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यूएसआईबीसी इंडिया आइडिया शिखर सम्मलेन में विदेश मंत्री का साक्षात्कार (22 जुलाई, 2020)

जुलाई 30, 2020

श्री स्टीफन हेडली, मॉडरेटर: गुड मॉर्निंग और गुड इवनिंग!

आईडिया शिखर सम्मेलन, अमेरिका-चीन रिश्तों में नवीनता, रचनात्मकता और ऊँची सोच के बारे में है और हमारे यहाँ दो वक्ता हैं, जो न केवल दूरदर्शी हैं, बल्कि वे, इस गंभीर रूप से महत्वपूर्ण संबंध को विकसित करने में प्रमुख कार्यान्वयनकर्ता भी हैं। शिखर सम्मेलन बेहतर भविष्य के निर्माण पर केंद्रित है, लेकिन जैसा कि लगभग वर्णित है, वर्तमान वास्तव में अधिक चुनौतीपूर्ण है। इसलिए, मंत्री जयशंकर,मैं आपके साथ शुरू कर रहा हूँ, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत आज हमारे सामने मौजूद सभी सार्थक चुनौतियों को पूरा करने में कहाँ सबसे अच्छा सहयोग कर सकते हैं और हम सभी के लिए एक बेहतर भविष्य बनाने के लिए भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के पास एक साथ काम करने के प्रमुख तरीके क्या हैं।

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री : धन्यवाद, मैं सबसे पहले दूसरे छोर पर उपस्थित प्रत्येक का स्वागत करता हूँ, आप सभी को सुप्रभात। बड़ी संख्या में आप को देखना अद्भुत है। स्टीव, आप जानते हैं, मुद्दों के दो बड़े बास्केट हैं जिन्हें हमें देखना चाहिए। वास्तव में, पिछले 20 वर्षों में एक मजबूत संबंध के ये दोनों संचालक हैं। एक भू-राजनीतिक टोकरी है, दूसरा लोगों से लोगों के जुडाव का पक्ष है। हर एक संचालक अपने आप में एक खेल परिवर्तक है। उनके पास पिछले 20 वर्षों में जो कुछ है उससे वे एक दूसरे को मजबूत करते हैं, और मुझे लगता है कि वे वास्तव में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक बहुत ही टिकाऊ संबंध बनाने की क्षमता रखते हैं। अब ऐसा करने के लिए, मुझे भू-राजनीतिक पक्ष से शुरू करना चाहिए, मुझे लगता है, अमेरिका को, वास्तव में, अधिक बहुध्रुवीय दुनिया में काम करना सीखना होगा, अधिक बहुपक्षीय व्यवस्थाओं के साथ, उन गठबंधनों से परे जाना चाहिए जिनके साथ वास्तव में यह पिछली दो पीढ़ियों से बड़ा हुआ है। मैं अब विशेष रूप से भारत का उल्लेख कर रहा हूँ,हमारी स्वतंत्रता का इतिहास देखे और यह तथ्य कि हम वास्तव में विभिन्न स्थानों से आ रहे हैं, कई ऐसे मुद्दे होंगे, जिन पर हमारा अभिसरण अधिक होगा, कहीं-कहीं यह कम होगा, मुझे लगता है कि पिछले 20 वर्षों में जो हमने खोजा है और मैं देख रहा हूँ कि भविष्य में भी वास्तव में इसी अधिक सामान्य जमीन की खोज जारी रहेगी। अब, मुझे लगता है कि अमोस ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में दुनिया को बदलने में एक साथ काम करने के बारे में बात की थी और मुझे लगता है कि हमें जरूरत है, हममें एक साथ काम करके दुनिया को आकार देने की क्षमता है। हम समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबला, कनेक्टिविटी, कोरोना के मामले में कैसे प्रतिक्रिया देनी है, महामारी, यहाँ तक कि जलवायु परिवर्तन, ज्ञान अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर काम कर रहे हैं, इसलिए मुझे लगता है कि इसका एक बड़ा हिस्सा, वास्तव में, यह है कि हम अपने द्विपक्षीय एजेंडा को मजबूत करते हुए कैसे एक बड़े एजेंडे को आकार देते हैं। और, मेरी अपनी समझ है, आप जानते हैं कि कई पिछले प्रशासनों और वर्तमान प्रशासन के साथ काम करते हुए, वास्तव में सहज रूप से अमेरिकी प्रशासन उस तरफ बढ़ना चाहता है, कि वास्तव में भारत जैसे देशों को और अधिक प्रभावी ढंग से कैसे जोड़ा जाए । हमने उन परिणामों को देखा है और शायद उन्होंने अतीत में जानबूझकर ऐसा कम किया था, अब उन्हें इसे अधिक उद्देश्यपूर्ण ढंग से करने की आवश्यकता है। तो, यह भूराजनीतिक पक्ष है। लोगों-से-लोगों के पक्ष की ओर देखें, तो जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब संयुक्त राज्य अमेरिका में 3000 भारतीय अमेरिकी रह रहे थे। आज, 4 मिलियन से अधिक और शायद कुछ मिलियन और अधिक भारतीय नागरिक गैर-आप्रवासी वीजा पर रह रहे हैं। अब, इसने क्या किया है, आप जानते हैं, इसने उस रिश्ते को एक नई गुणवत्ता दी है, इसने एक छवि बनाई है, रिश्ते की ब्रांडिंग, पूरी तरह से नया नेटवर्क, साथ ही, हम देखते है, मुझे यकीन है कि सीनेटर आप मेरे साथ विशेष रूप से कांग्रेस के संबंध में सहमत होंगे । लेकिन, इन सब में सबसे अधिक इसने दोनों समाजों के बीच एक संबंध बनाया है। और, मेरे विचार में इस सम्बन्ध को कैसे पोषित किया जाए और यह एक ऐसा सम्बन्ध है जो आज बहुत ज्यादा प्रतिभा के इर्द-गिर्द केंद्रित है, प्रतिभा जो हमारी अर्थव्यवस्था के लिए, नवाचार के लिए, प्रौद्योगिकी के लिए, उस अर्थ में हमारे रिश्ते के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । इसलिए, अगर हम देखें तो इसे मैं एक वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था दुनिया कहूँगा। मेरे विचार में, कुछ प्रमुख उत्तर और सिद्धांत जिन पर हमें इस संबंध का निर्माण करना चाहिए, वास्तव में विश्वसनीय प्रतिभाओं को पहचानने और बनाने के लिए और अधिक लचीली आपूर्ति श्रृंखला बनाने पर है,जिस पर हम दोनों भाग लेते हैं।

श्री स्टीफन हैडली, मॉडरेटर: धन्यवाद सीनेटर। मैं उस पर वापस आना चाहता हूँ। लेकिन फिलहाल मैं मंत्री के पास वापस जाना चाहता हूँ और आपके द्वारा सहयोग में वृद्धि के लिए पहचाने गए तीन क्षेत्रों में से दूसरे को चुनना चाहता हूँ अर्थात व्यापार । हम जानते हैं कि व्यापार विवादास्पद हो सकता है और ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है। एक तरफ अमेरिका-भारत व्यापार अब 2015 में ही 100 बिलियन डॉलर से उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 142 बिलियन डॉलर हो गया है। दूसरी ओर हम बाजार तक पहुँच, टैरिफ, ई-कॉमर्स नीति या डेटा स्थानीयकरण आवश्यकताओं के बारे में अमेरिका की चिंताओं को देखते हैं और भारत की धारा-232 टैरिफ, एच1बी वीजा नीति और अन्य मुद्दों के बारे में चिंताएँ है। तो श्रीमान मंत्री, हम इन मुद्दों को कैसे हल कर सकते हैं और क्या हमें रिश्ते में मौजूदा अडचनों पर काम करने के बजाय उच्च लक्ष्य रखना चाहिए। एक मुक्त व्यापार समझौता, उदाहरण के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच क्या ऐसा कुछ है जिसमें भारत दिलचस्पी रखता है और क्या कुछ ऐसा है जिसे दोनों देशों को आगे बढ़ने के लिए प्राथमिकता के रूप में करना चाहिए।

डॉ. एस जयशंकर, विदेश मंत्री : स्टीव, मुझे लगता है कि कल मेरे सहयोगी, व्यापार मंत्री, श्री पीयूष गोयल ने इनमें से कुछ मुद्दों को संबोधित किया था। उन्होंने उन चर्चाओं का वर्णन किया जो उनके और यूएसटीआर के बीच हो रही हैं, इसलिए मैं वास्तव में उन्होंने जो कहा, उसे दोहराना या टिपण्णी करना नहीं चाहता, लेकिन मैं महत्व को समझता हूँ, न केवल महत्व को, बल्कि लगभग आर्थिक संबंधों की केंद्रीयता को, क्योंकि आखिर में, भले ही मैंने इसे एक राजनयिक के रूप में नहीं सीखा, मेरा विश्वास करें, मैंने इसे टाटा में सीखा, ये उपजीविका के मुद्दे हैं। ये ही वास्तव में वे मुद्दे हैं जिनके लिए देश एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं। लेकिन, मुझे लगता है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार के मुद्दों पर काम करते समय हमें बड़ा सोचने की जरूरत है। व्यापार के संदर्भ में, मैं कहूँगा कि पिछले कुछ वर्षों में आपकी शिकायतों और हमारी शिकायतों के बारे में ही बातचीत होती है, और आप जहाँ हैं, उसके आधार पर यह थोड़ा अलग दिखता है। मेरी समझ मे, यह हमारे आपसी हित में है और मुझे पता है कि श्री गोयल ने स्पष्ट रूप से कहा कि हमें इन लंबित समस्याओं को हल करने और कुछ बड़ा करने की जरूरत है। मुझे लगता है कि ऐसा करने में बहुत हित हैं । लेकिन व्यापार से परे, हमारे दोनों देशों के बीच एक बहुत बड़ा संबंध है, जो एक तरह का ज्ञान नवाचार कनेक्ट है। मुझे लगता है कि सीनेटर वार्नर ने भी इसका उल्लेख किया है। और, यदि आप देखते हैं कि दुनिया कहाँ जा रही है, तो मुझे लगता है कि सामानों के आदान-प्रदान और एक-दूसरे के लिए बेहतर निवेश वातावरण बनाने से परे, नवाचार और प्रौद्योगिकी की इस दुनिया में एक साथ काम करने की यह क्षमता, मुझे लगता है कि वास्तव में हमारा एक अलग रिश्ता सेट करेगी। वहाँ यह महत्वपूर्ण है कि, हमारे पास बड़ी तस्वीर पर एक बहुत मजबूत अभिसरण है। आप जानते हैं कि हम दुनिया को देखते हैं, परिदृश्य हमारे जैसा दिखता है, आकांक्षाएं अधिक दिखती हैं या अधिक साझा की जाती हैं। मुझे लगता है कि इन सभी में मूल्यों से निश्चित रूप से फर्क पड़ता है क्योंकि आखिर में जब आप प्रौद्योगिकी या नवाचार या ज्ञान पर काम करते हैं, तो भरोसा और विश्वास बहुत महत्वपूर्ण कारक होते हैं । इसलिए मैं, हमारी व्यापार समस्याओं को हल करने पर बहुत जोर दूँगा, आप जानते हैं कि कोशिश करना, हमारी गति को पहले की तुलना में एक उच्च गियर में ले जाती है। मुझे विश्वास है कि यह बहुत संभव है क्योंकि, मैं व्यापार पक्ष में जो कुछ भी हो रहा है, उसके बारे में मुझे बहुत जानकारी है। लेकिन, मैं एक और बात करना चाहूँगा, जो यह कि, भारत भी बदल गया है। नई क्षमताएं हैं जो भारत में उभर रही हैं, ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ आज हमारी उपस्थिति है और एक महारत है जो शायद कुछ साल पहले हमारे पास नहीं थी। तो एक अर्थ में, आप जानते हैं, हमारी बहुत सी बातचीत विश्व अर्थव्यवस्था की बातचीत के पुन: संतुलन की तरह हैं, जहाँ आप जानते हैं, नए आने वाले खिलाडियों की, स्थापित खिलाड़ियों की तुलना में कुछ अलग चिंताएँ हैं। जाहिर है कि स्थापित खिलाड़ी कई मामलों में, वर्तमान में उनके लिए काम करने वाले ऐसे फायदे लंबे समय तक जारी रखना चाहते हैं। मुझे लगता है कि उन लोगों को समायोजित करना उचित होगा, उभरती अर्थव्यवस्थाओं, उभरती कंपनियों, उभरती प्रौद्योगिकियों, और उस सामंजस्य की वैध चिंताएँ कि हम कितना अच्छा काम करते हैं, मुझे लगता है कि यह हमारे संबंधों के निर्माण का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है और वहाँ मेरा मानना है कि यूएसआईबीसी जैसे संगठन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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