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तीसरे यूएसआईएसपीएफ वार्षिक नेतृत्व शिखर सम्मेलन में विदेश मंत्री का साक्षात्कार (31 अगस्त, 2020)

सितम्बर 02, 2020

श्री टिम रोमर: सवाल आपकी लंबित नई किताब "इंडिया वे" के बारे में है और आप दुनिया के सभी परिवर्तन और बदलाव के बारे में बात करते हैं, आप इस बारे में बात करते हैं कि कैसे अपने पड़ोसियों के साथ एक अधिक साहसिक (अश्रव्य) संबंध की और दुनिया में भारत के लिए एक बड़े पदचिह्न की आवश्यकता है। यह एक रणनीति की तरह लगता है। आप इस रणनीति को कैसे हासिल करेंगे?

डॉ. एस जयशंकर: सबसे पहले टिम, आपको देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा और आपकी तरह मैं जॉन और मुकेश को धन्यवाद देना चाहता हूँ और मैं मानता हूँ कि उन्होंने यूएसआईएसपीएफ में एक शानदार काम किया है, और आप जानते हैं, मुझे उस समय की याद आती है जब मैं बोर्ड का हिस्सा था, इसलिए इस कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर प्राप्त करना बहुत अच्छा है। इस संदर्भ में, कि स्पष्ट है कि दुनिया में आज भारत की वृद्धि पूरे क्षेत्र के लिए उन्नति का एक ज्वार है। हमें पड़ोसी देशों में निवेश करने की जरूरत है। हमें अधिक कनेक्टिविटी परियोजनाएँ बनाने की आवश्यकता है, और हम पहले से ही ऐसा कर रहे हैं, मेरा मतलब है कि अगर आप देखें तो पिछले पाँच वर्षों में भारत अपने अधिकांश पड़ोसी देशों के लिए बिजली का आपूर्तिकर्ता है, उनमें से कई को ईंधन की आपूर्ति करता है, और जलमार्ग, बंदरगाह, रेलवे भी । इसलिए, आज भारत बहुत सारे क्षेत्रीय निवेश कर रहा है और हमारी समझ से हमें बहुत बेहतर, एकीकृत क्षेत्र, बहुत अधिक जुड़ा हुआ क्षेत्र हासिल होने जा रहा है । लेकिन, इससे भी आगे और भी करने की जरूरत है। आज हमारी एक बहुत महत्वाकांक्षी भारत-अफ्रीका नीति है, हम कोशिश कर रहे हैं, हम लगभग सभी देशों में मिशन और दूतावास खोल रहे हैं, अपनी परियोजनाओं का विस्तार कर रहे हैं, और निश्चित रूप से हम, और अधिक विकसित दुनिया के साथ, स्थापित बाजारों के साथ, फिर से, और अधिक व्यापार कर रहे है, और हम अधिक से अधिक व्यावसायिक गतिविधि को प्रोत्साहित करते रहे हैं। इसलिए, जब मैं एक बड़े भारतीय वैश्विक पहचान की बात करता हूँ, तो मेरा मतलब केवल राजनयिक पदचिह्न नहीं है, हम एक आर्थिक पहचान , प्रौद्योगिकी में प्रवेश, किसी रूप में सुरक्षा क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाह रहे हैं, और इसी तरह का यह संबंध है जिस ओर हमें लगता है कि हमें आगे बढ़ना चाहिए।

श्री टिम रोमर: तो इन पंक्तियों के साथ, मैं इसके बाद हमारे श्रोताओं और अनुयायियों, विशेष रूप से व्यापारिक समुदाय से लगभग सात या आठ प्रश्न लेना चाहता हूँ। अब हमारा व्यापार लगभग 149 बिलियन का है, वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच दो-तरफा व्यापार चल रहा है, जय, जैसा कि आप जानते हैं, और इस आह्वान पर, कई लोग पारस्परिक रूप से लाभप्रद संबंध बनाने में रुचि रखते हैं। इस आह्वान पर, लोग ऐसा कुछ क्या करें जो उन्हें, उन कुछ रुकावटों और बाधाओं पर काबू पाने में मदद कर सकता है, जो वर्तमान में दोनों पक्षों के लिए अधिक अनुकूल आर्थिक संबंध स्थापित करने के मार्ग में हैं?

डॉ. एस जयशंकर: भारतीय पक्ष की ओर से, स्पष्ट तौर पर, कोरोना के बाद हम अपना बहुत अधिक ध्यान कारोबार को आसान करने पर केंद्रित कर के ही आर्थिक सुधार की राह देखते हैं क्योंकि, वास्तव में उन विशिष्ट समस्याओं को देखना है जो कंपनियों के सामने हैं, इसलिए उस विशेष डोमेन में आप अधिक मजबूत (अश्रव्य) दृष्टिकोण देखेंगे। आप पहले से ही ऐसी नीतियाँ देख रहे हैं जो अधिक से अधिक व्यावसायिक ऊर्जा का प्रचार कर रही हैं, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन नीतियाँ। और इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर पक्ष में भी उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन नीतियाँ हैं। कृषि क्षेत्र में, किसानों के लिए बाजार को बहुत बेहतर तरीके से मुक्त करने की नीति । आपको कई और नीतियाँ मिलेंगी, जो निवेश को, और साथ मिलकर काम करने को आकर्षित करेंगी, प्रोत्साहित करेंगी। लेकिन, गियर्स को शिफ्ट करते हुए मैं कहूँगा, आप जानते हैं कि कोरोना काल के दो बड़े सबक हैं। एक, इसने वास्तव में हम सभी को बहुत अधिक डिजिटल बना दिया है, मैं आपसे इसी तरीके से बात कर रहा हूँ, यह विभिन्न तरीकों से हमारी दैनिक आदतों में शामिल है। यह लचीले और विश्वसनीय आपूर्ति परिवर्तन के महत्व को भी सामने लाया है। आप जानते हैं, हमें दुनिया में आज ऐसे साझेदारों की जरूरत है, जिन पर मुश्किलों में भी भरोसा किया जा सके । इसलिए, मुझे लगता है कि वे हमारे बीच भविष्य के व्यवसाय के बहुत महत्वपूर्ण ड्राइवर हैं। आज, भारत और अमेरिका के बीच राजनीतिक भरोसे का जो एक स्तर है, वह अतीत में नहीं था। इसका विस्तार विभिन्न डोमेन में हुआ है, जिसे हमने रक्षा परिदृश्य बदलाव में देखा है, ऊर्जा व्यवसाय भी यहीं से निकला है। मेरा अभिप्राय यही है कि हम उस सब का उपयोग वास्तव में व्यावसायिक पक्ष के लिए अधिक आसान और आत्मविश्वास का निर्माण कैसे कर पाते हैं। मैं मानता हूँ कि यह अगले एक या दो साल में होगा ।

श्री टिम रोमर: यह तो बहुत अच्छा है और मैं आपसे सहमत हूँ कि रक्षा संबंध वाणिज्यिक पक्ष के साथ-साथ कुछ और सफलताओं के मार्ग भी प्रशस्त कर सकते हैं। इसलिए, जब हम इस रक्षा संबंध के बारे में बात करते हैं, तो मंत्री जी और अमेरिका हर समय और अधिक करीब आ रहे हैं, आशा है कि जब अधिकारी अक्टूबर के अंत में तीसरी इंडो-यूएस दो जमा दो बैठक के लिए व्यक्तिगत रूप से मिलेंगे, तो ये वार्ताएँ कई महत्वपूर्ण बातों को कवर करने वाली हैं, शायद चीन के साथ तनाव, वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली, पनडुब्बी रोधी युद्ध, इंडो-पैसिफिक व्यापक सहयोग में, क्वैड्स के बारे में बात करना और क्वैड्स का विस्तार करना शामिल हो सकता है, हम नींव के एक और समझौते पर भी सफलता पा सकते हैं, इस पर कुछ साल पहले मैंने कुछ काम किया था, उन सभी तीनों को पूरा करने की कोशिश करें, हम आखिरी एक को पूरा कर सकते हैं। आपको क्या लगता है कि यह भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अक्टूबर में होने वाला है? क्या आपको लगता है कि संबंधों को गहरा करने की यह एक श्रृंखला बनने जा रही है और विशेष रूप से आप इसे कहाँ देखते हैं?

डॉ. एस जयशंकर:
टिम, आपको सुनते हुए कुछ क्षणों के लिए मुझे लगा कि आपके पास बैठक की पूरी कार्यसूची है। कम से कम, आप इसे सेट करने का तो प्रयास कर रहे हैं। मैं यह कहूँगा कि पिछले कई वर्षों में हमने देखा है कि यह हित के अभिसरण का एक बहुत मजबूत तरीका है, एक साथ काम करने की अधिक बड़ी क्षमता है । इसलिए, हमने देखा है कि शुरू में नीति प्रारंभ होती है, फिर इस पर कारवाई शुरू हो जाती है और फिर रक्षा व्यापार होता है । आज, अनेक अमेरिकी प्लेटफॉर्म हैं जो भारतीय सैन्य सूची में हैं। इसलिए जब आपके पास नीति, अभ्यास, उपकरण सभी एक साथ हों, तो जाहिर है कि निश्चित रूप से इनके सम्मिलन से रक्षा और सुरक्षा पक्ष मजबूत होता है। अब, हम इसे केवल किसी विशेष स्थिति के अनुरूप या किसी देश पर केंद्रित नहीं देखते, यह कोई अल्पकालिक मुद्दा नहीं है। यह भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका की एक साथ आने की एक बड़ी क्षमता है, और दुनिया को यह दिखाने की कि हम कई तरह से एक जैसा सोचते हैं, कई सारे डोमेन में हमारे हित एक समान हैं। तो, हम वास्तव में दुनिया को सुरक्षित करने, इसे बेहतर जगह बनाने के लिए क्या करते हैं? इसलिए, जरूरी नहीं है कि मैं इसे उन शब्दों में कहूँ जिनमें आपने इसे कहा था। मेरे लिए यह वृहद् भारत-अमेरिका का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है, और एक तरह से दुनिया की एक वृहद् स्थिति है जो अस्तित्व में आ रही है। मुझे लगता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत जैसे एक बाहरी देश की ओर देख रहा है जो कभी किसी भी गठबंधन की स्थिति में नहीं रहा है, अपने अतीत के मुकाबले कहीं अधिक खुलेपन के साथ। और, भारत भी अपनी ओर से वास्तव में ऐसे देशों को देख रहा है जिनके साथ स्पष्ट रूप से हितों की मजबूत पहचान है। इसलिए, यह अतीत की तुलना में कहीं अधिक व्यावहारिक होगा, यह इस बदले हुए परिदृश्य में, जिस में हम रह रहे हैं, हमारी समझ को दर्शाता है ।

श्री टिम रोमर: तो इन पंक्तियों के साथ, मैं आपके साथ पूरी तरह से सहमत हूँ कि रक्षा प्लेटफार्मों पर हमें बहुत सी सफलताएँ मिली हैं, इंडो-पैसिफिक पर समझौतों के रूप में, आक्रामक चीन के प्रति हमारे एकरूप साझा विचारों के रूप में । तथापि, सामान्यतः, आमतौर पर कुछ ऐसा होता है जो पॉप अप करता है, जय, इसका कारण राजनयिक समुदाय है, आप जैसे प्रतिभाशाली लोग हैं, जो बिना थके दिन रात काम करते हैं। भारत पर हाल मे एक व्यापर-प्रतिषेध लगा था, 101 रक्षा और हथियारों के आयात पर, जो अगले कुछ वर्षों में उत्तरोत्तर लागू किया जाना था और इससे कुछ मुद्दे पैदा हुए हैं। आप, लोगों को इन मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में कैसे सलाह देंगे, इस प्रकार के मुद्दों के माध्यम से कैसे नेविगेट करेंगे और उस एजेंडे की ओर जाएँगे जिस पर आप और मैं दो जमा दो मीटिंग के लिए अभी चर्चा कर रहे थे ?

डॉ. एस जयशंकर: मुझे यकीन नहीं है कि मैं " व्यापर-प्रतिषेध (एम्बार्गो)" शब्द का इस्तेमाल करूँगा। मेरी समझ यह है कि ये ऐसे उत्पाद हैं जिनकी हमें भारत में बनाए जाने की उम्मीद है और अगर वे भारत में बनने जा रहे हैं और जब मैं उस सूची को देखता हूँ, तो स्पष्ट रूप से मुझे लगता है कि इन उत्पादों को भारत में बनाया जाना चाहिए। इस तथ्य को देखते हुए कि हमारे पास यह विनिर्माण क्षमता है और आप जानते हैं, हम आज दुनिया की पाँच शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में से हैं। इसलिए, मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि उन्हें विदेश से खरीदने की आवश्यकता है। इसलिए, मुझे वास्तव में लगता है कि देशों के लिए रक्षा विनिर्माण में निवेश करने का एक बड़ा अवसर है और वास्तव में निवेश की शर्तें बहुत अधिक उदार हो गई हैं। इसलिए, मैं आपके माध्यम से हर किसी के लिए बहुत स्पष्ट रूप से कहूँगा, कि यह व्यापार के लिए अच्छा है, यह आपके अपने व्यवसाय के लिए अच्छा है।

श्री टिम रोमर: हम निश्चित रूप से इन दिनों चीन में बहुत सारी चुनौतियाँ देखते हैं और बहुत सारे अमेरिकी व्यवसाय निराश हैं और वहाँ बिगड़ रहे हैं। वे चीन में और आगे बढ़ना नहीं चाहते, जब वे नई आपूर्ति लाइनें, नई विनिर्माण भागीदारी स्थापित करते हैं, तो भारत में संभावनाओं को खोजते हैं और अपने घर अमेरिका वापिस लौटने की सोचते हैं। इसलिए भारत जो कुछ भी कर सकता है, इस पर विचार करें और यह सुनिश्चित कराने का प्रयास करें कि हम स्थानीय सामग्री चुन रहे हैं, इसके लिए अलग-अलग आवश्यकताएँ निर्धारित करते हैं, रक्षा खरीदारी के बारे में, चलिए प्रयास करते हैं, हम अपने संभावित व्यवसाय के लिए उन मुद्दों को नेविगेट कर सकते हैं। जय, मैं आव्रजन और शिक्षा पर वापस लौटता हूँ । संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच बहुत मजबूत लोगों का लोगों से संबंध हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका में, यहाँ, जीवंत प्रवासी भारतीय समुदाय अधिक से अधिक शक्तिशाली हो रहा है। आप्रवास एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और भारतीय लोग एच -1बी कार्य वीजा पाने वालों में एक बड़ा और लाभकारी हिस्सा हैं, जहाँ उन्हें, उन कार्य वीजा का लगभग 69.9% प्राप्त होता है । हमें लगता है कि भारतीयों को अमेरिका लाने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। हम इन, लोगों से लोगों के संबंधों को कैसे मजबूत करना जारी रखें और बताएँ कि यह आव्रजन नीति दोनों देशों के लिए अच्छी क्यों है?

डॉ. एस जयशंकर:
टिम, अगर मैं पिछले प्रश्न पर केवल एक अतिरिक्त टिप्पणी के साथ समाप्त कर सकता हूँ और वह यह है कि, हम भारत में जिस दिशा में जा रहे हैं, जिस नीति को हम अपनाने जा रहे हैं उसे "आत्मानिर्भर भारत" कहा जाता है, जो एक अधिक आत्मनिर्भर भारत की तरह है। लेकिन, इसका मतलब है कि यह हमारी राष्ट्रीय क्षमताओं को बढ़ाने का एक कार्यक्रम है, और जाहिर है कि विनिर्माण क्षमता इसके केंद्र में है। इसलिए, मैं वास्तव में अमेरिकी व्यवसाय क्षेत्र को बताऊँगा कि अगर भारत वृद्धि कर रहा है, अगर भारत अपनी क्षमताओं का विस्तार करना चाहता है, तो वास्तविक, और बहुत अधिक नए व्यापारिक अवसर आपके लिए वहाँ खुल गए हैं। विशेष रूप से भारत यदि व्यापार करना आसान बनाता है, तो यह विदेशी निवेश द्वारा स्वामित्व के मामले में बहुत अधिक उदार हैं। इसलिए मैं सिर्फ इस बात पर बल देना चाहता हूँ कि यह तथ्य है कि हम उन वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक रुचि रखते हैं, जो भारत के माध्यम से, भारतीय उत्पादन क्षमता का उपयोग एक श्रृंखला के हिस्से के रूप में करती हैं, और यह भी तथ्य है कि हम विश्वसनीय और लचीले साबित होंगे जो व्यवसाय में उपयोगी होगा। आव्रजन मुद्दे के बारे में भी, हम एक और अधिक डिजिटल दुनिया की बात कर रहे हैं, हम एक अधिक प्रौद्योगिकी संचालित दुनिया की बात कर रहे हैं, जो वास्तव में प्रतिभा को प्रोत्साहित करती है। ठीक है। अब, अगर एक चीज है जो भारत दुनिया को दे सकता है, तो वह यह विश्वसनीय प्रतिभा है। आप दुनिया भर में कंपनियों में काम करने वाले भारतीयों को देखिए, उन्होंने हमेशा अच्छा किया है, उन्होंने हमेशा उस विशेष वातावरण में सही काम किया है। इसलिए, भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के लिए बहुत सम्मान और विश्वास है। जो बात मैं कहना चाह रहा हूँ, वह यह है कि अधिक ज्ञान-संचालित वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अधिक विश्वसनीय प्रतिभा की आवश्यकता होगी। मुझे लगता है कि यह भारत के लिए एक अवसर है। यह एक अवसर है जिसे अमेरिकी आव्रजन नीतियों में कुछ हद तक परिलक्षित किया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि आव्रजन निश्चित रूप से दोनों पक्षों के लिए फायदे का सौदा है, आपके इस पर अपने विचार थे, यहाँ तक कि भारत में भी पिछले 15-20 वर्षों में मुझे नहीं लगता कि लोग अब ऐसा सोचते हैं, लोग इस तरह की भूमिका को पहचानते हैं जो वास्तव में भारतीय प्रतिभा ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में वैश्विक अर्थव्यवस्था में जगह बनाई है, उत्प्रेरक भूमिका जो उनके पास है। इसलिए, मैं निश्चित रूप से आग्रह करूँगा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ अमेरिका को यह जानना चाहिए कि अमेरिकी हित में क्या है और मेरा मानना है कि यही भारतीय हित में भी होगा ।

श्री टिम रोमर: आपने अच्छी तरह से कहा, जय और मैं सहमत हूँ कि प्रतिभा और पूंजी और आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए गहन, जीवंत प्रतिस्पर्धा है और संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत जितना अधिक इन कुछ मुद्दों के माध्यम से अधिक काम कर सकते हैं और सफलताएं प्राप्त कर सकते हैं तो हम उन मोर्चों पर जितना करीब और करीब हों, हमारी आर्थिक प्रणाली उतनी ही बेहतर होगी, कोविड से बेहतर स्वस्थ्य-लाभ होगा और हमारा लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। जय, आपने चीन में भारतीय राजदूत के रूप में बहुत समय बिताया है। मैं चीन के बारे में एक सवाल पूछना चाहता हूँ। लेकिन इसे पॉकेट पॉड के संदर्भ में फ्रेम करें। पिछले हफ्ते, पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान ने कहा, "पाकिस्तान का भविष्य चीन से जुड़ा हुआ है। हमें स्पष्ट होना चाहिए कि हमारे देशों का विकास अब चीन के साथ गुंथ गया है।" अब, वे उन टिप्पणियों में से कुछ पर बाद में पीछे हट गए, उन्होंने कुछ के लिए अमेरिका को तालिबान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने और फिर पाकिस्तान में चीनी निवेश के लिए जिम्मेदार ठहराया। आप इसे कैसे देखते हैं, दुनिया भर में यह आक्रामक चीन, दक्षिण चीन सागर, हुआवेई और प्रौद्योगिकी के लिए और यह पाकिस्तान के साथ आपके नाजुक रिश्ते और महत्वपूर्ण संबंधों के साथ कैसे जाता है?

डॉ. एस जयशंकर: खैर टिम, मुझे लगता है कि स्पष्ट रूप से दुनिया के हर दूसरे देश की तरह, हम चीन के उदय से बहुत परिचित हैं। हम चीन के तत्काल पड़ोसी हैं। जाहिर है कि अगर आप एक पड़ोसी हैं, तो आप सीधे तौर पर इसके उदय से बहुत प्रभावित होते हैं, मैंने अपनी किताब में कहा है, एक सशक्त वैश्विक शक्ति । अब, हमारा बहुत ध्यान स्पष्ट रूप से है - हम इसे कैसे लेते हैं? भारत में भी इसी अवधि में वृद्धि हो रही है, शायद चीन के समान तेज गति से नहीं, लेकिन, यदि आप पिछले 30 वर्षों में देखें, तो यह स्पष्ट है, भारत का उदय भी प्रमुख वैश्विक कहानियों में एक रहा है। इसलिए, यदि दो देश, दो समाज, प्रत्येक के एक अरब लोग हैं, तो उनका जो इतिहास और संस्कृति है, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वे अपने बीच एक तरह की समझ या आपसी संतुलन बनाए रखें। और, यह एक व्यावहारिक दुनिया है, अगर कोई देश अधिक शक्तिशाली होने जा रहा है, तो हम उसका प्रभाव क्षेत्रों में, भौगोलिक रूप में, देखने जा रहे हैं, जो हमने पहले नहीं देखा है। हम उन गतिविधियों और क्षमताओं को देखने जा रहे हैं जो हमने पहले नहीं देखी हैं। अब, हम उन्हें चीन की तरफ से देखेंगे, और मैं कुछ क्षेत्रों में यह कहने की हिम्मत करता हूँ कि वे इसे हम में से देखेंगे । मेंने अपनी पुस्तक में कहा है कि भारत और चीन के बीच का यह कुछ समय का समझौता, दोनों देशों के लिए और वास्तव में दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए अत्यंत परिणामी है। अब जैसा कि आप जानते हैं, चीन का पाकिस्तान के साथ संबंध कुछ नया नहीं है, और यह वास्तव में 60 के दशक की शुरुआत से प्रारंभ होता है। इसके पहलू हमारे लिए पहले भी चिंता का विषय रहे हैं जो किकुछ नया नहीं है। और, जाहिर है कि यह एक ऐसी चीज है, जिसे हम दोनों देशों के साथ संबंधों के लिए जिम्मेदार मानते हैं।

श्री टिम रोमर: मैं अब आपसे एक अंतिम प्रश्न पूछ कर समाप्त करता हूँ जय। आप उस पर एक मिनट लें या जितना चाहें उतना समय ले सकते हैं । सैन्य शक्ति, सॉफ्ट पावर और प्रतिष्ठा के नजरिए से आप आज अमेरिका को किस रूप में देखते हैं? क्या वे आज दुनिया में रणनीतिक दृष्टिकोण से चीजों को निष्पादित और प्राप्त करने में सक्षम हैं? आप उस परिप्रेक्ष्य में अमेरिका को कैसे देखते हैं?

डॉ. एस जयशंकर:
टिम, मैं कहूँगा कि यह स्पष्ट है कि संयुक्त राज्य अमेरिका अपने खुद के वाद-विवाद, अपने स्वयं के परिवर्तन, अपनी खुद की बातचीत के माध्यम से गुजर रहा है, और एक विदेशी देश के रूप में, हम इसका बहुत सम्मान करते हैं, हम स्पष्ट रूप से शेष दुनिया की तरह बहुत रुचि के साथ इसका अनुसरण करते हैं। एक बात जो मैं कहूँगा, जो मैं भारत के लोगों के साथ कहता हूँ, कि यह बहुत हद तक आपकी अपनी बातचीत हैं, भले ही वे दुनिया को प्रभावित करें, लेकिन, हम भारतीयों को इस तथ्य से तसल्ली होनी चाहिए कि डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों के कई प्रशासनों में, हमारे संबंध लगातार व्यवस्थित रूप से विकसित हुए हैं। और न केवल कई प्रशासनों के बारे में, मेरा मतलब है कि अगर मैं वाशिंगटन आता हूँ, तो मेरे दोनों राजनीतिक दलों में दोस्त हैं और कभी-कभी तो अलग-अलग दलों में भी हैं, यहाँ विचारों की एक विस्तृत विविधता है, केवल मेरे व्यक्तिगत रूप के लिए नहीं, बल्कि एक देश के रूप में भी । इसलिए, मुझे लगता है कि स्पष्ट रूप से, जबकि हम इन सभी घटनाक्रमों का गहरी रुचि से अनुसरण करेंगे, हम विभिन्न क्षेत्रो में आपकी नीति के परिणामों पर भी नजर डालते हैं, उदाहरण के लिए, अभी जो अफगानिस्तान में हो रहा है, उसमें हमारी बहुत गहरी रूचि है। तो, यह सब होता है, लेकिन मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राज्य अमेरिका है और कई मायनों में आपके पास एक तरह का लचीलापन और समझदारी है, कई मायनों में आपके पदचिह्न, संसार के साथ आपके संबंध वास्तव में बहुत अद्वितीय हैं और एक भारतीय विदेश मंत्री के रूप में मैं इस तथ्य से बहुत आश्वस्त हूँ कि अमेरिका के साथ मेरा संबंध बहुत मजबूत स्थिति में है।

श्री टिम रोमर: यह सुनकर अच्छा लगा। खैर, जय, आप हमेशा की तरह अपने जवाबों में संक्षित पर स्पष्ट और शानदार रहे हैं। आपको देखना बहुत अच्छा लग रहा है। मुझे उम्मीद है कि हम जल्द ही मिलेंगे। मैं जॉन चैंबर्स और मुकेश अघी और हमारी साझेदारी के सभी व्यवसायों की ओर से, जो अमेरिका-भारत संबंधों को गहरा और बेहतर बनाने पर काम करने का प्रयास कर रहे हैं, आपका धन्यवाद कहना चाहता हूँ, मुझे लगता है कि यह सबसे महत्वपूर्ण संबंध है, विशेष रूप से (अश्रव्य) लोकतंत्र आगे बढ़ रहा है और मैं भी व्यक्तिगत रूप से कहना चाहता हूँ , जय, कि भारत के लोग भाग्यशाली हैं, जिनके पास आप जैसी प्रतिभा और सार्वजनिक सेवा के प्रति समर्पण रखने वाला, संयुक्त राज्य अमेरिका में और चीन में और दुनिया भर में सेवा करने वाला ऐसा व्यक्ति है और जो अब विदेश मंत्री, है। मुझे उम्मीद थी कि आपका बेटा आपके रास्ते पर चलेगा और वह सार्वजनिक सेवा में जाएगा, लेकिन वह निजी क्षेत्र में भी अच्छा काम करने जा रहा है, जहाँ मैं एपीसीओ में दुनिया भर में काम करता हूँ, हम हर समय प्रौद्योगिकी पर काम करते हैं। इसलिए मैं उनके सफल होने की कामना करता हूँ और मेरे दोस्त, मुझे उम्मीद है कि मैं आपसे जल्द ही व्यक्तिशः मिलूँगा। आज शाम और इस सुबह के लिए आपका धन्यवाद और मैं आगामी दो जमा दो में आपकी सफलता की आशा करता हूँ।

डॉ. एस जयशंकर: धन्यवाद। मुझे बहुत ख़ुशी मिली। अपना ख्याल रखिए। आपको देख कर अच्छा लगा ।

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