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आईओआरए के संदर्भ में " महामारी-पश्चात के बाद हिंद-महासागर क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग: भविष्य की राह" पर आरआईएस संगोष्ठी के उद्घाटन के दौरान विदेश राज्य मंत्री का भाषण

नवम्बर 25, 2020

महामहिम डॉ. नोमुव्यो नोक्वे, महासचिव,हिन्द महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ सचिवालय
प्रो. सचिन चतुर्वेदी, महानिदेशक, शोध एवं सूचना प्रणाली (आरआईएस)
प्रो. एस.के. मोहंती, प्रोफेसर, शोध एवं सूचना प्रणाली (आरआईएस)
विशिष्ट वक्ता और वेबिनार के प्रतिभागी,
देवियो और सज्जनों,
आप सभी को नमस्कार।


इस समय के सबसे सामयिक मुद्दों में से एक यानी हिंद-महासागर क्षेत्र में महामारी के बाद आर्थिक सहयोग पर इस सभा को संबोधित करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। मैं अभी की परिस्थितियों में इस कार्यक्रम का आयोजन करने में विकासशील देशों के शोध एवं सूचना प्रणाली द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना करता हूं।

आईओआरए हिंद महासागर क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है और भारत-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय सहयोग के मुख्य प्लेटफार्मों में से एक है। यह 22 सदस्यों के साथ हिंद महासागर क्षेत्र का सबसे बड़ा क्षेत्रीय समूह है, जो इस क्षेत्र के विकास हेतु विविध दृष्टिकोण और विचारों को एक साथ लाने का काम करते है। हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा, शांति व समृद्धि के लिए इसके सदस्य देशों के बीच और क्षेत्र में अन्य समूहों के साथ सहयोग को बढ़ाने के लिए भारत आईओआरए को मजबूत करने हेतु पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

साल 2011 में आईओआरए की अध्यक्षता के दौरान, भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में समक्ष उभरती हुई भू-रणनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, इसके पुनरोद्धार एवं मजबूती की दिशा में काम किया था। विगत कुछ वर्षों में, हम नियमित बैठकों, नई संरचनाओं के सृजन, सचिवालय की दक्षता को बढ़ाने, वार्ता के सहयोगियों के साथ सहयोग को बढ़ाने और आईओआरए की विभिन्न प्राथमिकता वाले और क्रॉस कटिंग क्षेत्रों में ठोस पहलों को लागू करके आईओआरए को मजबूत करने का काम किया है।

अभी, हम सभी कोविड-19 महामारी के रूप में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं जिससे हमारे स्थापित कार्य प्रणाली, मानदंड व नियम को प्रभावित हो रहे हैं और एक यह बड़े व्यवधान के रूप में उभरा है। इस व्यवधान का सबसे पहला प्रभाव आर्थिक रहा है। इस महामारी ने आपूर्ति श्रृंखला में विविधता और लचीलापन सुनिश्चित करने के महत्व को उजागर किया है। इसने सभी देशों को अपनी स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं का फिर से आकलन करने; दवाओं की उपलब्धता एवं क्षमता पर ध्यान देने के साथ-साथ स्वास्थ्य देखभाल के आवश्यक उत्पादों के लिए विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला बनाने की आवश्यकता को सामने ला दिया है। दुनिया को अब अधिक भरोसेमंद और सक्षम खिलाड़ियों की जरूरत है।

देवियो और सज्जनों,

भारत में एक जिम्मेदार भागीदार बनने की इच्छा व क्षमता है। वर्तमान स्थिति के बावजूद, दुनिया और विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र के साथ भारत का जुड़ाव वसुधैव कुटुम्बकम या दुनिया एक परिवार है, के इसके प्राचीन दर्शन पर आधारित है। आज बहुलवादी और खुला समाज होने के नाते हम अपनी लोकतांत्रिक भावनाओं और जिम्मेदारियों से अवगत हैं। महामारी के दौरान भी, भारत ने विश्व स्तर पर बढ़ती मांग को पूरा करने हेतु अपने दवा उत्पादन - विशेष रूप से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और पेरासिटामोल - का उत्पादन बढ़ाया। हमने आईओआरए के कई सदस्य देशों के साथ-साथ लगभग 150 देशों को दवाइयाँ दीं। हमारी चिकित्सा टीमें संकट का सामना कर रहे हमारे चार पड़ोसी देशों में तैनात की गई थीं। इससे यह संदेश जाता है कि पहले से अधिक क्षमता वाला भारत अब न केवल अपनी मदद कर रहा है, बल्कि इस क्षेत्र की भलाई के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। निकट भविष्य में टीके का कुशल उत्पादन एवं वितरण सुनिश्चित करते हुए महामारी के खिलाफ हमारी सामूहिक लड़ाई में मजबूत बहुपक्षीय सहयोग होना आवश्यक है। नैदानिक उपकरण, उपचार व टीकों की न्यायसंगत और सार्वभौमिक पहुंच हेतु अपने प्रयासों को और बढ़ाना आवश्यक है। भारत महामारी के खिलाफ अपनी लड़ाई में हिंद महासागर क्षेत्र के साथ सहयोग करने हेतु तत्पर है।

कोविड-19 महामारी से सभी देशों के लचीलेपन की परीक्षा हुई है और इससे मौजूदा आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमियों पर सभी का ध्यान गया है। अभी पूरी दुनिया का ध्यान आर्थिक लचीलापन और इससे रिकवरी पर है। भारत में, हमने सरकार और समाज के प्रयासों को एक साथ मिलाकर महामारी के खिलाफ लड़ाई को एक जन आंदोलन बनाने की कोशिश की है। हमने 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के पैकेज की घोषणा की है। इससे अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर आयेगी, आधुनिक अवसंरचना का निर्माण होगा और तकनीक-संचालित प्रणाली स्थापित होगी। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' के विज़न में भी परिलक्षित होता है। इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ावा देने पर ध्यान देते हुए भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक अभिन्न अंग बनाने की परिकल्पना की गई है। हम महामारी के बाद आपूर्ति श्रृंखला को विविधता भरी और लचीली बनाने में हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के प्रयासों में खुद भी शामिल होना चाहते हैं।

देवियो और सज्जनों,

यहां, मैं इस बात पर सभी का ध्यान खींचना चाहूंगा कि हम अभी की चुनौतियों से अपने व्यापक रणनीतिक लक्ष्यों से विचलित नहीं हुए हैं, विशेष रूप से इंडो पैसिफिक क्षेत्र में, जहां हम इंडो-पैसिफिक को खुला एवं समावेशी बनाने हेतु आईओआरए और आसियान के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। यह समुद्री सुरक्षा, समुद्री पारिस्थितिकी, समुद्री संसाधन, क्षमता निर्माण व संसाधन साझाकरण, आपदा जोखिम में कमी एवं इसका प्रबंधन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी व शैक्षणिक सहयोग और व्यापार संपर्क तथा समुद्री परिवहन के क्षेत्र में हमारी आम चुनौतियों और साझा लक्ष्यों का सहयोगी समाधान तलाशने के उद्देश्य से 2019 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा घोषित हमारी इंडो-पैसिफिक महासागरीय पहल का उद्देश्य रहा है।

भारत ने आईपीओआई के तहत समुद्री सुरक्षा एवं आपदा जोखिम में कमी और इसके प्रबंधन में अग्रणी भूमिका निभाई है। भारत आईओआरए के आपदा जोखिम प्रबंधन प्राथमिकता क्षेत्र का प्रमुख देश भी है। इस क्षेत्र में अपनी प्रतिबद्धताओं की वजह से भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता और प्राकृतिक आपदाओं एवं समुद्री पर्यावरणीय घटनाओं के वक्त मानवीय सहायता देने में पहले उत्तरदाता का काम किया है। विगत कुछ वर्षों में भारत के हिंद महासागर क्षेत्र में उल्लेखनीय एचएडीआर मिशनों में शामिल है - वर्ष 2015 में यमन में ऑपरेशन राहत - जब भारत ने 40 से अधिक अन्य देशों के 1,947 नागरिकों सहित 6,710 लोगों को बचाया और बाहर निकाला; साल 2016 में श्रीलंका में चक्रवात; 2019 में इंडोनेशिया में आया भूकंप; मोजाम्बिक में चक्रवात इडाई; और जनवरी 2020 में मेडागास्कर में बाढ़ एवं भूस्खलन जहां भारत की ओर से तुरंत सहायता प्रदान की गई थी। इसी महामारी के दौरान भी भारत की इस प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आयी है जो अगस्त 2020 में मॉरीशस में तेल रिसाव और सितंबर 2020 में श्रीलंका में तेल टैंकर में लगी आग के दौरान भारत की ओर से प्रदान की गई सहायता से प्रदर्शित होती है। आईओआरए के तहत, भारत एचएडीआर पर एक दिशानिर्देश भी तैयार कर रहा है। एचएडीआर पर एक आम नीति बनाने से प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त अधिकांश आईओआरए देशों की आपदा जोखिम प्रबंधन क्षमता मजबूत होगी।

देवियो और सज्जनों,

चूंकि इस वेबिनार में महामारी के बाद किये जाने वाले आर्थिक सहयोग पर चर्चा होनी है, इसलिए मैं इस मौके पर पिछले साल नवंबर में अबू धाबी में मंत्रिपरिषद की 19वीं बैठक के दौरान दिए गए कुछ सुझावों को दोहराना चाहूंगा। भारत का मानना​है कि आईओआरए तब अधिक प्रभावी होगा जब हम इसके हितधारकों की संख्या को और अधिक बढ़ाएंगे। मेरा मतलब है कि हमें नीति निर्माताओं व शिक्षाविदों से आगे बढ़ते हुए व्यापार एवं अन्य हितधारकों के संबंध में सहयोग बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए। इससे आईओआरए में अंतर-क्षेत्रीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने हेतु व्यावहारिक तरीके और साधन तलाशने में मदद मिलेगी। इससे क्षेत्र में समृद्धि को बढ़ावा देने के हमारे प्रयासों में अधिक समानता आएगी। इसके लिए, मैं इस वेबिनार में मौजूद प्रतिभागियों से आग्रह करूंगा कि वे इस महत्वपूर्ण विषय पर विचार-विमर्श करें और नीति निर्माताओं के विचारों पर उचित सिफारिशें करें।

इंट्रा-आईओआरए पर्यटन को बढ़ावा देना भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। कोविड-19 महामारी के कारण पर्यटन सबसे अधिक प्रभावित हुए क्षेत्रों में से एक है। हम सभी जानते हैं कि आईओआरए के कई सदस्य देश अपनी आर्थिक जरुरतों के लिए पर्यटन पर निर्भर हैं। इसलिए, आईओआरए क्षेत्र में पर्यटन उद्योग को फिर से पहले जैसा बनाने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। चूंकि हम महामारी की वजह से स्वास्थ्य संकट से गुजर रहे हैं, इसलिए इस क्षेत्र में पर्यटन उद्योग को फिर से पहले जैसा बनाने हेतु मैं कहना चाहूंगा कि आयुर्वेद एवं कल्याण से जुड़े पर्यटन पर भी विचार किया जा सकता है।

भारत ब्लू इकोनॉमी और विज्ञान एवं तकनीकी पर उच्च इंट्रा-आईओआरए के महत्व को समझता है। प्रदूषण के खतरे, विशेष रूप से प्लास्टिक का कचरे, तेल का रिसाव, गैरकानूनी, अप्रमाणित एवं अनियमित तरीके से मछली पकड़ने जैसे संसाधनों के अनियमित दोहन को रचनात्मक तरीकों और लोगों की भागीदारी से निपटने की आवश्यकता है। जमीनी स्तर पर आईओआरए क्षेत्र में इन खतरों को समझने हेतु हमें और अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसके लिए आवश्यक है कि हमारे सभी साथी देश केंद्रित एवं संस्थागत दृष्टिकोण अपनाये।

देवियो और सज्जनों,

मैं अपने वक्तव्य को इस बात पर जोर देते हुए समाप्त करता हूं कि, महामारी के बाद की इस दुनिया में यह महत्वपूर्ण है कि महामारी से विश्व स्तर पर बाहर आने और बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार सहित हिंद महासागर क्षेत्र के देश वैश्विक चुनौतियों का सामूहिक समाधान तलाशे। महामारी ने न केवल अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के संदर्भ में भी हमारी परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में बहुपक्षवाद की केंद्रीयता को भी स्पष्ट कर दिया है। इसलिए, आईओआरए के तहत विविधता भरे और लचीले इंडो-पैसिफिक के सृजन हेतु हमारी क्षेत्रीय अवसंरचना को मजबूत करने के लिए गहरा सहयोग किया जाना चाहिए।

नई दिल्ली
नवंबर 25, 2020
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