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इंडिया ग्लोबल वीक 2020 में विदेश मंत्री का साक्षात्कार

जुलाई 12, 2020

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: इंडिया ग्लोबल वीक सत्र "पुनरुद्धार में भागीदार – एक बेहतर नई दुनिया को आकार देने में भारत की भूमिका” में आपका स्वागत है। मेरा नाम एडी लूश है। मुझे वास्तव में भारत के विदेश मंत्री, डॉ. जयशंकर के साथ जुड़कर बहुत खुश हुई है। उन्होंने अपना करियर राजनीतिज्ञ से राजनीति में बदला है। मैं उनके करियर की कुछ मुख्य बातें उजागर करना चाहूंगी। 80 के दशक की शुरुआत में मॉस्को, राष्ट्रपति रीगन के दूसरे कार्यकाल के दौरान राजनैतिक अधिकारी के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका, बर्लिन की दीवार गिरने के बाद हंगरी और चेक गणराज्य, 90 के दशक में टोक्यो, वे 2009 में चीन में भारत के राजदूत थे, और ओबामा प्रशासन के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत थे। तो, डॉ. जयशंकर, इससे पहले कि हम आपके विदेश मामलों के पोर्टफोलियो को देखें, थोड़ी देर महामारी के बारे में बात करते हैं। मैं वर्तमान में यूके में रहती हूं, जहां हम देश को वापस खोलने की प्रक्रिया में हैं, लेकिन भारत में अभी भी मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन अगर मैं मामले प्रति मिलियन या मौतें प्रति मिलियन के आधार पर तुलनात्मक आंकड़ों को देखती हूं, तो भारत एक अधिक बेहतर प्रक्षेपवक्र पर नज़र आता है। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि भारत इस महामारी से कैसे निपटा है?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: वास्तव में, मैं आपको बताना चाहूँगा कि एक मंत्री और एक नागरिक होने के अलावा मैं मंत्रियों के एक समूह का भी सदस्य था जिसे कोरोनावायरस के प्रति नीतिगत प्रतिक्रिया बनाने का कार्य सौंपा गया था। तो देखिए, जब महामारी पूरे विश्व में फैलना शुरू हुई, तो मेरे विचार में हर देश के पास था एक ही विकल्प था कि आप इसके लिए किस तरह प्रतिक्रिया देंगे और अपनी ताकतों का इसमें कैसे उपयोग करेंगे। कुछ देशों के पास बेहतर परीक्षण क्षमता थीं जैसे कि दक्षिण कोरिया, कुछ देशों जैसे कि जर्मनी के पास बेहतर आईसीयू प्रणाली थी। हमारे मामले में, आप जानते हैं कि अपनी क्षमताओं और सीमाओं को पहचानते हुए, हमने काफी हद तक सोशल डिस्टेंसिंग का सहारा लेने का विकल्प चुना। हमने बहुत पहले ही लॉकडाउन लागू कर दिया था, हमने बहुत पहले ही यात्राओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, और उन तीन महीनों में अच्छे नतीजे मिले, हाँ, हालांकि आज मामलों की संख्या बहुत अधिक है, लेकिन यह आबादी की तुलना में इतनी ज्यादा अधिक भी नहीं है। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि, भले ही हम मामलों की संख्या में तीसरे स्थान पर हैं, लेकिन यदि आप मौतों की संख्या को देखते हैं तो हम आठवें स्थान पर हैं। हमारी रिकवरी रेट 61% है और इससे हमें जो अतिरिक्त समय मिला है उसकी वजह से न केवल महामारी का प्रसार धीमा हुआ है बल्कि अच्छी तरह से तैयारियां करने का भी मौका मिला है। जब हमारे देश में कोरोनावायरस का प्रहार हुआ, तब हम कोई निजी सुरक्षा उपकरण नहीं बना रहे थे। लेकिन, आज हम इस क्षेत्र में यथोचित रूप से आत्मनिर्भर हैं। हमने इसकी प्रतिक्रिया में अपने फार्मास्युटिकल कार्यों को बढ़ाया है। अस्पताल प्रणाली ने भी इसकी प्रतिक्रिया दी है। लेकिन अब भी हमारे सामने चुनौतियां हैं। हम इस चीज से पूरी तरह से अवगत हैं। मुझे लगता है कि अगले कुछ सप्ताह और महीनें कठिन होने वाले हैं। लेकिन, मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए, मुझे लगता है कि हमने सही चुनाव किया है और इस परिस्थिति के तहत हमने उतना ही अच्छा प्रदर्शन किया है जितना कि कोई और देश करता।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: अगर मैं आपको एक क्रिस्टल बॉल देती हूँ और अगर आप उसमें भविष्य देख सकते हैं तो आपको क्या लगता है कि महामारी का कोई टीका कब तक बनेगा या लोगों में इससे प्रतिरक्षा कब तक बनेगी, आपको क्या लगता है कि कोरोनावायरस के बाद की दुनिया में भारत की क्या स्थिति होगी?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री:
मेरे विचार में, जहाँ तक बात टीके की है, जैसा कि आप जानते होंगे, कि यह एक ऐसा क्षेत्र में जिसमें भारत पर्याप्त ताकत रखता है। हम विश्व में सबसे बड़े टीका निर्माता है। और मुझे लगता है कि एक बार इसका कोई टीका या अनेक टीकों की खोज होने के बाद, स्पष्ट है कि हम उसे सुलभ और किफायती और बाकी की दुनिया के लिए उपलब्ध बनाने की दिशा में अपनी भूमिका निभाएंगे। वास्तव में, टीका से पहले, मैं ये भी बताना चाहूँगा, वास्तव में इस समय में जब कोरोना से संबंधित दवाओं की तलाश चल रही थी, तब हमने वास्तव में दुनिया को ये दवाएं उपलब्ध करवाई हैं। हमने 120 से अधिक देशों में दवाओं की आपूर्ति की है, जिनमें अनेक छोटे देश शामिल हैं जो सामान्यतः इस तक पहुँचने में सक्षम नहीं थे क्योंकि उन दवाओं की मांग बहुत अधिक थी। इसलिए, हमने कुछ दवाएं उनके लिए भी अलग से रखी थीं। और हमने कैरीकॉम या प्रशांत द्वीप के देशों के लिए यह अतिरिक्त प्रयास भी किया। उदाहरण के लिए, हमने अपने अफ्रीकी भागीदारों को भी यह दवाएं उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया। तो मेरे विचार में, कोरोना के बाद की दुनिया में, मुझे क्रिस्टल बॉल की जरूरत नहीं, बल्कि मैं ये साफ-साफ देख सकता हूँ कि हम सक्षम रहेंगे, हमें कई सारी स्वास्थ्य नीतियाँ बनानी होंगी और चिकित्सीय तौर पर इसकी प्रतिक्रिया देनी होगी। लेकिन, मैं आपको ये बताना चाहूँगा कि, जिसके लिए मुझे क्रिस्टल बॉल की जरूरत होगी, शायद कोरोना के बाद की दुनिया में राजनीति बढ़ जाएगी। मेरी समझ में, ऐसे कई प्रचलन थे जो कोरोना वायरस से पहले मौजूद थे, ये प्रचलन तेजी से बढ़ सकते हैं। मेरा अर्थ है कि पिछले छह महीनों में दी गई प्रतिक्रिया में हमने जो कुछ भी देखा है, उदाहरण के लिए, हमने देखा है कि कई देशों ने इस स्थिति में राष्ट्रवाद का सहारा लिया। आप जानते हैं, लोग अपनी ही चिंता में मग्न हैं। मेरा अर्थ है, मैं समझता हूँ कि ये कुछ हद तक सही है, लेकिन मैं एक ऐसी दुनिया देख सकता हूँ जहाँ कई लोगों का तर्क और भी पैना हो जाएगा। मुझे लगता है कि विश्वास की समस्या सामने आएगी, लचीली आपूर्ति श्रृंखला पर सवाल उठेंगे। तो, आगे की दुनिया और भी चुनौतीपूर्ण दुनिया होगी।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर:
तो, आइए यूनाइटेड किंगडम के साथ आपके संबंधों को देखते हैं। पिछले साल, आपने इस कार्यक्रम में कहा था कि यूके भारत के लिए एक प्रमुख भागीदार है। आप संबंधों के इन परिरेखाओं को कैसे देखते हैं? और, ब्रेक्सिट के बाद के युग में संक्रमण के दौरान आपकी प्राथमिकताएँ क्या होंगी?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: खैर देखिए, मुझे कुछ हद तक ऐसा लगता है कि कितने देश यूके के साथ जुड़ेंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि यूके अपने-आप में कैसे विकसित होता है। और, ब्रेक्सिट, जो कोरोनावायरस की मुख्य समस्या के कारण विस्तारित हो गया है, के बाद के समय में क्या होगा यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। तो आप जानते हैं, ऐसा कह कर मैं यह बताना चाहता हूँ कि मैं आपको भारत का परिप्रेक्ष्य नहीं दे रहा हूँ, ठीक है, यूके कई तरह का है। एक ऐतिहासिक यूके है, जो एक तरह से वैश्विक यूके है, जो अभी भी पूरी दुनिया में अपना प्रभाव और हित बनाए हुआ है। ब्रेक्सिट के बावजूद, लन्दन शहर वाला यूके है, यूरोपियाई यूके है, मेरा अर्थ है कि आप अभी भी यूरोप के साथ बहुत ही घनिष्ठता से जुड़े हैं। एक बहुत ही अनोखा ट्रांसअटलांटिक यूके है, क्योंकि अमेरिकियों के साथ करीबी संबंध अब भी इस हद तक बरक़रार है जो किसी और के साथ नहीं है। यूके के लिए एक मंच है, एक ऐसा यूके जो बहुत अधिक बहु-सांस्कृतिक, बहुमुखी यूके है और जो पिछले 50-60 सालों में विकसित हुआ है। और, मैं कहूँगा, शायद कई तरह से, आज का यूके बहुत ही अधिक अभिनव है। मेरा अर्थ है, जब कोई लंदन शहर की कल्पना करता है, तब लोग अक्सर ये भूल जाते हैं कि ये विशाल वैज्ञानिक प्रौद्योगिकीय क्षमताओं वाला शहर भी है, यहाँ कई चीजें हैं, विश्वविद्यालय की शोध संस्थानें हैं। तो, मेरे लिए, एक भारतीय होने के नाते, विदेश मंत्री होने के नाते, जब मैं इसे देखता हूँ, मुझे उन कई यूके के सम्पूर्ण वर्णक्रम के बारे में सोचना पड़ता है। ब्रेक्सिट के बाद रुख जैसे-जैसे साफ होता जाएगा, अंतर्राष्ट्रीय संतुलन बनता जाएगा। लेकिन, जाहिर तौर पर, ये सभी मेरा दृष्टिकोण है।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: तो, आपने बताया कि कई यूके हैं और एक नया भारत है, और क्या आप बहुपक्षवाद के बारे में और बहुपक्षीय संस्थानों के अधीन यूके-भारत के संबंधों पर कुछ कहना चाहेंगे? कई लोगों का कहना है कि कोरोनावायरस के परिणामस्वरूप या इसके हिस्से के रूप में हमें बहुपक्षवाद खतरे में नज़र आ रहा है। और क्या आप इनमें से कुछ बहुपक्षीय संस्थानों में यूके के साथ भारत के सहयोग और समझ के स्तर के बारे में कुछ बाताना चाहेंगे?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री
: खैर, मैं आपकी बात से इनकार नहीं कर सकता, जो आपने बहुपक्षवाद के बारे में कहा, मेरे विचार में यह वर्तमान में खतरे के अधीन नहीं है, पर बेशक तनाव में है। लेकिन, इसी के साथ, आप जानते हैं, बहुपक्षवाद कमजोर होने के साथ-साथ बहु-ध्रुवीयता बढ़ रही है। अब मैदान में कई खिलाड़ी उतर चुके हैं, खेल में केवल विश्व राजनीति के शीर्ष खिलाड़ी ही नहीं हैं, लेकिन मैं कहना चाहूँगा, मेरा अर्थ है कि मध्य शक्तियां और क्षेत्रीय शक्तियां भी खेल में शामिल हो चुकी हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में क्या हो रहा है, यदि आप ये देखेंगे तो पाएंगे कि इस दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है उससे यह बिलकुल तरह से स्वायत्त है। तो, इस तरह कई सारे गतिशील घटक हैं। कई सारे गतिशील घटक हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए केंद्रीकृत प्रणाली का अभाव है। मेरे विचार में, यूके और भारत जैसे देशों के लिए यह महत्वपूर्ण है, जो विश्व के प्रति साझा दृष्टि, साझा मान्यता रखते हैं, और हम दुनिया को एक ही नज़र से देखते हैं, हमें बोध है कि क्या सही है और क्या गलत। तो ऐसे देश जो अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रति अपने दृष्टिकोण में मौलिक सिद्धांत साझा करते हैं, उनके लिए एक-साथ मिलकर करीब से काम करना आवश्यक है। और, इसी साल संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में हमारा चुनाव हुआ है। हम अगले दो सालों तक बने रहेंगे। अभी से दो साल बाद जी-20 के अध्यक्ष भी होंगे। तो, हम, बहुपक्षीय क्षेत्र में दृश्यमान होंगे और बेशक, मैं यूके को हमारे एक तटस्थ भागीदार के रूप में देखता हूँ।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: तो, आइए यूके-भारत संबंध के मुद्दे से हटते हैं। क्या आप मुझे चीन के साथ सीमा संकट के बारे में बता सकते हैं? और, वर्तमान में इसकी क्या स्थिति है?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: अभी तो बस इतना ही हुआ है कि हम डिसइंगेजमेंट की आवश्यकता पर सहमत हुए हैं क्योंकि दोनों पक्ष के सैनिक इससे बहुत करीब हैं, एक-दूसरे से बहुत करीब तैनात हैं। तो डिसइंगेजमेंट और डिएस्केलेशन की प्रक्रिया चल रही है, जिस पर सहमति बनी है। यह अभी-अभी शुरू हुआ है। यह प्रगतिधीन है। तो, इस समय मैं इससे कुछ ज्यादा नहीं कहना चाहूँगा।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: ठीक है, तो हम आपकी इस हिस्से की दुनिया के बारे में बात करते हैं और ऑस्ट्रेलिया के साथ आपके संबंधों पर नज़र डालते हैं। हाल के वर्षों में भारत-ऑस्ट्रेलिया का समीकरण विशाल रूप से मजबूत बना है। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री मॉरिसन के बीचे एक वर्चुअल शिखर सम्मेलन भी हुआ था। दो साल पहले, ऑस्ट्रेलिया ने कहा था, वह भारत को अपने शीर्ष तीन निर्यात बाजारों में शामिल करना चाहता है। तो इस संबंध में व्यापार का भी एक पहलु है। लेकिन, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय सुरक्षा और समृद्धि बढ़ाने का भी एक पहलु है। तो, क्या आप अपने संबंधों के बारे में थोड़ा विस्तार से बताना चाहेंगे?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: खैर, मुझे प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री मॉरिसन के बीच हुई उस वर्चुअल शिखर सम्मेलन में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। और, आप जानते हैं, निजी तौर पर, दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच अच्छी घनिष्ठता नज़र आई। उनके बीच की केमिस्ट्री बहुत मजबूत है। जब पिछले साल उन्होंने ओसाका और फिर बैंकाक में मुलाकात की थी तब मैं भी उनके साथ था। तो, आप जानते हैं, मैं ये कहूँगा कि वो दोनों लोग एक तरह से सीधे-सीधे बात करने वाले लोग हैं, मेरा अर्थ है, आप वही पाते हैं जो देखते हैं। तो वो दोनों काफी हद तक एक-जैसे हैं। लेकिन, यह उनके व्यक्तिव्य से बढ़कर है। मेरे विचार में, भारत और ऑस्ट्रेलिया एक-दूसरे के साथ अपना जुड़ाव क्यों बढ़ा रहा है इसके पीछे मजबूत रचनात्मक और नीतिगत कारणें हैं। मैंने पहले भी मध्य शक्तियों की भूमिका के बारे में उल्लेख किया था, और यदि आप आज देखेंगे तो पाएंगे कि ऑस्ट्रेलिया का इस क्षेत्र में बहुत दबदबा, बहुत प्रभाव, बहुत सारे हित भी हैं, लेकिन यदि आप आज कि इस दुनिया को देखते हैं जहाँ पहले की तुलना में क्षेत्रीय रचना काफी ज्यादा ढीली हो चुकी है और अनिश्चित है, लेकिन जिनका अतिव्यापन और अभिसरण भी हुआ है, तो दुनिया के अलग हिस्सों में स्थित देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे समान आधार की तलाश करें और उन क्षेत्रों की भी जिनमें वे दूसरे देशों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। और ऑस्ट्रेलिया के मामले में, इसका एक हिस्सा इंग्लिश है, इसका एक हिस्सा क्रिकेट है, ऑस्ट्रेलिया में हमारे लगभग सैंकड़ों हजारों छात्र पढ़ाई करते हैं, और हमारा आर्थिक संबंध भी बढ़ रहा है। लेकिन, इन सभी से परे, मेरे विचार में आज भारत और ऑस्ट्रेलिया इस बात को समझता है कि यदि उन्हें अधिक सुरक्षित, अधिक स्थिर, अधिक प्रत्याशित बनाना है तो उन्हें निश्चित क्षेत्रों में एक-साथ काम करना होगा, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को एक-साथ आने की आवश्यकता होगी। और आप यही होता हुआ देख रहे हैं। इसके अलावा, वर्चुअल शिखर सम्मेलन में कुछ बहुत महत्वपूर्ण समझौते हुए। समुद्री सुरक्षा, रक्षा बलों पर समझौतें, आपसी लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करने, साइबर सुरक्षा, खनन, कृषि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर सहमति बनी। तो इस प्रकार यह एक बहुत ही फलदायक कार्यक्रम रहा। लेकिन, जैसा कि मैंने कहा, ये एक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक प्रचलन है, मैं कहूँगा, आगामी दिनों में इस पर से पर्दा उठाने के लिए आपको अधिक मजबूत संबंधों की तलाश करनी चाहिए।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: मुझे व्यक्तिगत तौर पर सुनकर ख़ुशी हुई कि आप वैश्वीकरण के मामले को संबंधों के मायनों में सामने रख रहे हैं, बजाय उसके जो मैंने हाल में काफी सुना है जो ठीक वैसा ही है जिसके बारे में आपने पहले कहा था, वास्तविक राष्ट्रीयकरण, वास्तविक अंतर्मुखी होना। सिंगापुर के बारे में सोचते हुए, आप 2007 से लेकर 2009 तक सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त थे और सिंगापुर भारत के लिए लम्बे समय से सामरिक और आर्थिक भागीदार रहा है। आप कहाँ विकास के अवसर देखते हैं?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: आप जानते हैं, जब लोग मुझसे अक्सर सिंगापुर के बारे में सवाल पूछते हैं, तब उन्हें कम से कम आधे घंटे का जवाब मिलता है। और यह जवाब मुख्य रूप से सकारात्मक होता है और सिंगापुर के गुणगान में होता है क्योंकि मैं कहूँगा कि मेरी पोस्टिंग जितनी भी जगह हुई है, उनमें से यदि मैं किसी एक जगह को विश्व की धड़कन कहूँगा तो वो है सिंगापुर, आप वहां होते हुए भी दुनिया भर में क्या-क्या हो रहा है जान सकते हैं। मेरा अर्थ है कि इन मायनों में सिंगापुर जैसा कोई दूसरा देश नहीं है। लेकिन, सिंगापुर के साथ हमारे क्या संबंध में, उन अर्थों में कहूँ तो, देखिए, भारत में जो-जो बदलाव हुए हैं उसमें सिंगापुर की एक असाधारण बड़ी दिलचस्प भूमिका रही है, और इसकी शुरुआत 90 के दशक के शुरुआत से होती है जब हम एक तंग अर्थव्यवस्था से उबर रहे थे। और जब हमने दुनिया को देखा, और जब एक अलग सन्दर्भ बिंदु की तलाश की जो हमें अपनी नीतियां बदलने की अनुमति दे, तब सिंगापुर एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ बिंदु बनकर सामने आया। और, ये दिलचस्प है, अगर मैं आपको आंकड़ें बताऊँ कि सिंगापुर में आज 9000 भारतीय कम्पनियां हैं। तो ये आपको बताएगा कि हमारी वैश्विक आर्थिक गतिविधियों के अर्थों में सिंगापुर कितना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, सिंगापुर के साथ 18 बिलियन डॉलर का व्यापार होता है, जिससे यह हमारे शीर्ष व्यापार भागीदारों में से एक बन जाता है। यह एक ऐसा चैनल है जिसके ज़रिए बहुत सारा निवेश भारत में आते और जाते हैं। सिंगापुर के साथ हमारा बहुत करीबी रक्षा और सुरक्षा संबंध है। भारत से किसी अन्य विदेशी गंतव्य की तुलना में सिंगापुर के लिए सबसे अधिक संख्या में उड़ानें हैं। सिंगापुर की यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या बहुत अधिक है। मैं इस पर इसलिए बल देता हूँ क्योंकि यह एक बहुत ही अनोखा संबंध है और यह एक ऐसा संबंध है जो विश्व के साथ हमारे व्यापक संबंध का मूल है। यह केवल एक देश से देश का संपर्क नहीं है बल्कि मेरे अनुसार जैसा कि मैंने कहा यह दुनिया की धड़कन है। चूंकि, मैं अपेक्षा करता हूँ कि भारत विश्व के साथ अपना जुड़ाव बढ़ाएगा, इसलिए मैं स्वाभाविक रूप से कल्पना कर सकता हूँ कि भारत सिंगापुर के साथ भी अपने संबंधों को बढ़ाएगा।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: तो, सिंगापुर के अतिरिक्त, डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन प्रशासन दोनों के तहत संयुक्त राज्य के साथ भी आपका कुछ वृहद अनुभव रहा है। यह देखना बहुत ही दिलचस्प था कि हाल में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चार जुलाई की बधाई देने के ट्वीट के बाद, ट्रम्प ने ट्वीट करके कहा, धन्यवाद मेरे दोस्त, अमेरिका लव्स इंडिया। वास्तव में भारत एक ऐसा दुर्लभ देश है जिसने अमेरिका के संक्रमण को बहुत अच्छी तरह संभाला है और डीसी में वास्तविक द्विदलीय सद्भाव रखता है। तो इसके पीछे का राज़ क्या है? आप ऐसा कैसे कर लेते हैं?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: आप जानते हैं, मैंने इसके बारे में सोचा है, और मैं आपका सवाल आपसे ही पूछना चाहूँगा। पिछले चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बारे में सोचें, डोनाल्ड ट्रम्प, बरैक ओबामा, जॉर्ज डब्ल्यू बुश, और बिल क्लिंटन। मुझे यकीन है कि आप मुझसे सहमत होंगी कि दुनिया में इनके जैसे अलग-अलग लोग आपको नहीं मिलेंगे, लेकिन फिर भी इन चारों ने भारत के महत्व को समझा है और उस संबंध को मजबूत बनाने पर सहमत हुए थे। शायद इसमें हमारा भी कोई जादू रहा हो लेकिन मेरे विचार में यह काफी हद तक उनकी सोच पर भी निर्भर था। और, आज यूएस के साथ हमारा एक बहुत मजबूत राजनैतिक संबंध, सामरिक संबंध, बहुत मजबूत सुरक्षा रक्षा सहयोग है और आर्थिक संबंध भी बढ़ रहे हैं, और साथ ही एक बहुत ही अनोखा प्रौद्योगिकीय संबंध भी है। मेरा अर्थ है कि यदि आप देखेंगे कि दोनों देश किस तरह एक-दूसरे से पारस्परिक रूप से जुड़े हुए हैं, मैं केवल भारतीय-अमेरिकियों की बात नहीं कर रहा, मैं ये कहना चाहता हूँ कि सारे काम कैसे होते हैं और विचारों का कैसे आदान-प्रदान हो रहा है और अमेरिकी प्रौद्योगिकी के विकास में हमने जो भूमिका निभाई है यदि आप वास्तव में उसे देखेंगे, और लोगों से लोगों का संपर्क देखेंगे तो पाएंगे कि, मेरा अर्थ है, हमारी स्वतंत्रता के समय भारतीय अमेरिकियों की संख्या 30,000 थी और अब यह बहुत बढ़ चुकी है। आज इनकी संख्या लगभग 4 मिलियन हो गई है। और, इनमें से बहुत से लोग अब भी भारतीय हैं, ऐसे कई भारतीय भी हैं जो विभिन्न प्रकार के गैर-प्रवासी वीजा पर हैं। तो, मैं कहूँगा कि यह एक ऐसा संबंध रहा है जिसे तलाशने में लगभग छह दशक का समय लग गया, लेकिन इसकी तलाश पूरी होने के बाद अब यह अपने खोए समय की भरपाई कर रहा है। और, मेरे विचार में, जब हम सभी अन्य समानताओं की बात करते हैं, जिसके बारे में मैंने बहुत कुछ बताया है, तब मैं या तो यह बता रहा हूँ कि क्या हो रहा है या ये इससे कैसे जुड़ा है, मैं कहूँगा कि मान्यताओं से फर्क पड़ता है। आप जानते हैं, आज भारतीय और अमेरिकी एक-दूसरे के समाज को बेहतर ढंग से समझते हैं और इसलिए इसकी बहुत निकटता से प्रशंसा करते हैं। वे एक-दूसरे के लिए महसूस करते हैं, जबकि अधिकतर देश एक-दूसरे से करीब महसूस नहीं करते हैं। और ये सब सिर्फ तत्काल प्रशासन की वजह से नहीं है, हालांकि जाहिर तौर पर यह एक महत्वपूर्ण घटक है, मुझे लगता है कि अमेरिकी राजनीति के साथ हमारा एक बहुत मजबूत, बहुत विविध संबंध है, विशेष रूप से अमेरिकी कांग्रेस के साथ। आप जानते हैं, दोनों दलों के कांग्रेस के नेता हमारे लोग हैं, आप जानते हैं पिछले कुछ दशकों से हमारे संबंध मजबूत हुए हैं, पिछले दो दशकों में मजबूत हुए हैं। तो, मैं इसे निश्चित रूप से अपना एक बड़े संबंध के रूप में देखता हूँ, लेकिन अपेक्षा करता हूँ कि यह एक ऐसा संबंध बने जो विश्व के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण में भी अधिक महत्वपूर्ण साबित हो।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: तो, आपके लिए आखरी सवाल। व्यक्तिगत स्तर पर, हर कोई एक करियर राजनीतिज्ञ से राजनीति में कॉर्पोरेट कार्यकारी बनने तक की छलांग नहीं लगा सकता। तो, आप इन चुनौतियां का सामना कैसे कर रहे हैं?

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: खैर,मैं अभी तक जीवित हूँ, और मुझे लगता है कि आप जानते हैं, मुझे नहीं पता कि आपको यस मिनिस्टर सीरीज याद है या नहीं।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: हाँ!

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: सर हम्फ्रे और जिम हैकर दोनों बनना बहुत दिलचस्प है। रिकॉर्ड के लिए बताना चाहूँगा, अपने जीवन में पहले मैं बर्नार्ड भी था। लेकिन, मेरे विचार में, इस तरह का संक्रमण करने की क्षमता के पीछे का एक कारण शायद ये है कि आप एक साधारण सिविल सर्वेंट नहीं हैं, बल्कि एक राजनीतिज्ञ हैं। मुझे लगता है कि एक राजनीतिज्ञ होने के नाते, आप ज्यादा कुशल होते हैं, आप अपने परिवेश के मुताबिक ढलने में सक्षम होते हैं, आप बहुत उत्सुक होते हैं, हर समय सीखना चाहते हैं। राजनीति इसी के बारे में है। और निश्चित ही राजनीति की दुनिया मुझे बहुत आकर्षित करती है। एक एक साल हो चुका है। मुझे एमपी बने हुए एक साल और दो महीने हो चुके हैं, और मैं आपको ये बता सकता हूँ कि मैं अब भी सीख रहा हूँ लेकिन यह काफी दिलचस्प और अत्यधिक फलदायक है।

सुश्री एडी लूश, मॉडरेटर: डॉ. जयशंकर, इंडिया ग्लोबल वीक के दौरान यहां हमारे साथ जुड़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। यह एक दिलचस्प बातचीत रही।

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री: धन्यवाद। मुझे भी ख़ुशी हुई!

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