मीडिया सेंटर मीडिया सेंटर

नैरोबी विश्वविद्यालय में नवीनीकृत महात्मा गांधी स्मारक पुस्तकालय के उद्घाटन अवसर पर विदेश मंत्री की टिप्पणी

जून 14, 2021

माननीय अबाबू नमवाम्बा; विदेशी मामलों के मुख्य प्रशासक सचिव;
मुख्य शिक्षा सचिव ;
कुलाधिपति डाक्टर वीजू रतांसी ;
कुलपति प्रोफेसर स्टीफन कियामा;
प्रोफेसर जूलिया ओजियांबो


दोनों उच्चायुक्तों और साथ में अफ्रीकी मामलों के प्रधान सचिव राजदूत राहुल छाबड़ा ने हमें यहां आने के लिए प्रोत्साहित किया। इसलिए आपके हिसाब से सबकुछ सहजता के साथ हो गया।

छात्रों, विशिष्ट अतिथिगण, शिक्षाविद और मित्रों,


नैरोबी विश्वविद्यालय में नवीनीकृत महात्मा गांधी पुस्तकालय के उद्घाटन अवसर पर आज आपके आपके बीच उपस्थित होकर वाकई मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि विश्वविद्यालयों में लंबा समय बिताने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए किसी विश्वविद्यालय में वापस आना हमेशा अच्छा अनुभव होता है।

पांच साल पहले, मुझे जुलाई, 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केन्या की सरकारी यात्रा के अवसर पर उनके साथ जाने का मौका मिला था। यह मेरे लिए बड़े सम्मान की बात थी। यदि आपको याद हो, तो इस अवसर पर, उन्होंने इस विश्वविद्यालय में छात्रों की एक बड़ी सभा में विशेष व्याख्यान दिया था और विश्वविद्यालय के आदर्श वाक्य "यूनिट एट लेबोरे" अर्थात कड़ी मेहनत और एकता का उल्लेख किया था। उन्होंने छात्रों से कहा था कि आपका परिश्रम आपका भाग्य तय करेगा और ऐसे समय में आप भारत को एक विश्वसनीय और भरोसेमंद मित्र के रूप में पाएंगे। आज जब पुस्तकालय के नवीनीकरण का काम पूरा हो चुका केन्याई छात्रों की नई पीढ़ी के लिए ज्ञान ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया में बहुत उपयोगी साबित होगा। सच मानिए तो हमने अपना यह वादा पूरा किया है। मैं इस काम के लिए केन्या और भारत में रहने वाले लोगों के साथ ही विशेष रूप से दोनों देशों के उच्चायोगों , मंत्रालयों और विश्वविद्यालयों में काम करने वाले उन लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने इसे संभव बनाया है।

लेकिन यह खुद की तारीफ करने का वक्त नहीं है यह संभवत भारत और केन्या के बीच संबंधों की व्यापकता के महत्व को प्रतिबिंबित करने का भी समय है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, इस विश्वविद्यालय के साथ भारत का जुड़ाव दशकों पुराना है और यहां महात्मा गांधी का स्मरण किया जाना हमारी मजबूत एकजुटता को रेखांकित करता है। यह हमें भारतीयता की विरासत वाले उन केन्याई लोगों की भी याद दिलाता है जिन्होंने इस विश्वविद्यालय के विकास और सफलता में बहुत योगदान दिया है। इतने दशक बीत जाने के बाद भी यह भावना कम नहीं हुई है। इसके विपरीत, इसने व्यावहारिक रूप में दक्षिण-दक्षिण सहयोग का आकार ले लिया है, जिसका यह परियोजना एक छोटा सा उदाहरण भर है।

अब, कई ऐसी अन्य गतिविधियाँ भी हैं जिनमें मानव संसाधन और प्रतिभाओं की भागीदारी है और जो हमारे गहरे संबंधों के प्रमाण के रूप में मौजूद हैं। जैसा कि आपने अन्य वक्ताओं से सुना है, शिक्षा और क्षमता निर्माण में, भारतीय विश्वविद्यालयों ने 1960 के दशक से कई युवा केन्याई लोगों की मदद की है जो विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचे हैं।भारत सरकार हर साल केन्याई लोगों को 400 से अधिक छात्रवृत्तियां देती है। महामारी के दौरान भी, हमने ई-आईटीईसी पाठ्यक्रम जैसी गतिविधियों को वर्चुअल माध्यम से जारी रखा और इसका एक ताजा उदाहरण केन्याई डाक विभाग के अधिकारियों के साथ किया गया हमारा काम है । ऐसा ही एक अन्य उदाहरण ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के माध्यम से रिफाइनरी प्रक्रिया और प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में दक्षता निर्माण में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और नैरोबी विश्वविद्यालय के बीच सहयोग है।

इन दृष्टांतों को ध्यान में रखते हुए इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि हम अपने समकालीन संबंधों को कैसे नया रूप देना चाहते हैं। मेरा मानना ​​है कि हमारे इन संबंधों के मूल में अभी भी वही एकजुटता मौजूद है जो पिछली सदी में हमारे साझा संघर्ष के दौरान उपजी थी। लेकिन इसमें उन नई चुनौतियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए जो उस समय से निरंतर बनी हुई हैं।

इस संदर्भ में सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण वैश्वीकरण के बारे में हमार नजरिया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज दुनिया परस्पर ज्यादा जुड़ी हुई है और बहुत अधिक एक दूसरे पर निर्भर है। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि वैश्वीकरण केवल संसाधनों और बाजारों तक सीमित हो जाए जबकि उत्पादन केंद्र कुछ के हाथों में केंद्रित रहें। कोविड -19 महामारी ने सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में निर्भर रहने के खतरों का अहसास दिलाया है।

जब आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और मांग आपूर्ति से अधिक हो जाती है तब निश्चित रूप से कमजोर लोगों को दिक्क्तें होती हैं। अफ्रीका ऐसी दिक्कतों को झेलते रहने का जोखिम नहीं उठा सकता और वैसे भी यह दक्षिण-दक्षिण सहयोग की भावना के विरुद्ध है। महामारी ने हमें जो आज सबसे बड़ा सबक दिया है वह वैश्वीकरण का विकेन्द्रीकरण करने की जरुरत का है।

हमारी सुरक्षा की भावना में भी बड़ा बदलाव आया है। अब हम स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से कहीं अधिक महत्व देते हैं। यह अफ्रिका के संबंध में क्षमताएं बढ़ाने का एक मजबूत मामला बनता है। यह तभी संभव हो सकेगा जब साझेदारी मुख्य रूप से अफ्रीका के कल्याण से जुड़ी विकास परियोजनाओं पर केन्द्रित हों। वास्तव मे विकास तभी दिखता है जब वह गहराई से हमारी क्षमताओं पर आधारित होता है। हमने सहयोग के उस मजबूत असर को देखा है जो ऐसा संभव बना सकता है। आज दोपहर में, जब मुझे राष्ट्रपति उहुरू केन्याटा से मिलने का अवसर मिला, तब उन्होंने मुझसे अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि किस तरह से एल्डोरेट में रिवाटेक्स परियोजना ने पूरे समुदाय को लाभान्वित किया​ है जिससे उसका पूरा स्वरूप ही बदल गया है।

इसलिए आज मैं आप सभी को यह बताना चाहूंगा कि आधुनिक अफ्रीका का उदय केवल एक नेक भावना का परिणाम नहीं है बल्कि यह एक ऐसी अपेक्षा का परिणाम है जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। जब एक अरब से अधिक आबादी वाला यह महाद्वीप अपना सही स्थान पा लेगा, तभी हमारे ग्रह की पूर्ण विविधता को उचित अभिव्यक्ति मिलेगी। तभी हम न्यायोचित रूप से यह कह पाएंगे कि विश्व वास्तव में बहुध्रुवीय है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा लिए गए निर्णय वास्तव में तभी वैश्विक होंगे जब अफ्रीका की आवाज सही तरीके से पूरी सुनी जाएगी। ऐसा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी प्रमुख वैश्विक संस्थाओं में सुधार के माध्यम से संभव बनाया जाना चाहिए। वर्तमान में भारत और केन्या दो साल के लिए सुरक्षा परिषद् के गैर-स्थायी सदस्य बनाए गए हैं।

भारत एकजुटता की भावना और रणनीति दोनों के तहत अफ्रीका के साथ खड़ा है। हमनें अपनी क्षमताओं के हिसाब से एक खुले दिमाग और बड़े दिल के साथ सहयोग किया है। आपकी प्राथमिकताएं हमारी पहलें तय करती हैं। हमने मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना किया है और आज भी कर रहे हैं खासकर तब जब सार्वजनिक स्वास्थ्य की बात आती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यादगार यात्रा के दौरान उनकी ओर से टीबी और एचआईवी-रोधी दवाएं उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धताओं को भी आज इतने ही प्रभावी ढंग से लागू किया गया है। और भी बहुत कुछ है जो किया जा सकता है और किया जाना चाहिए, खासकर एक ऐसे विश्व में जो कोविड महामारी से उबर रहा है।

मुझे उम्मीद है कि मेरी यात्रा ने सहयोग के एक नए एजेंडे में योगदान दिया है। मेरा विश्वास है कि यह प्रक्रिया अब शुरू हो चुकी है। इसने दोनों देशों के संबंधों के बारे में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति केन्याटा के दृष्टिकोण के आधार पर आकार लिया है। मुझे अपने केन्याई समकक्ष, रेशेल ओमामो और कई अन्य कैबिनेट सचिवों के साथ इस पर गहन चर्चा करने का अवसर मिला, जो हमारे साझा एजेंडे के प्रमुख पहलुओं से जुड़े हैं।

1956 में, महात्मा गांधी की प्रतिमा, जिस पर मुझे फूल चढ़ाने का अवसर मिला था, का अनावरण इसी विश्वविद्यालय में किया गया था। छह दशक बाद, इस पुस्तकालय का आधुनिकीकरण हमें एक साथ लाने के उन पलों की याद दिलाता है। इसलिए, मैं इस बात पर जोर देते हुए अपना भाषण समाप्त करना चाहता हूं कि महात्मा के शब्दों में, हम जो परिवर्तन चाहते हैं, वह केवल अधिक से अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और इसके परिणामस्वरूप उपजी मजबूत क्षमताओं के द्वारा ही संभव है। भारत और केन्या के पास यह प्रदर्शित करने का अवसर है कि उनकी साझेदारी से कितना फर्क पड़ सकता है। यह केन्या के मूल मंत्र , आइए हम कड़ी मेहनत और एकता से काम करें के पूर्णत अनुकूल है।

धन्यवाद!

Comments
टिप्पणियाँ

टिप्पणी पोस्ट करें

  • नाम *
    ई - मेल *
  • आपकी टिप्पणी लिखें *
  • सत्यापन कोड * Verification Code