श्री रणधीर जायसवाल, आधिकारिक प्रवक्ता: नमस्कार देवियों और सज्जनों, मैं आपका इस विशेष प्रेस ब्रीफिंग में स्वागत करता हूं, जिसका संचालन भारत के विदेश सचिव श्री विक्रम मिसरी द्वारा किया जा रहा है, यह ब्रीफिंग माननीय प्रधानमंत्री की तियानजिन में आयोजित 25वें एससीओ शिखर सम्मेलन में चल रही यात्रा के संदर्भ में है।
हमारे साथ चीन में भारत के राजदूत श्री प्रदीप रावत, विदेश मंत्रालय के पूर्वी एशिया प्रभाग के प्रभारी संयुक्त सचिव श्री गौरंगलाल दास, तथा मंत्रालय में एससीओ मामलों के प्रभारी संयुक्त सचिव श्री मयंक सिंह भी उपस्थित हैं। इसी क्रम में, मैं विदेश सचिव को आमंत्रित करता हूं कि अब तक हुई प्रगति पर अपने प्रारंभिक विचार प्रस्तुत करें।
सर, आप कृपया आगे बढ़ें।
श्री विक्रम मिसरी, विदेश सचिव: धन्यवाद रणधीर, सभी को शुभ संध्या। आप सभी का इस शाम हमारे साथ जुड़ने के लिए धन्यवाद।
जैसा कि आप सभी अवगत हैं, माननीय प्रधानमंत्री वर्तमान में तियानजिन की यात्रा पर हैं, जहाँ एससीओ शिखर सम्मेलन आयोजित हो रहा है। प्रधानमंत्री कल शाम तियानजिन पहुँचे, जहाँ मेज़बान सरकार ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके पश्चात तियानजिन स्थित भारतीय समुदाय ने उनका उत्साहपूर्ण सांस्कृतिक स्वागत किया।
प्रधानमंत्री की आज सुबह की पहली बैठक जनवादी गणराज्य चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता के रूप में हुई। हमने उस बैठक से संबंधित एक आधिकारिक बयान जारी किया है। उसके विस्तृत विवरण से आप पहले से ही अवगत होंगे। मैं आपको इस बैठक से जुड़े कुछ प्रमुख पहलुओं की जानकारी देना चाहूंगा।
जैसा कि आप जानते हैं, यह दोनों नेताओं के बीच एक वर्ष से भी कम अवधि में दूसरी मुलाकात है। पिछली मुलाकात अक्टूबर पिछले वर्ष कज़ान में हुई थी, जहाँ दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के विकास हेतु कुछ रणनीतिक दिशा-निर्देश तय किए थे और दोनों पक्षों के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए थे जिन्हें हासिल किया जाना था।
आज सुबह हुई बैठक में दोनों नेताओं ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि कज़ान बैठक के बाद से जो प्रगति दर्ज की गई है, जो कदम उठाए गए हैं, और द्विपक्षीय संबंधों में जो निरंतरता बनी हुई है—विशेषकर जन-से-जन संपर्क के क्षेत्र में—वह सराहनीय है।
आज सुबह दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के साथ अपने विचार साझा किए कि आने वाले समय में दोनों देशों की दीर्घकालिक प्रगति और विकास को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाए। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के सिद्धांतों पर अपनी-अपनी दृष्टि साझा की, जिनसे उम्मीद है कि संबंधों के अन्य आयामों पर कार्य करते समय भविष्य की दिशा तय करने में मार्गदर्शन मिलेगा।
उदाहरणस्वरूप, दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि दोनों देश मुख्यतः अपने घरेलू विकास लक्ष्यों पर केंद्रित हैं और इस संदर्भ में वे प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी हैं। दोनों नेताओं के बीच इस बात पर भी सहमति रही कि भारत और चीन के बीच स्थिर एवं सौहार्दपूर्ण संबंध, दोनों देशों में रहने वाले 2.8 अरब लोगों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं। दोनों देशों के साझा हित उनके मतभेदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, और दोनों नेताओं ने इस बात पर भी सहमति व्यक्त की कि मतभेदों को विवाद का रूप लेने से रोका जाना चाहिए। यह भी समझा गया कि यदि एशियाई शताब्दी का सपना साकार करना है और बहुध्रुवीय एशिया को केंद्र में रखते हुए एक प्रभावी बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था स्थापित करनी है, तो भारत और चीन का विकास एवं आपसी सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्रपति शी ने द्विपक्षीय संबंधों को और सुदृढ़ करने हेतु चार सुझाव प्रस्तुत किए: पहला, रणनीतिक संवाद को मजबूत करना और आपसी विश्वास को गहरा करना; दूसरा, परस्पर लाभ एवं साझा सफलता के लिए आदान-प्रदान और सहयोग का विस्तार करना; तीसरा, एक-दूसरे की चिंताओं को सम्मानपूर्वक समायोजित करना; और अंततः, साझा हितों की रक्षा के लिए बहुपक्षीय सहयोग को प्रबल करना, इन सभी सुझावों पर प्रधानमंत्री मोदी ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।
चर्चाओं में सीमा से जुड़ा मुद्दा भी शामिल रहा। दोनों नेताओं ने पिछले वर्ष हुए सफल सैन्य विमुक्ति (डिसएंगेजमेंट) और उसके बाद से सीमा क्षेत्रों में बनी शांति एवं स्थिरता का संज्ञान लिया। इस मुद्दे से जुड़े कुछ सिद्धांतों पर बात करते हुए, प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि द्विपक्षीय संबंधों के सतत और सुचारू विकास के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना अनिवार्य है। सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए मौजूदा तंत्रों का उपयोग करने और भविष्य में समग्र संबंधों में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न होने देने पर भी आपसी समझ बनी।
इस अवसर पर, मैं आपका ध्यान भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा मुद्दे पर आयोजित 24वें दौर की वार्ता के परिणामों की ओर आकर्षित करना चाहता हूं, जो अभी दो सप्ताह से भी कम समय पहले नई दिल्ली में संपन्न हुई थी। आज की बैठक में दोनों नेताओं ने उस दौर की वार्ता के परिणामों और लिए गए निर्णयों को सकारात्मक रूप से सराहा। दोनों नेताओं ने विशेष प्रतिनिधियों के प्रयासों की सराहना की और इस बात पर सहमति जताई कि उन वार्ताओं में हुई सहमतियों और तय किए गए परिणामों को शीघ्रता से लागू किया जाना चाहिए।
दोनों नेताओं ने सीमा मुद्दे के निष्पक्ष, यथोचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की, जो उनके समग्र द्विपक्षीय संबंधों के राजनीतिक दृष्टिकोण तथा दोनों देशों की जनता के दीर्घकालिक हितों पर आधारित होगा।
अन्य विषयों के साथ-साथ, दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और संतुलित करने, जन-से-जन संबंधों को सुदृढ़ करने, अंतर्राष्ट्रीय नदियों पर सहयोग बढ़ाने तथा आतंकवाद के विरुद्ध संयुक्त रूप से कार्य करने के तरीकों पर भी विचार-विमर्श किया। इन सभी मुद्दों पर आगे की प्रगति पारस्परिक सम्मान, साझा हितों और आपसी संवेदनशीलता के आधार पर करने की इच्छा व्यक्त की गई।
विशेष रूप से आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के संदर्भ में, इस बात को स्वीकार किया गया कि भारतीय और चीनी अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक व्यापार को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। दोनों नेताओं ने पुनः इस बात पर बल दिया कि द्विपक्षीय व्यापार घाटे को कम करने, द्विपक्षीय व्यापार एवं निवेश को दोनों दिशाओं में सुगम बनाने तथा नीतिगत पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता बढ़ाने के लिए राजनीतिक एवं रणनीतिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ना आवश्यक है।
क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों तथा चुनौतियों पर भी चर्चा हुई, जिसमें बहुपक्षीय मंचों से जुड़े विषय भी शामिल थे। प्रधानमंत्री ने चीन की वर्तमान एससीओ अध्यक्षता तथा तियानजिन में आयोजित शिखर सम्मेलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने राष्ट्रपति शी को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भी आमंत्रित किया, जिसकी वर्ष 2026 में भारत मेज़बानी करेगा। राष्ट्रपति शी ने प्रधानमंत्री को आमंत्रण के लिए धन्यवाद दिया और भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के प्रति चीन का पूर्ण समर्थन देने का आश्वासन दिया।
इसके अतिरिक्त, इस बैठक के बाद प्रधानमंत्री ने महामहिम श्री काई ची से अलग से भेंट की, जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो की स्थायी समिति के सदस्य हैं। जैसा कि आप अवगत होंगे, श्री काई पार्टी में कई महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं। मूल रूप से चीनी पक्ष की ओर से यह प्रस्ताव था कि श्री काई प्रधानमंत्री के सम्मान में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ओर से एक भोज आयोजित करें। यह एक विशेष पहल के रूप में किया गया था, जिससे यह प्रदर्शित हो सके कि लगभग सात वर्षों के अंतराल के बाद हो रही इस यात्रा को चीन किस प्रकार महत्व प्रदान कर रहा है। हालाँकि, समय-सारिणी के टकराव के कारण यह निर्णय लिया गया कि प्रधानमंत्री और श्री काई के बीच संक्षिप्त बैठक आयोजित की जाए।
बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने श्री काई के साथ भारत-चीन संबंधों को लेकर अपना समग्र दृष्टिकोण साझा किया और उनसे आग्रह किया कि वह दोनों नेताओं के बीच बनी सहमति को मूर्त रूप देने में अपना योगदान और भूमिका निभाएँ। अपनी ओर से, श्री काई ने विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय आदान-प्रदान को विस्तृत करने की चीन की इच्छा दोहराई, ताकि आर्थिक क्षेत्र में हमारी-अपनी चिंताओं का समाधान किया जा सके और आज सुबह प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति के बीच हुई बैठक में बनी सहमति के अनुरूप संबंधों को और प्रगाढ़ किया जा सके।
आज शाम कुछ समय पूर्व, प्रधानमंत्री ने म्यांमार के राज्य सुरक्षा एवं शांति आयोग के अध्यक्ष, सीनियर जनरल मिन आंग हलैंग के साथ भी एक द्विपक्षीय बैठक की। दोनों नेताओं ने इस वर्ष की शुरुआत में थाईलैंड में आयोजित बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान हुई अपनी पिछली मुलाकात को याद किया और मौजूदा द्विपक्षीय संबंधों की स्थिति की समीक्षा की। प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि भारत अपनी "पड़ोसी प्रथम" और "एक्ट ईस्ट" नीतियों के तहत म्यांमार के साथ अपने संबंधों को अत्यंत महत्व देता है। प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के बीच विकास साझेदारी के महत्व पर जोर दिया और भारत-म्यांमार के बीच चल रहे संपर्क (कनेक्टिविटी) परियोजनाओं के लिए सीनियर जनरल मिन आंग हलैंग का समर्थन मांगा।
सुरक्षा और सीमा संबंधी मुद्दों पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने म्यांमार में चुनावों की घोषणा का स्वागत किया और कहा कि देश में शांति और स्थिरता स्थापित करने का एकमात्र मार्ग संवाद ही है। आज शाम थोड़ी देर पहले, प्रधानमंत्री ने 25वें एससीओ शिखर सम्मेलन के आधिकारिक स्वागत समारोह में भाग लिया, जिसका आयोजन राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने विदेशी नेताओं के लिए किया था।
कल, प्रधानमंत्री शिखर सम्मेलन के पूर्ण सत्र को संबोधित करेंगे, जहाँ वे एससीओ की छत्रछाया में क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत के दृष्टिकोण का विवरण प्रस्तुत करेंगे। इस बैठक के बाद, उनका रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठक का कार्यक्रम है, जिसके पश्चात वे भारत के लिए प्रस्थान करेंगे।
मैं यहीं विराम लेना चाहूंगा, और मुझे लगता है कि अब हमारे पास कुछ प्रश्नों के लिए समय है।
मनीष चंद, इंडिया राइट्स नेटवर्क: विदेश सचिव, मनीष चंद, इंडिया राइट्स नेटवर्क। मेरा प्रश्न व्यापार घाटे के बढ़ते स्तर के बारे में है, जो करीब 100 बिलियन डॉलर के पास पहुँच चुका है। आपने संतुलित आर्थिक संबंध बनाने की बात की थी। कौन-कौन से ठोस उपाय या कदम पेश किए गए? क्या चीनी पक्ष की ओर से भारत में निवेश बढ़ाने की कोई प्रतिज्ञा की गयी ?
मेरा दूसरा प्रश्न यह है कि क्या तनाव कम करने (डी-एस्केलेशन) के मामले में कोई प्रगति हुई? और क्या इस मुद्दे पर चर्चा हुई? और विशेष प्रतिनिधियों (एसआर) की वार्ता के आगे के रास्ते क्या हैं? धन्यवाद।
सुधी रंजन सेन, ब्लूमबर्ग: सर, मैं सुधी रंजन सेन, ब्लूमबर्ग से बोल रहा हूं। सीमा वार्ता के संबंध में, आपने विशेष प्रतिनिधि (एसआर) स्तर की वार्ता का उल्लेख किया। अब इससे आगे क्या कदम उठाए जाएंगे? विशेष रूप से, सीमा रेखा निर्धारण (डिलिमीटेशन) का मुद्दा, जिसका उल्लेख पिछली संयुक्त घोषणा में किया गया था।
उमा शंकर सिंह, इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट: उमा शंकर सिंह, इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट। मेरा सवाल यह है कि चीन की तरफ से जो बयान जारी किया गया उसमें राष्ट्रपति शी के हवाले से कहा गया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से यह कहा, और मैं कोट कर रहा हूं, कि "हमें सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए मिलकर काम करना चाहिए और सीमा मुद्दे को समग्र चीन भारत संबंधों को परिभाषित नहीं करने देना चाहिए"।”
सवाल ये है कि भारत क्या चीन के लिए रुख से सहमत है? क्योंकि भारत पहले से यह कहता रहा है कि 2020 अप्रैल के पहले की यथास्थिति जो है, वह पहली शर्त है दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की।
सिद्धांत सिब्बल, विऑन: नमस्ते, महोदय मैं विऑन से सिद्धांत हूं। सर, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक में सीमा पार आतंकवाद, विशेष रूप से पाकिस्तान से उत्पन्न आतंकवाद के मुद्दे पर कितनी चर्चा हुई?
और मेरा दूसरा प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री ने प्रत्यक्ष उड़ानों और संबंधित घोषणाओं का भी उल्लेख किया। क्या हम किसी समय-सारिणी की ओर देख रहे हैं कि आने वाले कुछ महीनों में प्रत्यक्ष उड़ानों की शुरुआत कब होने की संभावना है?
मेघा प्रसाद, एबीपी: सर, मैं एबीपी से मेघा प्रसाद हूं। मेरा प्रश्न उस बातचीत के बारे में है जो राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कल प्रधानमंत्री मोदी के साथ की थी, उन्होंने ट्विटर पर कहा है कि प्रधानमंत्री से बात करते समय उन्होंने यह भी कहा कि यूक्रेन रूस के प्रमुख के साथ बैठक के लिए अपनी तत्परता की पुष्टि करता है।
अब, प्रधानमंत्री कल राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात करेंगे। क्या यूक्रेन की कोई अपेक्षा है कि भारत इस मामले में मध्यस्थता करेगा? यदि हाँ, तो इस स्थिति में भारत क्या रुख अपनाएगा?
श्री विक्रम मिसरी, विदेश सचिव: तो, मनीष, आपके व्यापार घाटे से संबंधित प्रश्न के उत्तर में। हाँ, यह तथ्य है कि भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा काफी बड़ा और निरंतर बना हुआ है और यह कई वर्षों से चर्चा का विषय रहा है।
वर्तमान संदर्भ में भी… वास्तव में, यह वह चर्चा है जो तब शुरू हुई थी जब विदेश मंत्री वांग यी दिल्ली में थे और उन्होंने विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर से बैठक की थी। यह मुद्दा वहां भी हमारे द्वारा उठाया गया था।
मैं उस बिंदु पर लौटना चाहूंगा जो मैंने अपनी ब्रीफिंग में उल्लेख किया था, और जो असल में प्रधानमंत्री ने आज राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ साझा किया, कि यह महत्वपूर्ण है कि व्यापार और व्यापार घाटे के मुद्दे को दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक दिशा और सहभागिता के परिप्रेक्ष्य से भी देखा जाए। दोनों देशों के बीच बढ़ता व्यापार और व्यापार घाटे में कमी, संबंधों की धारणा में भी बदलाव लाने में योगदान देगा। लेकिन यह एक ऐसी चर्चा है जो कई स्तरों पर चल रही है—सरकारों के बीच, व्यवसायों के बीच, और उन संस्थाओं के बीच जो व्यापार में शामिल हैं—और हमें देखना होगा कि यह आगे कैसे विकसित होती है।
आपके उस प्रश्न के संबंध में जो तनाव कम करने से जुड़ा है, मैं आपको उस विस्तृत परिणाम दस्तावेज़ की ओर निर्देशित करूंगा, जो एसआर के बीच हुई वार्ता के बाद जारी किया गया था। यह एक ऐसी चर्चा है जो दोनों पक्षों के बीच निर्धारित तंत्रों में आगे बढ़ती रहेगी, जो इन मुद्दों से संबंधित हैं।
सुधी, आपकी उस प्रश्न के संबंध में भी, कि सीमा वार्ताएँ आगे कैसे बढ़ेंगी, स्थिति लगभग यही है। आपने फिर से वह बयान देखा होगा जो हमने एसआर की वार्ताओं के बाद जारी किया था। आप जानते ही हैं कि इन वार्ताओं को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित तंत्र बनाए गए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि ये… मौजूदा तंत्र, जो भारत और चीन के बीच सीमा क्षेत्रों में समन्वय और सहयोग के लिए कार्यरत है, आने वाले दिनों और हफ्तों में बैठक करेगा, और इस तंत्र के दोनों पक्षों के संबंधित नेता यह समझ बनाएंगे कि सीमा सीमांकन से संबंधित वार्ताओं को आगे कैसे बढ़ाया जाएगा।
उमा, आपका जो प्रश्न था कि जो राष्ट्रपति शी ने कहा है बाउंड्री इश्यूज़ और द्विपक्षीय संबंधों के बारे में। देखिए मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि हम शुरू से यह मानते आए हैं, और अलग-अलग स्तर पर हम यह साफ कहते आ रहे हैं, कि बाउंड्री पर जो स्थिति होगी … वह स्थिति … हम उसका जो असर है वह द्विपक्षीय रिश्तों में किसी न किसी तरह देखेंगे और इसी वजह से सबसे जो एक तरह से इंश्योरेंस पॉलिसी है द्विपक्षीय संबंधों के लिए, वह बाउंड्री पर पीस और ट्रैंक्विलिटी मेंटेन करना है।
तो यह बात आज बड़े स्पष्ट तरीके से प्रधानमंत्रीजी ने भी राष्ट्रपति शी के सामने रखी और हम इसे मान के चलते हैं।
सिद्धांत, आपके प्रश्नों पर। प्रधानमंत्री ने सीमा पार आतंकवाद को सर्वोच्च प्राथमिकता के रूप में उल्लेख किया। और मैं यह जोड़ना चाहूंगा कि उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह ऐसा मुद्दा है जो न केवल भारत बल्कि चीन को भी प्रभावित करता है। और यह कि इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम आपसी समझ बढ़ाएँ और एक-दूसरे का समर्थन करें, क्योंकि दोनों देश सीमा पार आतंकवाद से मुकाबला कर रहे हैं। और मैं वास्तव में यह कहना चाहूंगा कि हमने सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को मौजूदा एससीओ शिखर सम्मेलन के संदर्भ में निपटाते हुए चीन की समझ और सहयोग प्राप्त किया है।
आपके सीधे उड़ानों से जुड़े सवाल के संदर्भ में, यह ऐसा विषय है जिस पर दोनों पक्ष हाल के हफ्तों और महीनों में काफी गहन रूप से चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि इस साल की शुरुआत में उच्च स्तर पर दोनों पक्षों के बीच हुई सहमति और दिशा-निर्देश के अनुसार यह उन क्षेत्रों में से एक है जिसमें हमें आगे बढ़ना चाहिए।
तब से, तकनीकी स्तर की कई दौर की वार्ता आयोजित की जा चुकी हैं। अगर मुझे सही याद है, तो इस सप्ताह की शुरुआत में आगे की चर्चा के लिए भारत की एक नागर विमानन प्रतिनिधिमंडल बीजिंग में था। मेरी समझ के अनुसार, एक व्यापक स्तर पर सीधे उड़ानों को फिर से शुरू करने पर सहमति या समझौता बन चुका है, और यह वही बात है जिसे आपने आज सुबह प्रधानमंत्री के बयान में सुन रखा होगा। मुझे लगता है कि अब शेष कुछ परिचालन संबंधी मुद्दे हैं, जिन पर दोनों पक्ष एक-दूसरे के संपर्क में हैं। हवाई सेवा समझौते से जुड़े मुद्दे हैं, साथ ही समय-सारिणी, कार्यक्रम और अन्य संबंधित विषयों से भी जुड़े प्रश्न हैं। मेरी समझ के अनुसार, इन मुद्दों का समाधान आने वाले कुछ हफ्तों में कर लिया जाएगा और इसके तुरंत बाद सीधे उड़ानों का पुनः आरंभ देखने को मिल सकता है।
मेघा, आपका सवाल प्रधानमंत्री और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच हुई बातचीत के बारे में है। मुझे लगता है कि हमने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच हुई बातचीत का विवरण साझा कर दिया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि इस बातचीत के किस हिस्से और किस तरह की बातें राष्ट्रपति पुतिन के साथ चर्चा में परिलक्षित होंगी। इस समय मैं कल दोपहर होने वाली बातचीत के निष्कर्षों के बारे में पहले से कोई अनुमान नहीं लगाना चाहूंगा। हम प्रयास करेंगे कि कल होने वाली उस बातचीत के दौरान हुई प्रक्रियाओं की जानकारी आपको तुरंत अपडेट करें।
गौरि द्विवेदी, एनडीटीवी: सर, मैं गौरि द्विवेदी, एनडीटीवी से बोल रही हूं। पहला प्रश्न, सर। क्या बातचीत में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्क का मुद्दा शामिल था? … और क्या यह चीन के द्वारा भारत के दृष्टिकोण के समर्थन के परिप्रेक्ष्य में था?
और दूसरा, भारत में अब भी अवरुद्ध पड़ी चीनी कंपनियों की आवेदनों के संबंध में क्या इस विषय पर कोई चर्चा हुई है?
शुभजीत रॉय, इंडियन एक्सप्रेस: विदेश सचिव, मैं शुभजीत रॉय, इंडियन एक्सप्रेस से बोल रहा हूं। रिपोर्ट में, भारतीय बयान में मैंने देखा कि इसे इस रूप में प्रस्तुत किया गया है कि भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार हैं। आप इसे इस तथ्य और वास्तविक स्थिति के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हैं कि भारत की ओर से 50,000 से अधिक सैनिक तैनात हैं और चीन की ओर से भी लगभग 50,000 सैनिक भारत-चीन सीमा पर तैनात हैं?
आदित्य राज कौल, एनडीटीवी: विदेश सचिव, मैं आदित्य राज कौल, एनडीटीवी से बोल रहा हूं। सीमा पार आतंकवाद के मामले में, क्या यहाँ पहलगाम आतंकवादी हमले का मुद्दा उठाया गया, क्योंकि ऐसी खबरें थीं कि लश्कर-ए-तैयबा और टीआरएफ के आतंकवादी वास्तव में चीनी उपकरणों का उपयोग कर रहे थे, जिनमें अल्ट्रा-सेट्स और एल्पाइन एप्स शामिल थे? इसके अलावा, ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में, पाकिस्तान सेना द्वारा इस्तेमाल किए गए चीनी उपकरण का मुद्दा भी चर्चा में आया क्या?
इसके अलावा, ताइवान के संबंध में एक दूसरा त्वरित सवाल। पिछली बार, जब वांग यी ने नई दिल्ली का दौरा किया था, तब कुछ प्रकार की संचार बाधा हुई थी। ताइवान के संबंध में, बीजिंग में यहाँ विदेश मंत्रालय की ओर से एक बयान जारी किया गया था। उन्होंने कहा कि नीति में किसी प्रकार का बदलाव हुआ था। क्या कोई बदलाव है? क्या आप ताइवान पर भारत के दृष्टिकोण को पुनः स्पष्ट करेंगे? धन्यवाद।
कोलम मर्फी, ब्लूमबर्ग: ब्लूमबर्ग से कॉलम मर्फी। मैं बस शी जिनपिंग द्वारा उठाए गए चौथे बिंदु की ओर इशारा करना चाहता था। साझा हितों की रक्षा के लिए बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के संबंध में। क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि भारतीय दृष्टिकोण से, वे कौन-कौन से बहुपक्षीय संगठन हो सकते हैं जिनके माध्यम से आप कार्य कर रहे हैं?
और विशेष रूप से, वे साझा हित क्या-क्या हैं? क्या इनमें, उदाहरण के तौर पर, व्यापार और शुल्क (टैरिफ) शामिल हैं? तो, क्या आप इस बिंदु पर थोड़ी और विशिष्ट जानकारी दे सकते हैं? राष्ट्रपति शी के इस बिंदु पर भारत का दृष्टिकोण क्या है? धन्यवाद।
अरुण, दूरदर्शन: सर मैं अरुण हूं दूरदर्शन से। सर एससीओ समिट के अंदर प्राइम मिनिस्टर मोदी का कल पार्टिसिपेशन रहेगा। तो किस तरह से बेसिकली इंडिया अप्रोच करेगा एससीओ समिट को इस बार? क्रॉस-बॉर्डर टेररिज़्म, आतंकवाद जैसे मुद्दे, टेरर फाइनेंसिंग जैसे मुद्दे, कई मल्टिलैटरल प्लेटफॉर्म में पहले भी रेज़ हो चुके हैं। लेकिन कल जब प्राइम मिनिस्टर मोदी होंगे और इंडिया किस तरह से एससीओ समिट को अप्रोच करेगा सर?
श्री विक्रम मिस्री, विदेश सचिवः ठीक है। … गौरि के सवाल, जैसे कि शुल्क आदि से संबंधित प्रश्न, के संदर्भ में, देखिए, मैं यह कहूंगा कि दोनों नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिति पर चर्चा की। उन्होंने उन चुनौतियों को स्वीकार किया जो हमारे आस-पास हो रही घटनाओं के परिणामस्वरूप उत्पन्न हो रही हैं और मैं कहूंगा कि चर्चा का मुख्य फोकस द्विपक्षीय क्षेत्र में ही रहा।
बेशक, जैसा कि मैंने कहा, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो कुछ हो रहा है उसे और इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को भी स्वीकार किया। लेकिन उन्होंने, एक तरह से, यह देखने का प्रयास किया कि इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर आपसी समझ को कैसे बढ़ाया जा सकता है और इन बदलती चुनौतियों के बीच भारत और चीन के आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
जहाँ तक आपके चीनी आवेदनों से संबंधित सवाल का संबंध है, फिलहाल मेरे पास इस पर कोई नवीनतम जानकारी नहीं है। आप इस संबंध में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संपर्क कर सकते हैं।
सुभाजित, आपका प्रश्न उस मुद्दे को स्पष्ट करने के बारे में है कि हमें सीमा पर सैनिकों के संदर्भ में भागीदारों को प्रतिद्वंद्वियों के रूप में क्यों नहीं देखना चाहिए। देखिए, जैसा कि मैंने कहा, दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि भागीदार के रूप में देखना, या इसे कुछ अलग ढंग से कहें तो, एक-दूसरे के लिए अवसर और चुनौती नहीं मानना—यही हमारे रिश्तों का ढांचा है। दोनों नेताओं ने इसी दृष्टिकोण के आधार पर रिश्तों की रूपरेखा तैयार की है। यही अपेक्षित है और यही वे रिश्तों के भविष्य के रूप में भी देखते हैं।
सीमा पर तैनात सैनिक, जो वास्तविकता हैं, हालाँकि मेरा मानना है कि यह स्थिति भी पिछले साल के दौरान विकसित होने लगी है, क्योंकि सीमाओं की स्थिति धीरे-धीरे सामान्य होने की ओर बढ़ रही है। यह वह स्थिति है जो किसी विशेष समय पर उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है और इससे स्पष्ट रूप से एक निश्चित संकट उत्पन्न हुआ है और यही वह संकट है जिसे हमने पिछले पाँच, पाँच ढाई वर्षों में संभालने या निपटने का प्रयास किया।
इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि दोनों नेता—और केवल ये दो नेता ही नहीं, बल्कि पूर्व नेता भी—ने जो रिश्तों के मध्यम से दीर्घकालीन भविष्य के लिए रूपरेखा तैयार की है, वह यही है कि हमें, दो बड़े पड़ोसी होने के नाते, दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से होने के नाते और दुनिया के केवल दो अरब से अधिक जनसंख्या वाले देशों के रूप में, एक-दूसरे के प्रति सहयोग और समझ का प्रयास करना चाहिए। वह भविष्य, जिसकी हमें आकांक्षा करनी चाहिए, जिस लक्ष्य की ओर हमें बढ़ना चाहिए और जिसके लिए हमें काम करना चाहिए, वह प्रतिस्पर्धा का नहीं बल्कि साझेदारी का भविष्य है।
आदित्य, आपके उन सवालों के संदर्भ में जो सीमा-पार आतंकवाद से संबंधित हैं…। देखिए, मैं केवल इतना कहूंगा कि, विवरण में जाए बिना, इस मुद्दे पर चर्चा की गई थी। इस मुद्दे को प्रधानमंत्री ने उठाया, और उन्होंने इस पर अपनी समझ बहुत ही स्पष्ट और विशिष्ट रूप से प्रस्तुत की। जैसा कि मैंने कहा, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह एक ऐसी समस्या है जिसका सामना दोनों, चीन और भारत, कर चुके हैं, और भारत अभी भी इस खतरे से लड़ रहा है और उन्होंने इस विशेष मुद्दे पर चीन का समर्थन माँगा और जैसा कि मैंने कहा, चीन ने इस मुद्दे को हल करने में विभिन्न तरीकों से अपना समर्थन दिया है।
आपके ताइवान से जुड़े प्रश्न के संदर्भ में, उत्तर काफी सरल है। ताइवान के संबंध में भारत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
कॉलम के उस प्रश्न के संदर्भ में कि दोनों नेताओं ने साझा हितों की रक्षा के लिए बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने पर क्या चर्चा की। असल में, यदि आप वैश्विक व्यापार या बहुपक्षीय वित्त जैसे क्षेत्रों में हो रही घटनाओं को देखें, तो यहां समझ मुख्य रूप से वैश्विक शासन में मौजूद घाटे को दूर करने के संदर्भ में है। इन संस्थाओं में, जो वैश्विक व्यापार या बहुपक्षीय वित्तीय ढांचे की देखभाल करती हैं। स्पष्ट है कि, उदाहरण के तौर पर, डब्ल्यूटीओ के कामकाज में एक कमी मौजूद है। यहाँ तक कि इस समय संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में भी एक कमी दिखाई दे रही है।
ये स्पष्ट रूप से दो बड़े देशों, जैसे कि भारत और चीन, के लिए साझा हित हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक, आर्थिक और वित्तीय मंच पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसलिए, इनके लिए यह स्पष्ट है कि इन संस्थाओं को मजबूत करने में एक निश्चित समझ होना जरूरी है, जिन्हें मूल रूप से इन मुद्दों को देखने का कार्य सौंपा गया था।
आपका जो सवाल था एससीओ को लेके। देखिये एससीओ की बैठक कल शुरु होने वाली है, और मेरा अनुमान है की एससीओ के बैठक के बाद हम एक वक्त्यव्य उसके बारे में निकालेंगे। तो अभी प्री-जज न करें, उसको प्रीएम्प्ट न करें, कल उसके बारे में कुछ समाचार आपको देंगे।
बहूत बहुत धन्यवाद।
श्री रणधीर जायसवाल, आधिकारिक प्रवक्ता: धन्यवाद महोदय। इसके साथ, देवियों और सज्जनों, हम इस प्रेस ब्रीफिंग को समाप्त करते हैं। हम आपको कल की घटनाओं और प्रगति के बारे में लगातार सूचित करते रहेंगे।
धन्यवाद।
तियानजिन
अगस्त 31, 2025