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आसियान - भारत थिंक टैंक नेटवर्क (एआईएनटीटी) की 6वीं गोलमेज बैठक में विदेश मंत्री का संबोधन

अगस्त 20, 2020

महामहिम उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री डॉन प्रमुदविनई,
आसियान और भारत के गणमान्यजन
देवियो और सज्जनों।
आप सभी को शुभ प्रभात।


आसियान-भारत थिंक टैंक नेटवर्क (एआईएनटीटी) के इस छठवें गोलमेज सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है। मैं सबसे पहले उप प्रधानमंत्री के रूप में आपकी हालिया पदोन्नति के लिए महामहिम डॉन प्रमुदविनई को बधाई देता हूँ, मुझे लगता है कि हम उसके बाद से पहली बार बातचीत कर रहे हैं, और मैं उनकी बहुत ही विचारशील शुरुआती टिप्पणियों के लिए भी उनको धन्यवाद देता हूँ। मैं आज इस कार्यक्रम में आसियान के महासचिव की उपस्थिति की भी सराहना करता हूं।

2. एआईएनटीटी की स्थापना हमारे सहयोग के भविष्य के संचालन पर हमारी सरकारों को नीतिगत इनपुट प्रदान करने हेतु की गई थी। यह कहना उचित होगा कि इस संबंध में काफी सफलता मिली है, लेकिन मैं आज विश्व की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इसके विस्तार को और बढ़ाने का थिंक टैंक से आग्रह करूंगा, विशेष रूप से हमारे। सामान्य स्थिति में भी, नए विचारों की आवश्यकता तथा गुंजाइश होती है। क्योंकि, जाहिर है, केवल शासन प्रणाली के भीतर ही सभी कुछ नहीं किया जा सकता है और हमने अतीत में विद्वानों, मीडिया, व्यवसायों और नागरिक समाज से प्राप्त होने वाली नई सोच को भी देखा है। मैं इस बात को जोर देकर कह सकता हूं कि उनका शायद पहले की तुलना में आज ज्यादा स्वागत किया जाता है।

3. दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती है। और विश्वास कीजिए, "अभूतपूर्व" शब्द इसके लिए कोई अतिशयोक्ति नहीं है। हममें से किसी ने भी इससे पहले ऐसा संकट, या इस स्तर की अनिश्चितता नहीं देखी है। यह महामारी कब खत्म होगी और इसके क्या परिणाम होंगे, यह अभी भी बहुत बड़ा सवाल है। कई महीनों के बाद भी, जीवन तथा आजीविका के नुकसान के संदर्भ में इसके विनाश की सीमा अभी स्पष्ट नहीं हुई है। हम यह दिखावा नहीं कर सकते कि यह सिर्फ एक कोई सामान्य घटना रहा है। इसके विपरीत, कोरोनावायरस का प्रभाव हमारी सामूहिक कल्पना से परे रहा है। अभी का अनुमान है कि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का संचयी घाटा 5.8-8.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर या लगभग 6.5-9.7% है। विश्व अर्थव्यवस्था के अनुमान के मुताबिक निश्चित रूप से यह महामंदी के बाद सबसे बड़ी मंदी होगी। यह इस पृष्ठभूमि के विपरीत है कि हमारी चर्चाएं आज हमारी साझा संभावनाओं का परीक्षण करें।

4. भारत और आसियान के बीच के समकालीन संबंध काफी हद तक वैश्वीकरण में हमारे साझा हित पर स्थापित थे। कम से कम एशिया में, आसियान उस प्रक्रिया के अग्रणी था और भारत को इसमें शामिल करने में मदद की। लेकिन आज क्योंकि यह तनाव में है, हमें इसकी निश्चित आर्थिक तथा सामाजिक परिभाषाओं से परे जाने की जरूरत है। वैश्वीकरण को व्यापार, यात्रा और वित्तीय प्रवाह के रूप में परिलक्षित किया जा सकता है। लेकिन वास्तव में, यह काफी बड़ा लक्ष्य है। महामारी से हमारे सामने जो चुनौति सामने आई है, वह मानव अस्तित्व का अविभाज्य पहलू है जो वैश्वीकरण को रेखांकित करता है। चाहे वह जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद या फिर महामारी हो, ये ऐसी चुनौतियाँ नहीं हैं जहाँ प्रभावित लोगों के पास कोई अन्य विकल्प है। पूरी तरह से राष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं या कभी-कभी अलगाव रहने की सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं। इसलिए, यह सामूहिक समाधानों की तलाश में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बहुत अधिक ईमानदारी से एक साथ काम करने की आवश्यकता को दर्शाता है।

5. हालांकि, विडंबना यह है कि जब बहुपक्षवाद की मांग सबसे अधिक थी, लेकिन यह इस निमित्त तक नहीं पहुंच सका। यदि हमने इसमें थोड़ी वृद्धि देखी, तो इसकी वजह सिर्फ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सामूहिक रूप से प्राचीन प्रकृति नहीं थी। समान रूप से, यह वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की गहन प्रतिस्पर्धात्मक प्रकृति को दर्शाता है। वास्तव में, यदि कोई संगठनों तथा संरचनाओं से परे जाता, तो यह कई राष्ट्रों के व्यक्तिगत व्यवहार में और भी अधिक स्पष्ट होता था। इसलिए, बड़ा मुद्दा जिसका सामना दुनिया करती है, वह केवल अर्थव्यवस्था की स्थिति, समाजों को क्षति या शासन की चुनौती नहीं है। वास्तव में यह वैश्विक मामलों की भविष्य की दिशा और किस प्रकार की विश्व व्यवस्था या अव्यवस्था में हम रहें, इसपर बहस है।

6. नतीजतन, आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जिस चीज को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है, वह है भरोसा। हमने पहले भी कई तिमाहियों में राष्ट्रीय सुरक्षा को आर्थिक सुरक्षा में शामिल करने को नए सिरे से परिभाषित होते हुए देखा है। हाल ही में, इसने प्रौद्योगिकी सुरक्षा पर सवाल तथा चिंताओं को पैदा किया है। महामारी की वजह से अब स्वास्थ्य सुरक्षा का महत्व बढ़ गया है। वास्तव में, सामरिक स्वायत्तता की अवधारणा जो कभी एकध्रुवीय दुनिया में चलन में थी, अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के संदर्भ में एक बार फिर प्रासंगिकता पा चुकी है। हम चाहे कुछ भी दावा करते हों, संकट के समय में राष्ट्रों की कार्रवाई यह निर्धारित करती है कि दुनिया वास्तव में उन्हें कैसे मानती है, और उन्होंने वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में निहित कई जोखिमों को उठाया है। नतीजतन, आपूर्ति श्रृंखला से संबंधित चिंताओं को उनके विविधीकरण और लचीलापन पर अधिक जोर देने के माध्यम से कम करने की मांग की जाती है।

7. इन प्रयोजनों के लिए, इन चुनौतियों के बारे में सोचना तथा सहयोग के अधिक सकारात्मक और व्यावहारिक मॉडल की शुरुआत करना हम सभी का कर्तव्य है। और ऐसा नहीं है कि संकटों के समय में भी दुनिया में अच्छे उदाहरणों की कमी रही है। कई ऐसे भी देश हैं जिन्होंने इस समय में भी दवाइयों, आपूर्ति या संसाधनों को साझा किया है। वास्तव में, अपने कार्यों के माध्यम से उन्होंने प्रदर्शित किया है कि, व्यापक असंतुलन के बावजूद अधिक उदार और न्यायसंगत वैश्विक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। आज भारत के लिए, अन्य चीजों के साथ-साथ अपनी राष्ट्रीय क्षमताओं को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है। यह सामाजिक अस्तित्व, विशेष रूप से स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण पहलुओं को खतरे में डालने के महत्व को भी रेखांकित करता है। और साथ-साथ, रोजगार का सृजन करने वाली अर्थव्यवस्था के निर्माण की घरेलू प्राथमिकता को पूरक करना, न कि केवल लाभ उत्पन्न करना। हम इसे आत्मनिर्भर भारत कहते हैं।

8. देवियों और सज्जनों, आसियान वैश्विक अर्थव्यवस्था के चौराहों में से एक है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम न केवल एक-दूसरे के समीप हैं, बल्कि साथ मिलकर एशिया तथा दुनिया को आकार देने में मदद करते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि इस मोड़ पर, हम खुद को जोड़े रखें। भारत-प्रशांत सहित बहस हेतु कई वैचारिक मुद्दे हैं। इंडो-पैसिफिक महासागरों जैसी पहल को हमें विस्तार करने की जरूरत है। जैसे-जैसे वैश्विक संबंधों में बदलाव आता है, हमें भी इसका निरीक्षण करना होगा। सुरक्षा, कनेक्टिविटी, अर्थव्यवस्था और राजनीति आपकी चर्चाओं में शामिल रहेंगे। आज की मेरी टिप्पणी केवल आप सभी को यह याद दिलाने पर आधारित है, तस्वीर में कितना बदलाव आया है। हमें इस महामारी से बाहर आने के बाद, एक तथ्य पर बिल्कुल स्पष्ट रहना चाहिए। दुनिया फिर कभी पहले जैसी नहीं रहेगी। इसका मतलब है कि नई सोच, नए विचार, अधिक कल्पना और अधिक से अधिक खुलापन। हमें रूढ़िवादियों से परे जाने की जरूरत है, चाहे व्यापार हो, राजनीति हो या फिर सुरक्षा। ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनपर आप सभी नियमित रूप से चर्चा करते हैं और मुझे यकीन है कि आज आप सभी बहुत ही उत्पादक चर्चा करेंगे।

आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

नई दिल्ली
20 अगस्त, 2020

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