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11 वीं दिल्ली वार्ता (14 दिसंबर, 2019) में विदेश मंत्री द्वारा समापन भाषण

दिसम्बर 14, 2019

गणमान्य प्रतिनिधिगण;
महानुभावों, देवियों और सज्जनों,


प्रारंभ में, मैं नई दिल्ली में पिछले कुछ दिन हमारे साथ अपना समय बिताने के लिए सभी प्रतिनिधियों की हार्दिक प्रशंसा करता हूँ। मैं इतने सारे वक्ताओं द्वारा अपने विचार रखने के लिए उनकी भी सराहना करता हूं।


मैं, विश्व मामलों के लिए भारतीय परिषद और आरआईएस - विकासशील देशों के लिए अनुसंधान और सूचना प्रणाली की, विशेष रूप से, राजदूत राघवन और मोहन कुमार और उनकी टीमों की इस आयोजन के लिए उनकी सब प्रकार की सहायता के लिए गहरी प्रशंसा व्यक्त करता हूँ ।

इन कार्यक्रमों के आयोजनों के स्पष्ट कारण के अलावा, मुझे विश्वास है कि इंडो-पैसिफिक की व्यापक अवधारणा पर हमारी चर्चा बहुत ही उपयुक्त रही है। एक तो यह कि, अब इस अवधारणा का समर्थन करने वाले देशों की एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह समझा जा सकता है क्योंकि इंडो-पैसिफिक के प्रति यह एक निर्विवाद भौगोलिक तर्क है।

संवादों के इस समुच्चय की प्रासंगिकता का एक और कारण यह है कि आज बृहत्तर मान्यता यह है कि हमें यह समझने की आवश्यकता है कि महाद्वीपीय क्षेत्र की अपेक्षा समुद्री क्षेत्र में चुनौतियां और अवसर कम सुपरिभाषित हैं। जैसा कि कल संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधिमंडल ने हिंद महासागर वार्ता में रेखांकित किया, हमें यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि कोई एक महासागर पर रेखाएं नहीं खींच सकता है और यह कह सकता है कि एक चुनौती यहाँ समाप्त होती है, और वहाँ एक कोई और मुद्दा है। तार्किक रूप से, इसलिए, अधिक संवाद होना, आज की चुनौतियों और अवसरों की सीमा-रहित प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने में सक्षम बनाता है।

अंतःपरस्पर सम्बद्ध समुद्री क्षेत्र के मूल तर्क ने आज खुद को स्वाभाविक रूप से और विकासवादी तरीके से फिर से साबित किया है। जैसा कि मैंने सितंबर में मालदीव में हिंद महासागर सम्मेलन में कहा था, कि इंडो-पैसिफिक अवधारणा आने वाले कल का पूर्वानुमान नहीं है, बल्कि बीते कल की वास्तविकता है। पिछले दो दिनों से यहाँ बोलने वाले अन्य लोगों ने नाना प्रकार से एक ही बात की है, जो संक्षेप में यह है कि: आर्थिक और सभ्यतागत संवेग, खाड़ी के माध्यम से अफ्रीका के पूर्वी और दक्षिणी किनारे, अरब सागर द्वीप राष्ट्र, भारतीय उपमहाद्वीप, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और प्रशांत द्वीप समूह को जोड़ते हैं । हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि यह इसी रूप में हमेशा हमारे क्षेत्र में रहा है। और शायद यह वैसा ही है जैसा होना चाहिए।

उपयुक्त रूप से कहें तो, पिछले दो दिनों की हमारी चर्चाओं ने इस वास्तविकता को भी प्रतिबिंबित किया कि हमें इंडो-पैसिफिक अवधारणा पर या यहां तक कि इसकी भौगोलिक सीमा पर किसी प्रकार के समझौते पर अभी पहुंचना है, केवल आम सहमति को छोड़ दें । लेकिन समान रूप से, यह मान्यता थी कि जबकि इंडो-पैसिफिक पर विचारों की बहुलता हो सकती है और इस बहुलता में जो कुछ भी हो इस अवधारणा के साथ जुड़ने से हासिल करने के लिए सब कुछ है, और इस विचार को बहिर्गामी बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस अवधारणा को बहिर्गामी बनाने में एक कदम हिंद महासागर क्षेत्र के समुदाय की इसके साथ और एक इंडो-पैसिफिक की धारणा में भागीदारी को बढ़ा रहा है । जबकि पूर्वी हिंद महासागर के राष्ट्र और प्रशांत को जोड़ने वाले समुद्रों पर स्थित राज्य इंडो-पैसिफिक के अपने दृष्टिकोण को परिभाषित कर रहे हैं, इस अवधारणा के एक पश्चिमी हिंद महासागर संस्करण के लिए भी जगह है। हमारे अपने विचार के अनुसार इंडो-पैसिफिक में स्वाभाविक रूप से खाड़ी में हमारे पश्चिमी महासागर पड़ोसी, अरब सागर के द्वीप राष्ट्र और अफ्रीका में हमारे साथी शामिल हैं । इस अवधारणा के लिए भारत के दृष्टिकोण ने हमें यह पहचानने के लिए प्रेरित किया कि इंडो-पैसिफिक के दोनों भौगोलिक छोरों पर और बीच में प्रत्येक का, आदर्श रूप से इंडो-पैसिफिक का अपना स्वदेशी रूप से विकसित दृष्टिकोण होना चाहिए।

और यही कारण है कि हम भारत-प्रशांत क्षेत्र में आसियान आउटलुक का स्वागत करने वाले पहले लोगों में से थे।

और, जैसा कि मैंने मालदीव में इस साल की शुरुआत में सुझाव दिया था, एक हिंद महासागर समुदाय के निर्माण की चुनौती सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संसर्गों की मान्यता से परे, एक मजबूत रणनीतिक अनिवार्यता की मांग करती है; एक, जो मौजूदा तंत्र को उद्देश्य की एक नई भावना के साथ चलाती है।

और इसीलिए मैं प्रसन्न हूं कि इस छठे हिंद महासागर वार्ता को दिए गए अधिदेश के अनुसार, आईओआरए के निर्दिष्ट ट्रैक 1.5 तंत्र के रूप में, इंडो-पैसिफिक पर विचारों का एक प्रारंभिक समुच्चय "दिल्ली आमसहमति" दस्तावेज़ में प्रस्तुत किया गया है, यह समयोचित दस्तावेज अगले आईओआरए के वरिष्ठ अधिकारियों की अगले साल की बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा।

महानुभावों, देवियों और सज्जनों;

जबकि नीति-निर्माता, राजनयिक और शिक्षाविद विचारों, अवधारणाओं और रणनीतियों को पुनरावृत्त करने के लिए एकत्रित होते हैं, लेकिन यह भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हम हर अवधारणा के प्रत्येक तत्व पर विचारों की पूरी पहचान खोजने की संभावित भ्रामक खोज में न फंसें। इसके विपरीत: इस समय अधिक महत्वपूर्ण कार्य, ठोस और सार्थक सहकारी पहल प्रदान करने के लिए इंडो-पैसिफिक को एक खुले, स्वतंत्र और समावेशी मंच के रूप में उपयोग करने के लिए समय और प्रयास लगाना है। ऐसा होने के लिए, यह सुनिश्चित करना हर किसी के हित में है कि दरवाजे यथासंभव व्यापक मंच पर खुले रहें।

दूसरे शब्दों में, यह हम सभी के लिए यह अधिक समझदारी है कि हम इस पर ध्यान केंद्रित करें कि हम क्या करते हैं, और जितना संभव हो उतनी अधिक भागीदारों के साथ।

अलग ढंग से कहें तो, वैचारिक विमर्श से परे एक ठोस घटक भी होना चाहिए।

उदहारण के लिए, कनेक्टिविटी का मामला लें। इस क्षेत्र के भीतर स्पष्ट रूप से बहुत कुछ किया जाना है: हमारे लिए क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय पहल के माध्यम से, कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए योजनाओं के निर्माण के तरीके खोजना आवश्यक है।

जैसा कि इंडोनेशिया की विदेश मंत्री महामहिम रिटेनो मार्सुडी ने कल हमें अपने मुख्य भाषण में याद दिलाया, हम अपने क्षेत्र में, अपने आप, इंफ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। आसियान कनेक्टिविटी के लिए मास्टर प्लान के साथ आसियान के साथ सहयोग के लिए हमारी पहल को संरेखित करने का हमारा प्रयास इसका उदाहरण है, यही हमें करने की जरूरत है। ये हमारे लिए उच्च गुणवत्ता वाले वित्तपोषण के माध्यम से सामूहिक रूप से स्थायी बुनियादी ढांचा बनाने के लिए मौजूदा अवसर हैं। इस नवंबर में पूर्व एशियाई शिखर सम्मेलन में इंडो-पैसिफिक इंफ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी पर एक प्रमुख कार्यक्रम की मेजबानी करने की घोषणा की इंडोनेशियाई राष्ट्रपति की पहल, हम सभी के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

एक अन्य क्षेत्र, जहां ठोस परिणाम हमारी मदद कर सकते हैं, वह है विचार के साथ भागीदारी निर्माण परियोजनाओं का कार्यान्वयन सुनिश्चित करना। पिछले कुछ दिनों में, इस तरह की साझेदारी के लिए, भारत के साथ साथ, कई तरह के विचार स्थापित किए गए थे। हमारे वैज्ञानिक विभागों ने कई नई पहल की पेशकश की, जिनमें आईओआरए के लिए एक भव्य चुनौतियां योजना; 100 पोस्ट-डॉक्टरल विद्वानों के लिए फेलोशिप योजना; हमारे महासागरीय अनुसंधान जहाजों पर भागीदारों के लिए जगह; सह-ब्रांडेड आईओआरए अनुसंधान सुविधाएं; शामिल है; और कम लागत के लिए भारत में मौजूदा प्रौद्योगिकियों को साझा करने के लिए, कम ऊर्जा खपत वाली अलवणीकरण सुविधाएं, जो विशेष रूप से द्वीप देशों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

कई वक्ताओं द्वारा पहचान किए गए अनुसार, भागीदारी के लिए एक और क्षेत्र, अपने व्यापक अर्थों में समुद्री सुरक्षा था। जबकि हम सभी को समुद्री क्षेत्र डेटा साझा करने के लिए एक साथ काम करने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि समुद्री सुरक्षा श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी समान रूप से मजबूत है, मानव सुरक्षा के लिए भी चुनौतियां हैं उन्हें भी संबोधित करने की आवश्यकता है। और द्वीप के देशों से हमारे कई साथियों ने हमें इस बारे में बहुत स्पष्ट रूप से याद दिलाया। मिसाल के तौर पर, प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव पूरी तरह से आर्थिक गतिविधियों की पूरी श्रृंखला पर पड़ता है, जो द्वीपों और समुद्री-तट के इलाकों के समुदायों पर बना रहता है। उत्पादक आर्थिक क्षमता के नुकसान के निहितार्थों में महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक परिणाम शामिल हैं और यह हमने सोमालिया और यमन में देखा है।

यह इस व्यापक संदर्भ में था कि हमारे प्रधान मंत्री ने बैंकाक में पिछले महीने 14 वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में अपने हस्तक्षेप में इंडो-पैसिफिक महासागरों की पहल का विचार रखा। यह पहल, संक्षेप में, समुद्री चुनौतियों और जरूरतों की एक श्रृंखला का जवाब देने के लिए एक स्वतंत्र, खुला और सहकारी मंच स्थापित करने के लिए कहती है। इनमें समुद्री सुरक्षा; समुद्री पर्यावरण का प्रबंधन; आपदा जोखिम शमन; आईयूयू मछली पकड़ने सहित समुद्री संसाधनों का स्थायी उपयोग; क्षमता निर्माण; और समुद्री व्यापार और परिवहन शामिल हैं। मुझे खुशी है कि इस अवधारणा को इन पिछले कुछ दिनों के दौरान कई हस्तक्षेपों में उल्लेख और समर्थन मिला। हम 2020 के प्रारंभिक कुछ महीनों में इस पहल के कुछ स्तंभों पर काम शुरू करने के लिए तत्पर हैं।

बातचीत का एक तीसरा व्यापक क्षेत्र जो हमारे पास परिभाषाओं, इतिहास और अवसरों से अलग था, समन्वय के लिए मंचों के विचार के आसपास था।

भारत के लिए, किसके साथ काम करना है और कैसे, इस सवाल का जवाब आसानी से दिया जाता है। स्वाभाविक रूप से, हमारे लिए परिभाषित सिद्धांत यह सुनिश्चित करना है कि क्षेत्र संप्रभुता, समानता और एक नियम-आधारित प्रणाली के मापदंडों के भीतर सभी के साथ समावेशी भागीदारी के लिए खुला और मुक्त बना रहे।

परिचालन रूप से, यह केवल तर्कसंगत है कि नई वास्तुकला स्थापित करने की कोशिश करने के बजाय, हम पहले से मौजूद वास्तुकला के साथ काम करते हैं। हमारे पूर्व में, स्पष्ट रूप से तंत्र की कोई कमी नहीं है। मुख्य रूप से, हालांकि, साझेदारी के लिए सबसे सफल और इसलिए स्पष्ट विकल्प, अनिवार्य रूप से आसियान के नेतृत्व वाले तंत्र हैं, विशेष रूप से पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, लेकिन एआरएफ, एडीएमएम+ और विस्तारित आसियान समुद्री मंच (ईएएमएफ) जैसी सलाहकार प्रक्रियाएं भी। जैसा कि दिल्ली वार्ता में वक्ताओं में से एक ने कहा, इस क्षेत्र में पहले से ही तंत्र का वर्णमाला-सूप है।

लेकिन बहुत कम वास्तुकला है जो भारत के पश्चिम में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को कवर करती है, आईओआरए के बावजूद और निश्चित रूप से वर्तमान में कोई भी वास्तुकला नहीं है जो पूरे क्षेत्र को आदि से अंत तक फैलाती है।

इस मामले में, इसलिए क्या है जो हमें करना चाहिए? व्यक्तिगत रूप से, मैं निश्चित नहीं हूँ कि आगे बढ़ने का सही तरीका पहले आदि से अंत का आर्किटेक्चर बनाने का तरीका खोजना है, हित के सभी संभावित क्षेत्रों को कवर करना है, यह पता लगाने से पहले कि हमें एक साथ क्या करना चाहिए । दूसरे शब्दों में, मुझे लगता है कि पहले आर्किटेक्चर बनाना और फिर औचित्य की तलाश करना कोई उत्पादक कार्य नहीं है: अक्सर नहीं अधिक बार, सफल मंच और तंत्र क्षेत्रीय या ट्रांस-क्षेत्रीय सहयोग की एक आवश्यकता का परिणाम होते हैं।

यदि वह आधार उचित है, और मैं मानता हूँ कि यह है, मेरा मानना है कि हमें पूरे क्षेत्र में प्लेटफार्मों के बीच विषयगत तालमेल को खोजने के लिए तेजी से प्रगति करनी चाहिए। हमारे दृष्टिकोण से, भारत, आसियान के नेतृत्व वाले तंत्रों में पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र, विशेष रूप से आईओआरए में हमारी भागीदारी से होने वाली प्रगति से सबक हस्तांतरित करने की कोशिश करेगा। हम सभी के लिए लक्ष्य अंततः यह होना चाहिए कि क्षेत्र भर में प्लेटफार्मों के बीच निर्बाध रूप से स्विच करने की क्षमता हो, ताकि सार्थक परिणाम दिए जा सकें। ऐसा करने में, हम अपनी क्षमताओं और संसाधनों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए, साथ ही परिणामों की गुणवत्ता के लिए भी बेहतर प्रयास कर सकते हैं ।

जैसा कि आज हम दिल्ली वार्ता के एक और संस्करण की समाप्ति पर हैं, मैं कहूंगा कि इस बड़े और जटिल आयोजनों के समुच्च्य से मुख्य निष्कर्ष में यह शामिल हैं: जिस दिशा में इंडो-पैसिफिक अवधारणा विकसित हो रही है, उस पर अधिक स्पष्टता; मौजूदा वास्तुकला के भीतर भागीदारी से विशिष्ट परिणामों में बढ़ी हुई रुचि; और आसियान-भारत और आईओआरए जैसे विभिन्न प्लेटफार्मों के बीच समन्वय के लिए, विशिष्ट विषयों और मुद्दों पर अब के लिए संभावनाएं, हालांकि, नवनिर्मित ।

सभी प्लेटफार्मों में अभिसरण बनाने का यह प्रयास संभावित रूप से वादा करता है कि ट्रांस-इंडो-पैसिफिक अभिसरण खोजने की प्रक्रिया उतनी जटिल नहीं भी हो सकती जितनी हम सोचते हैं। आज, बोलने वालों में, शायद एक ने तटरक्षक बल के प्रमुखों के एक स्थायी तंत्र का उद्धरण दिया है जो पूरे इंडो-पैसिफिक में समन्वय करने का काम करता है। यह कम से कम एक इकलौता उदाहरण है जिसे हम जानते हैं। लेकिन शायद यह ठीक काम करता है क्योंकि यह साझेदारी के लिए विशिष्ट क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता है जिन पर सभी पक्ष महत्त्व देते हैं।

उस मामले में, इसका अर्थ है कि सभी के लिए व्यापक हित के मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने के लिए पारस्परिक रूप से लाभप्रद, मुक्त, खुला, समावेशी और सहकारी इंडो-पैसिफिक विशिष्ट कार्यों की पहचान करने से शुरू हो सकता है।

राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने कहा था कि हर कार्य में जोखिम और लागत होते हैं। लेकिन ये आरामदायक निष्क्रियता के लंबे समय के जोखिमों से बहुत कम हैं।

आज जैसा कि हम कुछ देशों के लिए इंडो-पैसिफिक अवधारणा का दृष्टिकोण देखते हैं, दूसरों के लिए अलग दृष्टिकोण, यह महत्वपूर्ण है कि हम सभी अपने आप पर स्पष्ट रूप से संपूर्ण इंडो-पैसिफिक समुदाय के लिए एक वैचारिक चुनौती को लागू करें, और मैं इस तथ्य की बहुत सराहना करता हूं कि दिल्ली वार्ता ने इस विशेष मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया है।

मैं आज यहां उपस्थित होने के लिए आप सभी को धन्यवाद देता हूं और एक बार फिर से सभी आयोजकों को मेरा धन्यवाद, यह आयोजन पूर्ण रूप से बहुत ही सफल रहा है।

आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

 

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