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“एशिया और उभरती अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली” पर पुणे इंटरनेशनल सेंटर के भू-आर्थिक सम्मेलन में विदेश मंत्री का संबोधन

फरवरी 28, 2020

"एशिया और उभरती अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली” पर पुणे इंटरनेशनल सेंटर के भू-आर्थिक सम्मेलन में संबोधन देते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है।

पिछले कुछ दशकों के दौरान, वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक असंतुलन नज़र आई थी। इसका एक प्राथमिक परिलक्षण अधिक विविध उत्पादन केंद्रों का उद्भव और इसके परिणामस्वरूप व्यापार के विभिन्न स्वरूपों का उद्भव रहा है। नियत समय में, इससे उपभोग के नए केंद्रों का भी उदय हुआ है। ये विकास अन्य गतिविधियों के एक व्यापक स्पेक्ट्रम में भी परिलक्षित होते हैं, जो व्यापार के क्षेत्र से परे हैं। वास्तव में, ये बैंकिंग और कौशल विकास से लेकर रसद और कनेक्टिविटी तक, इसकी तत्कालीन और व्युत्पन्न गतिविधियों दोनों को सीधे प्रभावित करते हैं। इन सभी चीजों से झलकते वैश्विक परिदृश्य का क्रमिक परिवर्तन, अंततः एक राजनीतिक असंतुलन के रूप में उभरा है। इस संबंध में एक बड़ा मोड़ 2008 में आया जब पूरे विश्व पर वित्तीय संकट आ पड़ी थी, जिसका रणनीतिक परिणाम हमारे समय के प्रमुख राजनीतिक-आर्थिक मंच के रूप में जी-20 का गठन था। आज, जब कि राष्ट्रों के बीच व्यापार के संबंध में बातचीत अधिक एनिमेटेड हो गई है, तो अब कम दिखावा करना पड़ता है कि हम राजनीतिक प्रभाव के समानांतर प्रयोग के बारे में भी बात कर रहे हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि एशिया और उभरते अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली के बारे में कोई भी बहस इस वास्तविकता का एक घटक बने। व्यापार कभी भी राजनीतिक रूप से तटस्थ नहीं रहा है; यह अब और भी कम हो गया है।

हमारे समय के दो बड़े घटनाक्रम - चीन का उदय और संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रवाद - दोनों अटूट रूप से व्यापार में उनके प्रदर्शन के साथ जुड़ा है। पहला अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की मौजूदा रूपरेखा में राज्य के पूंजीवाद को समायोजित करने की चुनौतियों पर बल देता है। दूसरा निष्पक्ष बाजार पहुंच, व्यापार के नियमों और संरक्षणवाद के गुणों पर बहस को दर्शाता है। दोनों न केवल एशिया की अन्य अर्थव्यवस्थाओं पर सीधे प्रभाव डालते हैं, बल्कि उसके लिए वैचारिक और व्यावहारिक चुनौतियां भी पेश करते हैं। इसका एक हिस्सा दुनिया की दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच सख्त द्विभाजन द्वारा उत्पन्न तनाव है। लेकिन इन दोनों के द्वारा एक बड़ी समायोजन चुनौती, दोनों अलग-अलग तरीके की, भी प्रस्तुत होती है। जहाँ कुछ लोग इन नई वास्तविकताओं से सहमत हुए हैं, वहीं दूसरों को ऐसा करना कठिन लग रहा है। प्रति व्यक्ति कम आय और बड़ी आबादी वाली अर्थव्यवस्थाएं जिनकी आजीविका नीतिगत परिवर्तनों से प्रभावित हुई हैं, इस संदर्भ में विशेष रूप से संवेदनशील हैं। बदलते व्यापार परिदृश्य को आज नई साझेदारी के निर्माण, सोर्सिंग पर निर्भरता, और आपूर्ति श्रृंखलाओं की मैपिंग के रूप में व्यक्त किया गया है। कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी पर तेजी से गरमाती बहस उस जटिल युग को रेखांकित करता है जिसमें हम अब रहते हैं। वैश्वीकरण का क्षरण निश्चित रूप से कई समाजों की व्यापारिक प्रथाओं को प्रभावित करेगा। नियम, शासन और तंत्र के लिए उनके निहितार्थ के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कहने की जरूरत नहीं है।

इस पृष्ठभूमि में व्यापार के मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय समझ तक पहुँचना स्वाभाविक रूप से अतीत की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है। चूंकि कई समाजों में आर्थिक सोच संकीर्ण हुई हैं और व्यापार हितों को अधिक स्पष्टता से परिभाषित किया गया है, इसलिए स्पष्ट है कि शून्य-राशि के खेल का एक बड़ा तत्व अब भी मौजूद है। गैर-व्यापार मुद्दों के साथ जुड़ाव, चाहे सामाजिक प्रकृति का हो या सुरक्षा चिंता का विषय हो, ने चुनौती को और बढ़ा दिया है। पर फिर भी, अभिसरण की धारणा और राष्ट्र-पार की आपूर्ति श्रृंखला की वास्तविकता एफटीए जैसे सीमित रूपरेखा के लिए इसे एक शक्तिशाली तर्क बनाती है। भारत जैसे राष्ट्र के लिए, यह कई मुद्दों को उठाता है जिस पर बहस छिड़ी है। ऐसी कई बहस इस बात के इर्द-गिर्द घूमते हैं कि हम वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ ज्यादा खुले तौर पर जुड़ने के लिए कितने तैयार हैं। पिछला रिकॉर्ड बताता है कि पर्याप्त होमवर्क की कमी और प्रभावी मानकों का अभाव कई क्षेत्रों को खोखला कर रहा है। संरचनात्मक फायदे के ज़रिए उनके साथ प्रतिस्पर्धा करना, राजनीतिक औचित्यता द्वारा सही ठहराया गया एक आकस्मिक निर्णय नहीं हो सकता है। व्यापार संबंधी कई फैसलों का सीधे आजीविका और सामाजिक स्थिरता पर प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि ये भारत के लिए अनोखा नहीं है, लेकिन यह विरोधाभासी है कि जो लोग हमसे अधिक खुला बनने का आग्रह करते हैं वे अन्दर से खुद ही बहुत संवेदनशील हैं। अनुकूलता और संतुलन के मामले में हम चाहे जो भी विकल्प चुने, पर कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनसे हम बच नहीं सकते हैं। हमें ऐसे बदलावों को अपनाना पड़ेगा जो भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावशील खिलाड़ी बनने में सक्षम बनाता है। दूसरा है, गतिशीलता और प्रवासन के संदर्भ में ज्ञान अर्थव्यवस्था और इसके निहितार्थों को समझना। दूसरी चुनौतियों के साथ-साथ ये चुनौतियाँ आने वाले वर्षों में हमारी सोच को आकार देंगी।

पहले कहा जाता था कि व्यापार हमें झंडे तक ले जाता है। आज, इस अभिमुख कथन में अधिक सच्चाई नज़र आती है। एशिया की कई औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं राजनीतिक विकल्पों के परिणामस्वरूप बनी थीं। चीन का उदय, संभवतः किसी भी अन्य समकालीन उदाहरण में से सबसे बेहतर उदाहरण, दूसरों की रणनीतिक गणना से प्रभावित था। कुछ हद तक, भारत भी खुद को ऐसे ही कटोर पर पाता है। दुनिया में वैश्विक रणनीतिक संतुलन सुनिश्चित करते हुए विकास के अतिरिक्त संचालक बनाने की बहुत रुचि है। व्यापार और आर्थिक विकास के अन्य रूप अधिक प्रभावी बहुध्रुवीयता निर्माण में महत्वपूर्ण तत्व हैं। अवसरों पर प्रतिक्रिया देने का अर्थ है एक पर्याप्त रूप से मजबूत पुल फैक्टर का निर्माण करना, और इसीलिए यह कार्य केवल कूटनीति का ही नहीं बल्कि समान रूप से शासन का भी है। इस उद्देश्य के लिए, व्यापार आसान बनाना या आसान जीवन सुनिश्चित करना कुछ फर्क ला सकता है। लेकिन परिवर्तनकारी समय में केवल विकासवादी बदलाव पर्याप्त नहीं हैं। हममें से प्रत्येक को अपने स्वयं का मार्ग विकसित करना होगा और भारत की संभावनाएं अवसंरचनाओं के सुधार पर काफी हद तक केंद्रित हैं। आख़िरकार, यह तुलनात्मक लाभ को परिभाषित करने वाला एक तत्व हो सकता है। इसलिए राजनीति, अर्थव्यवस्था और शासन को एक ही समय में प्राप्त करना विशेष रूप से इस समय महत्वपूर्ण है।

मैं यह कहते हुए संबोधन समाप्त करना चाहूँगा कि अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली की खींचातानी और दबाव आज व्यापार क्षेत्र में सबसे स्पष्ट नज़र आती है। यह केंद्रीयता ध्रुवीकरण की सीमा को रेखांकित करता है जिसे हाल तक बड़े पैमाने पर अंतर-निर्भर स्थिति समझी जाती थी। गैर-व्यापार मुद्दों के जुड़ावों ने मामलों को और जटिल बना दिया है। जब हम इस परिदृश्य पर विचार करते हैं, हमें इस समय अपक्षपात के साथ आंकलन करने की आवश्यकता है कि हम इस तरह के विविध रुख पर संधि कैसे बना सकते हैं। मुझे विश्वास है कि यह सम्मेलन इस चुनौती को बहुत गंभीरता से संबोधित करेगा और इसकी सफलता की कामना करता हूँ।

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