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4 वें वैश्विक प्रौद्योगिकी शिखर सम्मेलन में विदेश मंत्री का संबोधन

दिसम्बर 08, 2019

चौथे वैश्विक प्रौद्योगिकी शिखर सम्मेलन के अवसर पर आप सभी से बात करते हुए मुझे खुशी हो रही है। विदेश मंत्रालय इस संबंध में कुछ वर्षों से कार्नेगी एंडोमेंट में सहयोग देता रहा है। और ये हमारा सौभाग्य है कि एक बार फिर हमें आपके साथ काम करने का अवसर मिला है। इस वर्ष, सम्मेलन का विषय है ‘डेटा का भविष्य’ और मेरा मानना ​​है कि इस समय इससे ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य विषय नहीं होगा। विदेश मंत्री होने के नाते जो देश की विदेश नीति को डिजिटल युग की ओर ले जा रहा हो, मुझे लगता है कि न केवल पेशेवर राजनयिकों बल्कि विश्लेषकों और कई मायनों में बड़े समुदाय, प्रौद्योगिकी समुदाय को प्रौद्योगिकी द्वारा प्रस्तुत इन चुनौतियां को बहुत गंभीरता से संबोधित करना है। जाहिर है, विदेश नीति के नजरिए से, डिजिटल युग का मतलब संचार की एक अलग विधि है और कई मायनों में, जहां तक विदेश नीति का सवाल है, हमारी एनालॉग विदेश नीति की तुलना में शायद डिजिटल युग का एजेंडा भी बहुत अलग है। मेरा मतलब है कि स्पष्ट रूप से डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग विकास के लिए किया जा सकता है, हम ऐसा होते हुए देख सकते हैं। यह समाज में हो रहा है, इस तथ्य को देखते हुए कि कितने सारे लोग इस तरह के कार्यक्रम में आए हैं, ये अपने आप में ही एक बदलाव है। हमारे अपने देश में बेंगलुरु उस बदलाव का प्रतीक है। बेंगलुरु वास्तव में कई मायनों में एक डिजिटल शहर है। लेकिन डिजिटल साधन और डिजिटल प्रथाएं भी शासन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ये विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण होती है जब बहुत तेजी से विकास करना हो। यह एक ऐसे देश, एक ऐसे समाज के लिए भी बहुत उपयोगी है, जिसके संसाधन सीमित हैं और इसलिए उन संसाधनों का अनुकूलन करना है, मुझे लगता है कि डिजिटल साधन की मदद से ऐसा करना सबसे अच्छा है। अब इसके कुछ परिणाम भी हैं और जाहिर है कि इसका परिणाम वो है जो हम अपने आस-पास देखते हैं, जो मानव संसाधनों पर बढ़ता जोर है। यह तथ्य कि आज हम एक ज्ञान संचालित अर्थव्यवस्था की बात कर रहे हैं; कई मायनों में, एक ज्ञान संचालित समाज, ज्ञान संचालित राजनीति, और मैं कहता हूं कि ज्ञान संचालित विदेश नीति की भी बात करते हैं। लेकिन, विदेश नीति के दृष्टिकोण से हमारे सामने क्या-क्या चुनौतियां हैं?

इसका एक हिस्सा, ज़ाहिर है, डेटा गोपनीयता से संबंधित मुद्दे हैं; और इसके लिए दुनिया की सबसे अच्छी प्रथाएँ क्या हैं और हम इस विषय में अपने नियम और कानून बनाने के लिए विभिन्न तरीकों से कैसे योगदान करते हैं। डेटा सुरक्षा को लेकर स्वाभाविक रूप से चिंताएं हैं। मुझे लगता है कि आज जब हम राष्ट्रीय सुरक्षा की बात करते हैं, तो डेटा सुरक्षा भी राष्ट्रीय सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक और बहुत ही स्वाभाविक परिणाम, ज़ाहिर है, डेटा का व्यावसायीकरण, डेटा का मुद्रीकरण है। और यह तथ्य कि जब हम व्यापार की बात करते हैं, तो हम निवेश की भी बात करते हैं, हम प्रौद्योगिकी साझेदारी की बात करते हैं, ऐसी बहुत सी चीजें डेटा के इर्द-गिर्द घूमती हैं। और जो देश इनका सबसे अच्छा उपयोग करता है, कई मायनों में वो वास्तव में अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में सबसे शक्तिशाली आर्थिक खिलाड़ी होगा। इसलिए, अगर हम डेटा की बात करें तो कहा जाता है कि डेटा एक नया तेल है, लेकिन मैं कहूंगा कि कई मायनों में डेटा वास्तव में एक नया प्रभाव है। और इस पर बड़ी बहस होंगी और मुझे लगता है कि विदेशी नीतियों के अन्य पहलुओं की तरह इस पर भी बड़ी बहस होगी। जो देश पहले से ही नेतृत्व कर रहे हैं, क्या आप केवल उन्ही को नेतृत्व करने देंगे या उन देशों के साथ मुकाबला करेंगे और नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए? यदि हमारी आकांक्षा किसी दिन एक अग्रणी शक्ति बनना है, तो हमें डेटा के उपयोग में भी एक अग्रणी शक्ति बनना होगा। इसलिए, मुझे लगता है कि आज कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जो भारत के सामने खड़ी हैं। मुझे बहुत खुशी है कि आप इस और डिजिटल युग, जिसमें हम प्रवेश कर चुके हैं, के अन्य पहलुओं पर बहस करेंगे। मैं अपनी शुभकामनाएं देता हूं। अगर आज मैं आपके साथ होता तो मुझे बहुत अच्छा लगता लेकिन क्योंकि ऐसा नहीं कर सकता, इसलिए शायद डिजिटल साधन के ज़रिए उपस्थित रहना, इस सम्मेलन में अपना योगदान देने का सबसे अच्छा तरीका होगा।

बहुत बहुत धन्यवाद!
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