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4 अक्टूबर 2019 को डब्ल्यूईएफ इंडिया इकोनॉमिक समिट 2019 में विदेश मंत्री की टिप्पणियां

अक्तूबर 09, 2019

बोर्गे ब्रेंडे: गुड आफ्टरनून, महानुभावों, देवियों और सज्जनों। विश्व आर्थिक मंच तथा हमारे साझेदार सीआईआई एवं अब भारत सरकार भी, की ओर से विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर का इस बैठक में स्वागत करना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है। आने के लिए धन्यवाद और हम जानते हैं कि आप आज सुबह ही अमेरिका की महत्वपूर्ण यात्रा से लौटे हैं। मुझे यह भी पता है कि प्रधानमंत्री मोदी की पिछले सप्ताह अमेरिका में बहुत सफल यात्रा हुई थी और ह्यूस्टन में 50,000 भारतीय प्रवासियों ने उनसे और राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात की थी, हो सकता है कि मंत्री महोदय आप भी वहाँ रहे हों। क्या अब प्रधानमंत्री मोदी और आपके नेतृत्व में, आप अमेरिका और भारत के बीच विशेष संबंध की बात कहेंगे, और क्या इसमें कुछ नया है क्योंकि 70 के दशक में ऐसा रूस के साथ हुआ करता था।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: 70 का दशक बहुत पहले की बात है, फिर भी ये आपके दिमाग में है, मैंने 70 के दशक में काम करना शुरू ही किया था, इसलिए मुझे अब भी उसकी कुछ धुंधली याद बाकी है। लेकिन, देखिए, मैं यकीन के साथ नहीं कह सकता कि इसके लिए मैं किस विशेषण का प्रयोग करूंगा, पर निश्चित रूप से जिस तरह का आयोजन आपने टेक्सास में देखा, हाउडी मोदी, ऐसा कर पाने वाले देश बहुत अधिक नहीं हैं, इसलिए निश्चित रूप से यह कुछ अनूठा है लेकिन यह तथ्य कि आप अमेरिका के साथ हमारे संबंधों को कैसे देखते हैं, तो यह कितना बदल गया है, अमेरिका के साथ हमारे सम्मिलन की सीमा, कई क्षेत्रों में साझा हित, आर्थिक संबंधों का आकार, व्यापार, निवेश, अमेरिका के साथ ज्ञान संबंध, तथ्य जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था में वास्तव में उद्योगों को बढ़ाया है, समुदाय, जहाँ हम आज हैं, मुझे लगता है कि लगभग 3.5 मिलियन भारतीय अमेरिकी होंगे, शायद दो मिलियन से अधिक भारतीय वहां रह रहे होंगे। तो आप सभी को ये एक साथ रखते हैं और इतने सारे छात्र,

बोर्गे ब्रेंडे: बहुत सफल भारतीय, बड़ी कंपनियों में कई सीईओ।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: तो अगर आप इसे एक साथ रखते हैं तो मैं कहूंगा, कि कई मायनों में, यह एक बहुत ही अनोखा संबंध है और मुझे लगता है कि यह आंशिक रूप से ह्यूस्टन में दिखाई दे रहा था।

बोर्गे ब्रेंडे: कल हमारे साथ सेक्रेटरी ऑफ कॉमर्स विल्बर रॉस थे और उनकी आपके वाणिज्य मंत्री के साथ भी चर्चा हुई थी। बहुत सस्पेंस है, बहुत दिलचस्पी है, क्या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका तथा सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था भारत के बीच व्यापार सौदा होने जा रहा है, आपने क्या महसूस किया जब कल आप लोग व्हाइट हाउस में थे और नए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एवं ट्रम्प के एक अन्य सलाहकार से मिले, क्या ऐसा होने वाला है?

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: यदि आपके साथ हमारे वाणिज्य मंत्री और विल्बर रॉस थे तो मेरा जवाब भी उनके द्वारा दिए गए उत्तर के समान ही होगा क्योंकि अंततः उन्हें ही इस पर काम करना है।

बोर्गे ब्रेंडे: मुझे लगता है कि कुछ हद तक लाइत्जर भी शामिल हैं।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: हां, लेकिन एक विदेश मंत्री के रूप में मैं आपको जो बता सकता हूं, वो यह है कि एक इच्छुक दर्शक के रूप में मैं समझता हूं कि यह इतना आसान नहीं है। यह समस्याओं का एक बहुत जटिल सेट है क्योंकि आप मुद्दों को स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं जिनकी कई मायनों में दर्पण छवि नहीं होती है। इसलिए मुझे लगता है कि अगर वे थोड़ा समय ले रहे हैं तो ऐसा करने के लिए उन्हें उचित ठहराया जाएगा। आज के अखबारों में मैंने जो कुछ भी पढ़ा, उससे दोनों के सावधान और आशावादी होने की बात सामने आई, क्या यह सही होगा?

बोर्गे ब्रेंडे: मैं समझता हूँ कि मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा, हमने उनके साथ एक करीबी बैठक की थी, जिसे मैंने मॉडरेट किया, लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि अपने देश में वाणिज्य मंत्रालय में रहते हुए मैंने इससे पहले भी भारत और अमेरिका के साथ अलग से बातचीत की है।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: उनकी सहानुभूति प्राप्त की।

बोर्गे ब्रेंडे: मैं कहूंगा कि उन वार्ताओं के दौरान मूक दर्शक बने रहना ही बेहतर होगा क्योंकि आप दोनों दुनिया के सबसे अच्छी तरह से तैयार व्यापार वार्ताकार हैं।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: यही कारण है कि आपके प्रति मेरी सहानुभूति है। देखिये, गंभीरता से कहूं, तो मुझे पता है कि इस पर बहुत काम हो चुका है, मुझे पता है कि टीमें मिल रही हैं और स्पष्ट रूप से श्री गोयल ने हमारी तरफ से नेतृत्व किया है और अमेरिकी राजदूत लाइत्जर ने अमेरिकी पक्ष का। और इसमें मेरा आखिरी चेक प्रधानमंत्री ट्रम्प से मिलने से ठीक पहले था और मुझे लगता है कि बहुत से लोगों ने उन्हें इसके बारे में प्रेस से बात करते हुए सुना। तो मूड चाहे जो कुछ भी था, आपको पता है कि कल आपने जो तापमान देखा, मुझे लगता है कि यह वास्तव में नवीनतम होगा।

बोर्गे ब्रेंडे: लेकिन मुझे भी लगता है कि पूरे सम्मान के साथ, हम जानते हैं कि विदेश मंत्रालय इसके लिए बहुत प्रभावशाली है और व्यापार वार्ताकार दशकों से सिर्फ एक कृषि उत्पाद को लेकर बहस कर सकते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति है और यह इच्छाशक्ति ऊपर के क्रम में है जो कहती है कि चलो अब किसी बात पर सहमत होने की कोशिश करते हैं, यह हो सकता है और ऐसा लगता है कि अब यह दोनों देशों के बीच के रिश्ते में एक विशेष क्षण है और शायद चीन की स्थिति ने इस समझौते को और भी गति दे दी है, और जापान, क्या यह सही है?

विदेश मंत्री, डॉ एस जयशंकर: देखिए, मेरा मतलब है कि आपके पास एक बिंदु हो सकता है, लेकिन हमारे मामले में मैं जो कह सकता हूं, वह यह है कि निश्चित रूप से इस टिप्पणी में जो सम्बंधित मंत्री हैं वे वास्तव में व्यापार, वित्त, विदेशी और लाइन मंत्रालयों में से कुछ हैं क्योंकि ये सब क्षेत्रीय मंत्रालय हैं क्योंकि उनके हित उन लोगों से जुड़े हैं जो वास्तव में एक टीम के रूप में बहुत निकटता से काम करते हैं। और मुझे पता है कि यह किसी व्यापार वार्ताकार का एक कैरिकेचर है कि वे किसी एक मुद्दे पर अंतहीन बहस कर सकते हैं, लेकिन आपने कल देखा होगा कि हमारे वाणिज्य मंत्री एक बहुत ही रणनीतिक व्यक्ति हैं। इसलिए वह इसे संभालने में पूरी तरह से सक्षम है, मुझ पर विश्वास कीजिये।

बोर्गे ब्रेंडे: रणनीतिक होने की बात करें तो हमने देखा है कि आपने और आपकी सरकार ने दक्षिण एशिया को भी प्राथमिकता दी है। हमारे यहां बहुत से प्रतिभागी हैं जो नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका व मालदीव से हैं। हमने यह भी देखा कि आपने इन देशों में साझेदारी के लिए आवंटित की जाने वाली राशि को बढ़ाया है। क्या हम दक्षिण एशिया में भारत के एक बढ़े हुए कदम को देखेंगे और क्या यह इस तथ्य के कारण भी है कि इनमें से कई देश मानते हैं कि यह भारत और चीन का मिलन है?

विदेश मंत्री, डॉ एस जयशंकर:
आप जानते हैं, मुझे नहीं लगता कि यह भारत का चीन से मिलन है। मैं इसे काफी अलग तरीके से रखूंगा। जब आप दुनिया घूमते हैं तो आप भी मुझसे सहमत होंगे कि, दक्षिण एशिया, भारतीय उपमहाद्वीप वास्तव में सबसे कम क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसके विभिन्न कारण हैं। अब शुरू से ही प्रधानमंत्री को बहुत दृढ़ता से लगता है कि हमें इस बारे में कुछ करने की आवश्यकता है और हमें अपने पड़ोसियों को विश्वास दिलाना होगा कि वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था उन सभी को ऊपर उठाने वाला ज्वार है और क्योंकि हम सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़े देश हैं तो बहुत सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर है और आप देख सकते हैं कि राजनीतिक रूप से अपने पहले कदम के रूप में ही 2014 में शपथ ग्रहण के दौरान उन्होंने सभी क्षेत्रीय, पड़ोसी देशों को समारोह में आमंत्रित किया था। वो एक राजनीतिक संकेत था, लेकिन उसके बाद उन पांच वर्षों में, पहले कार्यकाल में, हमने वास्तव में उन क्षेत्रों में काम करने का वास्तव में महान प्रयास किया जिसे दूसरे क्षेत्र भी कर रहे हैं, कनेक्टिविटी बनाना, संपर्क बढ़ाना, ज्यादा से ज्यादा लोगों का प्रवाह, उनके बीच और अधिक व्यापार को प्रोत्साहित करना, और हमने ऐसा पुरानी अधिक रूढ़िवादी कूटनीति को छोड़े बिना किया। अब हम अपने पड़ोस में पारस्परिकता की बात नहीं करते हैं और आप इसे संख्या में प्रतिबिंबित होते हुए देख सकते हैं। मेरा मतलब है कि आज हमारे पास अपने सभी पड़ोसियों के लिए महत्वाकांक्षी ऋण, नरम ऋण हैं। बहुत सारी परियोजनाएं हैं जो अनुदान के तहत की जाती हैं। प्रशिक्षण की संख्या कई बार बढाई गई है। हम नए क्षेत्रों में गए हैं और यह वास्तव में कठिन है, वास्तव में आप उनकी अर्थव्यवस्थाओं, हमारी अर्थव्यवस्थाओं और दोनों के बीच में इसका प्रभाव देख सकते हैं। अगर मैं आपको इसके बारे में एक बहुत ही सामान्य उदाहरण दूं, तो आज आपके लिए अपने खुद के बंदरगाह से ज्यादा आसान पड़ोसी के बंदरगाह पर जाना है, लेकिन पुराने समय में आप ऐसा नहीं कर सकते थे। या आपके पास भारत के एक हिस्से में अतिरिक्त बिजली है, पड़ोसी देश में इसकी मांग होती है, लेकिन ऐसा कोई तरीका नहीं है जिसके द्वारा आप ट्रांसमिशन कर सकते हैं।

इसलिए आज आप यह देखते हैं कि हम वास्तव में जमीन पर काम करने की कोशिश कर रहे हैं, बिजली ट्रांसमिशन, ईंधन की आपूर्ति, सीमा सड़कों का निर्माण, कभी-कभी दूसरे देश के काफी अंदर तक निर्माण, बंदरगाहों से संपर्क, प्रभावी जलमार्ग का निर्माण, बहुत काम हुआ है, रेलवे, और यही वो दृश्य है जिसके लिए मैं कहूंगा कि शायद बांग्लादेश सबसे उन्नत होगा। हम अब नेपाल में बहुत अच्छा मार्ग बना रहे हैं, इसलिए वहां सड़क परियोजनाएँ, रेल परियोजनाएँ चल रही हैं। हमने म्यांमार को लगभग दो-तीन साल पहले बिजली की आपूर्ति शुरू कर दी है, यह अभी भी शुरुआती चरण में है। हमने श्रीलंका में बहुत सारी रेलवे लाइनें बनाई हैं। भूटान ऐतिहासिक रूप से वास्तव में विकास कार्यों के मामले में हमारा सबसे अच्छा साथी रहा है। इतना सुंदर, मैं कहूंगा, पूरे पड़ोस में बस एक को छोड़कर, क्षेत्रीय सहयोग की उत्कृष्ट गाथा है। और मुझे लगता है आप देखेंगे कि संभवतः उस स्तर को बनाए रखने का लगातार प्रयास हमारे विदेश मंत्रालय के बजट में परिलक्षित होता है। और मैं देख रहा हूँ कि यह और बढ़ता जा रहा है।

बोर्गे ब्रेंडे: इस माइनस एक का उल्लेख करने के लिए धन्यवाद, क्योंकि इससे मुझे भी इस पर बात करने का मौका मिला, हो सकता है, इस कमरे के कुछ लोग कहेंगे कि यह ऐसी समस्या है जिसे जानते सब हैं लेकिन जिसपर बात कोई भी नहीं करना चाहता है। जब आप अमेरिका में थे तो क्या वहां आपकी कोई बैठक ऐसी थी जिसमें कश्मीर मुद्दा नहीं आया था?

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: हां, मेरे पास वास्तव में आया था। कुछ ऐसे भी थे जिनमें यह मुद्दा नहीं आया और मेरी व्यावसायिक बैठकों में ये नहीं आया, यहाँ तक कि कुछ अन्य नीतिगत बैठकों में भी नहीं आया क्योंकि मुझे लगता है कि लोग हमारी स्थिति जानते थे लेकिन फिर भी कुछ अवसरों पर सामने आया। लेकिन आपको मालूम है कि यह स्वाभाविक है क्योंकि कई लोगों के लिए यथास्थिति में बदलाव होता है, एक परिवर्तन होता है और जब परिवर्तन होता है तो इसमें स्वाभाविक रूप से कोई हित होता है।

बोर्गे ब्रेंडे: आगे देखते हुए क्या आप कहेंगे कि माइनस वन एक स्थायी गतिरोध है?

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: नहीं, मैं नहीं कहूँगा। मैं नहीं कहूँगा क्योंकि तब मैं एक राजनयिक की दृष्टि से यह स्वीकार कर लूँगा कि कुछ चीजें संभव नहीं है, कि कूटनीति की अपनी सीमाएं हैं और मैं इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

बोर्गे ब्रेंडे: आप जानते हैं कि सोवियत संघ हमेशा के लिए था जब तक कि वो कुछ नहीं था।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर:
देखिए, मैं आशा करता हूं कि निश्चित रूप से एक दिन माइनस वन भी हमारे साथ आएगा क्योंकि आप एक पल के लिए कश्मीर को अलग रख देते हैं तो मैं उस पर आ जाता हूं। आज अगर हर किसी के साथ व्यापार में वृद्धि हो रही है, संपर्क बढ़ रहे हैं, व्यापार बढ़ रहा है, कनेक्टिविटी बढ़ रही है, मेरा मतलब है कि निश्चित रूप से किसी न किसी स्तर पर इसका प्रभाव पड़ेगा क्योंकि आप हर किसी को उस सहयोग और संपर्क से समृद्ध होते देखते हैं। इसलिए मैं हमेशा आशान्वित रहता हूं, मैं अवास्तविक नहीं हूं कि मुझे पता है कि हमारे पास बड़ी चुनौतियां हैं, कि उनके साथ मानसिकता का मुद्दा है जिसे उन्हें दूर करना होगा, लेकिन अब कश्मीर पर आपके सवाल पर वापस जाना होगा।

देखिए, मुझे लगता है कि जब मैं अमेरिका में था तब मैंने काफी विस्तार से बात की थी और कई मामलों में जब मैं उन्हें पृष्ठभूमि के बारे में बताने लगा, इतिहास, क्या हुआ, हमने क्या किया और क्यों किया तो ये सब उनके लिए नया था। उदाहरण के लिए क्योंकि ज्यादातर उन्होंने अपने स्वयं के प्रेस को ही पढ़ा है, तो शायद ही किसी को वास्तव में यह मालूम था कि यह संविधान का एक अस्थायी अनुच्छेद था या यह तथ्य कि ऐसी अव्यवस्था थी कि हमारे बहुत से राष्ट्रीय कानून जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं होते थे। तो ये सब उनके लिए नई चीजें हैं क्योंकि आम तौर पर प्रेस आपको बहुत ही काला-सफेद चित्र दिखाता है। ज्यादातर मुद्दों पर यह आपको एक ऐसी तस्वीर देता है जो लोगों की पूर्व धारणाओं से मेल खाती है। प्रेस आपके बिना नहीं है, यह किसी तरह से कहानी को आकार देना पसंद करता है, इसलिए मुझे लगता है कि इसके बारे में बहुत खुले तरीके से बात करना और लोगों को यह बताना जरूरी था कि हमारा दृष्टिकोण क्या था। मुझे लगता है कि कई मामलों में मैंने लोगों को इसे समझते हुए देखा है और उम्मीद है कि वे इससे सहमत होंगे।

बोर्गे ब्रेंडे: धन्यवाद मंत्री महोदय। दुनिया को बस और अधिक स्थूल परिप्रेक्ष्य में देखते हुए, हम शीत युद्ध के बाद की स्थिति से थोड़ा सरल हो गए हैं, कुछ लोग इसे गर्म शांति कह सकते हैं। दुनिया भर में बहुत संघर्ष है और ऐसे समय में हम एक बहु ध्रुवीय दुनिया में भी हैं, कम से कम इसका निर्माण तो शुरू हो गया है। कुछ लोग कहेंगे कि हमारे पास G2 है, लेकिन मुझे लगता है कि यहाँ भी कई तर्क हैं क्योंकि अब बहुत सारे खिलाड़ी हैं। बहुपक्षीय प्रक्रियाओं के आसपास भी गति पहले से कम है। डब्ल्यूटीओ वास्तविक चुनौतियों और ब्रेटन वुड संस्थान का सामना कर रहा है। क्या भारत इस बहु ध्रुवीय बहु वैचारिक दुनिया में, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, 1.2 बिलियन लोग, 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद है, शायद 2030 तक 10 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था। इसलिए भारत का प्रभाव बढ़ रहा है। क्या भारत इससे भी आगे बढ़ेगा, हम इस क्षेत्र की विदेश और सुरक्षा नीति पर भी भारत का बड़ा पदचिह्न देखेंगे? 70 और 80 के दशक में भारत कई मायनों में गुटनिरपेक्ष दुनिया का नेता था। आज यह एक नई वास्तविकता है तो भारत खुद को कहां रखेगा और इस बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की ओर से किस तरह की राजनीतिक पहल देखने को मिलेगी?

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: ठीक है, सवाल बहुत सारे हैं। इसलिए सामूहिक उत्तर देने के लिए मुझे कुछ तीखे बिंदु तय करने दें। पहला, इसमें कोई सवाल नहीं है कि दुनिया अतीत की तुलना में अधिक राष्ट्रवादी है और बहुत से राष्ट्रवाद आर्थिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हैं। दूसरा, मैं कहूंगा कि जहां तक भारत का संबंध है, हम, एक तरह से अलग खड़े हैं, हम एक अपवाद हैं। हम एक अपवाद हैं क्योंकि इस देश में आप कह सकते हैं कि हाँ, हम अधिक राष्ट्रवादी हैं, लेकिन साथ ही साथ हम राष्ट्रवादी होने और दुनिया के साथ अधिक व्यवहार करने तथा दुनिया के साथ और अधिक जुड़ने के अर्थ में अंतर्राष्ट्रीय होने के बीच तनाव नहीं देखते हैं। इसलिए राष्ट्रवाद दुनिया में एक तरह की नकारात्मक भावना नहीं है। वास्तव में लोग आमतौर पर महसूस करते हैं कि अगर आप ऊपर जा रहे हैं तो आपको दुनिया के साथ और चीजें करनी चाहिए न कि कम चीजें।

तीसरा, एक अधिक बहुल ध्रुवीय विश्व में, आपका शब्द, राष्ट्रवादी, मेरा शब्द, दुनिया मुझे लगता है कि हम कूटनीति को अलग-अलग रूप में देखेंगे जहां काम करने के पुराने तरीके अब दूर नहीं होंगे लेकिन मैं कहूँगा कि बहुत अधिक रचनात्मक, अभिनव, तदर्थ तरह की कार्य प्रणाली अक्सर बोर्ड के बजाय मुद्दों के आसपास केंद्रित होती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति का चरित्र शायद कई मायनों में बदल जाएगा।

चार, मैं आपसे सहमत हूं, मुझे लगता है कि बहुत से बहुपक्षीय शासन तनाव में आ जाएंगे। वे कैसे जीवित रहते हैं, इस बात पर निर्भर करेगा कि वे उस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं। वे इस राष्ट्रवाद के कारण आंशिक रूप से तनाव में आ जाएंगे, जिसके बारे में मैंने बात की थी। कुछ हद तक उनमें से कई की आलोचना इस आधार पर की जा रही है कि वे कितनी अच्छी तरह काम करते हैं या काम नहीं करते हैं, इसलिए बहुपक्षीय शासन पर एक तरह का प्रदर्शन ऑडिट भी चल रहा है। कभी-कभी यह बहुत अनुचित दिशा ले सकता है क्योंकि यदि आपका प्रदर्शन ऑडिट आत्म-केंद्रित राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के साथ होता है तो मैं यकीन से नहीं कह सकता कि मैं उस ऑडिट के निष्कर्ष से सहमत होऊंगा। लेकिन निश्चित रूप से वह भी एक कारक है। तो कुल मिलाकर मैं कहूँगा कि एक और अधिक जटिल दुनिया, निश्चित रूप से ज्यादा दिलचस्प, और संभवतः ज्यादा कठिन, लेकिन जहां तक भारत का संबंध है, तो आपने G2 की बात भी कही है। आप जानते हैं कि ये कुछ ऐसा है जिसे हमने कभी स्वीकार नहीं किया है, हम कभी भी इसमें सहज नहीं रहे हैं।

मुझे लगता है कि आंशिक रूप से हमें दूसरे देशों से अलग पहचान इसलिए भी मिलेगी, क्योंकि हम अभी भी दक्षिण के देशों के साथ बहुत मजबूत संबंध रखते हैं और कई वार्ताओं में जिन्हें आपने व्यापार मंत्री के रूप में भी देखा होगा, हम न केवल अपने हित के लिए खड़े हुए हैं बल्कि बहुत हद तक हम विकासशील दुनिया के सामूहिक हितों के लिए भी आवाज उठाते हैं, उदाहरण के लिए G77। निश्चित रूप से जब व्यापार की बात आती है या जब जलवायु परिवर्तन की बात आती है। इसलिए मुझे लगता है कि यह भी हमारे लिए एक निर्वाचन क्षेत्र ही है।

अब जब आप यह सब देखते हैं तो एक तरफ आप कहते हैं कि ठीक है, ये सब अधिक कठिन है, शायद सच भी है, लेकिन दूसरी ओर आप यह भी कह सकते हैं कि आज हम एक बहुत ही अनोखी स्थिति में हैं, एक बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में, एक लोकतंत्र के रूप में, सामाजिक रूप से बहुलतावादी के रूप में, पश्चिम के साथ हम सहज हैं। एशियाई होने के नाते, एशिया के उदय का एक हिस्सा होने के नाते एशियाई देशों के साथ इस पुनर्संतुलन में हम सहज हैं। G77 निर्वाचन क्षेत्र होने के नाते, अफ्रीका और एशिया के देशों के साथ काम करते हुए, हमारा उन देशों के साथ अधिक मजबूत संबंध है। इसलिए मुझे लगता है कि हम सही चौराहे पर हो सकते हैं, इसके लिए सक्रिय कूटनीति की आवश्यकता है कि ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों को एक साथ लाया जाना सुनिश्चित हो सके। यही सरकार की मंशा है।

बोर्गे ब्रेंडे:
तो

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: तो आपने क्या देखा, निश्चित रूप से पिछले पाँच वर्षों में, और हाल ही में यूएन में जो आपने देखा, वह देशों को जोड़ने की इच्छा है, अधिक देशों का दौरा करना है और इसलिए आज विदेशी मामलों में नई ऊर्जा आप देख सकते हैं।

बोर्गे ब्रेंडे: हमने देखा है कि आपका एजेंडा बहुत व्यस्त है। ट्विटर पर आपका अनुसरण करते हुए, हम देख सकते हैं कि आप केवल अपने ट्विटर अकाउंट को पढ़ते-पढ़ते थक सकते हैं। और एशिया के बारे में भी जो आपने कहा, कम से कम 1850 के बाद से यह पहला वर्ष है जब एशिया वैश्विक जीडीपी का 50 प्रतिशत है। मुझे लगता है कि एक बात निश्चित है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का प्रभाव और आकार आने वाले वर्षों में बढ़ने वाला है। हम भारत की तरफ से बेल्ट एंड रोड जैसी पहल कब देखेंगे या फिर क्या यह आपकी रूचि का नहीं है? क्या आप बेल्ट एंड रोड पहल में शामिल होंगे या नहीं? तीसरा प्रश्न भी इसी ओर से, आप जानते हैं कि पारंपरिक रूप से सुपर शक्तियां, लेकिन आज मैं कहूंगा, चीन दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, अमेरिका भी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में इस दृष्टिकोण से है कि वे इस बात पर बहुत बारीकी से नजर रख रहे हैं कि उनके पीछे क्या हो रहा है। बेशक अब कोई मोनरो डॉक्ट्रिन नहीं है लेकिन मोनरो डॉक्ट्रिन की यह धारणा अब भी बाकी है। क्या भारत उन चीजों को छोड़ देगा जो उसके पीछे होती हैं खासकर जब बात सैन्य प्रतिष्ठान और अन्य की आती है तो, या यदि आप उस पर विस्तार से बात करें तो वो भी काफी दिलचस्प होगा।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: ठीक है, मुझे पीछे कुछ काम करने दीजिए।

बोर्गे ब्रेंडे: मुझे खुशी है कि आप सबसे अंतिम के साथ शुरू कर रहे हैं।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: दुनिया एक प्रतिस्पर्धी स्थान है, ठीक है। इसलिए हम सभी की प्राथमिकताएँ हो सकती हैं लेकिन आप जानते हैं कि दुनिया पदवियों से नहीं चलती है, दुनिया क्षमताओं से चलती है, प्रभाव और, हितों से चलती है। इसलिए मुझे बहुत उम्मीद है कि हमारे पास प्रभावित करने और प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता है जो हमारे हितों को सुरक्षित करेगा। अब हम पूरी तरह से स्पष्ट हैं कि हमारे हित क्या हैं, आपने इसे बहुत कूटनीतिक तरीके से रखा है, मैं आपको बधाई देता हूं। लेकिन तथ्य यह है कि हम निश्चित रूप से हमारी प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता, हमारे हितों को सुरक्षित करने और आगे बढ़ाने की हमारी क्षमता, अन्य देशों को प्रभावित करने की हमारी क्षमता को सुनिश्चित करेंगे क्योंकि ये सब अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के बारे में है।

इसलिए मैं निश्चित रूप से आशा करूंगा कि यह तीखा बना रहे, प्रभावी बना रहे और इस अभ्यास में सामान्य रूप से अगर कोई उपकेंद्र है तो वो आप स्वयं हैं और आप कितने अच्छे हैं यह दूरी का सिद्धांत है। इसलिए आप अपने सबसे नजदीकी पड़ोस से शुरुआत करते हैं, यदि आप अपने पड़ोस को प्रभावित नहीं कर सकते हैं तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि आप दूर वालों को प्रभावित कर पाएंगे। तो मेरे लिए यह आपके हितों के पहले चक्र की तरह है।

आपके बेल्ट और रोड के मुद्दे के बारे में, आप जानते हैं कि उसे लेकर हमारी एक स्थायी सोच है। हमारे लिए यह संप्रभुता के मामलों से जुड़ा हुआ है, जिसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। लेकिन क्या हम ऐसा करने का विचार करते हैं, देखिये, हम हम हैं, हम कोई दूसरे देश नहीं हैं और मुझे लगता है कि यह सिर्फ इस पहल पर केन्द्रित नहीं है, मुझे लगता है कि कई अन्य क्षेत्रों में है, मेरा खुद का मानना है कि भारत बड़ा हो गया है, तथ्य यह है कि हम यह पाएंगे कि अन्य देशों के लिए विकसित की जाने वाली अवधारणाएं और विश्लेषण जरूरी नहीं कि हमारे लिए भी लागू हों और यह अपेक्षा कि हम उन मॉडलों की नकल करेंगे जो प्रकृति में बहुत भिन्न हैं, मुझे नहीं लगता कि इसकी बहुत संभावना है। क्योंकि हम अपने पड़ोस में भी बहुत सी चीजें करते हैं, जिनमें से कुछ आपको आश्चर्यचकित कर सकते हैं, जिनका स्तर, यह नहीं है, मेरा मतलब है कि अगर आप देखते हैं यह भारत के भीतर है, और जिस तरीके से किया गया है वह बहुत अधिक अलग है, बहुत अधिक जैविक है।

उदाहरण के लिए कनेक्टिविटी को लेकर, यह कहने के बजाय कि हमारे पास एक शानदार पहल है, हम कहेंगे कि ठीक है, हमारे पास वास्तव में एक विकास साझेदारी है, यही हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था जब वो पिछले साल अफ्रीका गए थे जहां उन्होंने कहा था, हम तैयार हैं, अफ्रीका में बहुत अधिक काम करने के लिए, लेकिन हम जानना चाहते हैं कि आप क्या चाहते हैं, हम आपकी प्राथमिकता जानना चाहते हैं और हम चाहेंगे कि आप इसमें भाग लें, हम चाहते हैं कि एक बार हम इसे स्थापित कर दें तो फिर इसका संचालन आप स्वयं करें।

इसलिए मुझे लगता है कि हमारे काम करने के तरीके बहुत अलग हैं, इसलिए हो सकता है कि उसका बहुत दिखावा न हो, लेकिन मैं कई तरीकों से सोचता हूं, मेरा मतलब है कि अगर आप कुछ देशों में जाते हैं, उदाहरण के लिए आप अफगानिस्तान जाते हैं, तो भले ही उसकी कहानी हमेशा सुर्खियों में नहीं आती, लेकिन मैं विश्वास के साथ कहूंगा कि शायद ज्यादातर अफगानी ये जानते हैं कि दूसरे देशों की तुलना में भारत ने विकास के लिए क्या किया है।

बोर्गे ब्रेंडे: तो अंतिम प्रणाली से कूटनीति का एक नरम रूप?

विदेश मंत्री, डॉ एस जयशंकर:
हां, मैं कहना चाहूंगा कि नरम, अधिक सहयोगी, अधिक सह-स्वामित्व वाला। देखिये, मेरा मतलब है, ये हम हैं, ठीक है। अन्य देश कानूनी रूप से भिन्न हो सकते हैं। मैं कहूंगा कि अगर आप कुछ कर रहे हैं तो मैं इसे साझेदारी की भावना से करूंगा, बजाय इसके कि अन्य लोगों को लगता है कि यह सब मेरा है। इसमें बने रहने की संभावना है, इसमें मुझे उस तरह के रिटर्न पाने की संभावना है जो मैं वास्तव में चाहता हूं।

बोर्गे ब्रेंडे: हम इतिहास से यह भी जानते हैं कि महाशक्तियों को इस क्षेत्र में संघर्ष से निपटने के लिए चुनौती दी जाएगी। क्या हम उदाहरण के लिए भारत को भी देख सकते हैं कि इस क्षेत्र के कुछ संघर्षों में मध्यस्थ बनने की कोशिश की जा सकती है, उदाहरण के लिए समुद्र

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: यह एक बहुत ही नॉर्वेजियन सवाल है।

बोर्गे ब्रेंडे: नॉर्वे कभी भी महाशक्ति नहीं रहा है।

विदेश मंत्री, डॉ एस जयशंकर: लेकिन यह मध्यस्थता के लिए नहीं रुकता है।

बोर्गे ब्रेंडे: जब मैं विदेश मंत्री था तब मैं कहा करता था कि दुनिया का एकमात्र संगठन जहां नॉर्वे एक महाशक्ति है, ईएफटीए है और ईएफटीए स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टीन और आइसलैंड के साथ एक मुक्त व्यापार संगठन है और हम भारत के साथ एक व्यापार सौदा स्थापित करने का प्रयास करते हैं। लेकिन इस उदाहरण के लिए, हम म्यांमार और बांग्लादेश के बीच रोहिंग्याओं की स्थिति को जानते हैं, क्या ऐसा कुछ हो सकता है जिसमें भारत एक मध्यस्थ हो सकता है, ये एक बड़ा सवाल है, पर मुझे लगता है कि हम सभी खाड़ी में स्थिति के बारे में चिंतित हैं, और ईरान के साथ, जो कि आगे बढ़ रहा है, पिछले सप्ताह थोड़ा अधिक शांत रहा है क्योंकि मीडिया में अन्य चीजें छाई रही हैं लेकिन मुझे नहीं लगता कि इससे संबंधित संरचनात्मक चुनौतियों से निपटा गया है या क्या यह कभी आपकी योजना में रहा है?

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: नहीं, मेरा मतलब है कि अगर मैं इतिहास में पीछे मुड़कर देखता हूं तो कई बार हम ऐसा कर चुके हैं। हमने शुरुआती दौर में ईरान-इराक युद्ध में थोड़ी दिलचस्पी ली, हमने श्रीलंका में सफल मध्यस्थता नहीं की।

बोर्गे ब्रेंडे: मेरे विचार से यह नॉर्वेजियन लोगों जितना बुरा नहीं है।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर:
नहीं, वास्तव में हमारा बुरा बीता। इसलिए बिना अतीत के कुछ भी पूरा नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि भारतीय तरीका बहुत अलग होगा, अगर आपके पास इस बारे में बात करने के लिए संबंध हैं, बातचीत है, तो अपने आप को एक मध्यस्थ घोषित नहीं करना चाहिए और इस तरह का स्पेस और प्रोफाइल नहीं बनाना चाहिये। मुझे नहीं लगता कि यह वास्तव में हमारी शैली है। मैं कहूंगा, व्यक्तिगत रूप से, मैं हमारे जैसे अन्य देशों के लिए यकीन के साथ नहीं कह सकता, लेकिन मैं कहूँगा कि यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे मैं बहुत लाभप्रद देखता हूं।

लेकिन आपके द्वारा उठाए गए कुछ उदाहरणों के बारे में, जैसे कि आपने म्यांमार बांग्लादेश के बारे में कहा, तो अब दोनों के साथ हमारे उत्कृष्ट संबंध हैं। हमने वास्तव में बनाया है, मेरा मतलब है कि हम वास्तव में समस्याओं के बाद राखीन राज्य में परियोजना को पूरा करने वाले पहले देश हैं। हमने एक हाउसिंग प्रोजेक्ट किया है और हम उम्मीद कर रहे हैं कि लोगों के पहले सेट को वापस भेजना केन्द्रीय बात होगी। इसलिए हमारे वहां संबंध हैं, हमारे बांग्लादेश के साथ संबंध हैं, निश्चित रूप से, उत्कृष्ट, सबसे अच्छे हैं। तो ऐसा नहीं है कि हम दूर रह रहे हैं या हम हैं, बल्कि मुझे लगता है कि हम इसे आपके तरीके से अलग तरीके से कर रहे हैं।

बोर्गे ब्रेंडे: मुझे लगता है कि देश जितना बड़ा होता जा रहा है, उतनी ही ज्यादा प्रेरणा देने की ताकत आपको मिलती जा रही है, और मुझे लगता है कि बांग्लादेश में आप सबसे बड़े एफडीआई निवेशक हैं और म्यांमार में दूसरे नंबर पर, मुझे लगता है कि चीनी वहां आपसे ज्यादा बड़े हैं। लेकिन लौटते हैं, कनेक्टिविटी और टेक्नोलॉजी के बारे में आपने जो बताया है। जब आप थे, तो मुझे पता नहीं है कि क्या आपने भी इसे उसी तरह महसूस किया था, मैं पिछले हफ्ते वहां था और इस व्यापार युद्ध धारणा के पीछे, प्रौद्योगिकियों के बारे में भी बहुत कुछ बताया गया। नई तकनीकों में कौन सबसे ऊपर रहने वाला है और मुझे लगता है कि इन दिनों कई देशों में स्पुतनिक क्षण हैं और कई देश यह देख रहे हैं कि वे देश जो नई तकनीकों और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर हैं, उनमें विजेता की प्रवृत्ति है और यह सबसे प्रभावशाली के हित में भी होगा। पिछले साल इस समय मैं यहाँ था और प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम का केंद्र खोला, जो मुंबई में है, लेकिन जिस तकनीकी पक्ष को आप देखते हैं, प्रौद्योगिकियों को भी मैं विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में जानता हूं। और आप इसे एक अंतर्निहित कारक के रूप में अधिक से अधिक देखते हैं।

विदेश मंत्री, डॉ एस जयशंकर: ठीक है, यदि आप वैश्विक परिदृश्य को देखें, तो हाँ, स्पूतनिक शब्द का उपयोग किया जाता है, लेकिन याद रखें कि स्पूतनिक क्षण वास्तव में गैर-स्पूतनिक देशों के लिए था। यह वास्तव में अमेरिका था जो स्पूतनिक को लेकर इस तरह प्रतिक्रिया कर रहा था जैसे कि स्पुतनिक को भेजने वाले देश का अच्छा नहीं हुआ हो। तो स्पष्ट रूप से आज की राजनीतिक प्रतियोगिता, रणनीतिक प्रतियोगिता भी खुद को एक प्रौद्योगिकी प्रतियोगिता के रूप में व्यक्त कर रही है, यदि आप करते हैं। इसलिए जब मेरा मतलब है कि जैसा मैंने कहा, अगर प्रतियोगिता प्राकृतिक है तो बेशक यह विचार भी प्राकृतिक होगा, यह बाधित नहीं है, कहीं न कहीं इसका शुद्ध परिणाम सकारात्मक है। अगर यह लोगों को अधिक विकल्प देता है तो यह वास्तव में सभी के लिए अच्छा है।

इस लिहाज से यह थोड़ा बहुत राजनीति की तरह है, मेरा मतलब है कि हम एक ध्रुवीय दुनिया को पसंद करेंगे क्योंकि यह आपको अधिक विकल्प देता है। इसलिए यदि आपके पास एक बहुध्रुवीय तकनीकी दुनिया है तो वो भी आपको अधिक विकल्प प्रदान करती है। लेकिन इस मुद्दे पर कि हम कहां हैं, तो यह बहुत स्पष्ट है कि हमें उस दिशा में नीचे जाना है और यदि आप देखें तो हम उन देशों में से एक हैं जहां वास्तव में हमारे, मेरा मतलब है कि हर देश के लिए उसकी संपत्ति उसके लोग हैं लेकिन कई देशों में अन्य संपत्ति भी हैं। जैसा कि आप नॉर्वे में जानते हैं, लेकिन हम वास्तव में पूरी तरह से, हमारा भविष्य पूरी तरह से मानव संसाधन पर निर्भर है।

तो मेरे दिमाग में, अपने एचआर की गुणवत्ता में सुधार करके और अपने लोगों को एक अलग दुनिया के लिए तैयार करके भविष्य के लिए खुद को तैयार करना होगा। और इसे शुरू करते हैं मूल बातों से, मेरा मतलब है कि यह वास्तव में प्राथमिक स्वास्थ्य और साक्षरता से शुरू होता है और आप तक शिक्षा को जानने के लिए, स्किलिंग, डिजिटलीकरण, रोजगार के लिए, मेरा मतलब है कि वास्तव में हम सभी की गुणवत्ता में सुधार का हिस्सा है मानव संसाधन। और मेरे दिमाग में वह एक क्षेत्र है जहां हम पिछड़ गए थे और मैं निश्चित रूप से देखूंगा कि वास्तव में यह इस सरकार की मुख्य प्राथमिकता है। यदि आप उनके द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यक्रमों को समग्रता से देखते हैं, तो एक एकल धागा है जो उन्हें जोड़ता है और वह एकल धागा वास्तव में इस देश के मानव संसाधनों की गुणवत्ता में सुधार करने का है।

बोर्गे ब्रेंडे: ठीक है, मैं बहुत सहमत हूं। मुझे लगता है कि यह अपस्किलिंग, री-स्किलिंग, देश में मानव पूंजी का निर्माण बहुत महत्वपूर्ण है। सभी प्रतिभागियों की ओर से, मुझे और सभी को लगता है कि भारत को ऐसे दूरदृष्टि वाले विदेश मंत्री का प्राप्त होना सौभाग्य की बात है। अंत में क्योंकि हम जानते हैं कि मैं अगले सत्र के लिए मैदान तैयार कर रहा हूँ, मुझे लगता है कि आपने मानव पूंजी निर्माण के बारे में आंशिक उत्तर दिया है, लेकिन मुझे लगता है कि आप विदेश सेवा से आने वाले दूसरे मंत्री हैं, आपके पास कई वर्षों तक पूर्व स्थायी सचिव और सिविल सेवक तथा राजदूत के रूप में विदेश नीति और सुरक्षा नीति पर एक विशाल अनुभव है, तो आप क्या देखते हैं कि मंत्रालय और भारत में किस तरह के पदचिह्न छोड़ना चाहते हैं? आप हमारे साथ केवल एक या दो मिनट में कुछ साझा कर सकें तो अंत में यह सराहनीय होगा।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: देखिए, मैं अभी आया ही हूं, मेरा मतलब है कि आप मुझसे पूछ रहे हैं कि जब मैं जाऊंगा तो क्या होगा। मुझे लगता है कि आपको मुझे सोचने के लिए कुछ साल देना चाहिए।

बोर्गे ब्रेंडे: मुझे लगता है कि आपने कुछ छाप छोड़े हैं।

विदेश मंत्री, डॉ. एस जयशंकर: नहीं, लेकिन गंभीरता से मेरा अभिप्राय है, मैं निश्चित रूप से भारतीय विदेश नीति को एक बड़ा पदचिह्न स्थापित करते हुए देखना चाहता हूं, वैश्विक मुद्दों के परिणामों को निर्धारित करने में बहुत अधिक प्रभावशाली, स्पष्ट रूप से हमारे हितों और हमारी तत्काल परिधि और उससे परे प्रभावों को देखना चाहता हूँ। लेकिन अंत में मैं इस बात को लेकर बहुत सचेत हूं कि हम एक ऐसे देश के लिए विदेश नीति तैयार कर रहे हैं, जो एक दशक के भीतर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी, जो सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा और जो अपने साथ अतीत का बहुत सारा बोझ लेकर चल रहा है, इस अर्थ में कि आप जानते हैं कि 1945 की शुरुआत में हम बहुत से अवसरों से चूक गए थे, जब वैश्विक क्रम तैयार हो रहा था। तो आप उन सभी चीजों के लिए कैसे तैयार होते हैं, जो आपने खो दी थीं और फिर भी उन सभी चीजों की तैयारी करते हैं जो आपका इंतजार करती हैं। तो इसके लिए बहुत सारी सोच, बहुत सारी कल्पना और बहुत सारी ऊर्जा की आवश्यकता होगी और मैंने कम से कम इसके लिए एक लॉन्चिंग पैड तैयार करने की कोशिश की है।

बोर्गे ब्रेंडे: बहुत-बहुत धन्यवाद।

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