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ग्लोबल टाउन हॉल में "हिंद-प्रशांत एवं कोविड-19 संकट" सत्र के दौरान विदेश मंत्री का संबोधन

नवम्बर 20, 2020

1. मुझे ग्लोबल टाउन हॉल 2020 को संबोधित करते हुए खुशी हो रही है और इस अवसर के लिए इंडोनेशिया के विदेश नीति समुदाय और ऑस्ट्रेलियाई रणनीतिक नीति संस्थान को धन्‍यवाद ज्ञापित करना चाहता हूँ। जैसा कि मुझसे ‘हिंद-प्रशांत एवं कोविड-19 संकट’ पर बोलने का आग्रह किया गया था, मेरी टिप्पणियां तीन मुद्दों पर केंद्रित है- हिंद-प्रशांत का औचित्‍य, कोविड-19 संकट के प्रति भारतीय अनुक्रिया, और दोनों कैसे एक साथ आएं।

2. हर युग अपनी रणनीतिक अवधारणाओं और विश्लेषणात्मक रचना का निर्माण करता है। वर्तमान युग भी कोई अपवाद नहीं है। आखिरकार प्रशांत और हिंद महासागर के थिएटरों के बीच तीक्ष्‍ण अंतर केवल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ही किया गया। अब क्या बदल गया है? पहले पहल, वैश्वीकरण और अंतर-निर्भरता की गहनता है जिसने सभी देशों, विशेष रूप से प्रमुख देशों के क्षितिज का विस्तार किया है। भारत के मामले में हिंद-प्रशांत उसकी एक्ट ईस्ट नीति का स्वाभाविक वाग्विस्‍तार था जिसने चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया को प्रमुख आर्थिक साझेदार बनाया है। वास्तव में, हम पश्चिम की तुलना में भारत के पूर्व से अधिक व्यापार करते हैं, जो औपनिवेशिक युग के तत्काल बाद से काफी उलट है।

3. दूसरा कारक वैश्विक व्यवस्था में हुआ पुनर्संतुलन है। राष्ट्रों की क्षमताओं और पहुँच में बदलाव आया है, जिससे कुछ अधिक और अन्य कम कर रहे हैं। लेकिन दोनों श्रेणियां पहले की तुलना में अधिक निर्बाध तरीके से हिंद और प्रशांत महासागर से व्‍यवहार करती हैं। परिणामी बहु-ध्रुवीयता भी समान विचारधारा वालों से पहले की तुलना में अधिक सहयोगात्मक रूप से और प्रभावी ढंग से काम करने की माँग करती है। फलस्‍वरूप, हमने पहले की तुलना में अधिक लचीले और कल्पनाशील गठबंधनों और कार्यकरण व्यवस्थाओं से परे जाने वाली पहलें देखी हैं।

4. किसी भी वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से, हिंद-प्रशांत वर्तमान वास्तविकता का अधिक समकालीन वर्णन है। इस तरह का परिदृश्य वास्तव में अधिक से अधिक सहयोग का लोकाचार बनाता है, जो विशेष रूप से ऐसे समय में आवश्यक है जब वैश्विक वस्तुओं की आपूर्ति कम है। यदि चुनौतियां द्विगुणित होती हैं लेकिन क्षमताएं गति नहीं बनाए रखती हैं, तो जवाब केवल अधिक गहन सहयोग में है। समुद्री सुरक्षा, पारदर्शी और बाजार आधारित कनेक्टिविटी या आतंकवाद के साथ मुकाबला जैसे मुद्दों के लिए ऐसे समाधानों की जरूरत है। हिंद-प्रशांत प्रभाव के क्षेत्रों की अस्वीकृति भी है और इस सबका यह निहितार्थ हो सकता है। यह दोहराया जाता है कि दुनिया को कुछ लोगों के लाभ के लिए अवरूद्ध नहीं किया जा सकता है, भले ही वह संयुक्त राष्ट्र का मामला हो। यह हमारे भविष्य का संकेत है, अतीत में पुनरावर्तन का नहीं। केवल शीत युद्ध की मानसिकता को पनाह देने वालों को ही ऐसे इरादे देखने को मिलेंगे।

5. हाल के दिनों में हिंद-प्रशांत के तर्क की बढ़ती हुई मान्यता रही है। हिंद-प्रशांत पर आसियान का दृष्टिकोण एक उल्लेखनीय कदम था। इस बृहत्‍तर क्षेत्र के राष्ट्रों के अलावा हमने जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड को भी इस दृष्टिकोण का अनुगमन करते हुए देखा है। आज की जरूरत इसे व्यावहारिक आकार देने की है। यह काम क्वाड जैसे बहुपक्षीय राजनयिक परामर्शों द्वारा किया जा सकता है। या फिर हिंद-प्रशांत महासागर पहल द्वारा इसको संरचित अंदाज में आगे बढ़ाया जा सकता है जिसे भारत द्वारा 2019 में पूर्व एशिया शिखर सम्‍मेलन में प्रस्‍तुत किया गया था। यह समुद्री सुरक्षा; समुद्री पारिस्थितिकी; समुद्री संसाधन; क्षमता निर्माण औेर संसाधन सहभाजन; आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन; विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अकादमिक सहयोग; और व्यापार कनेक्टिविटी और समुद्री परिवहन के सात स्तंभों पर निर्मित है। यह स्वाभाविक है कि हम विभिन्न विचारों और सुझावों को परस्पर क्रिया करते हुए देखेंगे और उनका सामंजस्‍य बैठाना बहुलवादी राजनीतिक संस्कृति का अतिआवश्‍यक भाग है जिसका हममें से कई समर्थन करते हैं।

6. जहाँ रणनीतिक बहसों का अपना महत्व है, वहीं कोविड-19 के संदर्भ से दूर होने वाला कोई नहीं है जो आज हमारी इतनी अधिक प्राथमिकताओं को आकार दे रहा है। भारतीय परिप्रेक्ष्‍य से मैं आपको बता सकता हूँ कि हमने इस चुनौती का दृढ़निश्चय और अनुशासन के साथ जवाब दिया है। जो अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर, टेस्टिंग किट, पीपीई और एन95 मास्क नहीं बनाती थी, आज न केवल अपनी जरूरतों को पूरा कर रही है, बल्कि जो बाहर हैं उनकी जरूरतों को भी पूरा कर रही है। 15,000 से अधिक समर्पित कोविड उपचार सुविधाओं की स्थापना करके, हमने प्रभावी ढंग से अनुक्रिया करने की अवसंरचना का निर्माण किया है। हमारा उच्च स्‍वास्‍थ्‍यलाभ और कम मृत्यु दर खुद बोलते हैं, जैसा कि वास्तव में सामाजिक दूरी की संस्कृति और बड़े पैमाने पर निवारक उपायों को अपनाना करता है। लेकिन दुनिया के लिए, जो बात अधिक प्रासंगिक है, वह बल है जो हम इस वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग पर देते हैं।

7. कोविड-19 ने फार्मास्यूटिकल्स, विशेष रूप से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन और पैरासिटामोल की माँग में स्‍पष्‍ट रूप से बढ़ोतरी की। हमने स्वाभाविक रूप से उत्पादन बढा़या लेकिन अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि दूसरों की आवश्यकताओं का भी जवाब दिया। ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया दोनों ही लाभार्थी थे। आज, ध्यान टीका उत्पादन और तेजी से परीक्षण पर स्थानांतरित हो गया है, दोनों जीवन की सामान्य स्थिति में वापसी के लिए आवश्यक हैं। भारत कई अंतर्राष्ट्रीय सहयोगों और पहलों में गहराई से शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र से प्रतिबद्धता जताई है कि हम सभी के लिए टीकों को सुलभ और किफायती बनाने में मदद करेंगे।

8. यह प्रकट हो रहा है कि इस वैश्विक स्वास्थ्य संकट के बीच, भारतीय कूटनीति अपने हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण को वास्तव में अमल में लाई है। हमने सोलोमन द्वीप समूह, नौरू, पापुआ न्यू गिनी, किरिबाती, टोंगा, तुवालु और पलाऊ को कोविड-19 के प्रति उनकी अनुक्रिया में सहायता करने के लिए चिकित्सा उपकरणों और आपूर्तियों की खरीद के लिए सहायता प्रदान की। यह भारत और प्रशांत द्वीपों के बीच बढ़ती विकास सहभागिता को देखते हुए स्वाभाविक था।

9. इस महामारी ने वैश्विक गतिशीलता और प्रवासन की व्यापक प्रकृति को भी रेखांकित किया। चूंकि लोग अपने घरों को वापस लौटना चाहते थे, इसलिए आवश्यक लॉजिस्टिक और प्रोटोकॉल का निर्माण सरकारों के बीच सहयोग उक्‍त उद्देश्य के लिए केंद्रीय था। भारत के मामले में, 2.5 मिलियन से अधिक नागरिक वापस आए, उनमें से लगभग 24,000 अकेले ऑस्ट्रेलिया से आए। हम उस अतिरिक्त प्रयास की गहराई से सराहना करते हैं जो कइयों ने मदद करने की अपनी इच्छा के चलते किया। अपनी ओर से हमने भारत से 120 देशों में 110,000 से अधिक विदेशियों की वापसी में सहायता की।

10. तो मैं कोविड-19 अनुभव की बड़ी उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ। सबसे बड़ी बात यह है कि यह हमारे समय के प्रमुख मुद्दों पर और अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का आह्वान है। एक ऐसी दुनिया में जिसमें विश्वास और पारदर्शिता अब अधिक बढ़ोतरी पर हैं, यह अधिक लचीली आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करने का महत्व रेखांकित करता है। यह बहुपक्षीयता के महत्व की भी याद दिलाता है। और इसके बदले में नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था का पालन करने की माँग करता है। हर आघात पहुंचाने अनुभव से, हम बेहतर बनकर बाहर आने की कोशिश करते हैं। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस बार भी यही स्थिति हो।

नई दिल्ली
20 नवंबर, 2020

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