-अलग वैरिएंट्स मौजूद हैं जिसकी शक्ति ज्यादा तथा जिनकी संक्रामकता स्वाभाविक रूप से पहले महसूस नहीं किया गया था। यूके वैरिएंट्स है, दक्षिण अफ्रीकी वैरिएंट्स है, तथा डबल म्युटेंट वैरिएंट्स है जो आज विशेष रूप से भारत के पश्चिमी क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। इस सब में, मुझे लगता है कि यह भी एक वास्तविकता है कि इस समय सामाजिक शालीनता भी था। हम में से कई के लिए किसी और पर उंगली उठाने के लिए एक बहुत ही अदूरदर्शी रवैया है क्योंकि तथ्य यह है कि हर कोई एक निश्चित अवधि के लिए संतुष्ट था जब हमारी संक्रमण की संख्या वास्तव में बहुत नाटकीय रूप से नीचे आ गया था। इसके बजाय की क्या गलत हो गया है, तथा कौन दोषी है तथा क्या किया जा सकता था, मैं चाहता हूं कि हम सभी को दीर्घकालिक समस्या तथा संभवतः दीर्घकालिक उत्तर के बारे में सोचना चाहिए। तथ्य यह है कि महामारी ने हमारे विकास मॉडल में, हमारी प्रगति में, हमारे स्वास्थ्य अवसंरचना में कमियां सामने लाई हैं। यह स्वाभाविक है, अगर आप तंत्र को तनाव के अधीन रखते हैं तो सभी दरारें तथा कमियाँ दिखाई देते हैं।

एक वर्ष पहले, मैं चाहता हूं कि आप सभी वापस मुड़कर देखें तथा इसके बारे में सोचें, हम उस समय संघर्ष कर रहे थे कि हम सभी मास्क कैसे बनायें? पीपीई कैसे बनायें? वेंटिलेटर कहां से प्राप्त करें? उस समय देश एकजुट होकर इन चीज़ों की प्राप्ति का प्रयास कर रहा था तथा हम में से एक वर्ग ने यह कहा की इन में से कुछ मात्रा में हमारे पास पहले से ही होना चाहिए था। व्यापार करने का हमारा तरीका, विकास की हमारी दृष्टि अपर्याप्त रूप से हमारी अपनी क्षमताओं को रोक रखा था। हम अभी तक विदेशों से आपूर्ति श्रृंखला पर भी निर्भर थे तथा यहां पर व्यापार में आने की बहुत कम सम्भावना थी। मैं बहुत खुलकर कहना चाहूँगा की मुझे लगता है कि व्यापार अपने काफी बुनियादी आधार पर चल रही है तथा इसके लिए ज्यादा प्रयास नहीं हो रहा की घरेलु स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण किया जाये, मैं इस बात पर बाद में आऊंगा। मैं इस पर मंथन करने के लिए इस बातचीत के शुरुआत में ही इसके बारे में बोला हूँ। तथ्य आज यह है की, अगर चिकित्सा ऑक्सीजन की मांग में आज भारी वृद्धि हुई है, सामूहिक रूप से हमारे किसी एक वर्ग के द्वारा यह पूछना चाहिए की क्यों देश में पर्याप्त चिकित्सा ऑक्सीजन उत्पादन नहीं है। इसलिए, मुझे लगता है कि यहाँ दीर्घकालिक सबक हैं। दोषारोपण का खेल कुछ खास मानसिकता वाले वर्ग द्वारा ही किया जाता है इसके चर्चा के बिना यह बातचीत जिम्मेदारी भरी नहीं हो सकती। परन्तु मैं आपके जैसे संघ के बारे में सोचता हूँ, जिसका गहराई से उद्योग जगत पर पकड़ है,यह वो पल है जिसमे हम ये सोचें की कैसे हम गहरी शक्ति तथा क्षमताओं का निर्माण हो जो हमें भविष्य में इस तरह के तूफानों से लड़ने में सक्षम बनायें।मेरे लिए, सबसे बड़ी सबक यह है की हम अच्छे समय में कुछ न करने का जोखिम नहीं उठा सकते तथा ये नहीं सोच सकते की जोखिम वापस हमे परेशान करने नहीं आएगा। मैं आशा करता हूं कि एक देश के रूप में, एक अर्थव्यवस्था के रूप में, एक उद्योग के रूप में हम सभी पर यह दबाव है की हम अपनी उत्पादन आदि बढ़ाएं, इसमें यह सन्देश है की यह उत्पादन क्षमता हमें अपने देश में सशक्तता से बनाना होगा।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज
: तथ्यों को अच्छी तरह से रखा गया, मैं उत्तर देने के लिए उत्सुक था, परन्तु मेरे पास भी कुछ प्रश्न है जिसे मै बताना चाहूँगा इससे पहले की मै आपके प्रश्नों का उत्तर दूँ। मुझे इस राष्ट्रवाद के बारे में बात करनी है जो कोविड, टीका, दवाओं का उत्पादन आदि से जुड़ा हुआ है। आपको कैसे लगता है कि यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यक्रम तथा गावी कार्यक्रम को प्रभावित कर सकता है जो उन लोगों के लिए प्रदान किया जाना चाहिए था जो अन्यथा प्रबंधन नहीं कर सकते थे? हम भारत में ही इसके बारे में सुन रहें है। लोग कह रहे हैं कि जब आपको इसकी आवश्यकता होती है तो आप टीका का निर्यात क्यों कर रहे हैं तथा यही बात अन्य देशों में भी हो रही है। इसलिए, मेरा प्रश्न वहीं से है।

विदेश मंत्री डॉ. एस.जयशंकर: सुनीलजी, मुझे लगता है कि यह बहुत ही जायज प्रश्न है और फिर मैं कहूंगा कि दोषारोपण के खेल का अपना रवैया तथा नजरिया होता है। गंभीर लोगों की तरह हमे इस पर विचार करना जरूरी है। आज, विदेश मंत्री के रूप में, मैं अन्य देशों, विशेष रूप से कुछ बड़े देशों पर दबाव बना रहा हूं, यह कहते हुए कि कृपया भारत में टीकों के लिए आने वाले कच्चे माल को भेजें। मैं ऐसा इस तथ्य के कारण कर रहा हूं कि वैश्विक आपूत श्रृंखलाएं हैं और विशेष रूप से एक भौगोलिक क्षेत्र में में बहुत कम चीजें पायी जाती हैं।बहुत कम समाज कह सकते हैं कि हम दूसरों पर अपनी निर्भरता कायम नहीं हैं। अपने आप से यह सवाल पूछिए, क्या हम एक तरफ विश्व भर में जाकर लोगों को बता सकते हैं कि वे अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को हमारी ओर भेजते रहें लेकिन हम टीका नहीं देने जा रहे हैं जो उस आपूर्ति श्रृंखला का अंतिम उत्पाद है जिसके लिए हम कच्चे माल की मांग कर रहे हैं? टीका को ही ले लीजिये, आज उत्पादन के अंतर्गत यह सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय उत्पाद हो गया है। यह एक सह-निर्माण, एक सह-उत्पादन है। ऐसा नहीं है कि हम अपने लोगों को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं। चीजें कठिन हो गई हैं, हम ईमानदारी से विश्व से बात की और कहा कि हम अपनी प्रतिबद्धताओं, उत्पादकों की संविदात्मक प्रतिबद्धताओं, गावी के लिए कोवैक्स प्रतिबद्धताओं पर खरा उतरने के लिए प्रतिबद्ध है परन्तु अभी, आप समझते है कि हम देश में एक बहुत ही गंभीर स्थिति में है, तथा मुझे लगता है कि ज्यादातर देश ये समझ रहें हैं। परन्तु कई लोग ये प्रश्न पूछेंगे विदेशों में निर्यात क्यों? फिर कोई और पूछेगा कि भारत को निर्यात क्यों? यह इतना संकीर्ण विचार है। केवल वास्तव में गैर-जिम्मेदार लोग, वास्तव में गैर-गंभीर लोग इस प्रकार का तर्क दे सकते हैं। तथा कुछ आपके आस-पास होंगें, ऐसा आपने देखा होगा।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज: जी हाँ। आपने ठीक कहा। हमे आपके अनुमान से ज्यादा इन चीज़ों से निपटना पर रहा है।

विदेश मंत्री डॉ. एस.जयशंकर: नहीं, नहीं, मुझे आपसे इसका अनुमान मिला, मुझे कोई समस्या नहीं है। मुझे यह मालूम है।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज: पीछे मुड़कर देखते हैं, यदि आप देखते है कि पूरे विश्व को वैश्वीकरण से काफी लाभ प्राप्त हुआ है। यह लाभ चीन, रूस, अमेरिका के साथ अलग-अलग दिशाओं में खींचतान के साथ हुआ। अमेरिका में पिछले राष्ट्रपति ने अपने देश पर ज्यादा ध्यान देते हुए तथा फिर एक देश के बाद दूसरे देशों के लिए कम से कम बोलने में ही अपनी सीमा को बंद किया। वास्तविकता में, सूचना प्रवाह अभी वैश्विक है, आपूर्ति श्रृंखला भी वैश्विक हैं, बिल्कुल जैसा आपने उल्लेख किया है। अब लोग जो प्रश्न पूछ रहे हैं, वह यह है कि 'आत्मनिर्भर भारत' का अभिप्राय क्या है? क्या यह भारत को अलग-थलग कर देगा? यह भारत की विदेश नीति और व्यापार तथा अर्थव्यवस्था के प्रति उसके दृष्टिकोण को कैसे प्रभावित करेगा?

विदेश मंत्री डॉ. एस.जयशंकर: सुनीलजी, सबसे पहले मैं उस धारणा का विरोध करूँगा जिसके साथ आपने शुरुआत की थी-पूरे विश्व को वैश्वीकरण से लाभ हुआ था। मैं इससे सहमत नहीं हूं । मुझे लगता है कि कई देशों को बहुत अधिक फायदा हुआ, कुछ को कम फायदा हुआ, कुछ को बिल्कुल फायदा नहीं हुआ। इससे भी महत्वपूर्ण बात, देशों के भीतर, कुछ लोगों को इसका लाभ मिला, कई लोगों को वास्तव कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है तथा आपने विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में यह देखा होगा। यदि आप वैश्वीकरण के पैरोकार को देखना चाहते हैं, तो न्यूयॉर्क जाएं। वॉल स्ट्रीट को देखें, वहाँ प्रत्येक कोई इसके लिए है। पुराने राजनीतिक प्रतिष्ठान को यह बहुत पसंद था। इसे वें मध्यम अमेरिका कहा करते थे। आखिर आपके पास ट्रंप घटना जैसी प्रविर्ती क्यों हुई? क्योंकि लोगों ने जीवन की गुणवत्ता को देखा, उनके रोजगार के अवसर वास्तव में नकारात्मक वैश्वीकरण से प्रभावित थे। लेकिन मैं सिर्फ अमेरिका के बारे में बात नहीं करना चाहता। अपने ही देश में देखिए। आप सभी व्यवसाय में हैं। क्या आप वास्तव में मुझे पिछले 15 वर्षों में बता सकते हैं कि सभी के लिए कार्य किया है? क्या आप मेरी आखों में देखकर यह कहेंगे कि आपकी औद्योगिक संपदा तथा आपके एमएसएमई रियायती अर्थव्यवस्थाओं से सस्ते आयात से प्रभावित नहीं हुए हैं? क्या इससे इस देश में रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ा है? इसलिए, आपको समझना होगा, हमारे पास उचित विकास नहीं हुआ है। सकल घरेलू उत्पाद की संख्या बहुत अच्छी लग रही है, परन्तु सकल घरेलू उत्पाद की संख्या आवश्यक रूप से रोजगार बढ़ाने में सक्षम नहीं हुआ है। आपके पास रोजगार की समस्या बढ़ रही थी क्योंकि वैश्वीकरण ने देश के भीतर आपकी आर्थिक निष्पक्षता तथा आर्थिक अवसरों को विषम कर दिया। आज आत्मनिर्भर भारत के पीछे मूलभूत धारणा यह है कि एक तरह का मानव केंद्रित होना है अथवा मैं इसे आर्थिक दृष्टि से रोजगार केंद्रित विकास कहूंगा। देखिए आप लोग इसे अच्छी तरह से कर सकते है। इसका मतलब यह नहीं है कि नोएडा में किसी व्यक्ति अथवा कहीं और एक नौकरी हो जाता है। मुझे यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि यह अच्छी तरह से हो रहा है। हमारी बहुत सारी चुनौतियां अलग नहीं हैं। यह अमेरिका में जो कुछ हुआ अथवा विश्व के अन्य हिस्सों में क्या हो सकता है, इसमें भिन्नता है। आज, हमे देश में विनिर्माण विस्तार की आवश्यकता है, देश में सेवाओं का विकास, कृषि में परिवर्तन, और विशेष रूप से ऐसी आर्थिक मानसिकता होनी चाहिए जो ये न कहे की निवल हानि को देख रहा हूँ; हम विदेशों से आपूर्ति श्रृंखला को एकीकृत करने के लिए तैयार हैं; मैं सच में परवाह नहीं करूँगा कि मेरे लोगों तथा देश में मेरे छोटे उद्यमों का क्या हुआ, यह सरकार का दायित्व है की वें इसे जोखिम से बाहर निकाले। मैंने वास्तव में ऐसा सुना है। मैंने व्यापार समुदाय के लोगों को देखा है, जिनमें से कुछ पेशेवर रूप से सरकार को सलाह दे रहे हैं, इस बाहरी आपूत श्रृंखला को किसी प्रकार की पात्रता के रूप में लेते हैं और वे वास्तव में सोचते हैं कि सरकार उनके लिए इसे सुरक्षित करने के लिए बाध्य है। यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है । मेरी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि आप सभी लोग देश में व्यवसाय करें जो देश में रोजगार देंगे।

इसलिए मुझे लगता है कि हमें मौलिक मानसिकता में बदलाव की जरूरत है। कहीं एक अच्छी बात के रूप में शुरू हुई और हम सभी ने 91-92 सुधार का समर्थन किया, बाद में यह पथ से भटक गया और हमने इस भावना को खो दिया कि उससे किसे और कौन लाभान्वित हो रहा है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में इससे कौन लाभान्वित नहीं हो रहा है। मुझे आशा है कि इस संकट के बाद वास्तव में तंत्र मजबूत होगा क्योंकि महामारी के कारण वास्तव में सुरक्षा की हमारी भावना का विस्तार किया है। आज हम स्वास्थ्य सुरक्षा के बारे में सोच रहे हैं। कई देश खाद्य सुरक्षा के बारे में सोच रहे हैं, हमें सौभाग्य से यह समस्या नहीं है। मुझे गलत मत समझिए मैं अतीत में वापसी के लिए चर्चा नहीं कर रहा हूं। मेरा विचार यह नहीं है कि सरकार को विषय-वस्तु पर ले जाया जाये। लेकिन मैं समझता हूं कि भारतीय उद्योग का भारत और भारतीय लोगों पर यह ऋण है कि वे लगातार देश में आपूत श्रृंखलाएं बनाएं, क्या मैं कहूंगा कि उस प्रकार के पिरामिड को अपडेट करें जिस पर आप सभी शीर्ष पर बैठे हैं और एक ऐसा रास्ता खोजें जिसके द्वारा देश का सबसे बड़ा आर्थिक मार्ग प्रशस्त हो।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज: धन्यवाद। यह एक लंबी बातचीत है । मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि भारतीय उद्योग इस समय, विशेष रूप से देश तथा संकट में अपने सभी लोगों का समर्थन करने में सक्षम और इच्छुक है। और आप सही हैं, उद्योग जगत में कुछ ऐसे हैं जो अधिक जिम्मेदार बन सकते हैं। वास्तव में, आज उद्योग जगत में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जो की न केवल सिर्फ स्वयं के लिए अथवा अपने ऋण के बारे में ही नहीं सोचते बल्कि वे बड़ा तथा अधिक जिम्मेदार भूमिका निभाना चाहते हैं, परन्तु यह एक बहुत लंबी जिंमेदारी है और मुझे लगता है कि केवल यही सही है तथा यही उंमीद है। मै थोड़ा बदलकर बात करता हूँ। मै दिनेश नटराजन से एक प्रश्न पूछता हूँ। यह चीन के बारे में है तथा यह है की राजदूत जयशंकर से ज्यादा कोई भी इस देश को आपसे बेहतर नहीं जानता। इस समय भारत पर उनकी आर्थिक और सैन्य ताकत के साथ, उनकी आक्रामकता का मुकाबला करने और उन्हें दूर करने के लिए हमारे पास किस प्रकार की कूटनीति उपलब्ध है?

विदेश मंत्री डॉ. एस.जयशंकर: सुनील जी अगर आप पिछले 40 वर्षों पर नजर डालें तो सीमा पर हमें अमन-चैन मिला है। मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि हमने सीमा विवाद को हल किया क्योंकि यह आसान था अथवा ऐसा होने वाला ही था। हम इसकी जटिलता को लेकर बहुत ईमानदार रहे हैं। लेकिन तथ्य यह था कि हमारे रिश्ते की धारणा यह थी की कोई भी पक्ष बल का उपयोग नहीं करेगा और न ही कोई पक्ष खतरा उत्पन्न करेगा। हमारे बीच विभिन्न समझौते हुए, जिन्होंने उन अच्छे इरादों का प्रतिबद्धताओं में बदल दिया। पिछले वर्ष ही यह बदला। चीन के द्वारा कोई उत्तेजना के साथ, सीमा के पास विशाल बल लाया, यह आप सभी जानते हैं। अब बात बहुत ही सरल है। यह रॉकेट विज्ञान नहीं है। आप सीमा पर शांति तथा सौहार्द को पूरी तरह से बाधित नहीं कर सकते और फिर बाकी संबंधों को जारी रख सकते हैं। मैं पिछले वर्ष से ऐसा कहता आ रहा हूं और मैं यह कहता रहूंगा कि इसे बदला नहीं गया है। अगर इस रिश्ते को तरक्की करनी है तो मुझे सीमा पर अमन-चैन की वापसी करनी चाहिए। इसके बारे में कोई दो तर्क नहीं हो सकता।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज: बिल्कुल, यह हम में से प्रत्येक के लिए यह एक स्पष्ट आवश्यकता है आज के विश्व में जीने के लिए, कि शांति तथा सौहार्द हो, दोनों नागरिकों के लिए तथा आर्थिक और व्यापार जगत के लिए भी। यह एक जटिल स्थिति है, इसमें कोई संदेह नहीं है। नए घटनाक्रमों की ओर थोड़ा आगे बढ़ाते हुए, क्या क्वाड एक और नाटो बन सकता है, अथवा क्या आप इसमे कभी भी नाटो जैसे कद, क्षमता और प्रभाव आदि की उंमीद करते हैं?

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर: संक्षिप्त में कहूँ तो। नहीं, मैं इसका आपको विस्तृत जवाब दूंगा। देखिए हमें 1947 में हमारी स्वतंत्रता मिली थी तथा हमारे लिए इसका मूल्य है क्योंकि यह संघर्ष के इतने दशकों के बाद हासिल किया गया था, और इसलिए हम गठबंधनों से दूर रहे हैं। और कई मायनों में वास्तव में, अपने देश में हम नहीं जानते कि क्या है इन सब का मतलब, क्योंकि हमने कभी इसे नहीं अपनाया। जो लोग नाटो के उस प्रकार के सादृश्य का उपयोग करते हैं, वे या तो हमें बिल्कुल नहीं समझते तथा न ही जानते कि हमारी जड़े कहाँ हैं, हमारी स्वतंत्रता का हमारे लिए क्या अर्थ है तथा भारत की मानसिकता क्या है। अतः एक स्पष्ट पूर्ण अज्ञानता अथवा भारतीय मानसिकता की समझ की कमी है। अथवा दूसरा यह हो सकता है कि वे वास्तव में इन शब्दों का उपयोग जानबूझकर कर रहे हैं, मैं कहूंगा कि हमारे हित मे वें हमें हतोत्साहित करें अथवा हमें रोकें अथवा हमें गुमराह करें। हमारा हित क्या है? एक देश के रूप में आज हमारा हित, उदाहरण के लिए किसी भी अन्य क्षेत्र में की तरह मैं कहूंगा कि यह हम में से चार लोगों के रूप में या आप में से तीन के लिए व्यवसायों के रूप में लागू है, यह है कि यह सभी पक्षों के लिए अत्यंत स्वाभाविक है जो आम हित के है तथा जहाँ साथ मिलकर कार्य करना है, कहने का तात्पर्य यह आप मे से तीनों एक साथ है जिनके पास साझा हित है। इसलिए, क्वाड को चार महत्वपूर्ण देशों के एक साझा मंच के रूप में सोचें जो वास्तव में बाजार में माँग पूर्ति नहीं होने की स्थिति को देख रहें हैं। वास्तव में हाल ही में एक सम्मेलन में, मैंने कुछ उदाहरण दिए: जब हम क्वाड में मिलते हैं तो हम क्या चर्चा करते हैं? हम टीका उत्पादन पर चर्चा कर रहे हैं, महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ क्या करना है,हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि हमारे छात्र कोविड के माहौल मे कैसे आसानी से जा सकें, हम समुद्री सुरक्षा अथवा साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों से कैसे निपटें। यह उन देशों के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बहुत उचित है जिनके पास एक साथ काम करने के लिए अभिसरण तथा समझौते और साझा हित अथवा समान हित हैं। लेकिन मैं इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं करूंगा और स्पष्ट रूप से नाटो, सैन्य गठबंधन, शीत युद्ध आदि की कल्पना पैदा करने के लिए इसे गलत तरीके से चित्रित करूंगा, क्योंकि यह कभी भी भारत की विरासत नहीं रही है। वास्तव में, इस तरह की सोच कुछ ऐसी थी जिसे एशिया के अन्य देश 1970 और 1980 के अंदर कृपापूर्वक प्रचारित करते थे। शीत युद्ध के दौरान भी हम नाटो से दूर रहे। एशिया में प्रत्येक देश ने ऐसा नहीं किया। इसलिए, उन लोगों के लिए नाटो का उपयोग करना स्वाभाविक है। हमलोग उस सादृश्य में बिल्कुल नहीं आते।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज: क्या आपको लगता है, जब आप ने आम हित की बात की थी तथा आपने व्यापार तथा अर्थव्यवस्था की बात की थी, कि क्वाड सदस्यों के बीच एक पादान मिल सकता है जो प्रौद्योगिकी के उपयोग में एक साथ काम करते हैं, ऐसा ही कुछ आपने उल्लेख किया। और अब प्रौद्योगिकी तेजी से सिविल सोसाइटी, अर्थव्यवस्था तथा व्यापार के लिए एक उत्तेजक है। तो क्या आपको लगता है कि इन देशों के लिए आर्थिक पक्ष पर एक साथ काम करने के लिए इसका लाभ उठाया जा सकता है?

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर:
बिल्कुल, अनेकों कारणों से। पहला, मुझे लगता है कि कोविड के तनाव के कारण, यहां तक कि कोविड से पहले भी, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आज के व्यापार की ही तरह, विश्वास एक महत्वपूर्ण वस्तु का एक प्रकार बन गया है। विश्वसनीयता भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। हम सभी एक-दूसरे के साथ एक तरह से व्यापार करना चाहते हैं, जिसमें हमें नहीं लगता कि इसका गलत तरीके से उपयोग किया जा रहा है ।

इसलिए, मुझे लगता है कि जब आप आगे की विश्व को देख रहे हैं, तो देश उन भागीदारों के साथ अधिक सहज होंगे जो उनके विचार में प्रौद्योगिकी का लाभ नहीं उठाएंगे अथवा व्यापार को गैर-व्यापार मुद्दों से जोड़ते हैं। समाज मे ऐसे लोग होंगे, जो एक-दूसरे के साथ अधिक आराम से रहेंगे जो पहले एक दुसरे के साथ आराम से नहीं रहते थे। क्योंकि आप विशेष रूप से क्वाड का उल्लेख किया है, चाहे अमेरिका हो, जापान हो, अथवा ऑस्ट्रेलिया हो, इन सभी देशों में हमारे अत्यंत मजबूत रिश्ते हैं । वहां आराम का एक बड़ा कारण है, वहां व्यापार मे बहुत कुछ किया जाना है, इन रिश्तों में से प्रत्येक स्वायत्त सम्बन्धों का एक महान भविष्य है, और मुझे लगता है कि हममे एक साथ सामूहिक रूप से कार्य करने की क्षमता है।

लेकिन यह कहने के बाद, मैं कहूंगा कि अन्य भी कुछ होगा। हमें प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के दौरा को फिर से पुनर्योजित होते देखा, परंतु निश्चित रूप से ब्रिटेन के साथ हमारी उम्मीद है, उदाहरण के लिए, कि हम आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापार कर रहे होंगे। मैं अभी फ्रांस के विदेश मंत्री से मिला था। हमने एक साथ बहुत समय व्यतीत किया, वास्तव में चर्चा यह हुई की फ्रांस के साथ तथा यूरोपीय संघ के साथ क्या संभावनाएं हैं।

इसलिए, मैं समळाता हूं कि कोविद ने जो कुछ किया है, क्या इससे वैश्विक वाद-विवाद को इस अर्थ में लाया है कि आज भारत वैश्विक उत्पादन के लिए एक अच्छा मंच है। और वैसे यह वही है जो मैं कल अबू धाबी में चर्चा कर रहा था। मुझे लगता है कि विश्व भारत से अधिक उत्पादन देखने के लिए इच्छुक है। हम एक बाजार अर्थव्यवस्था हैं; हम एक खुला समाज हैं। आप जानते हैं कि हमारी मानसिकता वैश्विक है। अगर मैं अपने आप को ऐसा कहूं, तो मैं कहूंगा कि कुल मिलाकर विश्व हम पर भरोसा करती है। और मुझे सच में ऐसा लगता है कि यह इस समय के लिए उपयुक्त कदम है। इसलिए, यदि मैं आपके दो प्रश्नों को एक साथ रखूं, तो आत्मनिर्भर भारत, जो हमे अधिक क्षमता देता है और यह वातावरण जो मुझे अधिक विश्वसनीय प्रयोजन देता है, बेहतर ब्रांडिंग अगर होती है, तो मुझे लगता है कि वहां संभावनाएं हैं।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेअरमैन, हीरो एंटरप्राइज: मुझे इस बिंदु से थोड़ा आगे बात करता हूँ। आपने अच्छे संबंधों के सकारात्मक पक्ष को बताया कि इनमें से कई मे देश प्रदर्शन कर रहा हैं, एक साथ कार्य करने की जरूरत है अथवा दोस्ती आदि। साथ ही यहां आकर्षण के केंद्र भी हैं। कुछ पुरानी फॉल्ट लाइनें भी हैं जो फिर से दिखाना शुरू हो रही हैं। कुछ नए विकसित हो रहे हैं । तनाव के बिंदु हैं जो हमने देखे हैं, वास्तव में एक ऐसे बिंदु पर जा रहे हैं जहां वे गंभीर संघर्ष अथवा निकट समय मे संघर्ष होते जा रहे हैं। क्या आप विश्व में कहीं भी एक युद्ध की स्थिति की संभावना को देखने है जो ऐसी नई व्यवस्था होने से पहले हो सकती है जिसका आपने जिक्र किया?

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर: आप जानते हैं कि स्थानीय संघर्ष हो सकते हैं, उनमें से कुछ बहुत महत्वपूर्ण हैं। हम एक बहुत ही चिंताजनक स्थिति को देख रहे हैं, जैसा अफगानिस्तान में हैं। लगातार चल रहे संघर्ष वाला क्षेत्र जैसे अफ्रीका महाद्वीप। इसलिए विश्व में हमेशा संघर्ष होंगे, लेकिन मैं सोचता हूं कि वास्तव में बड़ी शक्तियों के बीच एक तरह का वृहत स्तर पर, वह युग हमारे पीछे है। क्योंकि सभी ने कहा और किया, और जैसा कि मैंने आपसे पहले कहा था, वैश्वीकरण उचित नहीं रहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैश्वीकरण वास्तविक नहीं रहा है। हम एक अत्यंत ही भूमंडलीकृत विश्व हैं, और भारी परस्पर निर्भरता तथा परस्पर चर्चा है। प्रमुख अग्रणी देशों में, अगर वे इस तरह का कार्य करते हैं, हमारा उन पर भी एक व्यापक प्रभाव पड़ेगा! वे एक दूसरे के साथ इतने आपस में जुड़े हुए हैं। पिछले एक या दो दशक के पसंदीदा सिद्धांतों में उदाहरण के लिए, यह पूरा थूसीडाइड्स जाल है। मेरा अभिप्राय है, ये दीमाग का खेल है, आप जनते है। ये हमारे तरीके हैं जो आपको बता रहा हूँ, यह मत करो अथवा कुछ और। यह आपको विकल्प तलाशने से हतोत्साहित करने का एक तरीका है। यह कूटनीति का हिस्सा है ।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेअरमैन, हीरो एंटरप्राइज: हम कहते है कि शेयर बाजार में भी अक्सर ऐसा होता है, उदाहरण के लिए आपके पास नकदी ज्यादा होता है जब बाज़ार ऊपर जाता है तथा आपके पास नकदी खत्म हो जाता है जब बाज़ार नीचे चला जाता है। ऐसा बहुत बार होता है, आप सही हैं। मेरे पास अफगानिस्तान पर जुबिन कबराजी I से एक प्रश्न है जैसा कि आपने उल्लेख किया है, क्या आप भारत के लिए इस क्षेत्र में आर्थिक रूप से, बड़े भू-राजनीतिक ढांचे में हिस्सा लेने के लिए एक बड़ी भूमिका देखते हैं? एक मायने में आपने इस बात का जिक्र किया है की अमेरिकी सरकार ने संकेत दिया है कि भारत को अफ़ग़ानिस्तान मे इस बातचीत का हिस्सा बनने की जरूरत है। भारत के संदर्भ में यह कहां पर है की, भारत अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहा है?

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर: आप जानते हैं कि भारत ने हमेशा अफगानिस्तान में सक्रिय भूमिका निभाई है, न सिर्फ 2001 के बाद बल्कि 2001 से पहले भी। अफगानिस्तान बिलकुल पास मे है, तो हमारी भूमिका, प्रभाव, उपस्थिति, वहां के गतिविधि मे कैसे नहीं हो सकता। यह सिर्फ इतना है कि आप अपने मार्ग या अपने मंच का चयन करें जो स्थिति के लिए सबसे उपयुक्त है। 9/11 के घटना के बाद, 2001 की स्थिति के बाद, हमारे लिए मदद करने का सबसे अच्छा तरीका विकास परियोजनाओं तथा सामाजिक-आर्थिक गतिविधि के माध्यम से किया गया। क्योंकि अन्य लोग अन्य कार्य कर रहे थे तथा आखिरकार हमारा इरादा, वहां जाकर उपकार करना नहीं था। वहां होने का हमारा इरादा मदद तथा एक बड़ा वैश्विक प्रयास करने के लिए योगदान था। पिछले 20 वर्षों में जो कुछ किया है, उसने हमें बहुत सारे दोस्त बनाए हैं, इसने भारत के लिए अत्यंत सद्भावना सृजित की है तथा भारत के लिए अत्यंत स्वीकार्यता है। लोग इन पिछले 20 वर्षों में हमें देखते हैं और हमें अफगानिस्तान में अच्छी चीजों से जोड़ते हैं। इसी अवधि में कुछ कठिन चीजें हुई हैं, जिनमें से बहुत से किसी और पर दोषारोपण है, जो सब जानते हैं। जब हम आगे भविष्य को देखते हैं, मुझे लगता है कि यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कार्य करते हैं, तथा हमारी ताकत, हमारी क्षमताओं, हमारी नेटवर्किंग और हमारे रिश्तों के आधार पर देखते हैं, इसी के साथ हम एक बेहतर अफगानिस्तान बनाने में मदद कर सकते हैं। मैं जो बात करता रहता हूं वह यह है कि हमारा संबंध अफगान लोगों के साथ है। हम वहां राजनीति करने के लिए नहीं हैं, और हम वहां नहीं है यह कहने के लिए की, 'यह मेरा पसंदीदा है तथा वह मेरा पसंदीदा नहीं है', क्योंकि इस खेल मे हम नहीं है। हम वास्तव में वहाँ समृद्धि के लिए एक बड़ी स्थिरता के लिए, विकास के लिए, प्रगति के लिए हैं।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेअरमैन, हीरो एंटरप्राइज: मंत्री जयशंकर जी, आपने बहुत अच्छी तरह से बताया । हमारे पास केवल दो मिनट अब हैं और मेरे पास प्रश्नों की एक लंबी सूची है। मुझसे प्रस्न पुछने के बजाय मै ही एक प्रस्न पूछ लेता हूँ, आप कोई टिप्पणी हमें करना चाहते हैं, जो आपको लगता है कि महत्वपूर्ण है। आपने कोविड तथा उद्योगों की भूमिका के बारे में कुछ टिप्पणियों के साथ शुरुआत किया था। क्या कूटनीति, भू-राजनीति, भू-अर्थशास्त्र की दृष्टि से कुछ और है, जिसे आप टिप्पणी करना चाहेंगे क्योंकि अब यह सत्र समापन पर आ गया है?

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर:
मेरे विचार से केवल एक ही टिप्पणी है और मैं यह एक संक्षिप्त कार्यकाल के आधार पर कहता हूं जो मैंने सरकार छोड़ने के बाद तथा सरकार से पुनः जुड़ने के बाद कारपोरेट क्षेत्र में किया था, यह है कि हमारे राष्ट्रीय विकास को आगे ले जाने में व्यापार तथा सरकार के बीच एक मजबूत साझेदारी होनी चाहिए। मेरा अभिप्राय है, आप प्रत्येक किसी की तरह राष्ट्रवादी तथा देशभक्त और आकांक्षी हैं। परंतु मुझे लगता है, हमें बहुत अधिक सोचने की जरूरत है। एक मायने में सीएसआर को देखने के लिए बॉक्स तथा लिखने के लिए चेक नहीं होना चाहिए, अथवा यहां तक कि सिर्फ एक प्रोजेक्ट बनाना चाहिए। सीएसआर मानसिकता होनी चाहिए। मैंने अपने जीवन का अधिक समय बिताया है, जैसा की आप जानते हैं, जापान में पांच वर्ष, सिंगापुर में तीन वर्ष, चीन में साढ़े चार वर्ष, तथा ये वे देश थे जहां वास्तव में अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण इस युग में हुआ था। अंत में, जब मैं व्यापार को देखता हूँ, यह एक रोजगार निर्माता है तथा मेरे मन में प्रस्न यह है कि हम कैसे एक मजबूत राष्ट्रीय आर्थिक आधार का निर्माण कोविड से सीख लेकर कर सकते है। वास्तव में हमे देश मे एक मजबूत आधार बनाकर, विश्व के साथ बातचीत मे जोखिम को खत्म करना होगा। मैं अत्यंत आशा करता हूं कि कोविड के पश्चात बातचीत इस पर ध्यान केंद्रित करके होगी।

श्री सुनील कांत मुंजाल, चेअरमैन, हीरो एंटरप्राइज: मंत्री जयशंकर जी, एक अत्यंत व्यापक, अत्यंत सीधी अग्रसर तथा खुली बातचीत के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, जिसने वास्तव में हमें राष्ट्रीय नेतृत्व सम्मेलन को उचाई पर पहुचाने मे मदद की। हमेशा की तरह एक प्रशंसनीय संवादात्मक सत्र के लिए, आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर
: धन्यवाद।

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