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पॉलिसी एक्सचेंज, लंदन में “कोविड के बाद की दुनिया में भारत और ब्रिटेन” विषय पर विदेश मंत्री का मुख्य भाषण

मई 06, 2021

लार्ड गॉडसन जी,
विशिष्ट अतिथिगण
और यहां मौजूद सभी लोगों का धन्यवाद


पॉलिसी एक्सचेंज में आज शाम "कोविड के बाद की दुनिया में भारत और ब्रिटेन” विषय आप सभी से मुख़ातिब होना मेरे लिए बेहद खुशी की बात है। यह एक कठिन समय है और हमारी इस सभा के आयोजन प्रारूप भी वैसा नहीं है जैसे हमने सोचा था। लेकिन, आज जिन मुद्दों पर मैं अपने विचार रखने वाला हूं वे अधिक स्थायी हैं। वे ऐसे मुद्दे हैं जो इस वक्त की चुनौतियां हैं, जो अधिक प्रासंगिक हो गई हैं।

2. अभी 48 घंटे पहले ही, हमारे देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच एक वर्चुअल शिखर सम्मेलन आयोजन किया गया, और इस दौरान हमारे संबंधों की सीमाओं को फिर से तय करने का काम किया गया। उन्होंने 2030 के लिए महत्वाकांक्षी रोडमैप पर सहमति व्यक्त की, जिससे हमारे बीच का सहयोग बढ़ेगा। इसके माध्यम से दोनों देशों और लोगों को हर संभव तरीके से एक-दूसरे से जोड़ा जाना है, जिसमें करीबी राजनीतिक संपर्क, गहन आर्थिक व वित्तीय आदान-प्रदान, अधिक कौशल व शिक्षा प्रवाह, मजबूत अनुसंधान व नवोन्मेष साझेदारी, और हमारे बीच के मौजूदा जुड़ाव को और गहरा करना शामिल है। इसका एक अन्य पहलू है कि हम दुनिया को कैसे देखते हैं और उन मुद्दों से कैसे निपटते हैं जिसका सामना दोनों देशों हर दिन करना पड़ता है। यह जुड़ाव रक्षा व सुरक्षा के क्षेत्र में, जलवायु कार्रवाई तथा विकास साझेदारी में, आतंकवाद व कट्टरता का मुकाबला करने में, या महामारी और साइबर चुनौतियों का सामने करने में हमारे बीच के सहयोग में नज़र आता है। साझा मूल्यों, समान प्रथाओं और कुछ साझा इतिहास की वजह से हमारे बीच का सहयोग बेहद सहज हो पाता है।

3. जैसा कि मैंने बताया, प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री जॉनसन के शिखर सम्मेलन के दौरान एक बहुत ही विस्तृत रोडमैप तैयार किया है जो हमारे संबंधों को बढ़ाने में आने वाले दिनों में नीति निर्माताओं और कार्यान्वयनकर्ताओं का मार्गदर्शन करने का काम करेगा। इस दौरान, एक उन्नत व्यापार भागीदारी की भी शुरुआत की गई, जिसमें बाजार पहुंच में सुधार करते हुए व्यापक मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की प्रतिबद्धता दोहराई गई है। मैंने गृह सचिव प्रीति पटेल के साथ प्रवासन एवं गतिशीलता पर एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिससे दोनों देशों के बीच प्रतिभाओं का आदान-प्रदान बढ़ेगा, जो हमारी ज्ञान अर्थव्यवस्थाओं के लिए बेहद जरुरी है। इसके अतिरिक्त, आज मैंने विदेश सचिव डोमिनिक राब के साथ एक वैश्विक नवोन्मेष साझेदारी पर भी हस्ताक्षर किया है, जो हमारे संबंधों में मौजूद अपार संभानाओं का प्रतीक है। मौजूदा समय को ध्यान में रखते हुए, हम स्वास्थ्य और लाइफ साइंस पर एक कार्य योजना तैयार करने पर सहमत हुए हैं, जिसमें वैक्सीन, थेरप्यूटिक्स और डाइग्नास्टिक्स पर सहयोग शामिल है। हमारे बीच के मौजूदा सहयोग से हमें कोविड की चुनौती से निपटने में मदद मिली है; लेकिन इसमें अभी काफी संभावनाएं हैं।

4. यह कदम काफी महत्वपूर्ण हैं, आप मुझसे पूछ सकते हैं कि ये ऐसे समय में क्यों उठाये जा रहे हैं, जब दुनिया में इतनी परिवर्तनकारी घटनाएं हो रही हैं। आपके सवाल का संक्षिप्त जबाव यह है कि, ये सभी कदम एक बहुत बड़े बदलाव का इशारा करते हैं, जो अब वास्तविकता बन रहा है। और आपके सवाल का विस्तृत जवाब यह होगा कि, ये कदम सकारात्मक रूप से हर देश के लिए दूसरे देश और वास्तव में दुनिया के बदलते हुए विचार को दर्शाते हैं। दोनों देशों ने विगत कुछ सालों में, अपने-अपने तरीके से समुद्र से जुड़े बदलाव किये हैं, जिससे आज हमारे संबंधों को फिर से जोड़ने में मदद मिली है। जहां तक ब्रिटेन का सवाल है, ब्रेक्सिट के बाद से इसको लेकर बहुत अलग राजनीति दृष्टिकोण बना है। भारत में, 2014 के बाद से निर्णायक बदलाव हुए हैं, जो कि इसके राष्ट्रीय विशेषताओं, विविधता व लोकतांत्रिक प्रेरणा को दर्शाते हैं, जिसने इसे अधिक भरोसेमंद भागीदार बनाया है। और यही विकास, और विश्व राजनीति की बदलती प्रकृति, हमारे संबंधों की कुंजी है।

5. भारत के नज़रिए से, कई यूके हैं जिनके साथ हम जुड़ना चाहते हैं: ग्लोबल ब्रिटेन, अटलांटिक यूके, यहां तक​कि ब्रेक्सिट के बाद यूरोप, लंदन शहर, लंदन को छोड़कर शेष यूके, प्रवासी, नवोन्मेष व शिक्षा संबंधित यूके, और रणनीतिक व ऐतिहासिक यूके। उनके बीच का आंतरिक संतुलन ब्रेक्सिट की वजह से स्थानांतरित हो गया है और वैश्विक पहलू आज सबसे आगे है। एकीकृत समीक्षा करें तो यूके इंडो-पैसिफिक में बढ़ती हिस्सेदारी के साथ यूरो-अटलांटिक अभिनेता के रूप में नज़र आता है। निश्चित तौरपर, इससे यह भारत के लिए रणनीतिक रुप से अधिक प्रासंगिक हो जाता है। दुनिया में ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां ब्रिटेन के ऐतिहासिक हित और प्रभाव हैं। उनमें से कुछ, खाड़ी देश या दक्षिण पूर्व एशिया है, जहां पिछले कुछ दशकों में भारत की प्रोफ़ाइल और इक्विटी तेजी से बढ़ी है। इंडो-पैसिफिक में भी, यूके जैसे देशों की अधिक भागीदारी नियम-आधारित व्यवस्था का सम्मान करते हुए स्थिरता को बढ़ावा देती है। मैं यह कहना चाहूंगा कि आपके इंडो-पैसिफिक कमीशन की सिफारिशें इस लिहाज से बेहद सामयिक हैं। समकालीन विश्व व्यवस्था की विशेषता वाली बहुध्रुवीयता को देखते हुए, दोनों शक्तियों के लिए यह स्वाभाविक है कि हम जुड़ाव के रास्तों की तलाश करें। हमारा एक साझा इतिहास है, जो कभी-कभी अलग-अलग भी हो सकता है; लेकिन हमारा विज़न और इच्छाशक्ति निश्चित रूप से हमें इसका भलाई के लिए इस्तेमाल करने में मदद कर सकते हैं। दोनों देश बड़े क्षेत्रों में एक-दूसरे की भूमिका और योगदान को समझते हैं, जो रणनीतिक संबंध के लिए अधिक मजबूत नज़र आता है।

6. इसके लिए, नये भारत की उचित समझ होना भी जरुरी है, जिसकी तरफ भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। सात दशकों के रोचक और प्रभावी लोकतंत्र ने नीति निर्माण व आकांक्षाओं दोनों को पारंपरिक जुड़ाव से आगे ले जाने का काम किया है। इसकी वजह से भारत अधिक आत्मविश्वासी और प्रामाणिक बना है, लेकिन इसके साथ ही इसकी महत्वाकांक्षा भी बढ़ी है और अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्पित भी हुआ है। यह भारत परिणामों पर ध्यान देता है और इसके लिए दूसरों के साथ मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। मैंने जिस कई तरह के यूके की बात की, उनमें भारत को देने को लिए बहुत कुछ है, चाहे बात तकनीक की हो, संसाधनों, अवसरों और या फिर अच्छे तरीकों की हो, या दुनिया को सुरक्षित और बेहतर जगह बनाने की हो। बदले में, भारत ब्रिटेन के लिए विशेष महत्व रखता है, ब्रिटेन के लिए यह प्रतिभा का एक पूल है, बढ़ता हुआ बाजार है, नए विचारों व नवोन्मेषों का इनक्यूबेटर है या विश्व मंच का एक अधिक प्रभावशाली खिलाड़ी है। इस सबके बावजूद, हम एक पूरक समाज और अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिनमें एक-दूसर को देने के लिए काफी कुछ है। उन्हें अधिक प्रभावी तरीके से एक साथ लाना हम दोनों के लिए लाभदायक है। ग्लोबल यूके शायद पहले की तुलना में ऐसा करने की अधिक तैयार होगा, इसी तरह नया भारत भी पहले की तुलना में इसके लिए अधिक तत्पर है। इसके लिए, हम परेशानियों से जूझ रही दुनिया में अपने साझा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए साफ मन और नए सिरे से एक-दूसरे से जुड़ने के लिए तैयार हो सकते हैं। लेकिन ऐसा करने में चुनौतियां भी होंगी, क्योंकि अभिसरण में अभी भी अनुरूपता नहीं आई है। हमारा खुद का अवरोध इसका एक कारक होगा, जिसकी वजह शायद विश्व राजनीति की बढ़ती जटिलता भी है।

7. क्योंकि हम अभी भविष्य की ओर देख रहे हैं, इसलिए हमें अपने संबंधों को बढ़ाने के लिए इतिहास का सकारात्मक इस्तेमाल करना चाहिए। प्रवासी भारतीयों की भूमिका इसमें सबसे अहम है और संबंधों के इस जीवंत आधार को सावधानीपूर्वक और सतत पोषित किया जाना चाहिए। समाज के रूप में हमारे बीच की सहजता, व्यापार और प्रतिभा के प्रवाह में भी नज़र आती है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में खुद के पिछले अनुभव से, मैं इस बात को बेहतर समझता हूं। जब रणनीति और राजनीति की बात आती है, तो हमें इसमें दुनिया की भलाई को प्राथमिकता देने का प्रयास करना चाहिए, और ऐसा खुद-ब-खुद नहीं हो सकता। अपने क्षेत्र से संबंधित पारंपरिक दृष्टिकोण को बदलने में, जिसके साथ ब्रिटेन निकटता से जुड़ा हुआ है, निश्चित तौर वह अत्यंत उपयोगी होगा।

8. नए अवसरों को देखते हुए हमें अपने देश में भी राजनीतिक विकास को सुविधाजनक बनाना होगा। लेकिन इसमें सबसे अधिक प्रभावी कारक आज के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मौजूद बाध्यताएं हैं। हम अमूमन, समानताओं, बहुलवादी समाज, राजनीतिक लोकतंत्र और बाजार अर्थव्यवस्था से इनसे निपटने का प्रयास करते हैं। एक स्तर पर, हम अभी अधिक वैश्वीकृत और तकनीक संचालित दुनिया में हैं जो हमें अधिक अंतर-निर्भरता और अंतर-पैठ के लिए प्रोत्साहित करती है। लेकिन साथ ही साथ, हालिया घटनाओं ने हितों, मूल्यों और प्रथाओं के बारे में जागरूकता पैदा का काम किया है। दोनों देश वर्तमान व्यवस्था द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों से प्रभावित हैं, चाहे वह नियमों, नियंत्रण और मानदंडों के पालन करने की बात हो या विश्वास के जिम्मेदार तथा उदार व्यवहार की बात हो। अगर हमारे दोनों देश अपने सहयोग को मजबूत करें, तो आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों से भी अधिक प्रभावी तरीके से निपटा जा सकता है।

9. कोविड के दौर ने कई बदलावों को गति दी है। चाहे हमारे वैज्ञानिकों के एक साथ काम करने की बात हो, या फिर हमारे फार्मा व्यवसाय द्वारा साझेदारी में किया जा रहा निर्माण हो या यूके द्वारा इस मुश्किल वक्त में भारत को दी गई मदद हो, हर एक अनुभव से बड़े सबक सिखने को मिले हैं। कोविड की वजह से विश्व स्तर पर विश्वास और पारदर्शिता का मुद्दा भी सामने आया है, और शायद विश्वसनीयता और लचीलापन का मुद्दा भी सामने आया है। महामारी से वैश्वीकरण के जोखिम उजागर हुई हैं, भले ही इससे सहयोग के नए अवसर खुलते हो। इसने हमें जन स्वास्थ्य और आर एंड डी में मिलकर काम करने में मदद तो की ही है, साथ ही साथ इसने सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक शासन में भी हमें एकजूट करने का काम किया है। ऐसे समय में जब हमारी साझेदारी एक नए स्तर पर पहुंचने वाली थी; इस नए संदर्भ ने इसे और गति दी है।

10. इतिहास में स्थाई संबंध बनाने के लिए हमेशा विजन, मूल्यों और नेतृत्व की जरुरत होती है। आज, भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों में रूढ़िवादियों से आगे बढ़ने और हमारी संबंधों को एक नया आयाम देने की क्षमता नज़र आती है। यह हमारे कई साझेदारियों में भी देखने को मिलती है, जो इतनी प्रभावशाली हैं कि वो न केवल हमारे सहयोग को बहुत आगे ले जा सकती हैं, बल्कि इसके लाभ द्विपक्षीय लाभों से कहीं अधिक हैं। दुनिया आज एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संबंध को फिर से उभरता हुआ देख रही है और मुझे पूरा यकीन है कि अपने ब्रिटिश भागीदारों के साथ काम करते हुए, हम अपने वादे पर पूरी तरह से अमल करेंगे। मेरी बातों को सुनने के लिए आप सभी का धन्यवाद।



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