एनआरआई/पीआईओ द्वारा नए पहल कदम
सेवक परियोजना : भारत में गांवों के लिए देखरेख तक पहुंच के लिए एक प्रायोजिक परियोजना
संवर्धित जागरूकता तथा रोग और स्वास्थ्य संवर्धन के निवारण/प्रबंधन की जानकारी के माध्यम से ग्राम समुदायों में स्वच्छता स्वास्थ्य और शिक्षा।
अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ फिजीशिंयस ऑफ इंडिया (एएपीआई, डा. ठाकुर जी. पटेल, पद्मिनी बालगोपाल और रंजीता मिश्रा) ने भारत में चार गांवों में अध्ययन किया और यह आकलन किया कि मधुमेह और हाइपरटेंशन की उच्च विद्यमानता के साथ-साथ देखरेख और निवारात्मक देखभाल तक पहुंच वहां
की एक बड़ी समस्या है। तमिलनाडु राज्य में अलामरथुपट्टी, समियारपट्टी और पिलयार नाथम के ग्रामीण क्षेत्रों में चार अध्ययन तथा गुजरात राज्य में काराखाड़ी गांव में किए गए एक अन्य अध्ययन ने यह दर्शाया कि ग्रामवासियों को स्वास्थ्य देख-रेख तक अत्यंत सीमित पहुंच थी
तथा वहां ऐसे प्राथमिक स्वास्थ्य देखरेख केन्द्र भी नहीं थे जो पुराने रोगों का उपचार कर सकते थे। भारत की सत्तर प्रतिशत जनसंख्या (700 मिलियन लोग) गांवों में रहते हैं तथा भारत के इस विशाल भाग को उनकी संसाधन-विहीन संरचनाओं में शिक्षित करना और उन्हें स्वास्थ्य देखरेख
मुहैया कराने का महत्व एक अविलंब और व्यवहार्य मुद्दा है। मधुमेह, हाइपरटेंशन, कार्डियोवैस्कुलर रोगों तथा इनके जोखिम कारकों के बारे में सामान्य जानकारी में सुधार करने तथा स्वस्थ जीवन-शैली को प्रोत्साहित करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए जाने चाहिए।
काराखाड़ी में, लगभग 300 ऐसे व्यक्ति हैं जो हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं तथा उनका अभी तक निदान भी नहीं हुआ है, उनका उपचार नहीं किया गया है तथा संभवत: उनके स्वास्थ्य के लिए कोई दीर्घकालिक प्रबंधन नहीं है। डा. पद्मिनी बालागोपाल ने इस सूचना की जानकारी यूएसए में डा.
पटेल को दी। उन्होंनें उन्हें डा. कमल पाठक, डीन से बात करने के लिए कहा जिन्होंने लोगों की देखभाल के लिए एक वैन भेजी। परंतु यह केवल अस्थायी व्यवस्था थी क्योंकि वह गांव बड़ौदा से दूर था। गांव में पुराने रोगों की देखरेख करने की असमर्थता से डा. पटेल चिंतित थे जिन्होंने
देखरेख संबंधी पहुंच के मुद्दे का समाधान करने के लिए यूएस नेवी कोपर्समैन के साथ अपने अनुभव के आधार पर सेवक की संकल्पना आरंभ की। यह एक प्रायोगिक परियोजना थी जिसका उद्देश्य ग्रामीणों की स्वास्थ्य देखरेख संबंधी आवश्यकताओं में कमी को दूर करना था। यह परियोजना यूएस
नेवी में इंडिपेंडेंट ड्यूटी कोर्प्समैन (आईडीसी) पर तैयार की गई है। आईडीसी स्वास्थ्य-देखरेख में रुचि लेने वाले हाईस्कूल स्नातक हैं। उन्हें 12 माह का प्रशिक्षण दिया जाता है और फिर मैरीन कोर्प्स यूनिट अथवा नेवी पोत निर्दिष्ट कर दिए जाते हैं तथा उन्हें 'डाक' के
नाम से पुकारा जाता है। वे प्राथमिक देखरेख प्रदान करते हैं, चोटों का उपचार करते हैं, आपदाओं को नियंत्रित करते हैं तथा पर्यावरणीय जांच जैसे आर्द्रता, तापमान और स्वच्छता, संचालित करने के साथ-साथ नाविकों की निवारक देखरेख भी करते हैं। हमने अपने सेवक कार्यक्रम में
ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य देखरेख पहुंच प्रदान करने में सहायता करने के लिए यह मॉडल अपनाया है।
मधुमेह, हाइपरटेंशन, मोटापे के शिकार निवासियों की जांच करने तथा इन प्राचीन रोगों का अनुश्रवण करने के लिए गुजरात में प्रति जिला एक गांव (26) का चयन किया जाएगा। इस परियोजना में ग्रामों के साथ समन्वय करना तथा चिकित्सा और/अथवा गैर-चिकित्सा पृष्ठभूमियों के मेधावी
व्यक्तियों की पहचान करना शामिल है जिसके तहत 100-1500 की जनसंख्या वाले एक गांव से एक व्यक्ति चुना जाएगा। इन व्यक्तियों को फिर 'सेवक' बनने के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। सेवक गांव में मधुमेह, हाइपरटेंशन के रोगियों की जांच करेंगे, विभिन्न रोगों के प्रति
उच्च जोखिम में घिरे लोगों पर निगाह रखेंगे तथा पुराने रोगों से पीड़ित ऐसे रोगियों को देखेंगे जिन्हें उपचार प्रदान किया जा रहा है तथा इसके अलावा वे स्वस्थ जीवनशैली पूर्ण शिक्षा और निवारात्मक देखरेख भी प्रदान करेंगे। इस परियोजना का लक्ष्य मधुमेह और हाइपरटेंशन
की मानकीकृत जांच संचालित करना तथा गांवों में रहने वाले सेवकों द्वारा गांव में देखरेख सुविधाएं प्रदान करना है। सेवकों की पहचान कर लिए जाने पर, उन्हें निदान करने तथा मधुमेह और हाइपरटेंशन का उपचार करने और हृदयघात, दिल के दौरे, ट्रॉमा ट्रिएज, संक्रमणकारक रोगों,
गुर्दे के रोगों, दर्द के संकेतों तथा कारणों, डायरिया, टीकाकरण, स्वच्छता, जल शुद्धता, कुशल चूल्हों (स्टोव) के प्रयोग में तथा इस संबंध में प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए बड़ौदा लाया जाएगा कि जीवनशैली में सुधार संबंधी शिक्षा किस प्रकार प्रदान की जाए। वे यह सुनिश्चित
करने में सहायता करेंगे कि टीबी, एचआईवी और मलेरिया के रोगी अपनी दवाएं ले तथा मधुमेह और हाइपरटेंशन के रोगी नियमित रूप से जांच के लिए आएं तथा स्वास्थ्य कक्षाओं में भाग लें। गर्भवती महिलाओं की जांच भी मधुमेह और हाइपरटेंशन के लिए की जाएगी तथा उन्हें अस्पतालों में
प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा तथा वे प्रात: और शाम के समय स्वास्थ्य जांच का किसानों द्वारा अनुपालन करने में भी सहायता प्रदान करेंगे। उन्हें कम्प्यूटर तथा टेलीमेडिसीन की शिक्षा भी दी जाएगी।
उन्हें अन्य प्रदाताओं के साथ नेटवर्क स्थापित करना तथा स्वास्थ्य संबंधी मामलों को तालुका क्लीनिक और जिला अस्पताल में रेफर करना भी सिखाया जाएगा। सेवक किसानों की चिकित्सा संबंधी समस्याओं पर डाटाबेस अनुरक्षित करेंगे तथा स्वास्थ्य शिक्षा और मॉनीटरिंग के लिए उच्च
जोखिम वाले समूहों को लक्ष्य बनाएंगे। परिभाषित मापदण्डों जैसे डेमोग्राफिक्स, क्रोनिक कंडीशंस, बीपी, वजन तथा किसी अन्य निवारक स्वास्थ्य जटिलता जैसे विभिन्न परीक्षणों के लिए तारीखें (स्कूल गुसेक, क्लोनोस्कोपी, पीएसए, मैमोग्राम्स, पैप्स्मेयर आदि तथा वयस्कों और
बच्चों, दोनों के लिए टीकाकरण) को अनुरक्षित करेंगे।
भारत में ग्रामीण स्वास्थ्य
ग्रामीण भारत में समस्त जनसंख्या के लिए स्वास्थ्य देखरेख का संगठित वितरण मौजूद नहीं है। निवारक स्वास्थ्य देखरेख गांवों में उपलब्ध नहीं है। स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है तथा स्वच्छता भी पर्याप्त नहीं है। हालांकि टीकाकरण उपलब्ध है, परंतु यह उन सभी को कवर नहीं करता
जिनको इसकी आवश्यकता है। कुछ गांवों में, ऐसे स्वास्थ्य सेवक उपलब्ध हो सकते हैं जो उनके आने के दिनों पर ही केवल विषय देखरेख ही उपलब्ध कराते हैं। देखरेख का द्वितीय स्तर ग्रामीण स्वास्थ्य क्लीनिक में है जहां औषधियां उपलब्ध नहीं हैं अथवा स्वास्थ्य देखरेख अल्पविकसित
है। देखरेख का तीसरा स्तर जिला स्तर पर है जहां बेहतर देखरेख उपलब्ध है, परंतु पूर्ण बुनियादी देखरेख प्रदान करने के लिए आवश्यक उपायों का यहां अभाव है तथा यहां अत्यधिक भीड़-भाड़ भी है। देखरेख का चौथा स्तर शहरों में स्थित अस्पताल है जहां अत्यधिक भीड़ है तथा वे
आकस्मिक देखरेख ही उपलब्ध कराते हैं। इनमें से अधिकांश सुविधाओं का वित्त-पोषण सरकार द्वारा किया जाता है। ये सुविधाएं बेहतर तरीके से अथवा पर्याप्त रूप से वित्त-पोषित नहीं हैं। इनमें जांच अथवा निवारक देखरेख के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है। जीवन-शैली परिवर्धन
शिक्षा उपलब्ध नहीं है। भारतीय ग्रामीण खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं तथा उस समय वे अपनी मजदूरी खो देते हैं, जब उन्हें इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता है। उन्हें निवारात्मक स्वास्थ्य देखरेख तथा आम रोगों जैसे मधुमेह और हाइपरटेंशन के लिए जांच की आवश्यकता होती
है।
ग्रामीण भारत में देखरेख तक पहुंच
हमें 'सेवकों' के संवर्ग का सृजन करते हुए देखरेख तक ग्रामीण पहुंच बनाने के लिए चिकित्सकों से परे सोचने की आवश्यकता है। चिकित्सकों का भारी अभाव है परंतु सेवकों का प्रयोग करके देखरेख और निवारात्मक चिकित्सा तक विद्यमान भारी अंतर को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
चिकित्सकों का प्रयोग उन रोगियों का उपचार करने के लिए अधिक कार्यकुशलता के साथ किया जा सकेगा जिन्हें उनकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है। गांव में सेवक की उपस्थिति स्वास्थ्य संबंधी आवश्यिकताओं की पूर्ति करेगी तथा इससे एक स्वस्थ और अधिक कार्यकुशल भारत का निर्माण होगा।
सेवक परिकल्पना 'ग्राम स्वराज्य' के गांधीवादी सिद्धांतों के भीतर आती है। प्रायोगिक परियोजना के लिए औषधियां, ग्लूकोमीटर, बीपी मशीनें एएपीआई द्वारा उपलब्ध कराई जाएंगी। इस परियोजना की निरंतर मॉनीटरिंग परियोजना के समन्वयकों द्वारा की जाएगी।
सेवक का उत्तरदायित्व
वास्तव में सेवक स्वास्थ्य देखरेख प्रदाताओं का ही विकल्प है तथा उन्हें प्रतिस्पर्धी नहीं समझा जाना चाहिए। सेवक स्वास्थ्य देखरेख प्रदाताओं को उन तंत्रों का उपचार करने में अधिक दक्ष बनाएंगे जिन्हें उनकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है। देखरेख तक एक्सेस परियोजना ही मधुमेह,
हाइपरटेंशन तथा सीएडी की उच्च दर को नियंत्रित करने और उसकी जांच करने का एकमात्र समाधान हो सकती है। यह परियोजना इसके व्यापक पैमाने पर क्रियान्वयन से पूर्व गुजरात में एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में संचालित की जाएगी। सेवकों का प्रशिक्षण तीन माह की अवधि के लिए
होगा।
सेवक के लिए मानदण्ड
व्यक्ति को इन मानदण्डों की पूर्ति करनी चाहिए। उसका निवास गांव में ही होना चाहिए; यदि संभव है, तो उसके पास स्नातक डिग्री हो परंतु बारहवीं तक की शिक्षा भी उचित होगी। वे खेतों में काम करना जारी रख सकते हैं, परंतु उन्हें अपने समुदाय में कार्य करने की इच्छा भी होनी
चाहिए। बालिकाओं का चयन कार्यक्रम के लिए किया जा सकता है परंतु तभी तक जितनी अवधि के लिए वे उस गांव में रहने की योजना बनाती हैं। उन्हें बड़ौदा में तीन माह का प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा (रहने और भोजन की व्यवस्था की जाएगी)। उन्हें अंग्रेजी पढ़नी आनी चाहिए परंतु
उन्हें इसमें प्रवीण होने की आवश्यकता नहीं है। हम मार्च, 2010 में प्रथम कक्षा आरंभ करने की योजना बना रहे हैं।
प्रायोगिक परियोजना तीन वर्ष के लिए होगी जिसे अधिकतम पांच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। कार्यक्रम के चालू रहने के दौरान, कोई भी राज्य अथवा गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) इसे अपने राज्य अथवा समुदाय के लाभ के लिए अपना सकता है। इस समस्या की व्याप्ति इतनी व्यापक है कि जैसे-जैसे
यह कार्यक्रम आगे बढ़ेगा, इससे सीखे गए सबको तथा इसके लाभों को साझा करना महत्वपूर्ण है। इस कार्यक्रम को अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ फिजीशियंस ऑफ इंडियन ओरिजन, बड़ौदा मेडिकल कॉलेज, एएपीआई (एनवाई-एनजे) के साथ टेक्सास ए एंड एम यूनीवर्सिटी द्वारा संचालित किया जाएगा।
देखरेख के मानकों को सुनिश्चित करने तथा यह देखने के लिए कि क्या ग्रामीणों की स्वास्थ्य देखरेख संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति की जा रही है, इस कार्यक्रम की प्रत्येक तीन माह में समीक्षा की जाएगी। परियोजना के प्रधान समन्वयक ठाकुर जी. पटेल, एमडी हेमंत पटेल, एमडी, पद्मिनी
बालागोपालन, पीएच.डी तथा रंजीता मिश्रा, पीएचडी (यूएस), कमल पाठक, एमडी, डीन, बड़ौदा मेडिकल कालेज, श्री कीर्ति डी. पटेल, भारतीय सेवा समाज और बीना सेंगर, पीएचडी, सुदर्शन फाउंडेशन ट्रस्ट होंगे।
किसी भी प्रश्न के लिए कृपया संपर्क करें:
ठाकुर जी. पटेल, एमडी. एमएसीपी, चेयरमैन,
पब्लिक हैल्थ कमेटी (एएपी),
10980 राइस फील्ड प्लेस,
फेयरफैक्स स्टेशन, वीए 22039, यूएसए
दूरभाष : 703-425-7573
भारत : 09638202360
ई-मेल : thakorg@gmail.com