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भारत-अमेरिका मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद प्रेस वक्तव्य/मीडिया संवाद का प्रतिलेख

जुलाई 28, 2021

श्री अरिंदम बागची, आधिकारिक प्रवक्ता: शुभ दोपहर
संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री, माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन,
भारत के विदेश मंत्री, माननीय डॉ. एस जयशंकर,
दोनों प्रतिनिधिमंडलों के गणमान्य सदस्य,
मीडिया के सदस्य,

आप सभी को एक बार फिर से बहुत ही शुभ दोपहर, और संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री की नई दिल्ली यात्रा के अवसर पर इस विशेष प्रेस वार्ता में आप सबका गर्मजोशी से स्वागत है। व्यक्तिगत रूप से यहाँ उपस्थित होने के लिए धन्यवाद। हम दोनों मंत्रियों द्वारा मीडिया को दिए गए बयानों से शुरुआत करेंगे। अब मैं माननीय विदेश मंत्री, डॉ. एस. जयशंकर से अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी प्रारंभिक टिप्पणी दें।

डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री: मीडिया के दोस्तों, सचिव ब्लिंकन और मैंने अभी-अभी अपनी चर्चा समाप्त की है; मैं आप सभी को संक्षिप्त विवरण देने के इस मौके का स्वागत करता हूं। सबसे पहले मैं ये कहना चाहता हूँ कि सचिव महोदय, वापस दिल्ली में आपका फिर से स्वागत करते हुए बहुत खुशी हो रही है। हमारी बैठक एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हो रही है जब प्रमुख वैश्विक और क्षेत्रीय चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान करने की आवश्यकता है क्योंकि हमारी द्विपक्षीय साझेदारी एक ऐसे स्तर पर पहुंच गई है जो हमें बड़े मुद्दों के साथ सहयोगात्मक रूप से निपटने में सक्षम बनाती है और यह विशेष संतुष्टि का विषय है। अब, आप सभी हाल के वर्षों में हमारे संबंधों में हुए परिवर्तन के स्तर से अवगत हैं। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति बाइडेन ने कई बार बात की है और इस साल क्वाड, जी7 और जलवायु नेताओं के शिखर सम्मेलन में भाग लिया है जबकि मुझे लगता है कि सचिव ब्लिंकन महोदय और मैं, हम दोनों वास्तव में इस साल चौथी बार मिल रहे हैं। विदेश मंत्रियों के रूप में, यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की नियमित रूप से समीक्षा करें और अपने नेताओं को हमारे संबंधों में हुई प्रगति से अवगत कराते रहें और ठीक यही हमने आज किया है। अब चाहे वह कोविड चुनौती का जवाब हो, रक्षा और सुरक्षा पर सहयोग करना, व्यापार और निवेश को प्रोत्साहित करना, जलवायु परिवर्तन को संबोधित करना या शिक्षा तथा नवाचार का विस्तार करना हो, मैं वास्तव में कह सकता हूं कि 2021 में बहुत कुछ हुआ है। स्वाभाविक रूप से कोविड एक विशिष्ट मुद्दा था, इसलिए मैं सबसे पहले भारत में वैक्सीन उत्पादन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को खुला रखने के लिए बाइडेन प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया को स्वीकार करता हूं और फिर कोविड की दूसरी लहर के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका से हमें मिले समर्थन के लिए उन्हें बड़ा धन्यवाद देता हूं, जो वास्तव में असाधारण था। हमने आज वैश्विक स्तर पर इसे किफायती और सुलभ बनाने के लिए वैक्सीन उत्पादन के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया; हमने कोविड के कारण उपजी यात्रा की चुनौतियों पर भी चर्चा की। छात्रों के मामले में अमेरिका अग्रणी रहा है। इस संबंध में विदेश विभाग और दूतावास ने जो परेशानी उठाई है, उसकी मैं वास्तव में सराहना करता हूं और मुझे बहुत आशा है कि आने वाले दिनों में अन्य यात्रियों के प्रति भी वे सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखेंगे।

हमने क्षेत्रीय चिंताओं, बहुपक्षीय संस्थानों और वैश्विक मुद्दों के बारे में विस्तार से बात की, भारत के बढ़ते कदम ने, चाहे वह अफ्रीका में हो, दक्षिण-पूर्व एशिया, कैरेबिया या दक्षिण-प्रशांत क्षेत्र में, स्वाभाविक रूप से साझा एजेंडे को व्यापक बनाया है। हमने जिन कई मुद्दों पर ध्यान दिया, उनमें मैं विशेष रूप से अफगानिस्तान, इंडो-पैसिफिक और खाड़ी पर ध्यान देना चाहूंगा। अफगानिस्तान के संबंध में यह आवश्यक है कि सभी पक्षों द्वारा शांति वार्ता को गंभीरता से लिया जाए। दुनिया एक स्वतंत्र, संप्रभु, लोकतांत्रिक और स्थिर अफगानिस्तान को देखना चाहती है जो खुद भी शांत रहे और उसका पड़ोस भी शांत बना रहे, लेकिन इसकी स्वतंत्रता और संप्रभुता तभी सुनिश्चित होगी जब यह दुर्भावनापूर्ण प्रभावों से मुक्त हो। इसी तरह किसी भी दल द्वारा एकतरफा इच्छा को थोपना स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक नहीं होगा। न तो इससे कभी स्थिरता आ सकती है, न ही वास्तव में ऐसे प्रयास कभी वैधता प्राप्त कर सकते हैं। पिछले दो दशकों में विशेष रूप से महिलाओं, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता पर अफगानी नागरिक समाज को मिले लाभ सुस्पष्ट हैं; हमें उन्हें संरक्षित करने के लिए सामूहिक रूप से काम करना चाहिए। अफगानिस्तान को न तो आतंकवाद का घर होना चाहिए और न ही शरणार्थियों के लिए संसाधन। दूसरी ओर, भारत के लिए इंडो-पैसिफिक स्थिरता, विकास और समृद्धि के लिए अलग तरह की चुनौतियां ला रहा है। क्वाड फ्रेमवर्क के तत्वावधान में, हम समुद्री सुरक्षा, एचएडीआर आतंकवादरोधी, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे, साइबर और डिजिटल चिंताओं, कोविड-19 से लड़ाई, जलवायु पर कार्रवाई, शिक्षा और लचीली तथा विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में जुटे हुए हैं।

सचिव और मैंने इन सभी मुद्दों पर न केवल आगे सहयोग के अवसरों पर चर्चा की, बल्कि यूएनसीएलओएस सहित अंतर्राष्ट्रीय कानून, नियमों और मानदंडों का पालन करने के महत्व पर भी चर्चा की। क्वाड और अन्य जगहों पर अधिक बारीकी से, द्विपक्षीय रूप से काम करने की हमारी क्षमता, समग्र रूप से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को लाभान्वित करती है। भारत के विस्तारित पड़ोस में विकास भी स्वाभाविक रूप से हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। खाड़ी में स्थिरता, जहां हमारे राजनीतिक, आर्थिक और सामुदायिक हित इतने स्पष्ट हैं, एक साझा चिंता थी। म्यांमार के संबंध में, मैंने इसके लोकतांत्रिक परिवर्तन के साथ-साथ आसियान पहलों के लिए हमारे समर्थन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से अवगत कराया। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य हैं। यूएनएससी के समक्ष कुछ एजेंडे को भी हमारी चर्चाओं में शामिल किया गया था जिसमें बहुपक्षवाद में सुधार के लिए हमारा दृष्टिकोण भी शामिल था। संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में, द्विपक्षीय रूप से और अन्य निकायों में आतंकवाद का मुकाबला करना हमारे लिए सामान्य प्रयास रहा है। हमें विश्वास है कि दुनिया कभी भी सीमा पार आतंकवाद को स्वीकार नहीं करेगी।

जहां तक ​​जलवायु परिवर्तन का संबंध है, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति बाइडेन द्वारा अप्रैल में शुरू की गई एजेंडा 2030 साझेदारी पेरिस लक्ष्यों को पूरा करने की हमारी प्रतिबद्धता को मजबूत करती है, इसलिए इसकी स्वच्छ ऊर्जा और वित्त जुटाने के कार्य को आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

हमारी रणनीतिक साझेदारी की व्यापक और वैश्विक प्रकृति को देखते हुए, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश प्रमुख समकालीन मुद्दों पर बातचीत करेंगे। इस तरह के संवाद न केवल एक लोकतांत्रिक, विविध और बहु-ध्रुवीय दुनिया में आवश्यक हैं, बल्कि वास्तव में इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। हम इस बहुलवाद को अपने संदर्भों, विश्वासों और संस्कृतियों के चश्मे से देखते हैं। सेक्रेटरी ब्लिंकन और मैं उस यात्रा का हिस्सा रहे हैं जिसने आज हमारे दोनों देशों को इतना करीब ला दिया है। हमारे संबंध, जाहिर तौर पर हमारे राष्ट्रीय और पारस्परिक हितों की अच्छी तरह से रक्षा करते हैं, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये दुनिया में और हमारे समय के बड़े मुद्दों को लेकर एक वास्तविक फर्क पैदा करते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए, एंटनी मैं आपसे, आज की वार्ता पर अपनी राय देने और सचिव महोदय से उनकी टिप्पणी के लिए अनुरोध करता हूं।

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, अमेरिकी विदेश मंत्री: धन्यवाद। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। और सभी को शुभ दोपहर। भारत में वापस आना वास्तव में बड़ी खुशी है, मैं बस यही सोच रहा था कि पहली बार मैं यहाँ 40 साल पहले अपने परिवार के साथ आया था। इस बार यहाँ कुछ अलग परिस्थितियों में हूं, लेकिन यहां होना अद्भुत है। और मैं विशेष रूप से मंत्री जयशंकर, सरकार में हमारे सभी सहयोगियों और कुछ ऐसे व्यक्तियों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिनसे मुझे अविश्वसनीय रूप से गर्मजोशी से मिलने का अवसर मिला है। मंत्री महोदय और मेरे बीच कुछ ही वर्ष पहले की साझेदारी और मित्रता है। और मुझे कहना होगा कि नियमित रूप से आपके साथ काम करने में सक्षम होना मेरे काम के विशेष सुखों में से एक है।

दुनिया में ऐसे कुछ रिश्ते हैं जो संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच के रिश्ते से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। हम दुनिया के दो प्रमुख लोकतंत्र हैं और हमारी विविधता हमारी राष्ट्रीय ताकत को बढ़ाती है। हम दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिसे हमारे लोगों की अभिनव भावना से ऊर्जा मिलती है। ऐसे समय में जब तापमान और समुद्र स्तर दोनों बढ़ रहे हैं, हम दुनिया के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक जलवायु संकट और एक नई हरित अर्थव्यवस्था के अग्रणी छोर पर हैं। हमारे देश जलवायु परिवर्तन के कानूनी परिणामों को पहले से जानते हैं। और भारतीय और अमेरिकी लोग पीढ़ियों से चले आ रहे लाखों पारिवारिक संबंधों, साझा मूल्यों और साझा आकांक्षाओं के साथ एकजुट हैं। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा की जाने वाली कार्रवाइयाँ साथ मिलकर 21वीं सदी और उससे आगे के समय को आकार दे रही हैं। यही कारण है कि भारत के साथ साझेदारी को मजबूत करना संयुक्त राज्य अमेरिका की शीर्ष विदेश नीति प्राथमिकताओं में से एक है। पिछले कई राष्ट्रपति प्रशासनों, डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के लिए समान रूप से ऐसा ही रहा है। और राष्ट्रपति बाइडेन भारत के साथ हमारी दोस्ती को अधिक से अधिक मजबूत और प्रभावी बनाने के लिए एक गहरी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता महसूस करते हैं। हमारा मानना ​​है कि यह साझेदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और उसके बाहर स्थिरता तथा समृद्धि प्रदान करने और दुनिया को यह दिखाने के लिए महत्वपूर्ण होगी कि लोकतंत्र अपने लोगों के लिए कैसे काम कर सकता है। और हम मानते हैं कि हम एक साथ कई मोर्चों पर इस डील को पूरा कर सकते हैं।

जैसा कि मंत्री महोदय ने कहा, हमने आज कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। कोविड-19 एजेंडे में सबसे ऊपर है, इसने हम दोनों देशों को बहुत-बहुत प्रताड़ित किया है। हम भारत की उस सहायता और सहयोग को कृतज्ञता के साथ याद करते हैं, और हम उसे कभी नहीं भुला पायेंगे जो भारत ने कोविड-19 के शुरुआती दिनों में हमें प्रदान की थी जब हमारे अस्पताल महामारी से बीमार लोगों से भर गए थे। और मुझे गर्व है कि हम पिछले कुछ महीनों में दोस्ती के उसी भाव के साथ वापस मदद कर पाए, संयुक्त राज्य सरकार ने कोविड-19 से राहत के लिए भारत को 200 मिलियन डॉलर से अधिक का योगदान दिया है। और इसके साथ ही निजी क्षेत्र के अलग-अलग अमेरिकियों की ओर से भी भारी सहयोग मिला है। आज, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि संयुक्त राज्य सरकार पूरे भारत में टीकाकरण प्रयासों में सहायता के लिए अतिरिक्त 25 मिलियन डॉलर भेजेगी। मुझे लगता है कि यह फंडिंग वैक्सीन आपूर्ति श्रृंखला लॉजिस्टिक्स को मजबूत करके, वैक्सीन के प्रति झिझक को दूर करके और अधिक स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करने में मदद करके जीवन बचाने में योगदान देगी। हम इस महामारी को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका इसे करने के लिए मिलकर काम करेंगे, जिसमें क्वाड वैक्सीन साझेदारी भी शामिल है, जो पूरे क्षेत्र में दूसरों के लिए सुरक्षित और प्रभावी टीके लाएगा। और मेरा यह भी मानना ​​है कि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका एक साथ, दुनिया भर में इस महामारी को समाप्त करने में अग्रणी होंगे। और मुझे उम्मीद है कि आगे चलकर एक और मजबूत वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली स्थापित की जाएगी ताकि हम अगली महामारी आने से पहले बेहतर स्थिति में आ जाएँ। हमें महामारी के बहुत ही दर्दनाक द्वितीयक परिणामों को भी संबोधित करना होगा, जो संयुक्त राज्य में हमारे आर्थिक सुधार को बढ़ावा देने से जुड़ा है और इसके लिए व्यापार संबंधों को आगे बढ़ाना जारी रखना होगा। और इसके अलावा, हमें उन बाधाओं के बीच काम करते रहना होगा जो वृहत द्विपक्षीय निवेश और गहरे वाणिज्यिक संबंधों के रास्ते में आ रही हैं। कुछ इन्हीं मुद्दों पर हमने आज बात की। यदि हम अधिक से अधिक व्यापार और निवेश, तथा नवाचार के लिए सही परिस्थितियों का निर्माण करते हैं, तो उन उपलब्धियों की कोई सीमा नहीं है जिन्हें वास्तव में हमारे निजी क्षेत्र हासिल कर सकते हैं।

मंत्री जी ने और मैंने द्विपक्षीय रूप से तथा क्वाड के माध्यम से जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ अन्य बहुपक्षीय साझेदारियों के साथ हमारे क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने पर भी चर्चा की। दुनिया के इस हिस्से में 21वीं सदी के भविष्य के बारे में बहुत कुछ लिखा जाएगा। हम एक स्वतंत्र, खुले, सुरक्षित और समृद्ध इंडो-पैसिफिक के भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के दृष्टिकोण को साझा करते हैं। हम उस विजन को साकार करने के लिए एक साथ काम करेंगे और दुनिया भर में शांति सुरक्षा विकास को आगे बढ़ाने तथा एक नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों में काम करते रहेंगे। इसके केवल एक उदाहरण पर वापस आते हैं, जैसा कि मंत्री महोदय ने उल्लेख किया है, क्वाड देशों का पूरा ध्यान कोविड-19 से प्रभावी ढंग से निपटने, जलवायु एजेंडा को आगे बढ़ाने और उभरती प्रौद्योगिकियों से निपटने पर केंद्रित है। और हम अपने विशेषज्ञों को इस क्षेत्र में और उससे आगे के कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक साथ ला रहे हैं, जिसमें बुनियादी ढांचा, आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा शामिल है। जैसा कि मंत्री जी ने कहा, हमने क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर चर्चा की, जिसमें अफगानिस्तान भी शामिल है। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों की शांतिपूर्ण, सुरक्षित और स्थिर अफगानिस्तान में गहरी रुचि है। इस क्षेत्र में एक नेता और महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में, भारत ने अफगानिस्तान की स्थिरता और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और ऐसा करना वह जारी रखेगा। और हम अफगान लोगों के लाभ को बनाए रखने और देश से गठबंधन सेना की वापसी के बाद क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन करने के लिए मिलकर काम करना जारी रखेंगे। और वास्तव में, हमने जलवायु संकट के बारे में भी बात की। इस साल की शुरुआत में, हमने भारत के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को आधा करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए अपने महत्वाकांक्षी 2030 लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करने के लिए यूएस इंडिया क्लाइमेट एंड क्लीन एनर्जी एजेंडा 2030 साझेदारी शुरू की, और इसके लिए अन्य लक्ष्यों के साथ 450 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित की। यह अक्षय ऊर्जा क्षमता का लगभग दोगुना है जिसे पूरी दुनिया ने 2020 में जोड़ा है। यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं को प्रदर्शित करेगा कि आर्थिक विकास और एक स्वच्छ अर्थव्यवस्था साथ-साथ चल सकती है।

आज की बातचीत जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल के साथ मेरी आज की बैठक, और बाद में प्रधानमंत्री मोदी के साथ होने वाली मेरी बैठक शामिल है, हमारे सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए मूल्यवान और महत्वपूर्ण अवसर हैं। रक्षा सचिव ऑस्टिन और मैं इस वर्ष के अंत में वाशिंगटन में वार्षिक 2+2 संवाद के लिए मंत्री जयशंकर और रक्षा मंत्री सिंह की मेजबानी करने के लिए उत्सुक हैं। हमारी सामरिक और सुरक्षा साझेदारी को गहरा करने के लिए यह हमारे दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। अंत में, हमारे साझा मूल्यों से हमारे द्विपक्षीय संबंध मजबूत हुए हैं। विश्व के दो प्रमुख लोकतंत्रों के रूप में, हम अपने सभी लोगों को स्वतंत्रता, समानता और अवसर प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेते हैं। और हम जानते हैं कि हमें इन मोर्चों पर लगातार और अधिक काम करना चाहिए, हममें से किसी ने भी उन आदर्शों को अब तक हासिल नहीं किया है जो हमने अपने लिए निर्धारित किए हैं। लोकतंत्र के वादे का एक हिस्सा बेहतर के लिए निरंतर प्रयास करना है, जैसा कि अमेरिका के संस्थापकों ने कहा है, एक अधिक परिपूर्ण संघ बनाने के लिए, हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों को हमेशा मजबूत करने के लिए न्याय और अवसर तक पहुंच का विस्तार करना होगा, मौलिक स्वतंत्रता के लिए मजबूती से खड़ा होना होगा। वे मूल्य जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के केंद्र में हैं, वे न केवल हमारी सरकारों के बीच, बल्कि हमारे निजी क्षेत्रों, विश्वविद्यालयों, नागरिक समाजों, हमारे देशों और सबसे बढ़कर, हमारे लोगों को जोड़ने वाली विशाल श्रृंखला के मूल में हैं।

एक आखिरी बात, आज की अपनी यात्रा की तैयारी के लिए, मैं एक अमेरिकी नेता द्वारा भारत की पिछली यात्रा को देखता हूं। 2006 में तत्कालीन सीनेटर जो बाइडेन यहां आए थे। और उस भारत यात्रा के दौरान, उन्होंने कहा था, जिसे मैं उद्धृत करता हूं, मेरा सपना है कि 2020 में, दुनिया के दो सबसे करीबी देश भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका होंगे, अगर ऐसा होता है, तो दुनिया सुरक्षित हो जाएगी। खैर, यह 2021 है। जो बाइडेन संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच दोस्ती दुनिया में सबसे अधिक फलदायी है। और हम भी भविष्य को, 2030 और उससे आगे की ओर देखते हैं क्योंकि एक बार फिर, आज हम जो विकल्प और निवेश करते हैं, वे हमारे बच्चों और दुनिया के लिए एक स्वस्थ, अधिक शांतिपूर्ण, अधिक समृद्ध, अधिक लोकतांत्रिक भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। हमारे सामने यही अवसर है। और इसे हासिल करने के लिए भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग मिलकर काम करेंगे। धन्यवाद।

श्री अरिंदम बागची, सरकारी प्रवक्ता: माननीय मंत्रीगण, आपके प्रारंभिक वक्तव्यों के लिए धन्यवाद। अब मैं अपने गणमान्य व्यक्तियों के लिए यहां मीडिया के सदस्यों से प्रश्न आमंत्रित करूंगा। समय की कमी को देखते हुए, हम भारतीय मीडिया से दो प्रश्न लेंगे और फिर मैं स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता, श्री नेड प्राइस को कमान सौंप दूंगा, जो यूएस की ओर से दो प्रश्न लेने के लिए हमारे साथ हैं। मैं सीएनबीसी के परीक्षित लूथरा से शुरू करता हूं, कृपया।

परीक्षित लूथरा: श्री जयशंकर, और सचिव ब्लिंकन, मैं समझता हूँ कि दोनों पक्षों ने अफगानिस्तान की स्थिति पर विस्तृत चर्चा की। क्या आप हमें अफगानिस्तान को लेकर मेल और मतभेद के क्षेत्रों और आगे के रास्ते के बारे में बता सकते हैं?

डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री: आप जानते हैं, मैं मेल और मतभेद को देखने के बजाय कहूँगा, यदि सचिव मेरा खंडन नहीं करते हैं तो, कि मेल बहुत अधिक था, लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे हैं जहाँ हम अलग-अलग जगहों से, अलग-अलग हितों और पृष्ठभूमि से आ रहे हैं। मुझे लगता है कि कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि हम सहमत थे कि, मैंने अपनी टिप्पणी में जिस बात पर जोर दिया कि शांति वार्ता को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, स्थायी समाधान का यही एकमात्र तरीका है और अफगानिस्तान की विविधता को ध्यान में रखा जाना चाहिए। और चूंकि संयुक्त राज्य अमेरिका की अफगानिस्तान में एक बहुत ही अनूठी भागीदारी है, लेकिन एक ऐतिहासिक संबंध के साथ एक तत्काल पड़ोसी के रूप में हमें लगता है कि जिस तरह से हम इसे देख रहे हैं, जिस तरह से हम आगे की चुनौतियों को देखते हैं, मैं कहूंगा कि हमारे विचार काफी समान थे। मुझे लगता है कि यह एक उचित विवरण होगा।

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, अमेरिकी विदेश मंत्री: मैं निश्चित रूप से अपने मित्र का खंडन नहीं करूंगा, सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि वह जो कह रहे हैं, वह बिल्कुल सही है। मुझे लगता है कि मोटे तौर पर हम अफगानिस्तान को एक तरह से ही देखते हैं। हम दोनों इस प्रस्ताव के लिए प्रतिबद्ध हैं कि अफगानिस्तान को प्रभावित करने वाले संघर्ष का कोई सैन्य समाधान नहीं है, एक शांतिपूर्ण समाधान होना चाहिए, जिसके लिए तालिबान और अफगान सरकार को मेज पर आने की आवश्यकता है। और हम दोनों सहमत हैं, मैं दृढ़ता से सोचता हूं कि किसी भी भावी सरकार के लिए अफगानिस्तान को समावेशी और अफगान लोगों का पूर्ण प्रतिनिधि होना चाहिए। लेकिन अंततः, यह एक अफगान के नेतृत्व वाली और अफगानी स्वामित्व वाली शांति प्रक्रिया होनी चाहिए जिसका हम सभी समर्थन करेंगे। मैं समझता हूं कि यह कहना भी सही होगा कि पड़ोसी देश अफगानिस्तान और इस क्षेत्र के अधिकांश देशों के बीच इस तरह के भविष्य की आवश्यकता पर काफी हद तक सहमति है। और निश्चित रूप से इस प्रस्ताव पर अस्वीकृति है कि सैन्य बल देश के भविष्य को परिभाषित करने का तरीका है और एक ऐसे अफगानिस्तान के लिए मजबूत समर्थन है जो समावेशी और अपने लोगों का प्रतिनिधि बने। इसलिए मैं कहूंगा कि हम दोनों न केवल सम्पर्क में हैं, बल्कि एक साथ काम कर रहे हैं और अन्य देशों, पड़ोसी अफगानिस्तान और इस क्षेत्र में अफगानिस्तान के लिए उस तरह के भविष्य का समर्थन करने के लिए काम कर रहे हैं। मैं इस बात पर जोर देने के लिए एक और बात कहना चाहता हूं कि यद्यपि हमने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस ले ली है और नाटो व अन्य ने भी अपनी सेना वापस ले ली हैं, तब भी हम अफगानिस्तान से बहुत हद तक जुड़े हुए हैं। हमारे पास न केवल एक मजबूत दूतावास है, बल्कि महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी हैं जो सुरक्षा सहायता के माध्यम से, आर्थिक रूप से विकास सहायता के माध्यम से अफगानिस्तान का समर्थन करना जारी रखते हैं। और हम कूटनीति से जुड़े हुए हैं, संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए पार्टियों को एक साथ लाने के लिए काम करने की कूटनीति में लगे हुए हैं।

श्री अरिंदम बागची, सरकारी प्रवक्ता: धन्यवाद, महानुभाव। दूसरे प्रश्न के लिए, मिंट से एलिजाबेथ।

एलिजाबेथ: मेरा प्रश्न मंत्री जयशंकर और सचिव ब्लिंकन दोनों से है। आपकी टिप्पणियों से, ऐसा लगता है कि इंडो पैसिफिक और क्वाड पर काफी चर्चा हुई है। अब चीन इन दोनों अवधारणाओं की आलोचना करने का कोई मौका नहीं गंवाता है। आप इंडो पैसिफिक और क्वाड पर चीनी आलोचना का कैसे जवाब देंगे? क्योंकि उन्होंने इसे देशों के एशियाई नाटो गुट के रूप में वर्णित किया है, आदि। आप इसका उत्तर कैसे देंगे?

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, यू.एस. विदेश सचिव: मुझे इसकी शुरुआत करते हुए खुशी हो रही है।

डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री: और मैं आपका खंडन नहीं करूंगा।

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, अमेरिकी विदेश मंत्री: क्वाड क्या है, वास्तव में यह काफी सरल है लेकिन जितना महत्वपूर्ण है उतना ही सरल भी है। चार समान विचारधारा वाले देश, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, हमारे समय के कुछ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सामूहिक रूप से काम करने के लिए एक साथ आ रहे हैं, जिनका हमारे लोगों के जीवन पर वास्तविक प्रभाव पड़ने वाला है। और इसे इस तरह से करने के लिए कि एक स्वतंत्र और खुला इंडो पैसिफिक क्षेत्र, और उस क्षेत्र के लोगों के लिए शांति, सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित हो। इसलिए हम एक साथ जो कर रहे हैं, वह है समन्वय, हमारे संसाधनों को जमा करना, हमारी सोच को जोड़ना, और कोविड-19 का हमारे लोगों के जीवन पर हुए विभिन्न प्रकार के प्रभावों और मुद्दों पर सक्रिय रूप से सहयोग करना। और वैक्सीन पहल जो हमने कुछ महीने पहले हुई प्रथम नेताओं की बैठक में शुरू की थी, महामारी के बाद आर्थिक सुधार पर एक साथ काम करना, जलवायु संकट पर काम करना, और साथ ही साथ मुद्दों की एक पूरी श्रृंखला पर काम करना। समुद्री सुरक्षा से लेकर बुनियादी ढांचे तक सब कुछ, जो फिर से हमारे लोगों के जीवन पर सार्थक प्रभाव डालने वाला है। क्वाड एक सैन्य गठबंधन नहीं है, ऐसा नहीं है। इसका उद्देश्य फिर से क्षेत्रीय चुनौतियों पर सहयोग को आगे बढ़ाना है, अंतरराष्ट्रीय नियमों और मूल्यों को मजबूत करना जिसके बारे में हम मानते हैं कि वह इस क्षेत्र में शांति, समृद्धि और स्थिरता का आधार है। और निश्चित रूप से, हम आसियान के साथ अन्य देशों और समान विचारधारा वाले अन्य भागीदारों के सहयोग से भी ऐसा कर रहे हैं।

श्री अरिंदम बागची, सरकारी प्रवक्ता: धन्यवाद। अब मैं कमान सौंपूंगा...

डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री: इससे पहले कि आप सौंपें, मैं कुछ शब्द जोड़ दूं। देखिए, सचिव ब्लिंकन ने क्या कहा, मैं सबसे पहले इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि मैं यहां आपको एक भारतीय दृष्टिकोण दे रहा हूं। आज एक वैश्वीकृत दुनिया में, भारत के हित अपनी तत्काल सीमाओं से बहुत आगे हैं। निश्चित रूप से हमारे हित हिंद महासागर में, प्रशांत महासागर में, इंडो-पैसिफिक में हैं, वहां हमारे प्रमुख व्यापारिक भागीदार हैं, हमारे प्रमुख व्यापार मार्ग हैं, हमारे राजनीतिक साझेदार हैं, हमारे बड़े सामुदायिक हित हैं, मेरा मतलब है, आप जिस भी पैरामीटर को ले लें, यह स्पष्ट है कि इंडो-पैसिफिक में भारत की रुचि है। दूसरा यह है कि, इस अधिक जटिल दुनिया में बहुत सारी नई चुनौतियों के साथ, जब हम पुनर्संतुलन के बारे में बात करते हैं, तो इसका वास्तव में क्या मतलब है कि विभिन्न देश जिनकी क्षमताएं बढ़ी हैं या बदल गई हैं, और जो एक-दूसरे के साथ काम करने के लिए पर्याप्त जागरूक हैं, जाहिर है, ऐसा करना चाहेंगे। अब, देशों के समूहों के लिए एक साथ काम करना अजीब नहीं है, यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इतिहास रहा है, आप जानते हैं, देशों के समूह जो एक साथ काम करते थे, एक ही क्षेत्र में थे, मेरा मतलब है, आपके पास क्षेत्रीय सहयोग है, या वे कभी-कभी एक साथ काम करते हैं, तब भी जब उनके बीच हितों का टकराव हो, तो मेरा मतलब है, ब्रिक्स ऐसा ही एक उदाहरण है। इसलिए, मुझे लगता है कि लोगों को इस विचार से बाहर निकलने की जरूरत है कि, अन्य देश जो चीजें कर रहे हैं, वो उनके खिलाफ हैं। मुझे लगता है कि देश वे चीजें करते हैं, जो उनके हित में और दुनिया की भलाई के लिए होती हैं और ठीक यही बात क्वाड के मामले में भी लागू होती है।

श्री अरिंदम बागची, सरकारी प्रवक्ता: धन्यवाद महोदय। मिस्टर प्राइस, कमान अब आपके हाथों में है।

श्री नेड प्राइस: धन्यवाद। हमारा पहला सवाल एबीसी न्यूज के कॉनर फिननेगन का होगा।

कॉनर फिननेगन: आप दोनों को धन्यवाद। श्रीमान विदेश मंत्री जी के लिए, आप क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर कितने चिंतित हैं क्योंकि अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस ले ली है? और क्या आप मानते हैं कि अमेरिकी सरकार ने तालिबान के समर्थन को लेकर पाकिस्तान पर पर्याप्त दबाव बनाया है और श्रीमान सेक्रेटरी के लिए, महासचिव मार्क मिले ने पिछले सप्ताह कहा था कि तालिबान हरकत में है। राजदूत रॉस विल्सन ने कहा है कि इस बात की विश्वसनीय रिपोर्ट है कि समूह अत्याचार कर रहा है। और अमेरिका को हाल ही में इसकी कार्रवाइयों को धीमा करने के लिए और अधिक हवाई हमले करने पड़े। क्या अफगानिस्तान में चीजें गलत दिशा में जा रही हैं? धन्यवाद।

डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री: ठीक है, देखिए। यह स्वाभाविक है, मैं कहूंगा कि अपरिहार्य है, यदि संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसकी अफगानिस्तान में पिछले 20 वर्षों से मजबूत सैन्य उपस्थिति थी, वहां से वापस हो जाता है, तो उसके परिणाम होंगे। अब मुद्दा यह नहीं है कि यह अच्छा है या बुरा, जो हुआ सो हुआ। यह नीति है। और मुझे लगता है कि कूटनीति में, आपके पास जो है, आपको उससे निपटना होता है। और आज की हमारी बहुत सारी बातचीत और अफगानिस्तान के कई पड़ोसियों के साथ मेरी बातचीत ठीक उसी स्थिति को संबोधित करती है। और अब, स्थिति के बारे में कि हम क्या सोचते हैं, मुझे लगता है कि पिछले प्रश्न के साथ, सचिव और मैंने इसे बहुत स्पष्ट कर दिया था, हमें नहीं लगता कि परिणाम को युद्ध के मैदान पर बल द्वारा तय किया जाना चाहिए। हमें लगता है कि शांति वार्ता एक बातचीत होनी चाहिए और इसे शांति की ओर ले जाना चाहिए, इसे हिंसा की समाप्ति के बारे में देखना चाहिए, एक राजनीतिक समझौता होना चाहिए। इसलिए हम वहीं देख रहे हैं। और मुझे लगता है कि व्यापक सहमति है, गहरी सहमति है, अफगानिस्तान के अधिकांश पड़ोसी इससे सहमत हैं। अब हर कोई जो इससे सहमत है, जरूरी नहीं कि जो कहते हैं, वही करते भी हैं। मैंने अपवाद को नोट किया, जिसे आपने भी इंगित किया है, लेकिन मुझे लगता है कि यह एक वास्तविकता है, जो नई नहीं है। यही पिछले 20 सालों की हकीकत है।

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, अमेरिकी विदेश मंत्री: और आपका प्रश्न कॉनर, मैं कुछ बातें कहना चाहता हूं। हां, निश्चित रूप से हमने पिछले सप्ताह देखा है कि तालिबान कुछ जिला केन्द्रों पर आगे बढ़ रहा है जो प्रांतीय राजधानियों को चुनौती दे रहा है। हमने तालिबान द्वारा किए गए अत्याचारों की इन रिपोर्टों और उन क्षेत्रों को भी देखा है जिन पर कब्जा कर लिया गया है, ये बहुत परेशान करने वाले हैं, और निश्चित रूप से पूरे देश के लिए तालिबान के इरादों के बारे में अच्छी छवि नहीं दिखाते हैं। ऐसा कहते हुए, कुछ चीजें, जैसा कि मैंने उल्लेख किया है, हम अफगानिस्तान में सरकार के समर्थन में जुटे हुए हैं, और इसके लिए हम सुरक्षा बलों के साथ-साथ कूटनीति के माध्यम से संघर्ष को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने के लिए पार्टियों को सार्थक तरीके से एक साथ लाने का प्रयास करने में लगे हुए हैं। और, आखिरकार, एक अफगानिस्तान जो अपने लोगों के अधिकारों का सम्मान नहीं करता है, एक अफगानिस्तान जो अपने ही लोगों के खिलाफ अत्याचार करता है वह एक अछूत राज्य बन जाएगा। तालिबान का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहता है, कि वह अफगानिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन चाहता है; संभवत: यह चाहता है कि इसके नेता दुनिया में स्वतंत्र रूप से यात्रा करने में सक्षम हों, प्रतिबंध हटाए गए, आदि। ठीक है, देश पर बलपूर्वक कब्जा करना, और अपने लोगों के अधिकारों का दुरुपयोग करना उन उद्देश्यों को प्राप्त करने का मार्ग नहीं है। केवल एक ही रास्ता है, और वह है वार्ता की मेज पर संघर्ष को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने के लिए आना और एक ऐसे अफगानिस्तान का उदय होना जो वास्तव में समावेशी तरीके से शासित हो। और यह अपने सभी लोगों का प्रतिनिधि हो।

मिस्टर नेड प्राइस: अंतिम प्रश्न, अब हम वॉल स्ट्रीट जर्नल के कर्टनी मैकब्राइड के पास जाएंगे।

कर्टनी मैकब्राइड: धन्यवाद। प्रत्येक सज्जन के लिए प्रश्न। श्रीमान सचिव, आपने यूएस-भारत के साझा लोकतांत्रिक आदर्शों और उन्हें कायम रखने की चुनौतियों पर चर्चा की है। और जैसा कि आप जलवायु और कोविड जैसे मुद्दों पर भागीदार बनना चाहते हैं, और चीन के लिए एक लोकतांत्रिक विकल्प की पेशकश करना चाहते हैं, तो आप ऐसे मुद्दों पर भारत सरकार के पिछड़ेपन को कैसे संबोधित करते हैं? और डॉ. जयशंकर, महामारी से बाहर निकालने की इन चर्चाओं में आपने क्या प्रगति की? मेरा मतलब है, क्या आपको टीके के उत्पादन और वितरण में तेजी लाने की क्षमता में विश्वास है? और क्या आप संतुष्ट हैं कि आपके द्वारा उल्लिखित छात्रों के अलावे अन्य की भी अमेरिका तक पहुंच बढ़ाने के लिए बाइडेन प्रशासन प्रतिबद्ध है?

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, यू.एस. विदेश सचिव: मुझे इसकी शुरुआत करते हुए खुशी हो रही है। तो मैं यह कहकर शुरू करता हूं कि हमारे साझा मूल्य, हमारी साझा लोकतांत्रिक परंपराएं, उच्च आदर्श जो हम दोनों ने अपने लिए निर्धारित किए हैं, आज की बातचीत का एक हिस्सा हैं, जैसा कि वे आमतौर पर होते हैं। और मैं आपको बता दूं कि आपने मुझे आज पहले भी ऐसा कहते सुना है, मैंने इसे पहले भी कई बार कहा है, लेकिन हमारे दोनों देशों के बीच संबंध बेहद महत्वपूर्ण और मजबूत है, क्योंकि यह हम दोनों लोकतंत्र के बीच का रिश्ता है, और इसके मूल में, हमारे लोगों के बीच के संबंध हैं। और मुझे लगता है कि भारत के बारे में अमेरिकी जिन तत्वों की सबसे अधिक प्रशंसा करते हैं, उनमें से एक है लोकतंत्र, बहुलवाद, मौलिक स्वतंत्रता के मानवाधिकारों के प्रति अपने लोगों की दृढ़ प्रतिबद्धता। यह हमारे दिमाग में उन तरीकों में से एक है जिससे हम भारत को परिभाषित करते हैं और हम उसमें खुद को प्रतिबिंबित देखते हैं। और यही कारण है कि हमारे साझा मूल्य, संबंधों को मजबूत करते हैं। हमारे देश की तरह, भारत का लोकतंत्र भी अपने स्वतंत्र विचार वाले नागरिकों द्वारा संचालित है। हम इसकी सराहना करते हैं। और हम भारतीय लोकतंत्र को एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक, वास्तव में, एक स्वतंत्र और खुले विश्व की रक्षा में भलाई के लिए एक ताकत के रूप में देखते हैं। हम यह भी मानते हैं कि प्रत्येक लोकतंत्र, जिसमें हमारा भी शामिल है, लगातार बन रहा है। और जब हम इन मुद्दों पर चर्चा करते हैं, तो मैं निश्चित रूप से इसे विनम्रता के शुरुआती बिंदु से करता हूं, हमने उन चुनौतियों को देखा है जिनका सामना हमारे अपने लोकतंत्र ने अतीत में किया है और आज भी कर रहे हैं। लेकिन यह एक तरह से सभी लोकतंत्रों के लिए सामान्य बात है। मैंने पहले भी इसका उल्लेख किया था, हम अपने संस्थापक दस्तावेज़ में बात करते हैं, एक अधिक संपूर्ण संघ की खोज, जिसका अर्थ है कि हम पूर्ण नहीं हैं। और यह कि हमारी पूरी खोज उन आदर्शों के करीब और करीब पहुंचने की है, जिन्हें हमने अपने लिए निर्धारित किया है। और इसी तरह समाज प्रगति करता है। और कभी-कभी, हम ऐसे क्षणों में थे जब चुनौती दर्दनाक होती है। यह बदसूरत भी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के रूप में हम इससे खुलकर निपटते हैं। और अंत में, मुझे लगता है कि हमारे लोकतंत्र में स्व-लेखन तंत्र हैं जो विभिन्न पृष्ठभूमि, विभिन्न धर्मों, स्वतंत्र मीडिया, स्वतंत्र अदालतों के स्वतंत्र नागरिकों से बने हैं, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रणाली द्वारा संचालित हैं। यहाँ दुनिया के सबसे उल्लेखनीय लोकतांत्रिक चुनाव होते हैं। यह पृथ्वी पर कहीं भी नागरिकों द्वारा स्वतंत्र राजनीतिक इच्छा की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। मैं यह सब इसलिए कह रहा हूं क्योंकि दोस्तों के रूप में, हम इन मुद्दों के बारे में एक-दूसरे से बात करते हैं, हम उन चुनौतियों के बारे में बात करते हैं जिनका सामना हम दोनों अपने लोकतंत्रों को नवीनीकृत करने और मजबूत करने में कर रहे हैं। और मुझे लगता है, नम्रतापूर्वक हम एक-दूसरे से सीख सकते हैं। क्योंकि कोई भी लोकतंत्र, चाहे वह कितना भी बड़ा या कितना भी पुराना क्यों न हो, इससे गुजरा है। और हम इस बात का जश्न मनाते हैं कि दुनिया के सबसे पुराने और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र मूल्यों के एक साझा सेट के लिए दिल से समर्पित हैं, मुझे विश्वास है कि यह न केवल लोकतंत्र की चरम सफलता, बल्कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंधों की सफलता सुनिश्चित करेगा।

डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री: ठीक है, इससे पहले कि मैं उस प्रश्न का उत्तर दूं, जिसे आपने मुझे निर्देशित किया, मैं सचिव द्वारा कही गई बातों में कुछ शब्द जोड़ना चाहता हूं। कई मुद्दों पर हमारी अच्छी बातचीत हुई। और इस व्यापक मुद्दे पर, मुझे लगता है कि मैं इसे अपने दृष्टिकोण से जोड़ूंगा। मैंने तीन महत्वपूर्ण बिंदु रखे। पहला, एक अधिक संपूर्ण संघ की तलाश भारतीय लोकतंत्र पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी कि अमेरिकी लोकतंत्र पर, और वास्तव में, सभी लोकतंत्रों पर। नंबर दो, यह सभी राजनीतिकों का नैतिक दायित्व है कि वे वास्तव में सही गलतियाँ करें, जब वे ऐतिहासिक रूप से और पिछले कुछ वर्षों में आपके द्वारा देखे गए कई निर्णयों और नीतियों सहित, उस श्रेणी में आते हैं। और तीसरा, स्वतंत्रता महत्वपूर्ण हैं, हम सभी उन्हें महत्व देते हैं, लेकिन कभी भी स्वतंत्रता की बराबरी गैर-शासन या शासन की कमी या खराब शासन के साथ नहीं करते हैं। वे दो पूरी तरह से अलग चीजें हैं। इसलिए, हमने अच्छी बातचीत की, मुझे यकीन है कि हम उस बातचीत को जारी रखेंगे। टीके के मुद्दे के संबंध में, हां, मुझे लगता है, उस पर हमारे बीच बहुत विचार-विमर्श हुआ था। हम उस समर्थन की बहुत सराहना करते हैं जो मैं कहूंगा, वास्तव में जिस खुलेपन के साथ बाइडेन प्रशासन ने आपूर्ति श्रृंखलाओं को खुला रखा, उसने आज हमें वास्तव में वैक्सीन संख्या को बढ़ाने में सक्षम बनाया है, लेकिन वह काम भी अभी चल रहा है। इसलिए, उद्योग की प्रकृति को देखते हुए, टीकाकरण में होने वाले परिवर्तनों की प्रकृति को देखते हुए, हमें इस पर काम करते रहना होगा। लेकिन कुल मिलाकर, हाँ, हम बहुत संतुष्ट थे, यह बहुत प्रशंसनीय था। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां हमने साथ काम किया है, हम एक साथ काम करना जारी रखेंगे और मैं वास्तव में इस संबंध में सचिव के प्रयासों के लिए व्यक्तिगत रूप से उन्हें धन्यवाद दूंगा।

माननीय एंटनी जे. ब्लिंकन, अमेरिकी विदेश मंत्री: धन्यवाद।

श्री अरिंदम बागची, सरकारी प्रवक्ता: धन्यवाद। तो यहाँ यह मीडिया संवाद समाप्त होता है। आपकी उपस्थिति के लिए आप सभी का धन्यवाद। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के जाने तक कृपया बैठे रहें।

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