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प्राग के चार्ल्स विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति द्वारा व्याख्यान

सितम्बर 19, 2018

चार्ल्स विश्वविद्यालय के रेक्टर,
डॉ. टॉमस जिमा,
विश्वविद्यालय के प्राध्यापक गण,
और प्रिय छात्रों,
दोबरे रानो, नमस्कार


  • मुझे यहाँ आने और आपके साथ अपने विचारों को साझा करने में हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। मैं चार्ल्स विश्वविद्यालय रेक्टर डॉ. जिमा और संकाय सदस्यों को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे शिक्षा के इस मंदिर के समृद्ध इतिहास को देखने का अवसर प्रदान किया है।
  • मैं भारत की विभिन्न भाषाओं में आपकी प्रस्तुतियों से अत्यंत प्रभावित हूँ। मैं इंडोलॉजी के छात्रों के रूप में ज्ञान और अकादमिक उत्कृष्टता के आपके प्रयास की सराहना करता हूँ।
  • छात्रवृत्ति की लंबी परंपरा के साथ, चार्ल्स विश्वविद्यालय को यूरोप के सबसे पुराने संस्थानों में से एक माना जाता है। मैं ज्ञान के इस पीठ पर आकर गर्वित हूँ। मुझे यह जानकर हर्ष है कि हमारे राष्ट्रीय कवि और भारत के महान पुत्रों में से एक रबींद्रनाथ टैगोर, एक बार इस परिसर में आए थे और अपने विचारोत्तेजक व्याख्यान से अनेक लोगों को प्रभावित किया था। उन्होंने ही मोहनदास करमचंद गांधी को सबसे पहले "महात्मा" या "महान आत्मा" का नाम दिया था। मुझे अपने राष्ट्रपिता के जीवन और विरासत को उजागर करने और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का सम्मान मिला है। अब से एक महीने से भी कम समय में, 2 अक्टूबर को, हम उनके 150वें जन्मदिन का विश्वव्यापी उत्सव आरंभ करेंगे। मुझे आशा है कि आप सभी उस उत्सव में हमारे साथ जुड़ेंगे।
  • हमारे दोनों देशों के संपर्क के इतिहास का पता लगाना दिलचस्प है। यह इंडोलॉजिस्टों द्वारा स्थापित किए गए संपर्क से काफी पुराना है। आपको यह जानना रुचिकर लग सकता है कि लगभग एक हजार साल पहले, बोहेमिया और भारत के बीच मसालों और रेशम में एक समृद्ध व्यापार था। उस साझा अतीत पर, आज हमने एक मजबूत समकालीन भागीदारी बनाई है।
  • इस विश्वविद्यालय में, 1850 में संस्कृत के एक विभाग की स्थापना के साथ प्राग में इंडोलॉजी की एक बहुत पुरानी परंपरा है। प्रोफेसर लेस्नी इंडोलॉजी के चेक स्कूल के संस्थापक और रवींद्रनाथ टैगोर के मित्र थे। वे पहले यूरोपीय इंडोलॉजिस्ट थे जिन्होंने अंग्रेजी अनुवादों का उपयोग करने की बजाय सीधे बांग्ला से टैगोर की कविता का अनुवाद किया था। प्रोफेसर लेस्नी के निमंत्रण पर, टैगोर 1921 और 1926 में चेकोस्लोवाकिया आए थे। मैं इस पल डॉ. हाना प्रीन्हाहेल्टरोवा के प्रति अपनी व्यक्तिगत श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिनका हाल ही में निधन हो गया। डॉ. हाना ने टैगोर और अन्य भारतीय विषयों पर उल्लेखनीय कार्य किया है।
  • चेकोस्लोवाकिया के विद्वानों के साथ टैगोर की बातचीत ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। प्राग में उनकी प्रतिमा की स्थापना और उसके बाद एक ट्राम स्टेशन का "ठाकुरोवा" नामकरण, हमारे राष्ट्रीय कवि और उनके काव्य प्रतिभा को श्रद्धांजलि है।
  • प्रोफेसर लेस्नी के छात्र प्रोफेसर दुसन ज़बविटेल ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और विभिन्न भारतीय विषयों का अध्ययन किया। उन्होंने उपनिषद समेत 60 संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद किया है और 2006 में भारत सरकार द्वारा, इंडोलॉजी में उनके योगदान के लिए, हमारे अत्यधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार - पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। एक अन्य इंडोलॉजिस्ट, जोसेफ जुबेती ने वैदिक साहित्य और भारतीय महाकाव्य पर काफी लिखा है। इन सभी इंडोलॉजिस्टों ने चेक समुदाय के समक्ष भारतीय साहित्य की गीतात्मक सुंदरता को उजागर किया, जिससे हमारी सांस्कृतिक परंपराएं एक-दूसरे के करीब आईं।
  • इंडोलॉजी संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन के साथ लगभग दो सदी पहले आरंभ हुई थी, लेकिन आज इसकी परिधि बहुत व्यापक हो गई है। इंडोलॉजी का क्षेत्र उदाहरण प्रस्तुत करता है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की गहरी समझ प्रदान करने के लिए विषयों के विशेषज्ञ किस तरह अक्सर मिलते रहते हैं। घग्गर-हाकरा बेसिन की रिमोट सेंसिंग स्टडीज ने हड़प्पा सभ्यता और लुप्त हो गई नदी-सरस्वती की भूमिका की हमारी धारणा को बदल दिया है – यह नदी कभी उन मैदानी इलाकों में बहती थी और वैदिक साहित्य में इसका उल्लेख है। विभिन्न विषयों में यह अद्भुत सहयोग प्राचीन भारतीय ज्ञान के पहलुओं को फिर से खोजने का एक शानदार अवसर प्रस्तुत करता है जो हमारी कई समकालीन समस्याओं को हल कर सकता है। योग पर अध्ययन ने मानव स्वास्थ्य और कल्याण पर इसके सकारात्मक प्रभाव की पुष्टि की है। मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि योग और आयुर्वेद को चेक गणराज्य में भारी समर्थन और रुचि मिल रही है।
  • इंडोलॉजी ने केवल हमारे दोनों देशों को जोड़ा ही नहीं है। आधुनिक भारत के निर्माण पर भी इसका असर पड़ा है। इसने भारत के समृद्ध अतीत को फिर से खोजा है और सांस्कृतिक जागरूकता आरंभ की है। इसने भारत को अपनी सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिकता को आत्मसात और समेकित करने में सक्षम किया है। इससे समझा जा सकता है कि विद्यासागर से विवेकानंद तक और टैगोर से महात्मा गांधी तक, भारत का सामाजिक-सांस्कृतिक आधुनिकीकरण एक ऐसी नींव पर बनाया गया था जो पूर्वी और पश्चिमी विचारों के जैविक संश्लेषण पर जोर देता था। भारत विद्या का अध्ययन दुनिया को उस सार्वभौमिक परिवार में बांधना जारी रखता है, जहां बाधाएं और दीवारें नहीं हैं।
  • मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि लगभग 500 भारतीय छात्र चेक गणराज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उनमें से कई ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली है और व्याख्याताओं एवं वैज्ञानिकों के रूप में काम कर रहे हैं। उनसे, आपको अपने इंडोलॉजिकल कार्यों के लिए बहुत अच्छा समर्थन मिलेगा।
  • देवियों और सज्जनों, मैं दोनों देशों के लोगों और संस्कृतियों को एक साथ लाने के निरंतर प्रयासों के लिए एक बार फिर से चार्ल्स विश्वविद्यालय के रेक्टर और सभी संकाय सदस्यों को धन्यवाद देता हूँ। मैं आपको अपनी शिक्षा पूरी करने और अपने सपनों को साकार करने में पूरी सफलता के लिए शुभकामना देता हूँ।

दकुई वाम [धन्यवाद]


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